डॉक्टर जयराम थिम्मापुरम और गायत्री के. नींद के विज्ञान, हमारे स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव और बेहतर आराम में सहयोग देने वाली आदतों के बारे में बात कर रहे हैं।
प्र. - डॉ. जय, क्या आप हमें नींद और इसमें आने वाली विभिन्न अवस्थाएँ समझा सकते हैं? हमें यह भी बताइए कि समग्र स्वास्थ्य और कल्याण में ये सभी अवस्थाएँ क्यों महत्वपूर्ण हैं?
इन प्रश्नों को पूछने के लिए आपका धन्यवाद। नींद एक ऐसा विषय है जो मेरे दिल के बहुत करीब है और सोना मुझे अच्छा लगता है। यदि मेरे पास अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने का विकल्प हो तो मैं थोड़ा और सोना चाहूँगा।
यदि सोचें कि नींद क्या है तो यह एक अस्थाई व प्रतिवर्ती विराम है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें हमारी सजग जागरूकता अस्थाई रूप से निलंबित हो जाती है। नींद में हमारी एक अलग तरह की जागरूकता हो सकती है लेकिन सजग जागरूकता, विशेष रूप से अपने परिवेश की जागरूकता, नहीं रहती।
नींद एक ऐसी अवस्था है जिसमें शरीर, मन और शरीर के अंदर की सारी कोशिकाओं का नवीनीकरण और स्वास्थ्यलाभ भी होता है। शरीर के जो भी कार्य होने ज़रूरी होते हैं, उन्हें कोशिकाएँ नींद के दौरान पूरा करती हैं। इसलिए नींद हमारे लिए प्रकृति का सबसे अद्भुत उपहार है। यदि इस उपहार का उचित उपयोग किया जाए तो यह हमारे शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक कल्याण में बहुत योगदान कर सकता है।
अब नींद की अवस्थाओं पर बात करते हैं। यदि आप किसी को आँखें बंद करके सोते हुए ध्यान से देखें तो पाएँगे कि उसकी पुतलियाँ धीरे-धीरे एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ घूमती हैं। ऐसा कुछ समय तक होता है और फिर वे तेज़ी से घूमने लगती हैं। नींद के दौरान पूरा समय यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है।
यदि हम सोते हुए व्यक्ति के मस्तिष्क से पैदा होने वाली तरंगों का अध्ययन करें तो पाएँगे कि नींद के पूरे चक्र में हर व्यक्ति के मस्तिष्क में तरंगों के अलग-अलग तरह के पैटर्न उत्पन्न होते हैं। प्रारंभिक चरण में मस्तिष्क थोड़े आराम में रहता है। इसके बाद यह और अधिक आराम में आ जाता है जब मस्तिष्क में थीटा तरंगे पैदा होती हैं। इसे हम नींद की पहली अवस्था कहते हैं। दूसरी अवस्था में हमारे अंदर के-कॉम्प्लेक्स (K-complexes) के साथ थीटा तरंगें दिखाई देती हैं। तीसरी अवस्था सबसे गहरी नींद की अवस्था होती है और इसमें डेल्टा तरंगें पैदा होती हैं। एक अवस्था से दूसरी अवस्था तक ये तरंगे उत्तरोत्तर धीमी होती चली जाती हैं। डेल्टा तरंगें इन विभिन्न तरंगों में सबसे ज़्यादा धीमी होती हैं।
नींद की तीनों अवस्थाओं को पार कर लेने के बाद हम एक और अवस्था में प्रवेश करते हैं जहाँ हम स्वप्न देखते हैं। हम इसे ‘रैपिड आय मूवमेंट’ (REM) की दशा कहते हैं। पहले की तीन अवस्थाओं के दौरान हमारी पुतलियाँ धीमे घूमती (NREM) हैं। उसके बाद की अवस्था में जब हमारी आँखों की पुतलियाँ तीव्र गति से घूमती हैं तब मुख्य रूप से हम स्वप्न देखते हैं। नींद की प्रत्येक अवस्था की एक विशेष भूमिका होती है। पहली अवस्था में मस्तिष्क की तरंगें थोड़ी धीमी होने लगती हैं लेकिन आप पूरी तरह से नींद में नहीं होते हैं। आपको जगाना आसान होता है।
दूसरी अवस्था में आपकी माँसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं लेकिन फिर भी आपको जगाया जा सकता है हालाँकि यह पहली अवस्था जितना आसान नहीं होता। तीसरी अवस्था में मस्तिष्क की तरंगें बहुत ज़्यादा धीमी हो जाती हैं और पूरा शरीर बहुत आराम में होता है। कदाचित यह नींद की सबसे गहरी अवस्था है जिसे आप प्राप्त कर सकते हैं।
आराम की उस सबसे गहरी अवस्था में हमारा रोगप्रतिरोधक तंत्र मज़बूत होता है और हमारा विकास होता है। शरीर की मरम्मत से संबंधित कोई भी कार्य नींद की इस तीसरी अवस्था के दौरान होता है। यदि हम स्वप्नावस्था की बात करें तो हम स्वप्न क्यों देखते हैं, इस पर बहुत से सिद्धांत बनाए गए हैं। हम जानते हैं कि यह अवस्था बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी अवस्था में हम अपनी भावनाओं को समझते हैं और उन्हें नियोजित करते हैं। कुल मिलाकर, ये नींद की अवस्थाएँ हमारे स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए महत्वपूर्ण होती हैं।
प्र. - पिछले कुछ वर्षों में अनिद्रा से पीड़ित लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आपके अनुसार इस वृद्धि के लिए कौन-से कारण मुख्य रूप से ज़िम्मेदार हैं?
मेरे मत में अनिद्रा के अधिकतर मामलों में हम स्वयं इस समस्या को उत्पन्न करते हैं और यह हमारी जीवनशैली से संबंधित है। हमें यह समझना चाहिए कि जब हम शिशु थे तब हमें नींद की कोई समस्या नहीं थी। बचपन में भी हमें नींद की कोई समस्या नहीं थी। किशोरावस्था में हम समझने लगते हैं कि नींद को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और फिर इस समय को हम ऐसी गतिविधियों में व्यतीत करते हैं जो हमारे लिए ज़रूरी हो भी सकती हैं और नहीं भी। इस तरह हम नींद से समझौता करने लगते हैं।

जब हम लगातार ठीक से नींद नहीं लेते और प्रकृति के इस उपहार का पर्याप्त उपयोग नहीं करते तब एक ऐसा समय आता है जब हम इसकी भरपाई नहीं कर सकते यानी ठीक से सो ही नहीं पाते। नींद का कर्ज़ आसानी से नहीं चुकाया जा सकता। प्रत्येक रात की नींद की हानि की भरपाई करने के लिए हमें कम से कम दो रातें लगती हैं। यदि इस तरह से देखा जाए तो हम इतने वर्षों, शायद दशकों तक नींद के मामले में जो समझौता करते रहते हैं, हमारा शरीर केवल एक हद तक ही उसे झेल सकता है। एक बार जब वह हद पार हो जाती है तब शरीर के लिए इससे उबरना मुश्किल हो जाता है। तभी नींद की समस्याएँ प्रकट होने लगती हैं। अन्य परिस्थितियाँ भी हैं जो आनुवांशिक हो सकती हैं और उन समस्याओं को हल करना बहुत मुश्किल होता है।
जीवनशैली की दृष्टि से, यदि आप छोटी उम्र से ही, जब हमारे मन अच्छी चीज़ों को अपनाने के लिए ग्रहणशील होते हैं, गहरी नींद लेने की आदत विकसित कर लें और अच्छी नींद के महत्व को समझ लें, तो आप अनिद्रा की समस्या को काफ़ी हद तक हल कर सकते हैं।

आराम की उस सबसे गहरी अवस्था में हमारा रोगप्रतिरोधक तंत्र मज़बूत होता है और हमारा विकास होता है। शरीर की मरम्मत से संबंधित कोई भी कार्य नींद की इस तीसरी अवस्था के दौरान होता है।
आधुनिक युग में अनिद्रा की समस्या निश्चित तौर पर बढ़ रही है। विश्व के लगभग एक तिहाई लोगों को किसी न किसी रूप में नींद की समस्या है। यदि आप अपने जीवन का एक पक्ष सुधार लें, जो है नींद, तो आपके जीवन की हर चीज़ पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अपनी नींद को सुधार लेने से इसका एक सकारात्मक प्रभाव धीरे-धीरे आपके जीवन के हरेक पहलू - शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक - पर पड़ेगा।
प्र. - एक डॉक्टर के तौर पर आपका जीवन बहुत व्यस्त होगा। क्या पर्याप्त नींद ले पाना आपके लिए चुनौतीपूर्ण है?
हाँ, विशेषकर जब हम अपने दैनिक जीवन में इतने सारे तनावों और खिंचावों से जूझते हैं। हम सभी डॉक्टर अनेक चिंताओं से गुज़रते हैं और वे हमारी नींद को प्रभावित करती हैं। यह ऐसा है मानो जब हम सो रहे होते हैं तब भी पृष्ठभूमि में किसी कम्प्यूटर का प्रोग्राम चलता रहता है।
यह हमें नींद की गहरी आरामदायक अवस्था में जाने नहीं देता। मेरे अनुसार, जब तक हम सोने से पहले चिंताओं और परेशानियों को हटा नहीं देते, वे हमारी नींद को प्रभावित करती रहेंगी। अधिकांश स्वास्थ्यकर्मी नींद की समस्याओं का सामना करते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान हमारे द्वारा किए गए एक अध्ययन में 10 में से 9 स्वास्थ्य सेवा कर्मियों में नींद की समस्या पाई गई थी।
प्र. - आप चिंताओं और परेशानियों का प्रबंधन कैसे करते हैं? क्या आप कोई ऐसे उपाय या सुझाव बताना चाहेंगे जो उन स्वास्थ्य सेवा कर्मियों की सहायता कर सकें जो शायद इसी तरह की चिंताओं या परेशानियों से जूझ रहे हैं?
हम सभी लोग दिनभर किसी न किसी स्तर पर भावनात्मक समस्या या परेशानी से गुज़रते हैं। आइए, सुविधा के लिए हम उन्हें भावनात्मक फ़ाइलें मान लें। इनमें से कई भावनात्मक फ़ाइलों का निपटारा हो जाता है और कुछ का नहीं हो पाता। फिर हम एक तरह से उन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं और सोने चले जाते हैं।
जब हम सो रहे होते हैं तो जैसे हमारे अंदर बैठा कोई कार्यालय सहायक हर फ़ाइल की जाँच करके कहने लगता है, “तुमने यह फ़ाइल निपटा दी, तुमने यह फ़ाइल निपटा दी। तुमने यह फ़ाइल नहीं निपटाई है। तुम इसका क्या करना चाहते हो?” फिर आप जाग जाते हैं और आपको पता नहीं चलता कि आप क्यों जाग गए। लेकिन आप फिर सो नहीं पाते।
एक पद्धति, जिसने बहुत सहायता की है, सिर्फ़ मेरी ही नहीं बल्कि मेरे कई सहकर्मियों की भी, वह है हार्टफुलनेस। हालाँकि हार्टफुलनेस जैसी ध्यान पद्धतियाँ अभ्यासियों की बहुत मदद करती हैं लेकिन कुछ अन्य कारक भी हैं जिनके बारे में जानना ज़रूरी है।

यदि आप अपने जीवन का एक पक्ष सुधार लें, जो है नींद, तो आपके जीवन की हर चीज़ पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अपनी नींद को सुधार लेने से इसका एक सकारात्मक प्रभाव धीरे-धीरे आपके जीवन के हरेक पहलू - शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक - पर पड़ेगा।
उदाहरण के लिए, सोने की अच्छी आदत अपनाना एक बुनियादी ज़रूरत है। निर्धारित समय पर सोने और जागने की रूपरेखा बनानी चाहिए। इसमें सप्ताहांत भी शामिल होना चाहिए। इसी आधार पर सब कुछ टिका होना चाहिए। यदि हमारी नींद का चक्र ठीक नहीं है और सोने की अच्छी आदतें नहीं हैं तो हम चाहे जो कुछ भी कर लें, अपनी नींद की गुणवत्ता को सुधारना बहुत कठिन होगा।
दूसरा कारक जो सोने और सोते रहने में मदद कर सकता है, वह है, हमारे शरीर का तापमान कम से कम एक या दो डिग्री कम हो जाना चाहिए। इसलिए कमरे को थोड़ा ठंडा रखना लाभदायक होता है।
इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दूर रहना कठिन है लेकिन ज़रूरी है। हमें किसी न किसी तरह यह करना ही होगा क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से मिलने वाली संवेदी उत्तेजनाएँ हमारे मस्तिष्क को सक्रिय कर देती हैं जिससे हमें आराम मिलना मुश्किल हो जाता है। यदि हमें आराम ही नहीं मिलेगा तो सोना भी मुश्किल हो जाएगा।
नींद आने के समय पर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, खास तौर पर फ़ोन के इस्तेमाल से होने वाले असर का एक अध्ययन किया गया जिसमें पाया गया कि फ़ोन नींद की तीसरी अवस्था के आने में एक घंटे की देरी करता है। यदि यह नींद की तीसरी अवस्था में एक घंटा देरी करता है तो कल्पना कीजिए कि आपको किस गुणवत्ता की नींद मिलेगी। वह अच्छी नहीं होगी।
ये कुछ सरल सुझाव हैं जिन्हें कोई भी अपनी नींद सुधारने के लिए आज़मा सकता है। इनके अतिरिक्त हमने अपने प्रतिभागियों के साथ जिन हार्टफुलनेस अभ्यासों का उपयोग किया है, उनसे भी उनके नींद के पैटर्न में महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं - विशेष रूप से सफ़ाई का अभ्यास यानी दिनभर के तनावों व खिंचावों को साफ़ करना।
सोने से पहले पूरे दिन की जाँच करने से, उन क्षेत्रों की पहचान करने से जहाँ हम सुधार कर सकते हैं और यह स्वीकार करने से कि इन क्षेत्रों पर मुझे काम करने की ज़रूरत है, हमें सोने और सोए रहने में मदद मिल सकती है। क्योंकि जब हम ऐसा करते हैं तब हम उस ‘कार्यालय सहायक’ को एक संकेत भेजते हैं। यह कार्यालय सहायक जान लेता है कि हमें उन बातों के बारे में पता है जिन पर हमें काम करने की ज़रूरत है और इसलिए शायद वह हमें अच्छी रात की नींद लेने देता है। कृपया सुनिश्चित करें कि आप उन बातों पर काम करते हैं जिनमें आपको सुधार करने की आवश्यकता है ताकि आपका कार्यालय सहायक आप पर भरोसा कर सके।
प्र. - ये सुझाव अत्यंत ज्ञानवर्धक थे। आपके अनुसार नींद की कमी किस प्रकार से हमारे दैनिक संबंधों और पारिवारिक गतिविधियों पर प्रभाव डालती है?
नींद की कमी हमारी भावनात्मक स्थिति को अत्यधिक प्रभावित करती है और इसका हमारे अपने मित्रों और परिवार के सदस्यों के साथ व्यवहार पर असर पड़ सकता है। सामान्यतः यह देखा गया है कि नींद में कमी हमें चिड़चिड़ा बना देती है।
नींद की कमी हमारी भावनात्मक स्थिति को अत्यधिक प्रभावित करती है और इसका हमारे अपने मित्रों और परिवार के सदस्यों के साथ व्यवहार पर असर पड़ सकता है। सामान्यतः यह देखा गया है कि नींद में कमी हमें चिड़चिड़ा बना देती है।
जिस रात आपकी नींद अच्छी होती है, आप एक बेहतर इंसान होते हैं तथा आप अच्छे से बातचीत करते हैं। जिस रात आप ठीक से नहीं सो पाते, लोग भी आपके नज़दीक नहीं आते, वे आपसे दूर जाना चाहते हैं। यदि आप अच्छे संबंध चाहते हैं तो आपको नींद से मिलने वाले उस आराम की ज़रूरत है। न केवल दूसरों से बल्कि स्वयं से भी अच्छे संबंधों के लिए मस्तिष्क को आराम देना बहुत ज़रूरी है।
प्र. - कृपया हमारे साथ अपने उन शोध परिणामों को साझा करें जिनसे पता लगता है कि हार्टफुलनेस अभ्यासों ने बेहतर नींद लेने में सहायता की है।
हमने अपने अस्पताल में अनिद्रा रोग से पीड़ित मरीज़ों पर हार्टफुलनेस अभ्यासों के प्रभाव का अध्ययन किया था। यदि आप इन मरीज़ों को देखते हैं या उनसे बात करते हैं तो आप समझ जाते हैं कि उनमें बहुत थकान है। ऐसे मरीज़ बहुत थके हुए होते हैं। नींद की कमी के और भी अनेक दुष्प्रभाव होते हैं जैसे हृदय की समस्याएँ। ठीक से न सोने से जीवनकाल भी कम हो जाता है।
हमने लंबे समय से अनिद्रा से पीड़ित मरीज़ों को चुना और उन्हें आठ सप्ताह के लिए हार्टफुलनेस के सरल अभ्यासों को करने के लिए कहा। हमने अध्ययन आरंभ करने से पहले और अंत में अनिद्रा संबंधी सूचकांक (Insomnia Severity Index score) मापे। इन्हें अनिद्रा गंभीरता सूचकांक कहा जाता है। इन अभ्यासों को आठ सप्ताह करने के बाद हमने उनके अनिद्रा के सूचकांक में उल्लेखनीय कमी देखी, 20.9 के औसत से 10.4 के औसत तक अर्थात् 10 अंकों से अधिक की कमी।
इनमें से कुछ मरीज़ों ने बहुत ही दिलचस्प बातें बताईं। उन्होंने कहा, “डॉ. जय पहले हम मात्र चार घंटे सो पाते थे। अब हम सात या आठ घंटे सो पाते हैं। हमें फिर से सपने आने लगे हैं।” जब उनकी नींद की गहराई और गुणवत्ता में सुधार हुआ, वे अपने सपनों को बेहतर तरीके से समझने लगे।
प्र. - यह तो अद्भुत है। हम जानते हैं कि बेहतर नींद और आराम हमें बेहतर काम करने में मदद करते हैं और दिन के समय सक्रिय रखते हैं। यदि इसे दूसरी तरह से देखा जाए तो क्या हमारी दिनभर की गतिविधियाँ हमारी नींद को प्रभावित करती हैं? क्या हमें बेहतर नींद के लिए अपनी जीवन शैली में परिवर्तन करने चाहिए?
हाँ, बिलकुल। हम दिनभर में जो कुछ भी करते हैं, उसका प्रभाव रात को होता है। शारीरिक गतिविधि बहुत महत्वपूर्ण है। दिन की शुरुआत किसी शारीरिक गतिविधि से करना और सुबह की धूप में बाहर निकलना आपकी जैविक लय को पुनः संतुलित करने में मदद कर सकता है।
आहार संबंधी आदतें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। खाना खाने के समय का और जिस प्रकार का भोजन हम खाते हैं, उसका प्रभाव पड़ता है। हमारी भावनात्मक स्थिति का, दिनभर की हमारी मानसिक गतिविधियों का और दिनभर जो कुछ भी होता है, उसका हमारी रात की नींद की गुणवत्ता और स्वरूप पर प्रभाव पड़ता है।
यह महत्वपूर्ण है कि आप अपनी दिनचर्या को नियोजित करें। इसे इस तरह नियोजित करें कि उसके अनुसार ही बाकी की गतिविधियाँ संपन्न हों। सुबह उठने का एक समय निश्चित कर लें। रात को सोने जाने का एक समय निर्धारित कर लें। नाश्ता, दिन के और रात के भोजन के लिए पर्याप्त समय रखें।
सोने के समय से ठीक पहले भोजन न करें। सोने जाने से पहले व्यायाम न करें, वह आपकी नींद को प्रभावित करेगा। व्यायाम आपके शरीर का मूल तापमान बढ़ा देता है जिसे कम होने में समय लगता है। सोने से पहले अपने हाथ व पैरों को धोना या स्नान करना आपकी नींद पर अच्छा प्रभाव डाल सकता है। जैसे-जैसे पानी वाष्पीकृत होता है, यह गर्मी को बाहर निकालता है और शरीर का मूल तापमान कम हो जाता है। इससे भी नींद बेहतर हो सकती है।
अंत में, जिस तरह हम अपना दिन बिताते हैं, वही हमें रात के लिए तैयार करता है और हमारी रात की नींद की गुणवत्ता आने वाली सभी चीज़ों को प्रभावित करती है।

जयराम थिम्मापुरम
जय वेलस्पन यॉर्क अस्पताल में आंतरिक चिकित्सा के क्षेत्र में शैक्षिक चिकित्सक हैं। उन्होंने तनाव व थ... और पढ़ें
