दाजी कुछ सरल उपाय बता रहे हैं ताकि हम वे चीज़ें दूर कर सकें जो हमें बोझिल बना रही हैं व उन चीज़ों को छोड़ सकें जो अब खुशी नहीं देतीं ताकि उस स्वतंत्रता व शांति के लिए जगह बना पाएँ जिसे महसूस करना हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

 

कोई नृत्य करके खुश हो सकता है –
जैसे सूरज की रोशनी हिलते हुए पत्तों के बीच से अपना रास्ता खोज लेती है।
तन झूमता है और आत्मा को कुछ ऐसा याद आ जाता है
जिसे महसूस करना वह भूल गई थी।

लेकिन इससे भी बड़ा सच तो यह है -
कि यह आनंद ही है जिसे पाकर व्यक्ति नाच उठता है।
एक लय जो संगीत से पैदा नहीं हुई है,
बल्कि अस्तित्व की शांत उमंग से पैदा हुई है।

और इसे -
इसे गढ़ा नहीं जा सकता है।
न कोई उदासी से जुड़ी मुस्कान,
न कोई आशा में उठाया गया कदम,
इस अपार आनंद की नकल कर सकता है।

क्योंकि आनंद एक लौ है
जो हमें नचाती है।

युवाओं के लिए जीवन उतार-चढ़ाव से भरा हो सकता है - स्कूल, पढ़ाई, परिवार, दोस्त और वे पागल कर देने वाले क्षण जब वाई-फ़ाई भी काम करना बंद कर देता है। ऐसे में व्यक्ति व्यग्र या अटका हुआ महसूस करता है। इसलिए जब मैं किशोरों से आध्यात्मिक मुक्ति जैसे गंभीर विषय की गहराई में उतरने के बारे में बात करता हूँ तब वे मुझसे ज़रूर पूछते हैं, “कैसे करें?”

यह भावात्मक लग सकता है लेकिन इसे ऐसे समझें जैसे कि आप वीडियो गेम में एक स्तर ऊपर पहुँच जाते हैं। हर स्तर पर आगे बढ़ते समय आप किसी चुनौती को ही नहीं जीतते बल्कि आपको जागरूकता, स्पष्टता और स्वतंत्रता की नई परतों के बारे में पता चलता है। और इसका रहस्य क्या है? अपनी आंतरिक दुनिया को स्वच्छ एवं व्यवस्थित करना मन और हृदय के लिए विशेषज्ञ मैरी कोंडो (एक जापानी विशेषज्ञ द्वारा विकसित किया गया, घर को स्वच्छ रखने का तरीका) के एक सत्र जैसा है।


जब मन इन आंतरिक बोझों से मुक्त हो जाता है तब यह स्पष्टतासाहस और पर्याप्त आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है जो आपके स्‍वयं को और दुनिया को देखने के नज़रिए को बदल देता है।


 

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पहला चरण - हृदय को हल्का करें - इच्छाओं की पकड़ को ढीला करें

इच्छाओं को अपने मन में मौजूद छोटे खरपतवारों की तरह समझें। जिस प्रकार ये खरपतवार जहाँ-तहाँ उगते और फैलते हैं उसी प्रकार इच्छाएँ आपको और अधिक की पूर्ति करने, अधिक होने और अधिक पाने के लिए उकसाती हैं। ऐसा नहीं है कि कुछ चाहना बुरा है लेकिन समस्या तब होती है जब ये खरपतवार रूपी इच्छाएँ अनियंत्रित रूप से बढ़ती हैं, आपकी खुशियों का गला घोटती हैं और दशाओं को प्रभावित करती हैं। क्या आपको वह समय याद है जब आप नवीनतम फ़ैशन वाले जूते लेना चाहते थे जिसके बारे में हर कोई बात करता था? या शायद आप उन्हें किसी पार्टी में पहनकर जाना चाहते थे या आप किसी पोस्ट पर निश्चित संख्या में लाइक चाहते थे। आखिरकार, जब आपने उन जूतों को प्राप्त कर लिया तब उत्साह कुछ समय तक तो बना रहा लेकिन फिर वह फीका पड़ने लगा। और बहुत जल्द आप में किसी अन्य वस्तु को पाने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो गई। हृदय को हल्का बनाने की कला इस दुष्चक्र को पहचानने और इससे बाहर निकलने में निहित है। अपनी खुशी को कुछ पाने या हासिल करने पर निर्भर करने के बजाय हर पल का आनंद लेना सीखें, जैसा भी वह है। आपकी इच्छाएँ आपकी पहचान नहीं बनातीं। उन्हें तो जड़ जमाने से पहले ही छोड़ दें। जब आप ऐसा करते हैं तब आपका हृदय हल्का, स्वतंत्र और जीवन की सहज खुशियों के प्रति ग्रहणशील बन जाता है।

दूसरा चरण - मन को मुक्त करें - भय और राय कायम करने की ज़ंजीरों को तोड़ दें

कल्पना करें कि अदृश्य ज़ंजीरें आपके विचारों को बाँध रही हैं। ये ज़ंजीरें भय, स्वयं पर संदेह और दूसरों की राय की ज़ंजीरें हैं। ये हमेशा प्रबल नहीं होतीं। ये अक्सर सूक्ष्म होती हैं जैसे एक धीमी आवाज़ कह रही हो, “क्या होगा यदि मैं उतना अच्छा नहीं हूँ?” या “वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे?” हो सकता है कि आपने ऑनलाइन कुछ पोस्ट करने में झिझक महसूस की हो क्योंकि आपको डर था कि कोई उस पर कमेंट नहीं करेगा या आप उत्तर जानते हुए भी कक्षा में चुप रहे। इन ज़ंजीरों को तोड़ना जागरूकता विकसित करने की एक प्रक्रिया है। उन कहानियों पर गौर करें जो आप खुद को सुनाते रहे हैं और धीरे से उन्हें फिर से लिखें। कुछ साबित करने की ज़रूरत, दूसरों को खुश करने की ज़रूरत और परिपूर्ण होने की ज़रूरत को छोड़ दें। जब मन इन आंतरिक बोझों से मुक्त हो जाता है तब यह स्पष्टता, साहस और पर्याप्त आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है जो आपके स्‍वयं को और दुनिया को देखने के नज़रिए को बदल देता है।

 

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तीसरा चरण - पीठ पर लटकाए थैले को खाली करें - अतीत जहाँ है वहीं रहने दें

अपने मन की कल्पना पीठ पर लटकाए थैले के रूप में करें जो हर उस चोट, पछतावे और शर्मनाक यादों, जिन्हें आपने कभी भी ढोया है, से ऊपर तक भरा हुआ है। यह भारी है, है न? और यह आपकी गति को धीमा कर देता है। उस समय के बारे में सोचें जब आप सबके सामने फिसल गए थे या जब आपने कक्षा में कुछ मूर्खतापूर्ण कहा था और आपको लगा था कि आप कभी उसे भुला नहीं पाएँगे। वर्तमान में उपस्थित रहने के लिए आपको अतीत को मिटाने की ज़रूरत नहीं है, बस उसे हर जगह ढोना बंद कर दें। इस थैले को खाली करने के लिए समय निकालें। जिसे माफ़ करने की ज़रूरत है, उसे माफ़ कर दें, जिसे छोड़ने की ज़रूरत है, उसे छोड़ दें और जो अब आपके काम का नहीं है उसे पीछे छोड़ दें। बोझ से मुक्त मन के साथ वर्तमान उत्साहपूर्ण व जीवंत हो जाता है और एक ऐसा स्थान बन जाता है जहाँ शांति अब मात्र एक विचार नहीं बल्कि एक अनुभव बन चुकी है।

चौथा चरण - दिव्यता का आलिंगन करें - यह आपकी आत्मा का असली घर है

इस बिंदु पर पहुँचकर आप केवल हल्के नहीं होते बल्कि आप स्वतंत्र भी होते हैं - जीवन को उसके सबसे व्यापक रूप में अनुभव करने के लिए स्वतंत्र। यह एक भव्य और पवित्र कक्ष में प्रवेश करने जैसा है जहाँ आप परम ज्ञान एवं गहनतम शांति प्राप्त कर सकते हैं। वहाँ कोई कतार नहीं है, कोई बाधा नहीं है, सिर्फ़ ब्रह्मांड का सौहार्द और प्रकाश है जो आपका आलिंगन करता है। आप उनके साथ चलते हैं जो आपसे पहले इस मार्ग पर चल चुके हैं - स्वामी विवेकानंद, बाबूजी महाराज, थेरेज़ ऑफ़ लीसिओ और आपको एहसास होता है कि आप कभी अकेले नहीं थे। यह ज्ञान और प्रकाश हमेशा से आपके भीतर था और हमेशा ही आपकी पहुँच में था।

आध्यात्मिक मुक्ति आपकी है!


जिसे माफ़ करने की ज़रूरत हैउसे माफ़ कर देंजिसे छोड़ने की ज़रूरत हैउसे छोड़ दें और जो अब आपके काम का नहीं है उसे पीछे छोड़ दें। बोझ से मुक्त मन के साथ वर्तमान उत्साहपूर्ण व जीवंत हो जाता है और एक ऐसा स्थान बन जाता है जहाँ शांति अब मात्र एक विचार नहीं बल्कि एक अनुभव बन चुकी है।


 


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दाजी

दाजी हार्टफुलनेसके मार्गदर्शक

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