ध्यान देने की कला 

भटकाव से उपस्थित रहने की ओर

 

अतुल पटेल बताते हैं कि ध्यान देनेइरादे और मनोभाव को साधने से हमें किस प्रकार भटकाव से उपस्थित रहने की ओर बढ़ने में मदद मिलती हैजिससे जागरूकता दैनिक जीवन में स्वाभाविक रूप से हमारे अनुभव और कार्यों को आकार दे पाती है।

 

अवधान की भंगुरता

हर सुबह अपने साथ अधिसूचनाओं (notifications), समय-सीमाओं, संदेशों और माँगों की एक बाढ़ लेकर आती है। इस निरंतर शोर के बीच, एकाग्र होने की क्षमता दुर्लभ है लेकिन आवश्यक भी है। यह क्षमता इस दुनिया में पूर्णतः उपस्थित रहते हुए जीने का आधार है जहाँ ध्यान भटकने के कारण हमारी ऊर्जा का बिखरना रोज़मर्रा की एक सामान्य सी बात है।

ध्यान देना केवल एक मानसिक कौशल नहीं है। यह वर्तमान में उपस्थित रहने की शुरुआत है। अपनी जागरूकता को निर्देशित करना हमें स्वयं से, दूसरों से और जीवन से गहराई से जुड़ने में मदद करता है। ध्यान देने का अर्थ यह चुनना है कि चेतना के प्रकाश को कहाँ केंद्रित करना है।

जहाँ हमारा ध्यान जाता है, वहीं हमारी ऊर्जा प्रवाहित होती है। प्राचीन ज्ञान लंबे समय से यही सिखाता आ रहा है और आधुनिक तंत्रिका विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है। हर बार जब हम किसी वस्तु, विचार या भावना पर ध्यान केंद्रित करते हैं तब स्नायु सक्रिय हो जाते हैं और उनके मार्ग सुदृढ़ हो जाते हैं। नकारात्मक भावनाओं पर बार-बार ध्यान देने से वे पैटर्न पुख्ता हो जाते हैं जिनसे हमारी आदतें और यहाँ तक कि व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है।

जब उदासी या हताशा पैदा होती है तब हमारा ध्यान स्वतः ही उन भावनाओं की ओर खिंचकर उन्हें ऊर्जा देता है और उन्हें स्मृति में गहराई से अंकित कर देता है। इस कारण हम मनःस्थिति, हालात और लोगों के बीच फँसा हुआ महसूस करते हैं।

मेरे अनुभव में हार्टफुलनेस अभ्यास ने मुझे बार-बार इस चक्र को तोड़ने का मार्ग दिखाया है। नकारात्मकता से ध्यान हटाकर उसे धीरे से हृदय में ‘प्रकाश के स्रोत’ की ओर मोड़ने से मैं लाचारी के भाव के बजाय भीतर परमतत्व की उपस्थिति पर केंद्रित रह पाया।

प्राणाहुति, जो हार्टफुलनेस की एक विशिष्टता है, ने इस परिवर्तन में सबसे अहम भूमिका निभाई जिससे मुझे भटकाव से आंतरिक स्थिरता की ओर सहजता से बढ़ने में मदद मिली। कई बार ऐसा भी हुआ जब मैं अपने अवधान पर काम नहीं कर पा रहा था। उन कमज़ोरी के क्षणों में समर्पण के भाव से असहाय बैठने मात्र से मुझे प्राणाहुति महसूस होने लगी जिससे मेरा ध्यान भीतर की ओर मुड़ गया।

 

art-of-attention-2.webp

 

एक मौन दृष्टा बनना

जब हम ध्यान देने की बात करते हैं तब यह समझना महत्वपूर्ण है कि हम ‘पूर्ण ध्यान’ विकसित कर रहे हैं, जिसमें अवधानहीनता की जागरूकता भी शामिल है। हृदय पर ध्यान देने से विकसित होने वाली ‘हृदयपूर्ण जागरूकता’ से हम हर बात पर पूरी तरह ध्यान दे पाते हैं। यह एकाग्रता से भिन्न है। एकाग्रता में मन से कुछ चीज़ों को हटाया जाता है जिससे हमारा ध्यान संकुचित हो जाता है। बहुत से लोग इस संकुचन को ही ध्यान की अवस्था समझने की गलती कर बैठते हैं। इसके विपरीत, ध्यान के दौरान अपने अवधान को हृदय में टिकाए रखकर हम खुद को अधिक पूर्णता के साथ देखने लगते हैं जिसका अर्थ अपने अस्तित्व की उथल-पुथल और अव्यवस्थित भाग का अवलोकन भी हो सकता है। ध्यानपूर्वक अवलोकन करने से हमें अपनी कमियों, आदतों, पूर्वाग्रहों, डर, शिकायतों और इच्छाओं का पता लगता है। हम अपने डर का सीधे सामना करते हैं। यहाँ इरादा और दृष्टिकोण हमारे सहयोगी बन जाते हैं। जब हमारे मनोभाव में कोई पूर्वाग्रह नहीं होता और इरादा अपने अस्तित्व के उच्चतर पहलुओं के साथ सामंजस्य में होता है तब हमारी जागरूकता अधिक हृदयस्पर्शी होती जाती है और असीमित रूप से विस्तारित होती जाती है। हार्टफुलनेस मार्गदर्शक, दाजी इसे बड़ी खूबसूरती से ‘360° जागरूकता’ के रूप में वर्णित करते हैं।


मेरे अनुभव में हार्टफुलनेस अभ्यास ने मुझे बार-बार इस चक्र को तोड़ने का मार्ग दिखाया है। नकारात्मकता से ध्यान हटाकर उसे धीरे से हृदय में ‘प्रकाश के स्रोत’ की ओर मोड़ने से मैं लाचारी के भाव के बजाय भीतर परमतत्व की उपस्थिति पर केंद्रित रह पाया।


ध्यानमयी अवस्था प्राप्त करना

भटकाव, इच्छाएँ और कटु अनुभव अक्सर हमें वर्तमान में उपस्थित रहने से पीछे खींच लेते हैं। दिन के अंत में की जाने वाली हार्टफुलनेस सफ़ाई इन छापों और बाधाओं को दूर हटा देती है। जब चक्र शुद्ध हो जाते हैं तब असंतोष, बेचैनी और डर की भावनाएँ कम हो जाती हैं और संतुलन बहाल हो जाता है।

ध्यान हमारे अनुभव करने की क्षमता को बढ़ाता है और सफ़ाई हमारे अवलोकन करने की क्षमता को बढ़ाती है। साथ मिलकर ये हमारे स्पंदन क्षेत्र का स्तर ऊँचा कर देते हैं जिससे गहन रूपांतरण का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। प्राणाहुति के सहयोग से नियमित ध्यान विकसित होता है और सचेत अवलोकन से हमारी ध्यानमयी जागरूकता विकसित होती है। यह हार्टफुलनेस का सबसे बड़ा लाभ है क्योंकि यह ध्यान को किसी कमरे तक सीमित न रखकर दैनिक जीवन में ले आता है। तब हम एक ध्यानमयी अवस्था के साथ दैनिक जीवन में ध्यान को जीने लगते हैं। इस ध्यानमयी अवस्था में हम हृदय से जागरूक होते हैं। हमारी कार्यक्षमता बढ़ जाती है - इसलिए नहीं कि हम एकाग्र होते हैं बल्कि इसलिए कि हम पूरी तरह से उपस्थित व केंद्रित होते हैं।

 

art-of-attention-3.webp

 

मनोभाव को नियंत्रित करना

ध्यान देना कोई ऐसी प्रवृत्ति नहीं है जो हमें स्थायी रूप से प्राप्त है; इसे नियंत्रित करना होता है। हर क्षण हमें एक विकल्प देता है - अपनी जागरूकता को भटकावों में बिखरने दें या उसे समेटकर उपस्थित रहें। यदि हम उपस्थित रहने को चुनते हैं तो ध्यान देना अस्तित्व का एक कोमल और दैदीप्यमान गुण बन जाता है।

हार्टफुलनेस ध्यान विधि में हम हृदय पर ध्यान देते हैं। यहाँ स्पष्टता प्राप्त होती है, शांति गहरी होती है और जुड़ाव बढ़ता है। रोज़ाना ध्यान देने से — चाहे वह ध्यान के दौरान हो, बातचीत में हो या सरल कार्यों में — हम जीवन को टुकड़ों में देखने के बजाय समग्र रूप में देखने लगते हैं। हार्टफुलनेस के आदि गुरु, फ़तेहगढ़ के रामचंद्र जी (जिन्हें ‘लालाजी’ कहा जाता है) ने सुझाव दिया था, “हृदय पर नज़र रखें।” यह केंद्रितता हमें हृदयपूर्ण जागरूकता देती है। इस सतर्कता के साथ हम थोड़ा विराम ले सकते हैं, अपनी प्रतिक्रिया का चुनाव कर सकते हैं और निर्णय ले सकते हैं।


हार्टफुलनेस ध्यान विधि में हम हृदय पर ध्यान देते हैं। यहाँ स्पष्टता प्राप्त होती हैशांति गहरी होती है और जुड़ाव बढ़ता है। रोज़ाना ध्यान देने से — चाहे वह ध्यान के दौरान होबातचीत में हो या सरल कार्यों में — हम जीवन को टुकड़ों में देखने के बजाय समग्र रूप में देखने लगते हैं।


हमें अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने में क्या मदद करता है? उस क्षण में हम अपने इरादे को कैसे मार्गदर्शित करें? कौन से मार्गदर्शक सिद्धांतों से हमारे संचालन की रूपरेखा तैयार होती है? जब मैं इस दुविधा का सामना करता हूँ तब दाजी की ‘जीवनोपयोगी मार्गदर्शिका’ पढ़ने से मुझे अपना मनोभाव समायोजित करने में मदद मिलती है। यह मेरे अवधान को हृदयपूर्ण व प्रेममयी उपस्थिति की ओर ले आता है और मेरे इरादे को सही दिशा प्रदान करता है। यह रूपरेखा आत्म-नियंत्रण करने वाले अवधान, इरादे और मनोभाव को प्राप्त करने में मेरा मार्गदर्शन करती है -

ध्यान देने की कला सचेत रहकर जीने की कला है। यह हमें भटकाव से उपस्थित रहने की ओर, शोर से शांति की ओर और अलगाव से जुड़ाव की ओर ले जाती है। अवधान दिशा-सूचक और गंतव्य, दोनों के रूप में कार्य करता है। यह हमें वापस हृदय की ओर ले जाता है जहाँ वास्तविक उपस्थिति निवास करती है।

art-of-attention-4.webp

 


Comments

अतुल पटेल

अतुल पटेल चौदह साल से अधिक समय से हार्टफुलनेस में ध्यान प्रशिक्षक हैं और उन्होंने डोमिनियन आई टी मे... और पढ़ें

उत्तर छोड़ दें