जेसन नटिंग विचारों के स्वरूप पर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं और बता रहे हैं कि कैसे किसी भी परिस्थिति में पहली प्रतिक्रिया करने के बजाय थोड़ा ठहरकर, मन के शोर को कम करके, अतीत के बोझ को हटाकर और किसी महानतर से जुड़कर व उसके साथ तालमेल बनाकर हम ऐसा स्थान बना सकते हैं जिसमें हृदय बोल पाए और हमारे अंदर से विवेक उजागर हो।
“आपके जीवन की गुणवत्ता आपके विचारों की गुणवत्ता से निर्धारित होती है।”
—मार्कस ऑरेलियस
लेकिन क्या होगा यदि आपके जीवन को निर्धारित करने वाले विचार वास्तव में आपके न हों?
हमें प्रत्येक क्षण एक विचार आता है। यह तेज़ी से आता है, अपने आप आता है और जाना पहचाना-सा होता है। यह विचार हमारे पिछले अनुभवों, आदतों और अवचेतन मन के प्रभाव से बनता है। इसे हम चुनते नहीं बल्कि यह एक अनैच्छिक क्रिया है।
चलिए हम इसे आपका पहला विचार मान लें।
लेकिन इसके पश्चात् क्या होता है?
आपके पहले विचार और आपके अगले कदम के मध्य का क्षण ही वह पल है जहाँ स्वतंत्रता होती है।
यहीं से रूपांतरण की शुरुआत होती है।
इसी स्थान से आपका हृदय कुछ कहता है।
यह ज़रूरी नहीं कि पहला विचार बुद्धिमत्तापूर्ण, सही या उसके अनुरूप हो जैसा आपको होना चाहिए। यह तो केवल आपके लिए
जाना-पहचाना होता है।
आपकी आदत, आपकी ऊर्जा और जागरूकता के आधारभूत स्तर के अनुसार ही यह पहला विचार बनता है। आप सामान्यतया इसी प्रकार से महसूस करते, सोचते और जीवन में प्रतिक्रिया देते हैं।
लेकिन जब जीवन में तनाव, दबाव या अनअपेक्षित चुनौतियाँ आती हैं, आप सक्रिय हो जाते हैं, ऊर्जा तेज़ी से बढ़ने लगती है जिससे भावनाएँ बढ़ जाती हैं, मनस तेज़ी से कार्य करने लगता है और पुराने बचाव के तरीके हावी होने लगते हैं।
इसी समय भय, आत्म-संदेह और रक्षात्मकता बहुत प्रबलता से उभरती है। बिना जागरूकता के, इस स्थिति में उभरा पहला विचार सत्य प्रतीत होता है। लेकिन यह केवल एक प्रतिक्रिया मात्र है।
इसीलिए अंतराल मायने रखता है। यही वह जगह है जहाँ स्वतंत्रता का आरंभ होता है।
यह स्वचालित मन है जो अतीत के घटनाक्रम-नियोजन के आधार पर जीवन के प्रति प्रतिक्रिया करता है।
- कुछ भी नया करने से पहले आप प्रतिरोध महसूस करते हैं।
प्रथम विचार - “मैं यह नहीं कर सकता।”
- •किसी बातचीत के दौरान आप उत्तेजित हो जाते हैं।
प्रथम विचार - “वे मेरा सम्मान नहीं करते।”
- आप एक लक्ष्य निर्धारित करते हैं और आपके मन में संदेह घर कर जाता है।
- ध्यान - भीतर के शोर को शांत करता है ताकि आप अपने हृदय की आवाज़ सुन सकें।
प्रथम विचार - “मैं पहले भी असफल हुआ हूँ। तो फिर कोशिश क्यों करनी?”
प्रथम विचार अक्सर भय, ज़िंदा रहने की ज़रूरत या अहम की नियंत्रण करने की इच्छा से आता है। यह अनुकूलित स्व, संकुचित मन तथा पुरानी बातों का दोहराव ही है।
ऐसे में यदि आप तुरंत प्रतिक्रिया दे देते हैं तो अपने उस संकुचित मन को और भी प्रबल बना देते हैं।
अब इसमें परिवर्तन लाने के लिए -
आपके लिए अपने प्रथम विचार को मानना ज़रूरी नहीं है।
संघर्ष के उस एक क्षण की कल्पना कीजिए… यह शायद हताशा, संदेह या किसी पुरानी आदत का खिंचाव हो।
प्रथम विचार अपने आप ही उभरता है।
लेकिन फिर एक विराम होता है जिसमें एक गहरी सा लें और दिल की धड़कन को सुनें।
और फिर उस शून्यता से एक नई आवाज़ उभरती है -
“यदि मैं प्रयास करूँ तो क्या होगा?”
“यदि मैं प्रेम से प्रत्युत्तर दूँ तो क्या होगा?”
“यदि मैं भरोसा करूँ तो क्या होगा?”
एक फुसफुसाहट की तरह यह आवाज़ धीमी लेकिन गहरी होती है…
यह मन की तरह ज़िद नहीं करती।
यह सब जानती है।
यही हृदय की आवाज़ है।
हृदय जल्दबाज़ी नहीं करता। यह प्रतिक्रिया
भी नहीं देता। यह पुराने तरीकों को भी नहीं दोहराता।
यह विवेक, वहाँ पूरी तरह से मौजूद रहकर और सच्चाई से प्रतिक्रिया देता है।
लेकिन इसको सुनने के लिए आपको भीतर खालीपन और एक विराम पैदा करना होगा।
हृदय का विवेक हमेशा उपलब्ध रहता है लेकिन अधिकतर लोग इसका उपयोग नहीं कर पाते क्योंकि वे हमेशा जल्दी में रहते हैं।
वे हृदय का संकेत प्राप्त होने से पहले ही प्रतिक्रिया दे देते हैं।

इसीलिए हार्टफुलनेस के अभ्यास सहायक हैं क्योंकि वे आप में ठहराव लाते हैं ताकि आप हृदय की आवाज़ को सुन सकें। अभ्यास का प्रत्येक पक्ष इस जागरूकता को विकसित करने में मदद करता है।
- सफ़ाई - नकारात्मक सोच और पुरानी छापों को हटाकर खालीपन पैदा करती है।
- प्रार्थनापूर्ण जुड़ाव - आपको किसी महानतर चीज़ से जोड़ता है और हृदय को बुद्धिमता से परे विवेक के अनुरूप बनाता है।
दैनिक अभ्यास के द्वारा कुछ गहन घटित
होता है -
द्वितीय विचार जो जागरूकता, अंतर्ज्ञान और गहरी समझ से बनता है, अब अधिक सहजता से प्रकट होने लगता है।
यह आपके भीतर कमल-पुष्प खिलने का संकेत है अर्थात आपका आंतरिक विकास हो रहा है।
समय के साथ यह द्वितीय विचार प्रथम विचार की जगह ले लेता है।
यही रूपांतरण का मार्ग है।
हृदय का विवेक हमेशा उपलब्ध रहता है लेकिन अधिकतर लोग इसका उपयोग नहीं कर पाते क्योंकि वे हमेशा जल्दी में रहते हैं।
आरंभ में इस प्रक्रिया को सचेत प्रयास की आवश्यकता होती है।
आप ज़रा ठहरें, सुनें तथा हृदय को अपना मार्गदर्शन करने दें।
लेकिन जैसे-जैसे आप अभ्यास करते हैं, यह परिवर्तन स्वाभाविक होता जाता है।
और एक दिन आप महसूस करते हैं कि
किसी भी चुनौती पर आपकी पहली प्रतिक्रिया भरोसा है, भय नहीं।
तनाव के प्रति आपकी पहली प्रतिक्रिया शांति है, घबराहट नहीं।
किसी भी संबंध में आपका पहला मनोवेग प्रेम है, बचाव नहीं।
द्वितीय विचार प्रथम बन जाता है।
यही हृदय और मस्तिष्क का वास्तविक एकीकरण है।
अब यह मनोवेग और विवेक के मध्य संघर्ष नहीं रहता ।
यही आपसी सामंजस्य है।
बस यही करना है -
थोडा ठहरें।
मन के शोर को हटाएँ
पुरानी छापों के भार को कम करें।
किसी महानतर चीज़ से जुड़कर उसके अनुरूप बनें।
प्रत्येक अभ्यास विचारों के बीच ठहराव लाता है और हृदय की आवाज़ को बुलंद करता है।
और समय के साथ हृदय की आवाज़ द्वितीय विचार नहीं रह जाती है।
यह प्रथम बन जाती है तथा हम एक बार फिर से हृदय से आगे बढ़ना सीख जाते हैं।
यह कोई सिद्धांत नहीं है।
यह एक अभ्यास है।
प्रत्येक अभ्यास विचारों के बीच ठहराव लाता है और हृदय की आवाज़ को बुलंद करता है।
अब प्रश्न यह है -
कि क्या आप इसे सुनेंगे?
यदि यह आपको सही लगे तो आज आप एक क्षण के लिए ठहरें।
जब भी कोई विचार उभरे तब तुरंत प्रतिक्रिया न दें।
अपने दिल की धड़कन से जुड़ने के लिए एक-दो पल के लिए साँस लें।
खालीपन पैदा करें।
और सुनें।
हृदय तो हमेशा से ही बोलता रहा है। बस, ज़रा ठहरें और फिर आप इसे सुन पाएँगे।
तो क्या आप इस परिवर्तन का अनुभव करने के लिए तैयार हैं?

जेसन नटिंग
जेसन एक व्यायाम एवं पोषण विशेषज्ञ हैं। इनके कार्य की शुरुआत अमेरिका की वायुसेना से हुई थी और बाद में वे एक प्रमाणित कोच बन गए जिसके तहत उन्होंने मोटापा कम करने, कार्य-प्रदर्शन एवं प... और पढ़ें
