ध्यान देने से आकर्षण की ओर - परमात्मा की ओर सहज यात्रा
जेसन नटिंग उस आंतरिक यात्रा के बारे में बताते हैं जिसके माध्यम से ध्यान, प्रयास से समर्पण में बदल जाता है।
शुरुआत में हम हृदय पर ध्यान करते हैं। उस समय उस ओर ध्यान देना हमारा सचेत कार्य होता है, जैसे कोई नदी अवरोधों .को चीरते हुए अपना रास्ता बना रही हो। हम मन को शांत करते हैं और यदि हमारा ध्यान भटकता है तो हम बस वापस हृदय पर लौट आते हैं। हृदय की ओर लौटने का हर विचार प्रेम का कार्य है जिसमें हम फिर से भीतर की ओर मुड़ने का चुनाव करते हैं।
हर यात्रा इसी तरह शुरू होती है - इरादे और प्रयास के साथ और हमारी इच्छाशक्ति हमारी इस यात्रा की नाव को आगे बढ़ाती है। इस शुरुआती चरण में हर ध्यान एक सौम्य पुनः प्रशिक्षण है - एक पवित्र नियम है। हृदय की ओर हर वापसी हमें याद दिलाती है, वहाँ बाहर नहीं... यहाँ भीतर केंद्रित होना है।
प्रयास आध्यात्मिकता का शत्रु नहीं है; यह उसकी पहली अभिव्यक्ति है। जैसे-जैसे हमारी इच्छाशक्ति हमारे प्रयासों में सम्मिलित हो जाती है और विचार शांत होते जाते हैं, हृदय धीरे-धीरे एक ऐसा क्षेत्र बन जाता है जहाँ हम सहज महसूस करते हैं।
ध्यान देने से आकर्षण की ओर
अंततः, कुछ बदल जाता है जिसका कई बार पता भी नहीं चलता। मन अब हृदय को खोजता नहीं है; यह स्वतः ही उसकी ओर खिंचा चला जाता है, सहज और स्वाभाविक रूप से। जैसे एक पतंगा प्रकाश और गर्माहट पाने के लिए लौ की ओर खिंचा चला जाता है, वैसे ही ध्यान देना आकर्षण बन जाता है। शुरुआत में जहाँ चप्पू रूपी प्रयास की ज़रूरत थी, वहाँ अब दिव्य धारा हमें स्वतः ही आगे बढ़ाती जाती है।
ध्यान अब कुछ ऐसा नहीं रहता जिसे आप करने का प्रयास करते हैं, बल्कि उसके प्रभाव से आप स्वतः ही ध्यान करने लगते हैं।
ध्यान अब कुछ ऐसा नहीं रहता जिसे आप करने का प्रयास करते हैं, बल्कि उसके प्रभाव से आप स्वतः ही ध्यान करने लगते हैं।
भीतर जाने का प्रयास स्वतः समाप्त हो जाता है क्योंकि तब आप दिव्य हृदय के गुरुत्वाकर्षण द्वारा धीरे-धीरे भीतर की ओर खिंचते जाते हैं - यह वह महान उलटफेर है जहाँ साधक ही साध्य बन जाता है।
परम सत्ता ही आगे बढ़ाती है
आकर्षण गहरा होकर तल्लीनता में बदल जाता है। जो ‘मैं ध्यान कर रहा हूँ’ के रूप में शुरू हुआ था, वह ‘ध्यान घटित हो रहा है’ बन जाता है। फिर वह भी विलीन हो जाता है, जब तक कि सिर्फ़ उपस्थिति शेष नहीं रह जाती।
यहाँ, परमात्मा आपको अपने भीतर खींच लेता है। अब आपका ध्यान परमात्मा तक पहुँचने की कोशिश नहीं करता, यानी आपका प्रयास समाप्त हो जाता है और परमात्मा आपको अपने केंद्र में वापस खींच लेता है, जैसे चुंबक धातु को खींचता है। यही समर्पण का छिपा हुआ अर्थ है - हार नहीं, बल्कि प्रयास का प्रयासहीन प्रवाह में रूपांतरण।
हम हृदय को थामने की कोशिश से शुरुआत करते हैं; अंततः हम ही हृदय द्वारा थाम लिए जाते हैं। थामे जाने पर भी यात्रा जारी रहती है क्योंकि तल्लीनता अंतहीन रूप से बढ़ती जाती है और हमें अनंत गहराई में खींचती जाती है।

परमात्मा की कृपा के प्रति समर्पण
जब भीतर के आकर्षण की धारा प्रबल होती जाती है तब साधना भी प्रार्थना बन जाती है - जिसमें न कोई शब्द होते हैं, न कोई अनुरोध या आवश्यकता।
हृदय न केवल ध्यान करने का स्थान, बल्कि स्वयं परमात्मा का निवास स्थान बन जाता है। हमें एहसास होता है कि हमारी आध्यात्मिक यात्रा का लक्ष्य कभी भी परमात्मा तक पहुँचना नहीं था; वह तो परमात्मा को ही अपने भीतर आने देना था।
हृदय न केवल ध्यान करने का स्थान, बल्कि स्वयं परमात्मा का निवास स्थान बन जाता है। हमें एहसास होता है कि हमारी आध्यात्मिक यात्रा का लक्ष्य कभी भी परमात्मा तक पहुँचना नहीं था; वह तो परमात्मा को ही अपने भीतर आने देना था।
परमात्मा की सहायता से परमात्मा में ही विलीन हो जाना - यही वास्तव में ध्यान का आरंभ है। प्रयास कृपा के सामने झुक जाता है, ध्यान देना आकर्षण में बदल जाता है और उस अनंत समर्पण में साधक और साध्य हमेशा के लिए एक हो जाते हैं।

जेसन नटिंग
जेसन एक व्यायाम एवं पोषण विशेषज्ञ हैं। इनके कार्य की शुरुआत अमेरिका की वायुसेना से हुई थी और बाद में वे एक प्रमाणित कोच बन गए जिसके तहत उन्होंने मोटापा कम करने, कार्य-प्रदर्शन एवं प... और पढ़ें
