पूज्य गुरुदेव,
कौन से गुण हमें संवाद के हर स्तर पर गहराई में उतरने में मदद करेंगे?
प्रिय चीनू भाई,
हर चीज़ संवाद करती है। हमें सिर्फ़ उन स्पंदनों को समझने की ज़रूरत है। ये स्पंदन कभी कथित होते हैं, अक्सर अकथित होते हैं और कभी ये चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, वास्तुकला, ध्यान या गहरी शांति द्वारा व्यक्त किए जाते हैं। हमारे आसपास बहुत कुछ संचारित होता है। सर्वोत्तम संवाद वह है जिसमें हम अपने ‘स्व’ यानी अंतर्मन के साथ संवाद करते हैं और जीवन का अर्थ समझने की कोशिश करते हैं। क्या ज़िंदगी हमसे बात करेगी?
यह सारी सृष्टि ध्वनि से भरी है। यह ध्वनि से शुरू हुई, ध्वनि से ही चलती है और ध्वनि के साथ ही एक गहरे मौन में इसका अंत होगा। सृष्टि चल रही है और हम इसके चलने का आनंद ले रहे हैं। हमें उस ध्वनि को जानने की ज़रूरत नहीं है जो सृष्टि-रचना के वक्त थी या फिर उस वक्त होगी जब सृष्टि का अंत हो जाएगा और पुनः कुछ भी नहीं होगा। इस समय ज़रूरी है कि हम उस शाश्वत ध्वनि की, उस शाश्वत स्पंदन की, उस ध्वनि रहित ध्वनि की अनुभूति करें जो सृष्टि रचना के पहले व्याप्त थी।
अब हमारे दैनिक जीवन के एक पहलू पर नज़र दौड़ाते हैं। हम अपनी आँखों के सामने ऐसी बातों को, घटनाओं को होते हुए अक्सर देखते हैं। पुरुष अक्सर अपनी माँ, पत्नी या बहन के अंतर्बोध से काफ़ी आश्चर्यचकित रह जाते हैं। एक स्त्री के अंतर्बोध को कम नहीं आँका जा सकता। साधारणतः एक स्त्री की भावनाएँ एक पुरुष के तर्कसंगत और सीमित समझ से बहुत परे होती हैं। शायद इसीलिए पुरुष अक्सर मुसीबत में पड़ जाते हैं क्योंकि एक स्त्री की अंतर्दृष्टि उसके झूठ को आसानी से बेनकाब कर देती है। अंतर्दृष्टि पढ़ने की तरह है - किसी किताब को नहीं, बल्कि एक चेहरे को। ऐसा करते हुए व्यक्ति आवाज़ में या खामोशी के पीछे छुपी हुए भावनाओं को महसूस कर पाता है। ये भी संवाद के ही रूप हैं। एक व्यक्ति स्पंदन प्रेषित करता है तथा दूसरा व्यक्ति उन्हें महसूस करता है और प्रतिक्रिया करता है।
एक बार की बात है, हम लोग फ्रांस में ओज़्रहां और ग्रनोबल के बीच चार गाड़ियों में सफ़र कर रहे थे। हमारी गाड़ी में बैठे लोग बात कर रहे थे कि अमुक स्त्री के लिए अमुक पुरुष पति के रूप में कितना उपयुक्त होगा। दूसरी गाड़ी में वह सज्जन पुरुष बैठा था जिसके बारे में हम लोग बात कर रहे थे। और उसकी मीठी-मीठी खिंचाई हो रही थी, जैसा इन अवसरों पर अक्सर होता है। आश्चर्य की बात तो यह थी की दोनों ही गाड़ियों में बातचीत का विषय इन दोनों को ज़िंदगी भर के लिए एक करना ही था। जब हम लोग दोपहर का खाना खाने के लिए रुके तो पता चला कि हम सब एक ही विषय पर बातचीत कर रहे थे। बात सबके सामने खुल कर आ गई और उसी दोपहर को उन दोनों की सगाई भी हो गई।
मैं यह सब क्यों बता रहा हूँ? अलग-अलग लोगों को एक ही वक्त में एक सा अंतर्बोध हो सकता है। भले ही ऐसा कभी-कभी ही होता है लेकिन यह संभव है। बहुत से वैज्ञानिक अनुसंधान एक ही वक्त में एक-दूसरे से बिलकुल अनजान वैज्ञानिकों द्वारा किए जाते हैं, कभी-कभी तो एक ही हफ़्ते में।
अपने प्रशिक्षक के साथ ध्यान करने पर मुझे पहले से ही ध्यान के समाप्त होने का एहसास हो जाता था। मेरी अंदर की आवाज़ और उनकी बाहरी आवाज़, दोनों एक साथ ही आती थीं, मानो मैं स्वयं ही ध्यान का अंत करने की घोषणा कर रहा हूँ। शायद यह अंतर्बोध नहीं है। शायद ऐसा आध्यात्मिक कार्य के कारण होता है। ऐसा अनुभव सिर्फ़ मुझे ही नहीं हुआ है। मैंने देखा है कि कई लोगों को जब मैं रिमोट सिटिंग देता हूँ, वे बाद में मुझे लिखते हैं कि वे ध्यान में कितनी देर बैठे थे, मैंने शुरू में क्या काम किया था और ध्यान का अंत कैसे हुआ।
इस प्रकार हम कई तरह के संवाद होते हुए देखते हैं। एक और संवाद होता है, आपके और आपके आध्यात्मिक अस्तित्व (Spiritual Entity) के बीच। पहले तो आपका एक अनुरूपी आध्यात्मिक अस्तित्व होना चाहिए और उसके बाद आप दोनों के बीच संपर्क स्थापित होना चाहिए। तीसरा, संवाद की ज़रूरत पैदा होनी चाहिए और सामने से जवाब भी मिलना चाहिए।
एक अन्य स्तर का संवाद लौकिक आत्माओं और दिव्य लोक की हस्तियों के बीच होता है। ऐसा कभी-कभी ही होता है मगर यह असंभव नहीं है।
कभी-कभी कुछ कम विकसित लोगों को सपनों के द्वारा मार्गदर्शन दिया जाता है। अगर जागरूक अवस्था में उन्हें कोई संकेत दिया जाता है तो हो सकता है वे उसे महज़ अपनी कल्पना समझें। जब उन्हें स्वप्नवस्था में किसी ऐसे व्यक्ति से निर्देश प्राप्त होते हैं जिनका वे बहुत सम्मान करते हैं या जिनसे वे बहुत प्रेम करते हैं तो वे उन निर्देशों का विरोध नहीं कर पाते हैं।
एक गहरे संवाद के लिए सबसे ज़रूरी है सादगी और शुद्धता। जब सादगी और शुद्धता हमारे अस्तित्व की पहचान बन जाती हैं तब अपने आप ही हमारे भीतर आंतरिक खामोशी विकसित हो जाती है जो हर परिस्थिति में हमें पूरी स्पष्टता प्रदान करती है। हृदय की खामोशी, खामोशी के मूलतत्व को जन्म देते हुए, व्यक्तिगत स्तर पर आध्यात्मिक विकास और उन्नति की अनगिनत संभावनाएँ पैदा कर देती है। हृदय की खामोशी में ही आस्था विकसित होती है। हृदय की खामोशी में ही हम ईश्वरीय कृपा को प्राप्त करते हैं। इस खामोशी में ही हमें ईश्वर के सच्चे दर्शन हो सकते हैं। खामोशी का केंद्र सदैव बिना किसी मिलावट के होता है और ईश्वर के साथ सीधे संपर्क में रहता है। अपनी इस गहरी खामोशी को सुनने से हमें अभ्यास का सबसे लाभप्रद पहलू प्राप्त होता है और हमें वे सारे उत्तर मिल जाते हैं जिन्हें हम ढूँढते हैं।
इस खामोशी की वजह से हम हर परिस्थिति में अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन पाते हैं। जीवन में ऐसे भी कुछ पल होते हैं जब हमारे विवेक को चुनौती का सामना करना पड़ता है। कभी हम सही निर्णय ले पाते हैं तो कभी हमारा निर्णय उचित नहीं होता है। जब हम उन घटनाओं के बारे में सोचते हैं तो पाते हैं कि हमने जब-जब अपने दिल की नहीं सुनी तब-तब हम गलती कर बैठे। अंतर्मुखी होने से हमारे भीतर की खामोशी और गहरी होती है जबकि बहिर्मुखी होने से हम हृदय की इस खामोशी से, अपने केंद्र से, दूर जाने लगते हैं। इससे हम कष्ट भोगते हैं और शांति खो बैठते हैं।
हम अपनी इस आंतरिक खामोशी की गहराई को कैसे बढ़ा सकते हैं? हमें पूरी तरह से अपने अंतर्मुखी होने पर केंद्रित होना पड़ेगा। अपने ऊपर काम करना, सामूहिक ध्यान और वो बहुत से सेमीनार जिनका हम आयोजन करते हैं, उन सबका उद्देश्य यही है। श्रद्धापूर्वक एकदम स्थिर बैठें, अपने ध्यान को हृदय की इस खामोशी की तरफ़ मोड़ें, प्रार्थनापूर्वक ध्यान करें और फिर उसका प्रभाव देखें। साथ ही आपको उन सब बातों से दूर होने का सचेत प्रयास करना होगा जो अन्यथा आपको बाहर की ओर खींचती हैं।
उस गहरी खामोशी में, हमें अंतःप्रेरणा मिलती है जिसमें भावनाएँ सतह तक उभर आती हैं और शब्दों के रूप में अभिव्यक्त होती हैं। हमारे अस्तित्व के मूल केंद्र से निकलने वाले ये अंतःप्रेरित शब्द ऊर्जित होते हैं। उनकी अपनी ऊर्जा होती है। इसके अलावा, हर वह निर्णय जो हम खामोश हृदय के साथ तालमेल में रहकर लेते हैं, हमेशा सही होता है। यम, नियम, प्रत्याहार और धारणा के अभ्यास भी बड़ी सरलता के साथ सही तरीके से स्थापित हो जाते हैं और इसे ही सहजता कहते हैं।
अतः, अपने हृदय की खामोशी के साथ गहराई से जुड़े रहने से या सरल भाषा में कहा जाए तो अपना हर कार्य, जिसमें हमारा संवाद भी शामिल है, करते हुए ध्यानस्थ अवस्था में रहने से सदा हम जीवन के हर पहलू में अत्यधिक सौम्यता और सौजन्यता देख पाएँगे। योगः कर्मसु कौशलम (कर्म में कुशलता ही योग है) का असली अर्थ यही है।
आदर और प्रेम सहित,
कमलेश

