जेसन नटिंग बता रहे हैं कि क्यों राहत अल्पकालिक होती है और साहस, जो हृदय से उपजता है, कैसे हमेशा टिका रहता है।
हम सभी राहत चाहते हैं - कम तनाव, कम अज्ञात बातें, अधूरी उम्मीदों का हल्का बोझ, हम जो हैं और हम जो बनना चाहते हैं, उसके बीच कम तनाव। राहत भले ही कुछ देर के लिए मन को शांत कर दे परंतु यह हृदय को सुकून नहीं देती। इसका एहसास जल्दी ही फीका पड़ जाता है और जीने का वही पुराना तरीका फिर से उभर आता है। इसी तरह हम अटक कर रह जाते हैं।
हम राहत के पीछे भागते रहते हैं जबकि वास्तव में जो हम चाहते हैं वह है साहस - डटे रहने, महसूस करने और जो कुछ भी सामने आता है उसे उपस्थित रहते हुए पार करने की ताकत।
राहत का माया-जाल
राहत गलत नहीं है। यह बस अल्पकालिक होती है।
शराब का एक और गिलास पीना, फ़ोन पर स्क्रॉल करते रहना, ईमानदारी में छोटा सा समझौता करना - ये सब राहत देते हैं, लेकिन सिर्फ़ कुछ पल के लिए। ये दर्द की तीव्रता को कम तो कर देते हैं लेकिन ये हमारी दुनिया को भी सीमित कर देते हैं।
राहत हमारी जागरूकता को संकुचित कर देती है। यह हमारी दृष्टि को इस एक पल, इस एक एहसास, इस एक बचाव के रास्ते तक सीमित कर देती है। यही संकुचन उस इच्छा को एक आपात स्थिति जैसा बना देता है, मानो शांति उसे संतुष्ट करने पर ही मिल सकती है।
लेकिन राहत मिलने के समय हम वास्तव में उपस्थित नहीं होते यानी पूरी तरह से सचेत नहीं होते। हम प्रतिक्रिया कर रहे होते हैं।
दूसरी ओर, उपस्थिति का अर्थ उस पल से भागना नहीं है। इसका अर्थ है स्थिरता के साथ उस क्षण में पुनः प्रवेश करना। इसका अर्थ है उसी भावना को महसूस करना जिसने पहले हमें अपने वश में कर लिया था, लेकिन अब एक व्यापक दृष्टिकोण से महसूस करना है।
राहत हमें उस क्षण में इस तरह बाँध देती है कि हम उसके परे और कुछ देख ही नहीं पाते; उपस्थिति हमें उस क्षण में इस तरह बनाए रखती है कि हम मुक्त महसूस करते हैं।

क्षण का विरोधाभास
जब हम किसी विवशता में फँस जाते हैं तब ऐसा लगता है मानो हमारा पूरा ध्यान वर्तमान में ही है। लेकिन हमारी जागरूकता वास्तव में कहीं और होती है, या तो अतीत को पुनः याद कर रही होती है या फिर भविष्य की कल्पना कर रही होती है।
हम बीते हुए कल के अपराधबोध को शांत करने के लिए भोजन करते हैं। हम आज के दबाव को कम करने के लिए पीते हैं। हम कल की अनिश्चितता से बचने के लिए स्क्रॉल करते रहते हैं।
हृदय एक और रास्ता सुझाता है। वह चीज़ों को ठीक करने या उनसे भागने की जल्दबाज़ी नहीं करता – वह सुनता है। वह असुविधा को मिटाता नहीं, बल्कि उसके साथ हमारे रिश्ते को बदल देता है। जब हम हृदय में लौटते हैं तब वही क्षण जो कभी घुटन भरा लगता था, अब खुला लगने लगता है। भावनाएँ बनी रहती हैं लेकिन हम अब उनकी गिरफ़्त में नहीं रहते। हम उसे उस पल में उपस्थित रहकर देख रहे होते हैं।
यही साहस की शुरुआत है।
जब हम भीतर की ओर मुड़ते हैं और उस पवित्र केंद्र पर लौटते हैं तब साहस स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है। हृदय हमारे बोध को स्थिर करता है, हमारे दृष्टिकोण को व्यापक बनाता है और उन विकल्पों को प्रकट करता है जिन्हें मन कभी नहीं देख पाता। हर बार जब हम राहत के बजाय साहस को चुनते हैं तब हम हृदय की ओर लौट आते हैं, उस पल को वैसे ही जीते हैं जैसा वह है।
साहस वास्तव में क्या है
साहस का अर्थ निडरता नहीं है; इसका अर्थ स्वयं को पुनः व्यवस्थित करना है।
राहत पूछती है, “मैं इस समय बेहतर कैसे महसूस कर सकती हूँ?” साहस पूछता है, “कौन सा विकल्प मेरा दायरा बढ़ाता है – भले ही वह मेरे आराम की कीमत पर हो?”
राहत आराम से प्रेरित होती है लेकिन साहस हृदय से प्रेरित होता है। दोनों एक ही इच्छा से उत्पन्न होते हैं - तूफ़ान में स्थिर महसूस करना। इनमें से एक ही रास्ता शांति दिलाता है।
साहस दर्द से बच निकलने की कोशिश नहीं करता; यह खुलकर दर्द का सामना करता है। यह पूर्णता की माँग नहीं करता; यह बस उस पल की सच्चाई को त्यागने से इनकार करता है। साहस भावना को दबाता नहीं; यह उसकी तीव्रता को कम कर देता है। यही हृदय की शक्ति है–मन जिस चीज़ से बचने की कोशिश करता है, उसे स्वीकार करना।
साहस का ईंधन
साहस तब टिका रहता है जब उसे सहारा मिल जाता है और वह सहारा प्रोत्साहन है। प्रोत्साहन वही वापस लाता है जिसे निराशा खत्म कर देती है। यह हमें याद दिलाता है कि हर बार जब हम उपस्थित होते हैं - भले ही दोषपूर्ण ढंग से - हम टिके रहने की अपनी क्षमता को मज़बूत करते हैं। प्रोत्साहन का अर्थ है व्यवहार में करुणा को समाहित करना - जिससे अंदर की आवाज़ कहती है, “मैं तुम्हारे साथ हूँ। चलते रहो।”
प्रोत्साहन के बिना साहस थक कर चूर हो जाता है। लेकिन उसके साथ साहस एक अक्षय ऊर्जा बन जाता है यानी एक ऐसी लौ बन जाता है जो बार-बार जल उठती है।
प्रतिक्रिया से पुनर्स्थापना तक की यह यात्रा केवल सैद्धांतिक नहीं है। हार्टफुलनेस में हम इसका प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।
ध्यान शांति और जागरूकता के माध्यम से साहस का पोषण करता है। सफ़ाई राहत पाने की कोशिशों से बचा हुआ अवशेष भी दूर कर देती है। प्रार्थना हमें दिव्य कृपा के लिए ग्रहणशील बनाती है - जो प्रोत्साहन का सर्वोच्च रूप है।
हृदय की ओर वापसी
व्युत्पत्ति की दृष्टि से, ‘साहस’ शब्द का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘करेज’ (courage) है। ‘करेज’ का मूल शब्द है ‘कोर’ (cor), जो एक लैटिन शब्द है। इस शब्द का अर्थ ‘हृदय’ है। अतः साहस के साथ जीना हृदय से जीना है। हतोत्साहित होना वस्तुतः हिम्मत हार जाना यानी हृदय का साथ में न होना है।
जब हम भीतर की ओर मुड़ते हैं और उस पवित्र केंद्र पर लौटते हैं तब साहस स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है। हृदय हमारे बोध को स्थिर करता है, हमारे दृष्टिकोण को व्यापक बनाता है” और उन विकल्पों को प्रकट करता है जिन्हें मन कभी नहीं देख पाता। हर बार जब हम राहत के बजाय साहस को चुनते हैं तब हम हृदय की ओर लौट आते हैं, उस पल को वैसे ही जीते हैं जैसा वह है।
जब हम हृदय में लौटते हैं तब वही क्षण जो कभी घुटन भरा लगता था, अब खुला लगने लगता है। भावनाएँ बनी रहती हैं लेकिन हम अब उनकी गिरफ़्त में नहीं रहते। हम उसे उस पल में उपस्थित रहकर देख रहे होते हैं।
राहत फुसफुसाती है, “छिप जाओ।” साहस फुसफुसाता है, “फिर भी सामने आओ।” ये एक ही चाहत के दो पहलू हैं – सुरक्षित, स्थिर और संपूर्ण महसूस करने की चाहत।
जब हम हृदय से जीते हैं तब राहत की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। जो बचता है वह शांति है, इसलिए नहीं कि हमारे आसपास की दुनिया बदल गई है बल्कि इसलिए कि हम बदल गए हैं।

जेसन नटिंग
जेसन एक व्यायाम एवं पोषण विशेषज्ञ हैं। इनके कार्य की शुरुआत अमेरिका की वायुसेना से हुई थी और बाद में वे एक प्रमाणित कोच बन गए जिसके तहत उन्होंने मोटापा कम करने, कार्य-प्रदर्शन एवं प... और पढ़ें
