तुम इस दुनिया को इतना प्रेम करते हो
या इससे डरते हो
पर तुमने यह दुनिया
कभी देखी नहीं।
तुम अंधे नहीं हो,
कम से कम वैसे जैसा यह दुनिया मानती है।
तुम्हारी आँखें प्रकाश के झरते कणों को सोख लेती हैं।
तुम्हारा मस्तिष्क उन धाराओं को आमंत्रित करता है,
जिनसे वह विद्युत के रूप में जीवंत हो उठता है।
तुम्हारा मन? वह तो बिलकुल अलग बात है।
तुम बहरे नहीं हो।
हवा में जो कुछ भी है,
अपने कणों के आसपास सिकुड़ता है, फैलता है,
वह तुम्हारी इंद्रियों के माध्यम से अंदर आकर
तुम्हारे कर्ण पटल पर ऐसी लय छेड़ जाता है कि
उन चमत्कारों के ज़रिए – जो अभी भी आधे-अधूरे ज्ञात हैं –
तुम पहचान लेते हो आवाज़ों को। कदमों की आहट।
मशीनों की गड़गड़ाहट। संगीत की मधुरता।
तुम्हें इसकी महक का पता नहीं।
कोई स्वाद या कोई स्पर्श पता नहीं,
चाहे तुम कहीं भी हो
(और तुम कहाँ हो, यह जानना अभी बाकी है)।
अब एक नज़ारे की कल्पना करो
जो व्यापक हो,
कल्पना करो कि तुम एक साथ पूरे गोले को
उसकी पूर्णता में देख रहे हो –
केवल इर्द-गिर्द ही नहीं और केवल वर्तमान ही नहीं
बल्कि भविष्य और अतीत को भी।
न केवल आकाश को
बल्कि उसके शून्य को भी।
इससे पहले तुम इस दुनिया को क्या कह सकते थे
सिवाए एक धुंधली और चपटी तस्वीर के?
नहीं होना चाहिए इस तरह की कविता का अंत
पहेलियों में,
गूढ़ वर्णनों को समझने जैसे नीरस काम में,
गुत्थियों में,
न ही अनसुलझे विरोधाभासों में।
और इसे अवश्य ही बचना चाहिए
उपदेश देने की उत्सुकता से…।
…लेकिन अगर तुमने इसे यहाँ तक पढ़ा है
तो तुम जानते हो कि क्यों
इसका अंत ऐसा ही होगा -
खोलो – लेकिन पहले धीरे से बंद करो – अपनी आँखें।

