दाजी एवं एलिजाबेथ डेनली द्वारा लिखित
ऋषि रंजन ‘द हार्टफुलनेस वे, द्वितीय’ पर, अध्याय-दर-अध्याय, अपने विचार बता रहे हैं। साथ ही आंतरिक परिवर्तन एवं आत्म-साक्षात्कार के लिए इस पुस्तक के व्यावहारिक दृष्टिकोण की रूपरेखा भी प्रस्तुत कर रहे हैं।
‘द.हार्टफुलनेस वे - द्वितीय’ व्यक्तिगत रूपांतरण के लिए एक प्रभावशाली मार्गदर्शिका है जिसे हार्टफुलनेस के वैश्विक मार्गदर्शक, दाजी, ने एलिज़ाबेथ डेनली के साथ वार्तालाप के माध्यम से लिखा है। यह पुस्तक पाठकों को मानसिक तथा भावनात्मक बाधाओं को पार करने और भय पर काबू पाने के लिए सशक्त बनाती है तथा आनंद, संतुलन एवं अपने उच्चतम सामर्थ्य को पाने के लिए पुरानी धारणाओं को चुनौती देने की शक्ति देती है। दाजी इसके लिए एक सीधा एवं व्यावहारिक तरीका प्रस्तुत करते हैं, जिसमें ध्यान, रिलैक्सेशन एवं अन्य मननशील अभ्यास हैं जो दैनिक जीवन में आसानी से अपनाए जा सकते हैं। ये अभ्यास प्रेम, करुणा तथा कृतज्ञता जैसे आंतरिक गुणों को बढ़ाते हैं और पाठकों को एक गहन उद्देश्य तथा स्थायी शांति प्राप्त करने में मदद करते हैं। यह यात्रा उन सभी के लिए सुगम्य है जो अपनी जागरूकता का विस्तार करने एवं आत्म-साक्षात्कार के लिए तैयार हैं।
‘द हार्टफुलनेस वे, द्वितीय’ केवल पढ़ने के लिए एक पुस्तक ही नहीं बल्कि यह जीने के लिए एक अनुभव है। यह केवल समझने के लिए नहीं बल्कि जागृति के लिए है। पहला भाग जहाँ समाप्त हुआ था, वहीं से आरंभ करते हुए इस बार दाजी एलिज़ाबेथ डेनली के साथ अपना ज्ञानवर्धक संवाद जारी रखते हैं। इसका परिणाम है एक निर्बाध अंतरंग वार्तालाप जिसे पढ़कर ऐसा लगता है जैसे पाठक एक ज्ञानी और विनम्र शिक्षक के सम्मुख बैठा है जो चेतना की सूक्ष्मतर परतों तथा मानव अस्तित्व के परम उद्देश्य को एक सरल तरीके से बता रहे हैं। पुस्तक एक गहन कथन से आरंभ होती है - “दर्शन का अर्थ है सोचना, योग का अर्थ है करना और आत्मबोध का अर्थ है पूर्वावस्था में लौटना।” इसके अध्याय हमें इसी पथ पर लेकर चलते हैं - सोचने से करने और फिर सब मिटाकर पूर्वावस्था में लौटने की ओर। यह पुस्तक न केवल हमें अपने भीतर की वास्तविकता समझाती है बल्कि उसे जागृत भी करती है। पुस्तक का प्रमुख गुण है पुरातन आध्यात्मिक ज्ञान तथा आधुनिक जीवन की व्यावहारिक वास्तविकताओं को एक-दूसरे से जोड़ने की क्षमता।

‘द हार्टफुलनेस वे, द्वितीय’ जीवन की सीमितताओं से आगे बढ़कर सहज संतुलन और प्रसन्नता पाने की चाह रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक स्पष्ट मानचित्र प्रदान करती है। पहला अध्याय, ‘हमारा आरंभिक बिंदु – हमारी मान्यताएँ,’ दर्शाता है कि कैसे मान्यताओं के अंदर अज्ञानता के बीज होते हैं क्योंकि ज्ञान के आभाव में हम मान्यताओं पर निर्भर रहते हैं। तब हम अपने जीवन को अपनी मान्यताओं के आधार पर समझते और गढ़ते हैं। वे ऐसे सोपान बन जाती हैं जो हमारा दृष्टिकोण बनाती हैं। इसी दृष्टिकोण से हम संसार को देखते हैं। इसके बाद पुस्तक में ईश्वर के साथ हमारे जुड़ाव पर चर्चा की गई है। यह जुड़ाव पूर्वनिर्धारित मान्यताओं से नहीं बल्कि सूक्ष्म अनुभवों द्वारा यानी दिव्य के साथ तारतम्य स्थापित करके एवं समानुभूतिपूर्ण तालमेल द्वारा बनता है, जब हम अपनी चेतना में एक आध्यात्मिक उपस्थिति को महसूस करते हैं। पहले अध्याय में इस विषय से आरंभ करना ठीक है क्योंकि जब हमारा सामना अपनी मान्यताओं से परे नए अर्थ से होता है तब हमें अपने अंदर उसके लिए ग्रहणशीलता की आवश्यकता होती है। इस अंतर का उदाहरण अर्जुन और दुर्योधन के चरित्रों में मिलता है - हालाँकि दोनों को कृष्ण का मार्गदर्शन मिला था, लेकिन सिर्फ़ अर्जुन ही अपनी स्थापित धारणाओं से आगे बढ़ने को तैयार था। उनकी ग्रहण करने की क्षमता में भिन्नता यह दर्शाती है कि बदलाव ज्ञान की समीपता से नहीं बल्कि उसके प्रति ग्रहणशीलता पर निर्भर करता है। आगे के अध्यायों का मूल आधार यही बुनियादी दृष्टिकोण है।
इस ग्रहणशीलता के साथ हम अगले अध्याय ‘यात्रा और लक्ष्य’ की ओर बढ़ने के लिए तैयार होते हैं। यहाँ दाजी लक्ष्य निर्धारित करने एवं इरादे रखने, प्रगति एवं स्वतंत्रता और विरोधाभास पर चर्चा करते हैं तथा रूपांतरकारी आध्यात्मिक यात्रा का पूरा मानचित्र प्रकट करते हैं। हम वास्तविक स्वतंत्रता तब पाते हैं जब हम सभी सापेक्षताओं से मुक्त हो जाते हैं - बाबूजी ने इसे “स्वतंत्रता से स्वतंत्रता” कहा है। दाजी यहाँ स्पष्ट करते हैं कि ज़िंदगी के कष्टों को हल करने का मतलब दुख-दर्द से बचना नहीं है बल्कि अपनी वास्तविक संतुलित हालत से पुनः जुड़कर दुख के असली कारण से मुक्त होना है।
पहले अध्याय से हमने भीतर ग्रहणशीलता विकसित करने के बारे में जाना और दूसरे अध्याय से इस रूपांतरण के बारे में जाना कि हमें क्या ‘बनना और होना है’। इस आधार के साथ हम अगले अध्याय ‘आवश्यक मनोभाव और दृष्टिकोण’ पर आते हैं। यह अध्याय उन सिद्धांतों का वर्णन करता है जिन्हें हमें रूपांतरण की इस यात्रा के लिए अपनाना चाहिए। इच्छाशक्ति एक सीमित साधन है लेकिन हमारी रुचि तो असीमित है। सबसे पहली और सबसे आवश्यक बात यह है कि हमें खुद के बदलाव में रुचि होनी चाहिए। यदि हम में रुचि है तो हम अपने आसपास एक ऐसा क्षेत्र तैयार कर लेंगे जो हमारी प्रगति में सहायक होगा। हमारे विचारों का प्रवाह स्वाभाविक रूप से ईश्वर की ओर होने लगेगा। इस बढ़ी हुई जागरूकता के साथ हम ईश्वर प्राप्ति के लिए बेचैन होने लगेंगे। बेचैनी एक उत्तम प्रकार की जागरूकता है। यह हमारे दृष्टिकोण का एक आवश्यक घटक है। छोड़ देना, आत्मविश्वास, हृदयपूर्ण संवाद, वातावरण पर अपना न्यूनतम नकारात्मक प्रभाव तथा संयम इस अध्याय के अन्य सुंदर विषय हैं।
सही दृष्टिकोण और मनोभाव हमें अपने हृदय में दिव्य स्पंदनों को महसूस करने के लिए तैयार करता है। अब अगला अध्याय है, ‘प्रेम और सहारा।’ दाजी बहुत खूबसूरती से लिखते हैं, “जिस व्यक्ति की आत्मा ईश्वर के स्पंदन को संप्रेषित कर सकती है, वह सच्चा गुरु है और जिस व्यक्ति की आत्मा उस स्पंदन को ग्रहण करती है, वह साधक या शिष्य है। जब साधक की आत्मा उन स्पंदनों के लिए प्यासी होती है, भले ही वह प्यास अचेतन रूप से ही हो, तब गुरु अचानक ही प्रकट हो जाते हैं।” यह अध्याय एक वास्तविक खुलासा है। यह गुरु से जुड़ने के तरीके के बारे में आवश्यक जानकारी देता है। वे लिखते हैं कि जैसे ही आप गुरु के बारे में सोचते हैं, दिल से दिल का तुरंत संपर्क हो जाता है।
मार्गदर्शक या गुरु से प्राप्त प्रेम एवं सहयोग का आधार बन जाने के बाद अब हम पाँचवें अध्याय के विषय, ‘प्रशिक्षण की विधियाँ’ को पूर्णरूपेण अपनाने के लिए तैयार हैं। इसमें हम ध्यान, प्रार्थना तथा अपने अनुभव लिखने के आसान तरीकों के साथ-साथ भीतर की सफ़ाई की ज़रूरत पर चर्चा करते हैं। इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य आपकी जीवनशैली को सरल एवं शुद्ध बनाना है ताकि आप अपनी चेतना का विस्तार उच्चतर आयामों में कर सकें। परिणामस्वरूप आपके हृदय व मन से अशुद्धियाँ व जटिलताएँ दूर हो जाती हैं, आपकी इंद्रियों एवं क्षमताओं के उपयोग में संयम आने लगता है, आपका चरित्र परिष्कृत होता है और अंततः आपकी चेतना का विस्तार होता है।

दाजी यहाँ स्पष्ट करते हैं कि ज़िंदगी के कष्टों को हल करने का मतलब दुख-दर्द से बचना नहीं है बल्कि अपनी वास्तविक संतुलित हालत से पुनः जुड़कर दुख के असली कारण से मुक्त होना है।
‘प्रशिक्षण की विधियाँ’ अध्याय में प्रस्तुत अभ्यास धीरे-धीरे हमें अगले अध्याय के लिए तैयार करते हैं, जो विश्वास और आस्था पर केंद्रित है। इस नए अध्याय में दाजी ज्ञान पाने के तीन तरीकों और गुरु के प्रति आस्था विकसित करने के बारे में बताते हैं। वे सच्ची आस्था को “नश्वर और अनश्वर को जोड़ने वाली जीवंत कड़ी” बताते हैं - एक ऐसी कड़ी जो गुरुओं और उनकी प्राणाहुति के माध्यम से विकसित होती है। दाजी उस गहन परिवर्तन के बारे में बात करते हैं जो सच्ची आस्था उत्पन्न होने से आता है - एक सच्चा श्रद्धालु कुछ भी नहीं माँगता। इसके बजाय ऐसा व्यक्ति कृतज्ञता, खुशी और उदार हृदय के साथ जीवन जीता है। उसके लिए माँग करना एक हिंसक कार्य जैसा लगेगा।
जब हम आस्था को एक ‘जीवंत जुड़ाव’ के तौर पर विकसित कर लेते हैं तब अगला कदम इसे अपने हृदय का एक स्थायी गुण बना लेना है। यही हमारा अगला अध्याय है – ‘सतत संबंध स्थापित करना।’ इस सतत संबंध से हमारी आंतरिक अवस्था संतुलित रहती है। लगभग पूर्ण संतुलन की इस अवस्था में हमारी चेतना एक लट्टू की तरह घूमती रहती है जिससे एक सुंदर और एकीकृत अवस्था उत्पन्न होती है। एक बार जब यह स्थायी हो जाती है, तो इसे ‘सतत स्मरण’ कहा जाता है, जो स्वाभाविक रूप से संस्कारों या छापों को बनने नहीं देता। हम तल्लीन रहते हैं। यह हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कैसे मदद करता है? भीतर से जुड़े रहते हुए हम सांसारिक ज़िम्मेदारियों से पीछे नहीं हटते बल्कि हम उन्हें अधिक अच्छे ढंग से पूरा कर पाते हैं क्योंकि हम ज़्यादा केंद्रित और संतुलित होते हैं।
इस निरंतर जुड़ाव के साथ हम साक्षात्कार के आयाम में बहुत अच्छी तरह से आगे बढ़ने लगते हैं। अब हम अगले अध्याय के लिए तैयार हो जाते हैं, जिसमें हम ‘भावनाओं और गुणों का क्षेत्र - हमारा हृदय’ से आगे बढ़ते हैं। दाजी ‘पाँच स’ गुणों (संतोष, शांति, संवेदना, साहस और स्पष्टता) और उनके विपरीत पाँच ‘अ’ अवगुणों (असंतोष, अशांति, अप्रसन्नता, अवसन्नता और अस्पष्टता) की व्याख्या करते हैं। वे बताते हैं कि हम सहानुभूति, समानुभूति और करुणा कैसे विकसित करते हैं और ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर कैसे बढ़ते हैं। जब संस्कार हमारे जीवन को नियंत्रित करते हैं तब हम ‘स’ अवस्थाओं का अनुभव करने के लिए बाहरी संतुष्टि पर निर्भर रहते हैं। अन्यथा हम उनकी विपरीत ‘अ’ अवस्थाओं में ही रहते हैं। जैसे-जैसे हम शुद्धिकरण के आध्यात्मिक अभ्यास द्वारा संस्कारों को हटाते हैं, तब ‘स’ अवस्थाओं का अनुभव करना बाहरी संतोषजनक अनुभवों पर निर्भर नहीं रहता। दाजी चारित्रिक विकास की आवश्यकता के बारे में भी बताते हैं जो हमें आध्यात्मिक यात्रा में उपहार स्वरूप मिली आंतरिक अवस्थाओं को बनाए रखने में मदद करता है। यह आध्यात्मिक विकास ही है जो मूल रूप से मानवीय गुणों के विकास को बढ़ावा देता है।
हृदय से संबंधित अध्याय को पूरा करने के बाद अब हम अगले अध्याय ‘मन - समर्पण का विकास’ पर आते हैं। यह बदलाव पूर्वावस्था में लौटने की ओर एक बड़ा कदम है क्योंकि हमारा ध्यान समर्पण करने और अपनी बनाई हुई पहचान की परतों को छोड़ने की ओर जाने लगता है। ‘मैं’ को समर्पित करने की प्रक्रिया अंततः उसके पूरी तरह से मिट जाने पर खत्म हो जाती है, जहाँ हमारा अस्तित्व अपने लिए नहीं रह जाता। समर्पण करने की यह यात्रा हमें ‘शरणागति’ की खूबसूरत हालत तक ले जाती है। ‘शरणागति’ हार की अवस्था नहीं है। यह तो अपने प्रियतम की देखभाल और सुरक्षा में होने का एहसास है। इससे आनंद मिलता है। शरणागति तक पहुँचने पर हम ऐसी ही आनंदावस्था में पहुँच जाते हैं।
अब हम ‘लक्ष्य - साक्षात्कार और केंद्र’ पर आ गए हैं। पिछले अध्यायों ने हमें ‘पूर्वावस्था में लौटने’ और आत्म-साक्षात्कार के इस अंतिम चरण पर कैसे मदद की है? मन समर्पण करता है और हृदय रिक्त हो जाता है ताकि दिव्य सत्व हममें संचरित हो सके। फिर हम आत्म-साक्षात्कार के लिए तैयार हो जाते हैं। यहाँ दाजी ब्रह्मांड के साथ हमारे संबंध, केंद्र के विज्ञान, पारंपरिक योग, वर्तमान युग तथा समाधि की अवस्था के बारे में बताते हैं।
‘द हार्टफुलनेस वे, द्वितीय’ इस वादे के साथ समाप्त होती है -
“तो दाजी, क्या इस सरल और संश्लेषित हार्टफुलनेस विधि से साक्षात्कार में लगने वाले समय पर कोई अंतर पड़ता है?”
“बिलकुल। अब यह केवल एक जीवन-काल में ही संभव है बल्कि उसके एक अंश में भी संभव है। ‘ईश्वर-साक्षात्कार’ प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए संभव है जिसके भीतर तड़प और रुचि है। किसी समर्थ गुरु की सहायता से ईमानदारी और सच्चाई से अभ्यास करें।”
‘द हार्टफुलनेस वे, द्वितीय’ एक करुणापूर्ण व अंतर्दृष्टि से ओतप्रोत उत्कृष्ट कृति है। यह साधकों को उनके उच्चतम सामर्थ्य को पहचानने के लिए साधन और विवेक प्रदान करती है। यह अत्यंत सरल है एवं आध्यात्मिक प्रगति के सच्चे मूल्यांकन के लिए अनुभव पर ज़ोर देती है और इसी में इसकी शक्ति है। दाजी जीवन के गहनतम प्रश्नों के लिए एक व्यावहारिक, हृदय केंद्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। वे तनाव और उद्देश्यहीनता से जूझ रही दुनिया के लिए आशा का प्रकाशस्तंभ प्रदान करते हैं। अंततः वे हृदय की शांति और परिवर्तित करने वाली शक्ति की ओर लौटने के लिए हमारा मार्गदर्शन करते हैं।
इस पुस्तक को पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे समुद्र इस एहसास के साथ लहरों को धीमे स्वर में कह रहा हो कि लहरें और समुद्र एक ही पानी की अभिव्यक्ति हैं।
दाजी ब्रह्मांड के साथ हमारे संबंध, केंद्र के विज्ञान, पारंपरिक योग, वर्तमान युग तथा समाधि की अवस्था के बारे में बताते हैं।

ऋषि रंजन
ऋषि रंजन एक बहुराष्ट्रीय क्लाउड सेवाओं की कंपनी में भारत प्रमुख और महाप्रबंधक हैं। वरिष्ठ आईटी नेतृ... और पढ़ें
