सेंथिल विश्वनाथन संगणना एवं आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से शून्य के सिद्धांत के बारे में बात करते हैं। इसके द्वारा वे मनुष्य के रूप में हमारे मूल एवं आधार को उजागर करते हैं। वे यह भी बताते हैं कि क्यों हमारा यह छुपा हुआ अंश उसी से ढका रहता जो इससे प्रकट होता है। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि यदि हम अपने अस्तित्व के केंद्र में मौजूद शून्यता की झलक पाना चाहते हैं तो हमें अपने व्यक्तित्व में नगण्यता एवं विनम्रता के मनोभाव को विकसित करना होगा।
कंप्यूटर के इस संसार में जानकारी की मूल प्रस्तुति के लिए द्विआधारी प्रणाली, यानी बाइनरी सिस्टम, का उपयोग किया जाता है। इस प्रणाली में जानकारी की केवल दो अवस्थाएँ होती हैं - जानकारी की उपस्थिति (1) और अनुपस्थिति (0)।
किसी भी संख्या को एक और शून्य के आँकड़ों के संयोजन से प्रस्तुत किया जा सकता है। आँकड़ों की इस द्विआधारी प्रणाली में अनुमत संक्रियाओं (operations) - जोड़, गुणा, भाग, निषेध, आदि - से जटिल आँकड़ों व गणनाओं दोनों को दर्शाया जा सकता है। इससे यह जानकारी का भंडार और उसे रूपांतरित व उसका उपयोग करने वाला तर्क दोनों बन जाते हैं।
यह शून्य हर संख्या में मौजूद रहता है (किसी भी संख्या में शून्य जोड़ने से वही संख्या रहती है)। इसी तरह किसी ग्राफ़ में ग्राफ़ का केंद्र 0, 0 निर्देशांक (co-ordinates) से दर्शाया जाता है। प्रत्येक अन्य निर्देशांक इसी केंद्र के संदर्भ में पढ़ा जाता है और इसी में निहित रहता है।
कंप्यूटर विज्ञान में इसी द्विआधारी प्रस्तुतीकरण का उपयोग करके जानकारी के प्रत्येक अंश (Bit) को प्रस्तुत किया जाता है और उसी द्विआधारी तर्क का उपयोग करके गणितीय संक्रियाएँ निष्पादित की जाती हैं तथा जानकारी को एक आयाम से दूसरे आयाम में रूपांतरित किया जाता है - जैसे ध्वनि को शून्य और एक की श्रृंखला के रूप में निरूपित करना और इसका विपरीत करके संगीत के रूप में वापस लाना। यह सब कुछ केवल दो अवस्थाओं - मात्र एक बिट की उपस्थिति और अनुपस्थिति की मूल प्रस्तुति से संभव है।
कंप्यूटर का मूल एक दोलक है जो बारी-बारी से एक और शून्य की इस श्रृंखला को या एक साइनसोइडल तरंग (sinusoidal wave) के रूप को उत्पन्न करता है। यह क्रिस्टल दोलक कंप्यूटर की जीवनरेखा और धड़कन है। अन्य सब कुछ इसी मूल से प्राप्त किया जाता है, हालाँकि इसे आसानी से भुला दिया जाता है और इसे प्राप्त रचनाओं एवं निरूपणों द्वारा ढक दिया जाता है।
हार्टफुलनेस के गुरु लालाजी अपनी पुस्तक ‘अक्षर सत्य’ में कहते हैं -
“वेदों पर प्रश्न उठाया जा सकता है क्योंकि वास्तविक मंत्र, श्रुति या उद्गीत ‘ॐ’ है। उनमें ‘बनने का भाव’ देखने को मिलता है। यह माने जाने का गुण और मनुष्य के हृदय का भाव है। इसलिए जब भी वे शब्दों में उलझते हैं तब उनमें कुछ फ़र्क नज़र आता है। उदाहरण के लिए, एक ही पूर्णांक या इकाई जोड़, घटाव, गुणा और भाग के सिद्धांतों के अंतर्गत योग के विभिन्न रूप ले लेती है। कुल योग, विपरीतता और प्रतीत होने वाले विरोधाभास के बावजूद, केवल एक पूर्णांक या इकाई है और केवल पूर्णांक के रूप में ही रहता है - ठीक उसी तरह जैसे पानी विभिन्न माध्यमों जैसे फव्वारा, कुआँ, टैंक, नदी या नहर से गुज़रने पर विभिन्न रूप धारण करता है लेकिन फिर भी वह पानी ही रहता है।”

अध्यात्म के विषय पर वे कहते हैं -
“जहाँ केवल एक ही चीज़ होती है, वहाँ कोई भी वैचारिक प्रेरणा नहीं होती। वहाँ भेद करने, जोड़ने या घटाने, गुणा करने या भाग करने का भी कोई अवसर नहीं होता। जब केवल एक ही चीज़ हो तब ज्ञान, कर्म व परमानंद भी कहाँ होता है? जब दो अवस्थाएँ होती हैं तभी उनके संयोजन से तीसरी अवस्था बनती है और तभी इसमें और उसमें तथा आप में और मुझमें भेद हो सकता है। उनकी गाँठ बीच में होती है तथा एक छोर पर एक तत्व होता है और दूसरे छोर पर दूसरा तत्व होता है। वह बीच की गाँठ मन है और एक छोर पर उच्चतर चेतना है और दूसरे छोर पर निष्क्रियता या अचेतनता का निम्नतर स्तर है। मन, जिस पर दोनों की झलक व प्रभाव पड़ता है, चैतन्य व अचैतन्य की एक गाँठ बन जाता है और सोचने व समझने के लिए मजबूर हो जाता है।”

उपर्युक्त दोनों उद्धरण कंप्यूटर की द्विआधारी प्रणाली के समान हैं जिसकी सहायता से हम हर चीज़ प्रस्तुत एवं उसकी गणना करते हैं जिससे पूरा डिजिटल संसार बनता है।
मुझे ऐसा लगता है जैसे सूक्ष्म व स्थूल शरीर कारण शरीर द्वारा ही बनते व अभिव्यक्त होते हैं।
चित्त और चित्त के क्षेत्र में काम करने वाले अन्य घटक, जैसे मन, बुद्धि एवं अहंकार, मूल आधार से ही तो निकले हैं लेकिन जिस आधार से वे निकले हैं उसी को आसानी से ढक देते हैं और अपनी ही रचना के जाल में उलझ जाते हैं।
हमारी यात्रा के दो उद्देश्य प्रतीत होते हैं। एक, इस मूल आधार को जानना जो संपूर्ण अस्तित्व का मूल है और जो अंदर से बाहर तक हम में प्राण भरता है। और दूसरा, उस मूल आधार के साथ तालमेल में रहना तथा उसकी सर्वोत्तम संभव अभिव्यक्ति बनना। यह लगभग एक निरंतर गतिशील रहने वाली लहर के अग्र भाग की तरह है। यह एक ऐसा ऊर्जा बिंदु है जो बिंदुओं की श्रृंखला की तरह ऊपर-नीचे होता रहता है। पीछे मुड़कर देखने पर यह लहर दिखती है, लेकिन यह एक बिंदु भी है जो निरंतर लयबद्ध गति में रहता है।
मेरे आध्यात्मिक गुरु, एक साथी मनुष्य जो अपने स्वयं के निषेध और नगण्यता व विनम्रता के मनोभाव के माध्यम से आधार से जुड़े हुए हैं, मुझे ऐसे अस्तित्व की संभावना के प्रति जागरूक करते हैं और मुझे याद दिलाते हैं कि वह क्या है जो मुझमें अंदर से बाहर तक प्राण भरता है। ऐसे व्यक्ति के साथ तालमेल बिठाने से मुझे एहसास होता है कि उनके साथ लयबद्ध होने और उनके जैसे गुणों को प्रकट करने की संभावना है।
हमारी यात्रा के दो उद्देश्य प्रतीत होते हैं। एक, इस मूल आधार को जानना जो संपूर्ण अस्तित्व का मूल है और जो अंदर से बाहर तक हम में प्राण भरता है। और दूसरा, उस मूल आधार के साथ तालमेल में रहना तथा उसकी सर्वोत्तम संभव अभिव्यक्ति बनना।


सेंथिल विश्वनाथन
सेंथिल दूरसंचार और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में इंजीनियरिंग प्रबंधन व्यवसायी हैं। इनके नाम पाँ... और पढ़ें
