जेसन नटिंग हृदय क्षेत्र के पाँच चक्रों या बिंदुओं का विवरण देते हैंजैसा कि हार्टफुलनेस के सिद्धांतों के माध्यम से समझाया गया है और जिन्हें हार्टफुलनेस ध्यान व सफ़ाई के नियमित अभ्यास द्वारा अनुभव किया गया है।

 

प्रतिक्रिया के परे सामंजस्य होता है जो हृदय की ऐसी मौन भाषा है जिससे वह स्वयं को ही याद करता है।

हार्टफुलनेस परंपरा में हृदय क्षेत्र के पाँच चक्र उस पवित्र परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ से हमारी आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है।

प्रत्येक चक्र एक प्राकृतिक तत्व से जुड़ा है और हरेक के भीतर एक भावनात्मक प्रतिध्वनि निहित है जो गहराई से परिष्कृत होने का अवसर प्रदान करती है।

प्राणाहुति द्वारा और ध्यान व सफ़ाई अभ्यासों के माध्यम से हम न केवल छापों के शुद्धिकरण का अनुभव करते हैं बल्कि अपने भावनात्मक अस्तित्व के निःशब्द विकास का भी अनुभव करते हैं।

आधुनिक मनोविज्ञान भी उस तथ्य को मानने लगा है जिसको ऋषियों ने बहुत समय पहले सिखाया था - भावनाएँ वे संकेत हैं जो हमें अपनी वास्तविक प्रकृति की ओर या उससे दूर जाने के लिए मार्गदर्शन देते हैं।

मैंने अपने अनुभव से यह देखा है कि जब सफ़ाई सही ढंग से होती है तब चीज़ें बहुत जल्दी बदल जाती हैं। जो बात कुछ क्षण पहले अभिभूत कर रही थी वह हल्की पड़ जाती है। प्रतिक्रिया फीकी पड़ जाती है और फिर केवल स्पष्टता रह जाती है। समय के साथ मैं यह समझ पाया हूँ कि भावनाएँ समस्या नहीं हैं, वे केवल संकेत हैं। कुछ हमें केंद्र से दूर कर देती हैं और कुछ हमें वापस अपने मूलस्थान पर ले आती हैं।

इस दृष्टि से भावनात्मक अनुभवों को हम एक साधारण वर्णक्रम के अनुसार देख सकते हैं -

कुछ भावनाएँ हमें बाहर की ओर जाने के लिए विवश करती हैं जिससे हम प्रतिक्रिया करने लगते हैं और सबसे अलग होने लगते हैं।

अन्य भावनाएँ हमारे भीतर गहरे सामंजस्य की पुष्टि करती हैं जिससे हमारे अंदर शांति, साहस, करुणा और स्पष्टता मज़बूत होती है।

प्रत्येक भावना एक द्वार खोलती है - वह या तो हमें बाहर की ओर खींचती है या हमें अपने मूल घर की ओर ले जाती है।

बाध्यकारी प्रतिक्रिया से लेकर मान्य प्रत्युत्तर की ओर का यह प्रकटीकरण हृदय क्षेत्र से होने वाली यात्रा को प्रतिबिंबित करता है।

हार्टफुलनेस के परिप्रेक्ष्य में बाध्यकारी भावनाएँ अक्सर उन पड़ी हुई छापों (या संस्कारों) से उत्पन्न होती हैं जो हमारे दृष्टिकोण को प्रभावित करती हैं। जैसे-जैसे सफ़ाई से ये अवशेष दूर होते जाते हैं, मान्य भावनाएँ स्वाभाविक रूप से उभरती हैं जो हृदय की पुनः स्थापित स्पष्टता को दर्शाती हैं।

आइए, हम मिलकर प्रत्येक चक्र पर विचार करें और न केवल यह देखें कि मन क्या महसूस करता है बल्कि यह भी जानें कि हृदय क्या प्रकट करता है।

बिंदु 1 - पृथ्वी तत्व

असंतोष से संतोष की ओर

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पहले चक्र पर हम उस सूक्ष्म बेचैनी का सामना करते हैं जो मानव के अधिकांश जीवन को प्रभावित करती है - यह भावना कि कुछ कमी है और संतुष्टि हमारी पहुँच से परे है।

बाध्यकारी प्रवृत्तियाँ इस प्रकार महसूस
होती हैं - बेचैनी, लालसा, तुलना, असंतोष।

मान्य प्रवृत्तियाँ इस प्रकार महसूस होती हैं - कृतज्ञता, पर्याप्तता, स्थिरता, उपस्थिति।

जैसे-जैसे इन गुणों की गहनता बढ़ती जाती है, हृदय स्वाभाविक रूप से फिर अपनी मूल सादगी की ओर उन्मुख होने लगता है।

असंतोष एक बाध्यकारी भावना है।
यह भावना हमें बाहर की ओर धकेलती है। यह हमें बाहरी रूप से उसे खोजने के लिए विवश करती है जिसे केवल आंतरिक रूप से ही प्राप्त किया जा सकता है।

ध्यान के अभ्यास से, जिसे प्राणाहुति से शक्ति तथा सफ़ाई से सहायता मिलती है, बेचैन करने वाली यह भावना नरम पड़ने लगती है।

जैसे-जैसे हृदय अपनी मूल स्थिति में स्थिर होने लगता है, हम संतोष और एक स्थायी शांति का अनुभव करने लगते हैं जो अंदर से उभरती है।


संतोष हृदय में होने वाले पर्याप्तता के गहन एहसास को दर्शाता है। यह एक नम्र स्मरण है कि जो पहले से ही पूर्ण हैउसे पूर्ण करने के लिए किसी बाहरी चीज़ की आवश्यकता नहीं है।


संतोष हृदय में होने वाले पर्याप्तता के गहन एहसास को दर्शाता है। यह एक नम्र स्मरण है कि जो पहले से ही पूर्ण है, उसे पूर्ण करने के लिए किसी बाहरी चीज़ की आवश्यकता नहीं है। यह भीतर से जागृत होने वाली पूर्णता का एहसास है जो बाहरी परिस्थितियों से अप्रभावित रहकर हमें चुपचाप अपने मूल की ओर खींचता है।

बिंदु 2 - आकाश तत्व

अशांति से शांति की ओर

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दूसरे चक्र पर हम मन की अशांति का सामना करते हैं - व्याकुलता, उत्तेजना, अत्यधिक हलचल जो मन को स्थिर नहीं होने देती।

बाध्यकारी प्रवृत्तियाँ इस प्रकार महसूस
होती हैं - मानसिक अस्थिरता, चिंता, विह्वलता, व्याकुलता।

मान्य प्रवृत्तियाँ इस प्रकार महसूस होती हैं- स्थिरता, स्पष्टता, शांति, खालीपन।

जैसे-जैसे स्थिरता आने लगती है, मन शांत होने लगता है और हृदय एक बार फिर ग्रहणशील हो जाता है।

अशांति एक बाध्यकारी भावना है।

यह हमारे ध्यान को अनेक दिशाओं में ले जाती है जिससे हम दिव्य उपस्थिति से दूर दुनिया के शोर और मन के कोलाहल में खिंचे चले जाते हैं।

जैसे-जैसे हमारा अभ्यास गहरा होता जाता है, अशांति की प्रवृत्तियाँ धीरे-धीरे शांत होने लगती हैं। सफ़ाई के माध्यम से हृदय को उत्तेजित करने वाली छापें हट जाती हैं जिससे हमारे भीतर खालीपन का एहसास उभरने लगता है।


शांति इस बात की पुष्टि करती है कि अंदर खालीपन फिर से पैदा हो गया है। यह एक ऐसी स्थिरता है जो बिना किसी प्रतिरोध के जीवन के प्रवाह का स्वागत करती है। यह एक ऐसे हृदय को प्रतिबिंबित करती है जो खुलाग्रहणशील और अस्तित्व की गहन लय के साथ तालमेल में है।


शांति इस बात की पुष्टि करती है कि अंदर खालीपन फिर से पैदा हो गया है। यह एक ऐसी स्थिरता है जो बिना किसी प्रतिरोध के जीवन के प्रवाह का स्वागत करती है। यह एक ऐसे हृदय को प्रतिबिंबित करती है जो खुला, ग्रहणशील और अस्तित्व की गहन लय के साथ तालमेल में है।

बिंदु 3 - अग्नि तत्व

नाराज़गी से करुणा की ओर

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तीसरे चक्र पर हम आलोचना की अग्नि का सामना करते हैं - जब जीवन हमारी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता तब चिड़चिड़ापन, निराशा और अलगाव उत्पन्न होता है।

बाध्यकारी प्रवृत्तियाँ इस प्रकार महसूस
होती हैं - चिड़चिड़ापन, निराशा, पूर्वधारणा, आक्रोश।

मान्य प्रवृत्तियाँ इस प्रकार महसूस होती हैं - समानुभूति, क्षमा, सौहार्द, समावेशी समझ।

जैसे-जैसे समझ बढ़ती है, वह अग्नि जो कभी विलग करती थी, अब जुड़ाव को आलोकित करती है।

नाराज़गी एक बाध्यकारी भावना है।
यह हृदय को कठोर बनाती है तथा ‘स्वयं’ व ‘अन्य’ और ‘सही’ व ‘गलत’ के बीच की सीमाओं को दृढ़ बना देती है।

फिर भी जैसे-जैसे अभ्यास के माध्यम से अग्नि तत्व परिष्कृत होता जाता है, कुछ गहन घटित होता है – हमारी प्रतिक्रिया अब समझ में बदल जाती है और हमारी आलोचना करने की प्रवृत्ति नरम होकर समानुभूति में परिवर्तित हो जाती है।


करुणा हृदय के एक स्वाभाविक सौहार्द के रूप में उत्पन्न होती है जो आलोचनाओं द्वारा बनी दीवार गिराकर सभी प्राणियों में स्वयं को पहचानता है। हम तुलना करने से आगे जुड़ाव की ओर बढ़ते हैं। वही अग्नि जो कभी विभाजित करती थीअब संबंध जोड़ने वाला सौहार्द बन जाती है।


करुणा हृदय के एक स्वाभाविक सौहार्द के रूप में उत्पन्न होती है जो आलोचनाओं द्वारा बनी दीवार गिराकर सभी प्राणियों में स्वयं को पहचानता है। हम तुलना करने से आगे जुड़ाव की ओर बढ़ते हैं। वही अग्नि जो कभी विभाजित करती थी, अब संबंध जोड़ने वाला सौहार्द बन जाती है।

बिंदु 4 - जल तत्व

निराशा से साहस की ओर

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चौथा चक्र हमें भावनात्मक शरीर की गहराइयों में ले जाता है - यादें, आसक्ति व भय जिनको सहन कर पाना कभी बहुत कठिन लगता था।

बाध्यकारी प्रवृत्तियाँ इस प्रकार महसूस
होती हैं - भय, उदासी, निराशा, पीछे हटना, उदासीनता।

मान्य प्रवृत्तियाँ इस प्रकार महसूस होती हैं - विश्वास, दृढ़ता, बहादुरी, ग्रहणशीलता।

जैसे-जैसे दृढ़ता बढ़ती जाती है, हृदय एक बार फिर स्वतंत्र रूप से कार्य करने लगता है और जीवन के प्रकटीकरण के प्रति ग्रहणशील हो जाता है।

निराशा एक बाध्यकारी भावना है।
यह धीरे से कहती है कि हम उतने मज़बूत नहीं हैं जितना होना चाहिए और न ही उतने सक्षम हैं, इसलिए आगे बढ़ने के बजाय पीछे हटना ही अधिक सुरक्षित है।


साहस उस आंतरिक शक्ति के रूप में उभरता है जो हमें ग्रहणशील बने रहने की हिम्मत देती हैतब भी जब भय हृदय को पीछे हटने के लिए उकसाता है। आगे बढ़ने की इस इच्छा का मतलब हैअनिश्चितता में भी जीवन-धारा के प्रति ग्रहणशील रहनाभरोसा करना और जीवंत बने रहना।


लेकिन जैसे-जैसे सफ़ाई के माध्यम से हृदय शुद्ध होता जाता है और पुराने भय का भार कम होता जाता है, धीरे-धीरे भीतर एक नई शक्ति का उदय होने लगता है। साहस उस आंतरिक शक्ति के रूप में उभरता है जो हमें ग्रहणशील बने रहने की हिम्मत देती है, तब भी जब भय हृदय को पीछे हटने के लिए उकसाता है। आगे बढ़ने की इस इच्छा का मतलब है, अनिश्चितता में भी जीवन-धारा के प्रति ग्रहणशील रहना, भरोसा करना और जीवंत बने रहना।

बिंदु 5 - वायु तत्व

भ्रम से स्पष्टता की ओर

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पाँचवें चक्र पर हम दृष्टिकोण की सबसे सूक्ष्म विकृतियों का सामना करते हैं - भ्रम व झूठी निश्चितता। ये वे आवरण हैं जो असली समझ को छिपा देते हैं।

बाध्यकारी प्रवृत्तियाँ इस प्रकार महसूस
होती हैं -भ्रम, खुद को धोखा देना, झूठी निश्चितता, गलत धारणा।

मान्य प्रवृत्तियाँ इस प्रकार महसूस होती हैं- अंतर्दृष्टि, विवेक, पारदर्शिता, दीप्तिमान ज्ञान।

जैसे-जैसे स्पष्टता बढ़ती जाती है, आवरण हटते जाते हैं और आत्मा पारदर्शी हो जाती है।

भ्रम एक बाध्यकारी भावना है। यह हमें विश्वास दिला देता है कि हम स्पष्ट रूप से देख रहे हैं, जबकि हमारा दृष्टिकोण अभी भी भय या अतीत की आदतों से प्रभावित होता है।

जैसे-जैसे छापें साफ़ होती जाती हैं और हृदय परिष्कृत होता जाता है, आवरण हटने लगते हैं।

स्पष्टता एक मान्य भावना है। यह सत्य को बिना किसी विकृति के प्रकट करती है जो भीतर के स्वाभाविक प्रकाश के रूप में प्रकट होता है। स्पष्टता होने से हम केवल सोचते ही नहीं हैं बल्कि हम जानते हैं - शांति से व गहराई से तथा संदेह रहित होकर।

हृदय क्षेत्र की यात्रा हमारे भावनात्मक परिदृश्य को रूपांतरित करती है - हम प्रतिक्रिया से सामंजस्य की ओर, विकृति से विवेक की ओर बढ़ते हैं।


स्पष्टता एक मान्य भावना है। यह सत्य को बिना किसी विकृति के प्रकट करती है जो भीतर के स्वाभाविक प्रकाश के रूप में प्रकट होता है। स्पष्टता होने से हम केवल सोचते ही नहीं हैं बल्कि हम जानते हैं - शांति से व गहराई से तथा संदेह रहित होकर।


बाध्यकारी भावनाएँ वे आह्वान हैं, वे संकेत हैं जो बताते हैं कि अभी भी कहाँ शुद्धिकरण की आवश्यकता है। मान्य भावनाएँ वे प्रमाण हैं जो यह बताते हैं कि हृदय अपने वास्तविक स्वरूप की ओर लौट रहा है।

हालाँकि इन प्रवृत्तियों को समझने से स्पष्टता आने लगती है लेकिन ध्यान और सफ़ाई के दैनिक अभ्यासों के माध्यम से ही ये आंतरिक परिवर्तन सुदृढ़ होते हैं।

सारांश यह है कि यह यात्रा स्वतंत्रता के विकास को दर्शाती है -

  • बाध्यकारी भावनाएँ हमें बेचैनी से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती हैं।
  • मान्य भावनाएँ तब उत्पन्न होती हैं जब हम सत्य, प्रेम या स्पष्टता के लिए स्वतंत्रतापूर्वक कार्य करते हैं।

 

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जैसा कि बाबूजी ने कहा है, “वास्तविक स्वतंत्रता, स्वतंत्रता से भी स्वतंत्रता है।”

यह किसी चीज़ से स्वतंत्रता नहीं है, न ही कुछ करने की स्वतंत्रता है बल्कि स्वतंत्र होने की आवश्यकता से भी स्वतंत्रता है। इसमें स्व विलीन हो जाता है। हृदय बस होता है।

हम आंतरिक स्व को उभरने देते हैं - जो उसकी उपस्थिति में स्थिर है, जीवन के प्रति ग्रहणशील है।


इसका आरंभ सुनने से होता है - बाहरी संसार के शोर को सुनने से नहीं बल्कि अपने भीतर की आवाज़ सुनने सेजहाँ हृदय बिना ध्वनि के कुछ कहता है।


इसी तरह हार्टफुलनेस का मार्ग हृदय के माध्यम से स्वयं को प्रकट करता है। और इसका आरंभ सुनने से होता है - बाहरी संसार के शोर को सुनने से नहीं बल्कि अपने भीतर की आवाज़ सुनने से, जहाँ हृदय बिना ध्वनि के कुछ कहता है। जब हम हृदय को सुनते हैं तब हम प्रतिक्रिया के परे जाते हैं और अपने भीतर के सामंजस्य को पुनः प्राप्त कर लेते हैं। और इसी मौन में समस्त वास्तिवक ज्ञान प्राप्त होने लगता है।

 


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जेसन एक व्यायाम एवं पोषण विशेषज्ञ हैं। इनके कार्य की शुरुआत अमेरिका की वायुसेना से हुई थी और बाद में वे एक प्रमाणित कोच बन गए जिसके तहत उन्होंने मोटापा कम करने, कार्य-प्रदर्शन एवं प... और पढ़ें

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