
सरल शब्दों में हार्टफुलनेस का अर्थ दिल की भाषा सीखना है।

यदि आप में विनम्रता और सरलता के गुण हैं तो आप यह मान सकते हैं कि आपके पास वह सबकुछ है जो आपको चाहिए।

हमारा भूतकाल हमारे वर्तमान को निर्धारित करता है जो बदले में हमारे भविष्य को तय करता है। इस प्रकार हम स्वयं अपनी नियति का निर्माण करते हैं।

मानवता की नियति के निर्माण की शुरुआत हम स्वयं से करते हैं। पहले स्वयं की चेतना का विकास करते हैं फिर उसे विस्तारित करके उसमें दूसरों को भी शामिल करते जाते हैं।

यदि दिल भटक जाए तो हमें क्या करना चाहिए? ध्यान। क्योंकि ध्यान करने से भटकाव दूर हो जाता है।

अगर हम उफ़नते समुद्र की तरह जीवन जीना पसन्द करेंगे तो अपनी अशान्त चेतना की लहरों में कहीं गुम हो जाएँगे।

मन के उच्चतर स्तरों पर उच्चतर चिन्तन जरूरी है। निम्न स्तर के खयालों में न उलझकर हमें इससे दूर और आगे निकल जाने का प्रयास करते रहना चाहिए।

सेवा करते समय अगर सेवा करने का खयाल बना रहे तो असलियत हासिल नहीं हो सकती। ये तो तभी हासिल होती है जब सेवा करते समय इसे करने का अहसास तक न हो।

विचारों का अविरल प्रवाह केवल ध्यान के समय ही नहीं, हर समय होता रहता है। मन का नियमन न होने के कारण वह उनके साथ हो लेता है और तरह-तरह की परेशानियाँ और व्यवधान पैदा करता रहता है।

विचारों पर ध्यान न देना ही उनसे लड़ने का श्रेष्ठ साधन है, क्योंकि हमारे ध्यान दिये बिना विचारों के पास कोई शक्ति नहीं होती है।

इतना सरल अभ्यास लाखो लोगों की नियति को कैसे बदल सकता है? दरअसल विचार की शक्ति से परिवर्तन को दिशा प्रदान करने और प्रेम की शक्ति से सबको जीत लेने की मानवीय मन और हृदय की असीम सामर्थ्य के कारण ही यह सम्भव हो पाता है।

असली ख़ुशी मन की वह अवस्था है जिसमें ख़ुशी का ख़याल भी पूरी तरह ग़ायब रहता है।

जब कई लोग प्रेम भरे दिल के साथ सामूहिक ध्यान करते हैं तो एकता और शान्ति स्वतः आ जाती है।

जिनसे आपको भय हो और जो आपके शत्रु हों उनसे दोस्ती कर लें और दूसरों के साथ ऐसा बरताव न करें जो आप नहीं चाहते कि वे आपके साथ करें।

नियति को वर्तमान में ही बदला जा सकता है।

अपने अस्तित्व के हर पहलू में हृदय को शामिल करें।

यह सच है कि समझदारी आत्म-निरीक्षण से बढ़ती है, लेकिन इसके लिए समय किसके पास है? जो इसके लिए रुचि पैदा करेंगे उनको समय भी मिल जाएगा।

ध्यान करने से चेतना आपका आईना बन जाती है और आपके सहज स्वभाव को प्रतिबिम्बित करने लगती है।

जैसे-जैसे हमारी चेतना का विस्तार होता जाता है, जीवन के हर क्षेत्र में हृदय से स्वत: ही मार्गदर्शन आने लगता है। ।

अगर कोई चीज़ अनंत से उत्पन्न होती है तो यह अपने साथ अपने उद्गम का सार तत्त्व भी ले आती है और इस तरह उसमें असीमितता का बोध बना रहता है।

पतझड़ में पेड़ से गिरने वाले पत्तों की तरह न बनें, जिन्हें हवा द्वारा यहाँ से वहाँ दिशाहीन, लक्ष्यहीन उड़ा दिया जाता है।

आध्यात्मिकता की खोज में जुटे व्यक्ति को गढ़ने के लिए ज़रूरी चीज़ों में से एक है- समभाव। इसका अर्थ है सभी इंद्रियों व अन्तर्जात क्षमताओं में संतुलन।

यदि आप आग के पास बैठकर गरमाहट और बर्फ़ के पास बैठकर ठंडक महसूस करते हैं तो आप ऐसे व्यक्ति के संपर्क में रूपांतरित क्यों नहीं होंगे जो अनुशासन व शिष्टाचार में परिपूर्ण है?

अन्त:करण को 'दिल की आवाज़' के रूप में वर्णित किया जा सकता है।

भेदभाव और पूर्वाग्रह की हमारी भावनाएँ ही हमारे मार्ग की सबसे बड़ी बाधा होती हैं।

स्वयं को शुद्ध करने के लिए हमें अपनी उन सभी आदतों और भावनाओं को सुधारना होगा जो सद्चरित्र एवं संस्कृति के विरुद्ध हैं, साथ ही सभी प्रवृत्तियों को भी परिष्कृत करना होगा ताकि हम स्वयं की परिपूर्णता तक पहुँच सकें।

जब कोई नेक काम किया जाए तो उससे मिलने वाली ख़ुशी औरों में बाँटें। तब चेतना अबाध रूप से बढ़ेगी।

एक बार जब किसी काम में दिलचस्पी पैदा हो जाए तब अनुशासन की भी ज़रूरत नहीं रहती।

जीवन एक पाठशाला है जहाँ हमें सबक सीखकर अगली कक्षा में जाना होता है।

एक बेहतर भविष्य की कल्पना करें। सोचें कि यह संसार आनंदमय बनता जा रहा है और यह कि अच्छे दिन आ रहे हैं। धीरे-धीरे ऐसा होता जायेगा।