प्रिय कमलेश भाई,

हार्टफुलनेस में आप अष्टांग योग के आखरी तीन चरण - धारणाध्यान और समाधि से शुरुआत करते हैं। बजाय इसकेआप परंपरागत सोच के अनुसार पहले के दो चरणों से क्यों नहीं शुरू करते?

 

प्रिय स्वामीजी,

प्रणाम। आपने बहुत ही उचित प्रश्न किया है। लेकिन वर्षों के अभ्यास के बाद मैं कह सकता हूँ कि मेरे गुरु का मार्गदर्शन एकदम व्यावहारिक है। मैं इसका कारण आपको समझाने की कोशिश करता हूँ।

योग का लक्ष्य मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार और शारीरिक अस्तित्व का न होना नहीं है। परम प्राप्ति इनके अस्तित्व को नकारती नहीं है। परम प्राप्ति सिर्फ़ हमें हर मौजूद चीज़ की सुंदरता दिखाती है। शरीर, मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार के बारे में हमारी जो समझ है उसमें बहुत बड़ा परिवर्तन आ जाता है। ये वो साधन हैं जो हमारी अंतरात्मा के साथ अच्छी तरह से समायोजित हो जाते हैं।

ध्यान परम शून्य तक पहुँचने का मार्ग है। यह मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को परिष्कृत करने में हमारी मदद करता है। जिस व्यक्ति का चित्त परिष्कृत हो, वह अपने आप को या किसी और को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुँचा सकता। ऐसे व्यक्ति का मन सही-गलत या अच्छे-बुरे को आसानी से पहचान पाता है। ऐसे परिष्कृत विवेक की मदद से व्यक्ति का विकसित मन एक उत्तम साधन बन जाता है।

जब हम अष्टांग योग की शुरुआत धारणा, ध्यान और समाधि से करते हैं तब हम यम और नियम के महत्व और उनके मूल्य को ज़्यादा अच्छी तरह से समझ पाते हैं। इसके विपरीत यदि हम यम से शुरू करते हैं तो वह बिलकुल ऐसे होगा जैसे घोड़े के आगे गाड़ी को जोत दिया हो।

कृपया आप हमारे कान्हा आश्रम में आएँ और जब तक आपकी इच्छा हो यहाँ पर रहें।

सादर नमस्कार

कमलेश


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दाजी

दाजी हार्टफुलनेसके मार्गदर्शक

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