जब भय शक्ति बन जाता है -
वह देवी जो चित्रकथाओं के माध्यम से पीड़ितों का रूपांतरण करती है
पूर्णिमा रामकृष्णन ने इस लेख में राम देवीनेनी का व्यक्तित्व-चित्रण किया है जिसमें वे वृत्तचित्र फ़िल्म निर्माता से लेकर चित्रकथाओं के रचनाकार बनने तक की उनकी यात्रा का वर्णन कर रही हैं। वे बता रही हैं कि राम देवीनेनी ने कैसे भारतीय पौराणिक कथाओं को संवर्धित वास्तविकता (Augmented Reality) के साथ जोड़कर सशक्तिकरण और सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए साधन बनाए।
सामाजिक परिवर्तन के लिए सबसे शक्तिशाली साधन भी कभी-कभी बिलकुल अकल्पित रूपों में सामने आते हैं। भारत में यह साधन एक चित्रकथा के रूप में आया जिसमें एक पौराणिक देवी पार्वती को नए ज़माने के पीड़ितों के साथ चलते हुए और बाघ को एक हिंसक पशु की जगह एक साथी के रूप में दिखाया गया। और अब संवर्धित वास्तविकता (वास्तविक दुनिया को कंप्यूटर द्वारा बेहतर बनाना) पौराणिक कथाओं को स्मार्ट फ़ोन के स्क्रीन पर जीवंत बना रही है।
‘प्रियाज़ शक्ति’ (Priya’s Shakti) नामक चित्रकथा उपन्यास राम देवीनेनी की रचना है। वे एक फ़िल्म निर्माता हैं जिन्होंने भारत की पौराणिक विरासत और अत्यावश्यक समकालीन आवश्यकताओं के बीच सेतु बनाने में तेरह वर्ष व्यतीत किए हैं। इस श्रृंखला की मुख्य नायिका प्रिया है। प्रिया को लैंगिक हिंसा के उन पीड़ितों के अनुभवों के आधार पर गढ़ा गया है, जिनसे राम दिल्ली में मिले थे। प्रिया इस कहानी में अपने साथी बाघ और विभिन्न पौराणिक पात्रों के साथ दिखाई देती हैं। यह श्रृंखला सनातन धर्म के जाने-पहचाने प्रसंगों पर आधारित है - भय का सामना करना, आंतरिक शक्ति का निर्माण करना और समझ बदलने के लिए अनुनय की शक्ति का उपयोग करना।
वर्ष 2014 में रचित एक चित्रकथा अब एक आंदोलन बन गई है जो पूरे भारतवर्ष, कोलंबिया और उससे भी आगे फैल गया है। यह आंदोलन गरिमा व न्याय से लेकर जलवायु परिवर्तन एवं लोक-स्वास्थ्य तक के मुद्दों को संबोधित कर रहा है। इसमें मुख्यतः एक सरल लेकिन गहन मान्यता है - मनुष्यों को अपनी समस्याएँ स्वयं हल करनी चाहिए और स्थायी परिवर्तन केवल कानून से नहीं बल्कि संस्कृति के माध्यम से लाया जा सकता है।
इस बात का एहसास देवीनेनी को अचानक ही दिसंबर 2012 में हुआ जब वे नई दिल्ली में किसी अन्य वृत्तचित्र पर काम कर रहे थे। उस समय एक महिला के साथ हुई हिंसा की एक दुखद घटना ने पूरे शहर में भारी विरोध प्रदर्शनों को भड़का दिया था। युवा सड़कों पर उतर आए थे। वे न केवल न्यायिक सुधार की माँग कर रहे थे बल्कि समाज में महिलाओं के प्रति नज़रिए और व्यवहार में मूलभूत सुधार की माँग भी कर रहे थे।
जिज्ञासावश देवीनेनी भी एक प्रदर्शन में शामिल हुए और उन्होंने दिल्ली के एक पुलिस अधिकारी से बात करते हुए पूछा कि वे इन विरोध प्रदर्शनों और वर्तमान स्थिति पर क्या सोचते हैं।
उस अधिकारी का उत्तर था, “कोई शरीफ़ लड़की रात में अकेली नहीं घूमती।” उसका यह उत्तर देवीनेनी के मन में बैठ गया।

उसका आशय स्पष्ट था - पीड़िता के साथ जो हुआ उसके लिए वह स्वयं ज़िम्मेदार और दोषी थी। देवीनेनी के लिए, जिनका जन्म भारत में हुआ था लेकिन वे अमेरिका में पले-बढ़े थे, यह एक गहरी सच्चाई का खुलासा था।
देवीनेनी याद करते हैं, “जब मैंने यह सुना तब मैं तुरंत समझ गया कि यह कोई कानूनी समस्या नहीं थी बल्कि यह एक सांस्कृतिक समस्या थी।”
उचित माध्यम का चुनाव करना
देवीनेनी को पहला विचार अपने जाने-पहचाने क्षेत्र में काम करने यानी वृत्तचित्र बनाने का आया। लेकिन उन्हें एहसास हुआ कि उस समय वृत्तचित्र बनाना और विशेष रूप से वृत्तचित्र के माध्यम से युवाओं तक पहुँचना लगभग असंभव था।
इसका समाधान उन्हें भारत में स्थित एक छोटे से दूरस्थ गाँव इलुरू में बिताए अपने बचपन की यादों से मिला। उस समय उनके गाँव में टेलीविज़न और मीडिया का विस्तार नहीं हुआ था और तब वे चित्रकथाएँ पढ़ा करते थे, विशेष रूप से भारतीय पौराणिक चित्रकथाएँ, जिनमें जातक कथाएँ और इसी तरह की अन्य कहानियाँ होती थीं।
वे बताते हैं, “हमारे पास इनके ढेर लगे रहते थे। मैं सिर्फ़ भारतीय पौराणिक कथाओं के बारे में ही नहीं पढ़ता था बल्कि इन चित्रकथाओं के माध्यम से दुनिया के विभिन्न हिस्सों के इतिहास और संस्कृतियों के बारे में भी जान पाता था। इसलिए उनका मुझ पर गहरा प्रभाव था।”

राम ने छह-सात महीने लैंगिक हिंसा पर शोध करने तथा गैर-सरकारी संगठनों, विशेषज्ञों एवं पीड़ितों से बातचीत करने में लगाए। उनके वृत्तांतों ने उस विचार को विकसित किया जिससे वह चित्रकथा बनी।
भय और रूपांतरण की पौराणिक कथा
जब देवीनेनी ने भारतीय पौराणिक चित्रकथाओं पर फिर से नज़र डाली तो उन्होंने इन कहानियों में एक प्रकार का विशेष पैटर्न देखा। मनुष्य जब भी किसी विकट परिस्थिति में होते थे तब देवताओं को सहायता के लिए पुकारते थे और देवता उनकी मदद करने के लिए आते थे। फिर भी अधिकतर मामलों में मनुष्यों को अंततः अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ही करना पड़ता था।
इस अवलोकन से उन्हें प्रेरणा मिली कि जो कहानी वे कहना चाहते थे, उसके साथ पौराणिक कथा को मिला दिया जाए। वे ज़ोर देकर कहते हैं कि वे इन पौराणिक कहानियों के माध्यम से किसी धर्म या मत का प्रचार करने का प्रयास नहीं कर रहे थे लेकिन उन्हें यह एहसास हुआ कि आस्था पर आधारित परंपराएँ समस्याओं पर चर्चा करने के लिए एक प्रभावशाली माध्यम हैं।
जब देवीनेनी ने जघन्य अपराधों से बचकर निकल आने वालों से बात की तो उन्होंने जाना कि एक भयानक हादसे के बाद सबसे पहली अवस्था भय की होती है। उनके साथ जो हुआ, उसका भय उन्हें आगे बढ़ने नहीं दे रहा था। उनमें वह भय अनेक कारणों से उत्पन्न हुआ। निस्संदेह अपने-आप में वह घटना तो ज़िम्मेदार थी ही लेकिन साथ ही उनके परिवार या उनके समाज से मिलने वाली संभावित प्रतिक्रिया का डर भी था जहाँ उन्हें अक्सर पीड़ित के बजाय उकसाने वाले के तौर पर देखा जाता था।
वे पीड़ित जो इस भय से उबर चुके थे, उन्होंने अपने आपको पीड़ित से उत्तरजीवी (अपराधों से बचकर निकल आने वाला) बना लिया था। इसीलिए देवीनेनी ने लगातार ‘उत्तरजीवी’ शब्द का प्रयोग किया है – उत्तरजीवी वे हैं जो अंततः उस भय से उबर सकते हैं - पूरी तरह नहीं तो कम से कम इतना तो उबर सकते हैं कि वे अपने जीवन में आगे बढ़ सकें और उस अनुभव का उपयोग न्याय पाने, उपचार पाने के लिए कर सकें। पीड़ितों का वह रूपांतरण बिलकुल वैसा ही था जैसा कि उन्होंने भारतीय पौराणिक कथाओं में पढ़ा था।
उन्होंने पाया कि ये ज्ञान परंपराएँ समय के हिसाब से उतनी असंगत नहीं हैं जितना बहुत से लोग सोचते हैं। भय पर काबू पाने और आत्मविश्वास बढ़ाने के मूलभूत सिद्धांत हमेशा ही बहुत प्रासंगिक होते हैं।
सिस्टिन चैपल में जादू
चित्रकथाओं में संवर्धित वास्तविकता (AR) का समावेश एक अप्रत्याशित स्रोत से आया था और यह शुरुआत में देवीनेनी के विचारों का हिस्सा नहीं था। एक दिन वे वेटिकन सिटी के सिस्टिन चैपल को देखने गए। वहाँ वे माइकलएंजेलो के भित्तिचित्रों और कलाकृतियों को देख रहे थे। जो कोई भी सिस्टिन चैपल देखने जाता है, उसे दो बातों का एहसास होता है - चित्रकला बहुत ऊँची छत पर बनी हुई है जिसे देखना कठिन है। यह चौकोर पट्टिकाओं में विभाजित है और हर पट्टिका मानवता तथा ईश्वर के साथ हमारे संबंध की अलग-अलग कहानियाँ प्रस्तुत करती है।
उन्होंने अपना फ़ोन ऊपर उठाया और उसके पीछे के कैमरे को ज़ूम किया ताकि वे उन कहानियों की छोटी-छोटी पट्टिकाओं को देख सकें। सिस्टिन चैपल में माइकलएंजेलों की पट्टिकाओं में विभाजित चित्रकला को देखते हुए उन्हें एहसास हुआ कि यह वस्तुतः चित्रित की गई एक महानतम चित्रकथा है। चित्रकथाओं को ‘अनुक्रमिक कला’ कहा जाता है क्योंकि ये पट्टिकाओं की एक श्रृंखला के द्वारा कहानी बताती हैं। सिस्टिन चैपल भी यही करता है।
फिर उन्हें एक और विचार आया कि वे चित्रकथा पट्टिका पर परत दर परत एक बहुस्तरीय रचना का निर्माण कर सकते हैं। शुरुआत में राम नहीं जानते थे कि इसे कैसे करना है। वे सिस्टिन चैपल वर्ष 2012-13 में गए थे जब संवर्धित वास्तविकता (AR) का विस्तार नहीं हुआ था। संवर्धित वास्तविकता किसी चित्रकथा को पॉप-अप पुस्तक में बदल सकती है। संवर्धित वास्तविकता और कला, विशेषकर चित्रकथा, का एक प्राकृतिक गुण होता है। यह उस माध्यम के लिए एकदम सही प्रतीत होता है। राम ने इंटरनेट पर एक संवर्धित वास्तविकता कंपनी को ढूँढा और उससे संपर्क किया। कंपनी को यह परियोजना पसंद आ गई।
राम ने अनेक पृष्ठ बनाए जिनमें विभिन्न एनिमेशन यानी जीवंत चित्र बाहर उभर आते थे जिससे लोग उनके साथ जुड़ सकें। चित्रकथा के दूसरे भागों में वीडियो या अन्य कहानियाँ प्रकट होती थीं जैसे पीड़ित उत्तरजीवियों की कहानियाँ ताकि लोग उससे अधिक से अधिक लाभ उठा सकें। लोग संवर्धित वास्तविकता के बिना भी चित्रकथा को पृष्ठ दर पृष्ठ पढ़ सकते थे लेकिन वे अपने फ़ोन पर प्रत्येक पृष्ठ को स्कैन करके उन सभी तत्वों को जीवंत होते हुए भी देख सकते थे।
यह एक अभूतपूर्व घटना थी क्योंकि वर्ष 2013 में कोई भी ऐसा नहीं कर रहा था।
देवीनेनी बताते हैं, “जब हमने लोगों को यह दिखाया तो उन्हें यह जादू की तरह लगा। यह बहुत ही शानदार था।”
जब उत्तरजीवी सह-निर्माता बन गए
जिन महिलाओं की कहानियों ने ‘प्रियाज़ शक्ति’ की रचना को प्रेरित किया था, वे इस कार्य की रचनात्मक प्रक्रिया में अभिन्न भागीदार और इसकी प्रभावशाली समर्थक थीं। यह सहभागिता एक मूलभूत निर्णय से शुरू हुई कि इन चित्रकथाओं में कभी भी हिंसा का सीधे चित्रण नहीं किया जाएगा। इसके बजाय वे उत्तरजीवी की दृढ़ता व रूपांतरण और सांस्कृतिक धारणाओं में बदलाव करने की उसकी ताकत पर केंद्रित रहेंगी। उनमें ज़ोर हमेशा इस बात पर होगा कि कैसे व्यक्ति आघात से उबरकर अपनी शक्ति और अधिकार हासिल करता है।
पहली चित्रकथा के साथ इस बात को लेकर संवेदनशीलता थी कि उत्तरजीवी किस प्रकार अपनी कहानियों को सार्वजनिक रूप से बता सकती थीं। उसके लिए बहुत सोच-समझकर आगे बढ़ने और उनकी परिस्थितियों का सम्मान करने की आवश्यकता थी।
उनकी दूसरी चित्रकथा ‘प्रियाज़ मिरर’ के मामले में कहानी और समय भिन्न थे। तेज़ाब के हमले से जीवित बची पीड़िताएँ अधिक खुलकर सामने आने लगी थीं तथा टीम के साथ मीडिया के सामने आकर अपने अनुभवों के बारे में बात कर रही थीं। वे न केवल इस चित्रकथा के लिए बल्कि स्वयं अपने लिए और अपने समुदाय के लिए आवाज़ उठाने वाली बन गई थीं।

ये उत्तरजीवी कहानियों को विकसित करने और फिर उनके प्रचार व प्रस्तुतीकरण में हमेशा शामिल रहती थीं। चित्रकथाएँ उनके लिए एक ऐसा साधन बन गई थीं जिसके माध्यम से वे बता सकती थीं कि उनके साथ क्या हुआ था, वे किस तरह से रूपांतरित हुईं और वे समाज को बदलने के लिए किस प्रकार से काम कर रही हैं।

परिवर्तन की तरंगें
सांस्कृतिक परिवर्तन का आकलन आँकड़ों से अधिक चेतना के बदलाव से संबंधित है। देवीनेनी को सफलता अप्रत्याशित तरीके से मिली।
वर्ष 2014 में जब ‘प्रियाज़ शक्ति’ प्रकाशित हुई थी तब ऐसी चर्चा छिड़ गई जैसी पहले कभी नहीं हुई थी। मीडिया अब केवल अपराधियों और कानूनी कार्यवाहियों से आगे बढ़कर उत्तरजीवियों के अनुभवों एवं उनकी दृढ़ता पर केंद्रित रहने लगा था। सोशल मीडिया, समाचार पत्र और टेलीविज़न अलग तरह के प्रश्न पूछने लगे थे और अलग प्रकार के विचारों को स्थान देने लगे थे।
देवीनेनी कहते हैं, “बातचीत के केंद्र में इस तरह का परिवर्तन महत्वपूर्ण था।”

लेकिन वास्तविक विकास तो उनकी दूसरी चित्रकथा ‘प्रियाज़ मिरर’ आने के बाद हुआ। अपने पहले अनुभव से सीखते हुए टीम ने अपने तरीके में सुधार किया। उन्होंने अपनी साझेदारी में विस्तार करते हुए भारत, कोलंबिया, इंग्लैंड और अन्य देशों में इसी प्रकार के मुद्दों पर काम कर रही गैर-सरकारी संस्थाओं को भी साथ में जोड़ा। इन संस्थाओं ने चित्रकथा का उपयोग अपने पक्ष-समर्थन, शिक्षा और सामुदायिक कार्य में किया।

पहली चित्रकथा से दूसरी चित्रकथा तक की प्रगति ने पुनरावृत्ति और सीखने की शक्ति को दर्शाया। प्रत्येक परियोजना ने राम की समझ को गहराई दी कि कैसे अर्थपूर्ण प्रभाव उत्पन्न किया जाए, कैसे उन आवाज़ों को बुलंद किया जाए जिन्हें सुना जाना ज़रूरी था और कैसे इस प्रकार के संसाधन बनाए जाएँ जिन्हें समुदाय अपना कह सके।
व्यक्तिगत विकास और दर्शन
भारत, कोलंबिया और अन्य जगहों पर तेरह वर्षों से इन मुद्दों पर कार्य करते हुए देवीनेनी उत्तरजीवियों की कहानियों को बहुत गहराई से महसूस करने लगे हैं। यह कार्य अत्यंत भावनात्मक है।
वे याद करते हैं, “मैं हमेशा सोचता था कि मुझे इसे उचित व सही तरीके से करना चाहिए। यह सुनिश्चित करना मेरे लिए बहुत ज़रूरी था कि उनकी कहानियों और उनकी भावनाओं को चित्रकथाओं द्वारा सचमुच समझा जाए।”
इस यात्रा के दौरान आघात, उपचार, समानुभूति और करुणा के बारे में उनका अपना दृष्टिकोण विकसित होता गया।
वे कहते हैं, “ये सभी जटिल तथा अत्यंत गहन बातें और विषय हैं। उन्हें वास्तव में सही तरीके से समझना होगा।”
जब वे युवा थे तब उन्होंने इस तरह की चित्रकथाएँ बनाने की कभी कल्पना भी नहीं की थी। यह विचार उनके मन में दूर-दूर तक नहीं था। वे तो बिलकुल अलग ही विषयों पर वृत्तचित्र बना रहे थे।

लेकिन उन्हें एहसास हुआ कि पुरुषों को इन मुद्दों के प्रति और ऐसी घटनाओं के होने या इन्हें रोकने में उनकी भूमिका के बारे में संवेदनशील बनाने की ज़रूरत है। यह अत्यंत आवश्यक है कि पुरुष भी इन मुद्दों पर बात करें और इस बदलाव का हिस्सा बनें।
देवीनेनी बताते हैं, “इसीलिए मुझे लगता है कि हमारे लिए यह समझना बहुत महत्वपूर्ण था कि जब हम चित्रकथाएँ बनाएँ तब हम युवाओं, विशेष रूप से किशोर लड़कों, के लिए चित्रकथाएँ बनाने पर केंद्रित रहें। वे ही आमतौर पर इन चित्रकथाओं और अन्य चित्रकथा पुस्तकों को पढ़ते हैं और यह महत्वपूर्ण है कि हम किशोर लड़कों के लिए एक चित्रकथा बनाएँ। यह मेरे लिए बहुत ज़रूरी था।”
अध्यात्म और सक्रियतावाद
कथावाचन में आध्यात्मिक आयाम लाने के लिए देवीनेनी को भारतीय पौराणिक कथाओं और उनके दार्शनिक आधारों को समझने के लिए बहुत समय देना पड़ा।
वे महान पौराणिक कथाकार जोसेफ़ कैंपबेल को पढ़कर बड़े हुए थे जिन्होंने तुलनात्मक पौराणिक कथाओं और विभिन्न संस्कृतियों की कहानियों का अध्ययन किया था और ‘स्टार वॉर्स’ जैसी रचनाओं को प्रेरित किया था। देवीनेनी ने भारतीय पौराणिक देवगणों, देवताओं, उनकी प्रेरणाओं और उनकी कहानियों को समझने के लिए गहराई से उनका अध्ययन किया। उनके अंदर उन कहानियों के लिए प्रेम और गहरा सम्मान विकसित हो गया, हालाँकि वे कहते हैं कि उनमें बहुत सारी जटिलताएँ हैं। वे बहुत पुरुष प्रधान, यहाँ तक कि दबंग भी हो सकती हैं। लेकिन उनमें गहन सत्य और ईमानदारी भी है, विशेषकर भय को जीतने वाली कहानियों में।
पहली चित्रकथा, ‘प्रियाज़ शक्ति’, में प्रिया को उसके गाँव से बाहर निकाल दिया जाता है और वह जंगल में रहती है जहाँ एक बाघ उसका पीछा करता है। एक दिन वह छिपने के लिए एक पेड़ पर चढ़ जाती है। तब देवी पार्वती प्रकट होकर उससे कहती हैं कि उसे बाघ का सामना करना चाहिए। प्रिया नीचे उतरती है, बाघ की आँखों में देखती है और एक शक्तिशाली मंत्र बोलती है जो उस बाघ को लेकर उसके अंदर के भय को शक्ति में बदल देता है। वे साथी बन जाते हैं, जो आगामी सभी चित्रकथाओं में एक साथ दिखाई देते हैं।
उनकी टीम ने ये सारे प्राचीन दर्शन और पौराणिक कथाएँ प्रिया के पात्र में डाल दिए थे। यह तरीका अमरीकन शैली की चित्रकथाओं और सुपरहीरो से मूलतः अलग है।
प्रिया असाधारण है क्योंकि उसकी शक्ति धर्म की राह पर चलने वाली शक्ति है जो समाज को रूपांतरित करती है। यह बात भारतीय धार्मिक परंपराओं और वृहद भारतीय दार्शनिक विरासत, विशेष रूप से अहिंसा के सिद्धांत से आती है। यह लड़ाई-झगड़े और हिंसा पर केंद्रित अमरिकी चित्रकथा दर्शन के बिलकुल विपरीत है। ये चित्रकथाएँ अमरिकी सुपरहीरो की कहानियों के विपरीत हैं।
नई कहानियाँ, स्थायी विषय
जैसे-जैसे यह परियोजना विकसित हुई, प्रिया की कहानी विस्तारित होने लगी और उसमें अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे भी शामिल होने लगे लेकिन उनमें रूपांतरण के मूल दर्शन को बनाए रखा गया।
कोविड-19 की महामारी के दौरान, उन्होंने ‘प्रियाज़ मास्क’ नामक चित्रकथा बनाई। उसमें एक छोटी लड़की की कहानी है जिसकी माँ एक नर्स थी। उस लड़की ने अपने डर पर विजय पाई और उसने अपनी माँ, जो मरीज़ों की देखभाल करती थी, के त्याग को समझा। इस चित्रकथा ने देखभाल करने वाली महिलाओं की अत्यधिक व अक्सर उपेक्षित भूमिका को दर्शाया। उसमें अनदेखा किए गए उनके योगदान और मौन वीरता के विषय को एक अलग दृष्टि से प्रस्तुत किया गया।
इस श्रृंखला ने पर्यावरण से जुड़ी कहानियाँ भी प्रस्तुत कीं, जिसमें प्रिया के साथी बाघ, ‘साहस’ पर केंद्रित चित्रकथाएँ भी शामिल थीं। इन कहानियों में जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई को संबोधित किया गया था और पारिस्थितिकी विनाश को सुरक्षा और संरक्षण के व्यापक विषयों से जोड़ा गया था।
परिवर्तनकर्ताओं के लिए कुछ ज्ञानपूर्ण शब्द
देवीनेनी उन युवाओं के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान करते हैं जो सामाजिक रूप से प्रेरित कला के माध्यम से बदलाव लाना चाहते हैं।
वे ज़ोर देकर कहते हैं, “अपनी कला के प्रति सच्चे रहें। सामाजिक संदेश से प्रेरित कलाकृति बनाने से पहले आपको यह समझना होगा कि एक कलाकार के रूप में आप कहाँ से आए हैं। यही उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पहला कदम है।”
वे शेक्सपियर को उद्धृत करते हैं, “सबसे बढ़कर, अपने आप के प्रति सच्चे रहो।” जब आप कोई ऐसी चीज़ बनाना चाहते हैं जिसका सामाजिक मुद्दों पर प्रभाव पड़े तब उसके लिए सच्ची प्रतिबद्धता और समय देने की आवश्यकता होती है। वे इसे 13 वर्षों से कर रहे हैं और यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे उन्होंने एक बार करके छोड़ दिया और आगे बढ़ गए। वे इसे लगातार करते रहे क्योंकि बदलाव करने और उसका असर आने में समय लगता है।
कई बार ये प्रभाव बहुत ही छोटे होते हैं। हो सकता है कि यह प्रभाव किसी छोटे समुदाय पर ही पड़ा हो। लेकिन लोगों को इन छोटे-छोटे कदमों से हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। यदि आप अपनी चित्रकला के प्रति सच्चे हैं तो आप अपने परिणामों से निराश नहीं होंगे। आप और अधिक प्रेरित महसूस करेंगे और आगे बढ़ते जाएँगे।
मंत्र जो सभी को प्रेरित करता है
मैंने पूछा, “यदि प्रिया स्वयं पाठकों को कोई संदेश दे सकती तो वह क्या होता?”
देवीनेनी हिचकिचाते नहीं और कहते हैं कि पहली चित्रकथा में प्रिया द्वारा बोला गया मंत्र ही वह संदेश है -
“बिना शर्मिंदगी के बोलें। मेरे साथ खड़े हों और वह परिवर्तन लाएँ जो आप देखना चाहते हैं।”
यही मंत्र का मर्म है जिसका वे तेरह वर्षों से पालन कर रहे हैं। यह ऐसा आह्वान है जो धर्म के मार्ग पर चलने के विशिष्ट भारतीय दर्शन के माध्यम से चुप रहने से इनकार करता है, शर्म को अस्वीकार करता है और रूपांतरण की माँग करता है।
प्राचीन कहानियों की तरह जहाँ मानव को अपनी समस्याएँ स्वयं सुलझानी पड़ती थीं, प्रिया का संदेश इस बात की पुष्टि करता है कि शक्ति देवताओं या बाहरी ताकतों में नहीं होती बल्कि हमारे अंदर ही होती है। प्रत्येक व्यक्ति को इस दुनिया में बिना भय के जीवन जीने का अधिकार है। और जब भय प्रकट हो ही जाता है तब उसे शक्ति में रूपांतरित किया जा सकता है।
बाघ जो कभी हिंसक जानवर था, प्रिया का साथी बन जाता है। उत्तरजीवी तब परिवर्तन के लिए शक्ति बन जाती है। और चित्रकथा एक पट्टिका, एक कहानी और एक रूपांतरित जीवन के साथ क्रांति का साधन बन जाती है।
‘प्रियाज़ शक्ति’ लगातार विकसित हो रही है जिसमें पौराणिक कथा, सक्रियतावाद और समसामयिक चुनौतियों को जोड़ने वाली कहानियाँ प्रस्तुत की जाती हैं। www.priyashakti.com पर और अधिक जानें।



