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कलाकार कार्ला साख्सी कागज़राजनीति और शरीरजिसे वे स्मृति को संजोने वाला पात्र मानती हैंके बारे में वनेसा पटेल के साथ बातचीत कर रही हैं।

प्र. - कार्ला, आपकी कला-संग्रह की सूची में इतनी भव्य रचनाओं को देखकर मैं बहुत प्रभावित हूँ। मैंने इसका कुछ हिस्सा तब देखा था जब आप इसे बना रही थीं और फिर मैंने आपकी कृतियों को बर्लिन में आपकी एक प्रदर्शनी में देखा था। आपने कागज़ का बहुत ही अनोखे तरीकों से उपयोग किया है। आपने ऐसी वस्तु को, जो नाज़ुक लगती है, टिकाऊ बना दिया है। आप कैनवास के बजाय कागज़ पर क्यों पेंट करती हैं?

शुरुआत में मैं कैनवास और बोर्ड पर पेंटिंग करती थी, लेकिन जल्द ही मुझे लगने लगा कि दूसरे लोग मुझसे बेहतर पेंटिंग करते हैं। फिर मैंने कागज़ पर काम करना शुरू किया क्योंकि उसे बाद में नष्ट करना आसान होता है। आप कैनवास के साथ ऐसा नहीं कर सकते। आप उसे फाड़ नहीं सकते। लेकिन कागज़ को आप मसलकर फेंक सकते हैं, हालाँकि मैंने ऐसा कभी नहीं किया।

प्र. - आपने सब कुछ इस्तेमाल किया है - कागज़ के टुकड़े, दस्तावेज़, टिकट की रसीदें, कटा-फटा कागज़, समाचार पत्र, यानी हर तरह का कागज़।

कल बर्लिन की फ्री यूनिवर्सिटी में मैंने अपनी वार्ता में एक वाक्य कहा था। वह कागज़ के बारे में था, “कागज़ ठोस वस्तु है लेकिन रचनात्मकता के स्तर पर यह तरल है। इस पर बनने वाले चित्र मानो रचनाकार के हाथों से फिसलकर स्वतंत्र रूप ले लेते हैं।” यह केवल कागज़ का वर्णन है। मुझे उन वस्तुओं का उपयोग करना अच्छा लगता है जो पहले से इस्तेमाल हो चुकी हैं, जिनमें एक इतिहास और कहानी छिपी है।”

प्र. - निश्चित रूप से हर छोटे से छोटे कागज़ के टुकड़े की अपनी एक कहानी होती है। क्या इस तरह का काम करने का तरीका आपके पूर्वी बर्लिन के शुरुआती दिनों से प्रेरित था?

यह तब हुआ जब मैं अपने साथी जोसेफ़ से मिली जो पहले से ही इस अंतर्राष्ट्रीय ‘मेल आर्ट’ समूह से जुड़े हुए थे। वह एक विकेंद्रीकृत वैश्विक आदान-प्रदान था जिसमें कलाकार छोटी-छोटी कलाकृतियाँ एक-दूसरे को भेजते थे, जिससे आधिकारिक सरकारी चैनलों को दरकिनार कर संबंध बनाए जाते थे। पूर्वी जर्मनी में यह बाहरी दुनिया तक पहुँचने का एक दुर्लभ और कभी-कभी जोखिम भरा तरीका था। वह समूह ऐसी छोटी-छोटी चीज़ें बना रहा था जो लिफ़ाफ़े में आ सकती थीं ताकि उन्हें सुरक्षित रखा जा सके और सरकारी गुप्त सेवा के नियंत्रण से बाहर रखा जा सके। तो, मेरी शुरुआती कृतियाँ छोटी थीं और उनमें से कुछ मैंने उस समय पूर्वी जर्मनी में कभी नहीं दिखाईं क्योंकि वे राजनीतिक विषयों पर थीं। मैं समाचार पत्रों में छपी सूचनाओं को काटकर उन पर टिप्पणी करती थी और यह खतरनाक था।

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प्र. - उससे तो आप बहुत बड़ी मुसीबत में फँस सकती थीं।

हाँ, मेरा एक बेटा था और इसलिए मैं जेल नहीं जाना चाहती थी। लेकिन मैंने बड़े-बड़े काम भी किए। मुझे जून 1989 में अपनी पहली स्थापना कलाकृति (installation artwork) करने का अवसर मिला। मैंने एक कमरे को कागज़ से भर दिया - दीवारें कोरे, सुंदर, सफ़ेद कागज़ों से ढकी हुई थीं और फ़र्श पर मुड़े हुए कागज़ बिखरे पड़े थे। आपको उनके बीच में से गुज़रना पड़ता था।

कमरे के केंद्र में समाचारपत्रों का एक ऊँचा ढेर था जो कम्युनिस्ट पार्टी का मुख्य प्रकाशन था। उसे न तो वहाँ पढ़ा जा सकता था और न ही अब कोई पढ़ना चाहता था। ऐसा करके मैं अपनी सोच को व्यक्त भी कर सकती थी और फिर भी ‘नीली आँखों वाली’ यानी मासूम दिख सकती थी। मैं कह सकती थी, “मैं निर्दोष हूँ, मैंने तो बस इन सुंदर समाचारपत्रों को एक ढेर में लगा दिया है।”

प्र. - वह सच में चतुराई का काम था। आपने फ्रॉटेज कला (किसी खुरदरी सतह पर कागज़ रखकर रगड़ना) से बहुत सारी कृतियाँ बनाई हैं। आप फेंकी हुई वस्तुओं में भी चित्र देख लेती हैं तथा उन्हें अपनी कला से जीवंत बना देती हैं। आप कैसे तय करती हैं कि किस वस्तु की छाप (रबिंग) बनानी है?

जहाँ मेरा ग्रामीण बगीचा है वहाँ बहुत सारे बड़े-छोटे पत्थर पड़े हैं जो हिमयुग के दौरान जमा हुए थे। मुझे लगा कि अवश्य कुछ घटित हुआ होगा जिसके कारण ये पत्थर बर्फ़ के साथ यहाँ आए होंगे। इसलिए मैंने उनकी सतह को ध्यान से देखा और हम इंसान हमेशा वस्तुओं को देखते हैं क्योंकि हम उनमें अपना प्रतिबिंब देखना चाहते हैं।

मेरे एक पत्थर पर कागज़ रखते ही एक आश्चर्य सामने आता है। उसमें कुछ ऐसा दिखाई देता है जैसे आँखें हों। जब आप पत्थर को स्पर्श करके परखते हैं तब पत्थर आपको बताता है कि कहाँ रुकना है। लेकिन यह स्पर्श अनुभव हमेशा आपकी आँखों के दृश्य अनुभव से अलग होता है।

मैंने ‘द हैंड्स सी डिफ़रेंट’ नामक एक प्रदर्शनी की थी। रगड़ने वाले हाथों का अनुभव आँखों के अनुभव से अलग होता है और यह हमेशा एक आश्चर्य होता है।

कुछ समय पहले आपने मुझे सुंदर, महीन मलमल का कपड़ा भेजा था। मैंने उसे कागज़ की जगह इस्तेमाल किया - जैसे डेनमार्क के एक पुराने पावर प्लांट की दीवारों पर बनी छापों पर रगड़ने के लिए। वह कपड़ा वहाँ लटकता और हिलता रहा, जिससे वह अलग ढंग से जीवंत हो उठा।

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प्र. - वैसे तो मुझे किसी एक रचना को अपनी पसंदीदा नहीं बनाना चाहिए लेकिन फिर भी आपकी रचनाओं का संग्रह ‘बास्केट्स ऑफ़ एक्सपीरियंस’ मेरा पसंदीदा है। इसमें कागज़ से बनी वस्तुएँ हैं जो शरीर के अंगों जैसी दिखती हैं। और आपने बताया कि हर एक को आपने अलग-अलग देश में वहाँ फेंके गए समाचारपत्रों से बनाया था। आपने इन पात्रों की कल्पना
कैसे की?

मैंने वर्ष 2001 में थाईलैंड में आयोजित एक वुमेनिफ़ेस्टो कार्यशाला में टोकरियाँ बुनना सीखा था। उसमें बहुत धैर्य की आवश्यकता थी और मुझे तभी महसूस हुआ कि मैं लपेटे हुए कागज़ से शरीर के अंगों को आकार देना चाहूँगी।

उस समय मीडिया में प्रसवपूर्व निदान, अल्ट्रासाउंड और डॉक्टरों के पास बहुत अधिक नियंत्रण होने पर बहुत चर्चा हो रही थी और उससे मैं बहुत क्रोधित हुई। तो, थाईलैंड में मैंने एक गर्भाशय बनाया, जो डॉक्यूमेंटा 15 (समकालीन कला प्रदर्शनी) का हिस्सा था और अब थाईलैंड में वुमेनिफ़ेस्टो के अभिलेखागार (archive) में है। मुझे तुरंत ही पता चल गया था कि मैं इस पर काम करना जारी रखूँगी।

जब भी मुझे समय मिलता - मान लीजिए, एक हफ़्ता या उससे अधिक - मैं एक नई वस्तु बुनना शुरू कर देती। यात्रा से पहले मैं सोचती कि मेरा डेनमार्क से क्या संबंध है? मेरा भारत से क्या संबंध है? और मैं सोचती कि मेरे शरीर का कौन-सा हिस्सा उस विशेष स्थान से सबसे अधिक जुड़ता है जहाँ मैं जा रही थी। तो, भारत के लिए मैंने एक लालायित हृदय रूपी पात्र बनाया क्योंकि मेरे लिए भारत संसार का हृदय है।

 

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प्र. - मैं आपसे पूछने वाली थी कि आपने भारत के लिए हृदय क्यों चुना। मुझे पता है कि आप वहाँ कुछ बार जा चुकी हैं और आपने वहाँ काम भी किया है।

कोच्चि, केरल, में अपने कार्यकाल के दौरान हमारे पास हार्दिक संपर्क बनाने के लिए पर्याप्त समय होता था। शुरू से ही मेरे लिए अपने काम में लोगों की राय और कहानियाँ शामिल करना ज़रूरी था। इसलिए मैंने उन सभी से, जो हमारे साथ काम करते थे या हमारे आसपास थे, उनके हृदय में हुए अनुभव - उनके दुख और सुख - पूछे।

उन्होंने अपने अनुभव कागज़ पर लिखे और उनकी आँखों के सामने मैंने कागज़ को लपेट दिया। लोग देख सकते थे कि उन पर हाथ से लिखा हुआ है, लेकिन अब उसे पढ़ा नहीं जा सकता था। राज़ को छुपाकर टोकरी की बुनाई में शामिल किया गया। यह शुरू से ही सहयोग का एक और विचार था, जो मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

प्र. - यह एक अद्वितीय समावेशी तरीका है, जो उन्हें अपनी बात कहने का अधिकार व स्वतंत्रता देता है और साथ ही उनकी निजता और अंतरतम भावनाओं का सम्मान करता है। वे पात्र उनकी कहानियों को संजोए हुए हैं।

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वर्ष 2023 में, जब हमारी बड़ी प्रदर्शनी थाईलैंड के ‘बैंगकॉक आर्ट एंड कल्चर सेंटर’ में हुई थी, मुझे अपने कार्य को प्रदर्शित करने का एक शानदार अवसर मिला था। बुनी हुई वस्तुएँ छत से आँखों की ऊँचाई तक लटकी हुई थीं और आगंतुक उनके बीच से होकर चल रहे थे।

कई युवा इस प्रदर्शनी को देखने आए थे, जो हमें बर्लिन और पश्चिम में अक्सर देखने को नहीं मिलती। आप देख सकते थे कि वे पढ़ने या समझने की कोशिश कर रहे थे और शायद उनके साथ अपनी कहानी जोड़ रहे थे।

प्र. - जब उन्होंने इन शरीर के अंगों को टोकरी के रूप में देखा तब आप उन्हें क्या महसूस और अनुभव कराना चाहती थीं?

सृजन के दृष्टिकोण से यह किसी विशेष स्थान से जुड़ा मेरा अपने शरीर और मन का अनुभव है। लेकिन क्योंकि इन रचनाओं के आकार ऐसे हैं जिन्हें आप पहचान सकते हैं, इसलिए यदि आपको शरीर रचना (anatomy) का कुछ ज्ञान है तो आप इसमें अपने अनुभवों को भी शामिल कर सकते हैं। आप स्वयं से पूछ सकते हैं - मैं आँतों के माध्यम से और मानसिक रूप से अपनी पाचन प्रक्रिया के बारे में क्या सोचता और महसूस करता हूँ?

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प्र. - मुझे आँखें प्रिय हैं - पाँच आँखों के गोले।

हाँ, आँखें बहुत ही खास हैं क्योंकि मैंने उन्हें वियतनाम में युद्ध के दिग्गजों से बात करने के बाद बनाया था। आप उनसे सीधे उनके अनुभवों के बारे में नहीं पूछ सकते, इसलिए मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने अपने जीवन में क्या देखा है।

उन्होंने युद्ध के बारे में नहीं, बल्कि अपने आसपास और अपने जीवन के बारे में सामान्य बात की। इसलिए ये आँखें विशेष हैं। ये पाँच अलग-अलग लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं और आज तक मुझे भी बहुत भावुक कर देती हैं।

प्र. - मैं आपको एक कलाकार के रूप में जानती हूँ, लेकिन आप अपने जीवन में बहुत समय एक कला शिक्षिका रही हैं और आपने बहुत सारे युवाओं को प्रभावित किया है। आपने इससे क्या पाया? इस प्रक्रिया ने आपकी रचनात्मकता में कैसे मदद की?

मेरे स्कूल की शिल्पशाला (studio) में छात्र चित्रकारी करते थे। अपने काम के बारे में वे जो भी जानना चाहते थे, उसके लिए मैं हर छात्र की व्यक्तिगत रूप से मदद कर सकती थी। निस्संदेह इस सारी शिक्षा की तैयारी में मुझे अपनी बहुत ऊर्जा खर्च करनी पड़ती थी लेकिन मुझे हमेशा ऐसा महसूस होता था कि उन युवाओं की मौजूदगी से मुझे उतनी ही ऊर्जा वापस मिल जाती थी।

आजकल युवाओं का समुदाय होना बहुत अच्छा लगता है। जब भी मेरी प्रदर्शनी का उद्घाटन समारोह होता है, मुझे वहाँ युवाओं को देखना अच्छा लगता है, सिर्फ़ अपनी उम्र के लोगों को ही नहीं।

कल मैंने पश्चमी बर्लिन के एक विश्वविद्यालय में पैंतीस छात्रों को एक व्याख्यान दिया और उन्हें अपना काम दिखाया। वे साहित्य का अध्ययन कर रहे हैं और सेमिनार ‘कंक्रीट एंड विज़ुअल पोएट्री’ (साकार कविता व दृश्य कविता) पर था। जल्द ही वे राजनीतिक स्थिति और मेरे काम से संबंधित विषयों पर निजी प्रश्न पूछने लगे।

वे सभी युवा बर्लिन की दीवार गिरने के बाद पैदा हुए हैं, इसलिए उन्होंने उसे प्रत्यक्ष रूप से अनुभव नहीं किया है। इतिहास के प्रति इन युवाओं की रुचि और जिज्ञासा को देखकर बहुत खुशी हुई।

प्र. - कार्ला आपका काम बहु-स्थानिक है। आपने दुनिया भर में काम किया और प्रदर्शनियाँ लगाई हैं। क्या आपकी इस तरह घूमने की लालसा कुछ समय के लिए बंद वातावरण में रहने के कारण है, जहाँ आप सीमित स्थान में प्रतिबंधों के साथ रहीं?

मैंने पहले अपने समाज को बदलने के लिए कुछ गुप्त रूप से कार्य करने वाले समूहों के साथ काम किया था। लेकिन जब दीवार गिर रही थी तब यह स्पष्ट हो गया था कि हम तुरंत पश्चिमी व्यवस्था अपनाने की ओर जा रहे थे, जो बहुत से लोगों के लिए अच्छी स्थिति नहीं थी।

मैंने सोचा, अब मेरे लिए बहुत देर हो चुकी है। मैं एक साल के लिए न्यूयॉर्क में रहने नहीं जा सकती थी, जैसा कि मैं चाहती थी, क्योंकि मेरा बेटा छोटा था।

लेकिन तब से इस मेल आर्ट नेटवर्क के माध्यम से मैं अपनी कृतियों के साथ सभी महाद्वीपों और यूरोप के कई देशों में गई हूँ। शुरू में मैं पेरिस और लंदन नहीं जाना चाहती थी क्योंकि मैं उनके बारे में अपनी कल्पनाओं को नष्ट नहीं करना चाहती थी। लेकिन अंततः कई अन्य यूरोपीय देशों की यात्रा करने के बाद मैं वहाँ गई।

प्र. - मैंने आपकी एक रचना ‘सेटल्ड डाउन वुमन’ देखी है, जो महिलाओं की पूर्ण आकृतियों के समुच्चित चित्र (collages) हैं। क्या आप उस कार्य के बारे में थोड़ा बता सकती हैं?

यह मेल आर्ट नेटवर्क का परिणाम था। मैं ब्रुसेल्स, बेल्जियम, के एक कलाकार के साथ पत्राचार करती थी। उन्होंने मुझे ब्रुजलेट में सन्यासिनियों (nuns) के मठ में एक प्रदर्शनी के लिए आमंत्रित किया।

उसने मुझे पश्चिम से आए नारीवादी लेखों और कहानियों के बारे में सोचने पर मजबूर किया। हालाँकि मुझे कभी भी पितृसत्ता की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ा, फिर भी मैं नारीवादी सोच का पूरी तरह समर्थन करती थी। इसी भावना से मैंने बारह मातृसत्तात्मक आकृतियाँ बनाईं - चार सफ़ेद जो कुँवारी कन्याओं का प्रतीक थीं, चार लाल जो माताओं का प्रतीक थीं और चार काली जो वृद्ध महिलाओं का प्रतीक थीं। ये मिलकर उस पवित्र त्रिमूर्ति का रूप हैं जो ईसाई धर्म में आने से बहुत पहले अस्तित्व में थी। मैंने इन पर पंद्रह दिनों से भी अधिक समय तक बिना सोए काम किया और जब ये आकृतियाँ तैयार हो गईं तब मैंने इन्हें लपेटकर बेल्जियम भेज दिया, यह जाने बिना कि इनके साथ क्या होगा। सौभाग्य से, मेरी एक चाची थीं जिन्होंने मुझे अपने चौरासीवें जन्मदिन पर आमंत्रित किया और मैं किसी तरह बेल्जियम जाने के लिए एक अवैध विकल्प पासपोर्ट प्राप्त कर पाई। इस प्रकार मैंने उस मठ में प्रदर्शनी देखी।

प्र. - यह अविश्वसनीय है। आपने यह काम दीवार गिरने से पहले किया, उन्हें एक रोल में भेजा और फिर उन्हें प्रदर्शित होते देखा। यह तो बहुत आश्चर्यकारी अनुभव रहा होगा।

यह आश्चर्यकारी था क्योंकि वे सब आकृतियाँ एक बड़े स्थान में लटकी हुई थीं। आप उन्हें पीछे से भी देख सकते थे। वह दृश्य बहुत सुंदर था, सामने से देखने की तुलना में अधिक अमूर्त।

बाद में, उन्हें बेल्जियम में एक अन्य स्थान पर और डेनमार्क के एक चर्च में प्रदर्शित किया गया। जब वे मेरे पास वापस आईं तब मैंने सोचा कि मैं उन्हें फिर कभी नहीं दिखाऊँगी (जिसका मुझे अफसोस है)। इसलिए मैंने उन्हें दुनिया भर में अपनी परिचित महिलाओं को भेज दिया ताकि वे उन्हें प्रदर्शित कर सकें और अन्य लोग उन्हें देख सकें।


सृजन के दृष्टिकोण से यह किसी विशेष स्थान से जुड़ा मेरा अपने शरीर और मन का अनुभव है। लेकिन क्योंकि इन रचनाओं के आकार ऐसे हैं जिन्हें आप पहचान सकते हैंइसलिए यदि आपको शरीर रचना (anatomy) का कुछ ज्ञान है तो आप इसमें अपने अनुभवों को भी शामिल कर सकते हैं। आप स्वयं से पूछ सकते हैं - मैं आँतों के माध्यम से और मानसिक रूप से अपनी पाचन प्रक्रिया के बारे में क्या सोचता और महसूस करता हूँ?


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प्र. - आपकी मातृसत्तात्मक आकृतियाँ पूर्वी बर्लिन से बाहर यात्रा कर चुकी हैं और हर जगह गई हैं। क्या ऐसा कुछ है जो आप साझा करना चाहती हैं जिसके बारे में हमने अभी तक बात नहीं की है?

हाँ, मेरी कृतियों की सूची में ‘पदार्थ, भाषा और स्थान’ शीर्षक का एक विवरण है। मैंने इसे वर्ष 1998 में लिखा था और यह मेरे सभी कार्यों का एकत्रीकरण है।

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प्र. - मुझे यह कविता जैसा लगता है।

हाँ, बिलकुल यही लगता है। आप चाहे इसे कॉलम में ऊपर से नीचे या क्षैतिज रूप से पढ़ें, फिर भी यह समझ में आता है।

प्र. - समाप्त करने के लिए यह एक सटीक बिंदु है। मैंने आपके काम के कई पहलुओं की खोज की है लेकिन अभी और भी बहुत कुछ जानना बाकी है। कार्ला हमें समय देने के लिए धन्यवाद और कृपया ऐसे अद्भुत संपर्क बनाना जारी रखें।

कार्ला साख्सी की कला एवं उनकी चल रही परियोजनाओं के बारे में अधिक जानने के लिए उनकी आधिकारिक वेबसाइट  www.karla-sachse.de पर जाएँ।


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कार्ला साख्सी बर्लिन और हर्ज़फ़ेल्ट में रहने वाली एक कलाकार हैं, ज... और पढ़ें

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