रॉबर्ट स्टीवन गोल्डस्टीन सैनफ्रांसिस्को में रहने वाले एक लेखक हैं। उनका नवीनतम उपन्यास ‘गोल्डाज़ हच’ मार्च 2025 में प्रकाशित हुआ। इस लेख में वे पूर्वी और पश्चिमी देशों में प्रचलित ज्ञानयोग और ध्यान के अभ्यासों के बीच के संबंधों के विषय में जानकारी दे रहे हैं। वे इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि सैद्धांतिक तौर पर इनमें ज़्यादा अंतर नहीं है।

लेकिन ज्ञान के वृक्ष का……तुम फल नहीं खाओगे”
द बुक ऑफ़ जेनेसिस (उत्पत्ति पुस्तक)

 

पनी युवावस्था में मैंने अपने लिए एक आध्यात्मिक अभ्यास तैयार किया था। वह अभ्यास पिछले पचास सालों से मुझे सहारा दे रहा है। इस अभ्यास के चार मुख्य भाग हैं - योग, ध्यान, शाकाहार और ऐसा व्यवहार जिसमें करुणा और अहानिकारकता है, जो ऐसे सिद्धांत हैं जिन्हें हिंदू, बौद्ध और जैन लोग अहिंसा कहते हैं।

कई चीज़ों को मिलाकर इस अभ्यास को बनाने में बहुत समय नहीं हुआ था जब मुझे पता चला कि बहुत पहले भारत जैसी जगहों में इन सभी विधियों और कई अन्य सिद्धांतों के लिए एक ही शब्द, ‘योग’, का प्रयोग होता था। लेकिन आजकल, खास करके पश्चिमी देशों में, योग का मतलब बस कुछ आसन और प्राणायाम तक ही सीमित रह गया है जिसमें अन्य बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता।

मेरी आध्यात्मिक साधना के चारों भागों में मुझे जिस भाग को निभाने में सबसे ज़्यादा मुश्किल हुई, वह था ‘ध्यान’। मुझे याद है कि मैं उस समय बहुत छोटा था जब योग की कुछ पुरानी पुस्तकों में मैंने ‘ध्यान’ शब्द को पहली बार पढ़ा था। ध्यान के बारे में दिए हुए ये संक्षिप्त विवरण सिर्फ़ उसके फ़ायदे के बारे में बात करते थे, लेकिन ध्यान कैसे करना चाहिए, इस बारे में इनमें कुछ भी नहीं लिखा था।


इंसानों को ज्ञान की सख्त ज़रूरत हैलेकिन उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि ज़रूरत पड़ने पर उसके प्रवाह को कैसे बंद किया जाए।


इसलिए तब मुझे ध्यान बेहद आकर्षक और रहस्यमय लगता था। यह अपने मन को कुशलतापूर्वक नियंत्रित करने का तरीका था जिससे मैं ईश्वर को देख सकता था। लेकिन, मैंने सोचा कि यह कैसे संभव होगा? अपने खयालों में मैं कल्पना करता था कि आध्यात्मिक जागृति जैसी गहन उपलब्धि प्राप्त करने के लिए ध्यान में अवश्य असाधारण रूप से जटिल मानसिक मोड़ और घुमावदार बातें होंगी, जटिल दिमागी गणनाएँ होंगी, जैसे अग्रिम भौतिक विज्ञान या कैलकुलस में होती हैं।

लेकिन जब मैंने और अधिक जाँच-पड़ताल की तब मुझे पता चला कि ध्यान के बारे में मैंने जो कुछ सोचा था या कल्पना की थी, वास्तव में वह तो उससे बिलकुल उल्टा था। मैं भौंचक्का रह गया। वास्तव में ध्यान मन के सारे विचारों को स्थिर करके उसे एक खाली पात्र बना देता है और फिर उसमें आध्यात्मिक शक्ति भर देता है।

तो क्या बस सोचना बंद कर दें?

क्या इस अज्ञात, शक्तिशाली अभ्यास, जिसे ध्यान कहते हैं, को करने के लिए बस इतनी सरल सी तरकीब है?

मुझे बड़ा अजीब लगा। मैं सच में विश्वास नहीं कर पाया। यह कुछ ज़्यादा ही आसान लग रहा था।

जब तक मैंने कोशिश नहीं की और उसे लगभग असंभव पाया।

मैं एक बहुत ही मेधावी विद्यार्थी था। मुझे अपनी आयु के हिसाब से उच्चतर कक्षाओं में डाला जाता था। मैं एक कक्षा छोड़कर अगली कक्षा में भी डाला गया लेकिन फिर बड़ा होने पर लाख कोशिशों के बावजूद मैं अपने उन परेशान करने वाले विचारों को (जिनके लिए मुझे स्कूल में हरदम सराहा जाता था) कुछ क्षणों के लिए भी रोक नहीं पा रहा था। यह इतना कठिन क्यों था?

अंततः अपनी इच्छाशक्ति के ज़ोर से तो नहीं लेकिन शांति, धैर्य और बहुत अभ्यास के बाद मैंने ध्यान करना सीख ही लिया। और जैसे-जैसे मैं इस आध्यात्मिक मनोदशा में नियमित रूप से डूबने लगा, मुझे आध्यात्मिक साधना में कुछ अनुभव होने लगे और मेरी साधना मेरे लिए और भी ज़्यादा वास्तविक व आंतरिक होती चली गई।

परंतु ईसाई-यहूदी धर्म की रस्साकशी, जिसमें मेरी और मेरे सभी दोस्तों की परवरिश हुई थी, मेरे भीतर अभी भी मौजूद थी - आंतरिक स्तर पर उतनी नहीं थी लेकिन बौद्धिक स्तर पर यकीनन थी। ये मान्यताएँ इतने सारे लोगों के लिए क्यों मायने रखती थीं? मुझे यह सब निरर्थक क्यों लगता था? क्या इन सबके और अपने चुने हुए पथ के बीच मुझे कोई संबंध मिल सकता है? यदि हाँ तो यह समष्टि या संपूर्णवाद (gestalt) फिर मेरे लिए ज़्यादा मायने रखेगा।

अपने कॉलेज में मेरा मुख्य विषय अंग्रेज़ी साहित्य और रचनात्मक लेखन था और साथ ही एक अनौपचारिक व अघोषित गौण विषय था धार्मिक अध्ययन। मुझे जहाँ भी वे कक्षाएँ मिलती थीं मैं उनमें ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाता था। मैंने पाया की दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञानसमाज-शास्त्र और मानव-शास्त्र के विभागों में तुलनात्मक धर्म के विषय को पढ़ाया जाता था। जर्मन विभाग में हर्मन हेस के उपन्यासों के अनुवाद को पढ़ाया जाता था। इन सबमें शायद मेरी सबसे प्रियकर कक्षा अंग्रेज़ी विभाग में होती थी – साहित्य के रूप में बाइबल का अध्ययन।

जब मैं उन्नीस वर्ष का था तब गर्मियों में मुझे अपने ध्यान का पहला महत्वपूर्ण अनुभव हुआ। तकरीबन उसके तुरंत बाद ही, जूनियर कॉलेज के पहले सेमेस्टर में लौटने पर मैंने बाइबल साहित्य की कक्षा में दाखिला ले लिया।

 

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कक्षा के पहले हफ़्ते में ही जब हमने सृष्टि रचना से संबंधित पौराणिक कथाओं और जेनेसिस में आदम और हव्वा की कहानी का विश्लेषण किया तब मुझे पूर्व और पश्चिम के आध्यात्मिक दृष्टिकोण के बीच एक गहरा संबंध स्पष्ट हुआ।

और मुझे यह उचित लगा कि महत्वपूर्ण साझे सत्य को पूर्व विधान (Old Testament) की पहली ही कहानी में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जो पूरी बाइबल का आधार बनेगा।

जैसे ही आदम और हव्वा ने ज्ञान के वृक्ष का फल खाया, उन्हें अदनवाटिका (Garden of Edens) से बहिष्कृत कर दिया गया।

मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि यह उस दार्शनिक दुविधा पर आधारित है जिसका सामना सभी मनुष्य आध्यात्मिकता की खोज में करते हैं। लेकिन कक्षा में हमें जो मानक व्याख्याएँ दी गईं, उनमें से कोई भी कहानी के उस अर्थ के अनुरूप नहीं थी जो व्यक्तिगत रूप से मैं समझता था।

हमारे प्रोफ़ेसर ने हमसे कहा कि बाइबल में जिस तथ्य को ‘अच्छाई और बुराई के ज्ञान के वृक्ष’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, उसे एकदम अक्षरशः नहीं लेना चाहिए, क्योंकि उस समय में ‘सब कुछ’ या ‘हर चीज़’ के लिए साधारण भाषा में ‘अच्छाई और बुराई’ वाक्यांश का उपयोग किया जाता था। साधारण तौर पर वह वृक्ष ज्ञान का प्रतीक था।

हमने कई विद्वत्तापूर्ण किताबों का अध्ययन कियायह जानने के लिए कि आखिर ईश्वर मनुष्यों को ज्ञान प्राप्त करने से क्यों रोकना चाहेगा, लेकिन किसी में भी मुझे वह उत्तर नहीं मिला जो अब ध्यान करने के कारण मुझे स्पष्ट हो गया है - हमारे मस्तिष्क की गतिविधि यानी हमारे निरंतर आने वाले विचार हमें इस ब्रह्मांड के आध्यात्मिक पहलू का अनुभव नहीं करने देते। आध्यात्मिक समझ पाने के लिए हमारी सोच और हमारा ज्ञान एक माध्यम नहीं, बल्कि बाधा हैं।

लेकिन ज्ञान और सोच अब भी ज़रूरी हैं और ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें प्राप्त किया जाना एवं संजोकर रखना चाहिए। इसलिए इंसानों को ज्ञान की सख्त ज़रूरत है, लेकिन उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि ज़रूरत पड़ने पर उसके प्रवाह को कैसे बंद किया जाए।

जैसा हमेशा होता है, यह भी द्वैतवाद है - साम्यावस्था लाने के लिए हमें सावधानीपूर्वक इसे संतुलित करना और समझना होगा।

लेकिन इससे भी अधिक हममें यह क्षमता है कि हम ऐसी मानसिकता प्राप्त कर पाएँ कि इस द्वैतवाद को खत्म कर सकें - जहाँ भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र मिलकर एक संयुक्त और शक्तिशाली समष्टि बन जाएँ।

एक आजीवन चलने वाले आध्यात्मिक पथ का यही लक्ष्य है।

 

 


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