मार्ग पटेल अपने पिता, दाजी और उनसे पहले आए गुरुओं के अपने अवलोकन के माध्यम से हार्टफुलनेस परंपरा में प्रेम और उसकी अविरल धारा पर अपने विचार व्यक्त करते हैं।
मैंलालाजी को नहीं जानता था। मैं बाबूजी से कभी नहीं मिला। उनके नाम मेरे लिए चेहरों या आवाज़ों के रूप में नहीं आए बल्कि कहानियों, खामोशी और मेरे पिता के शब्दों से उभरे व्यक्तित्वों के रूप में आए। बचपन में मैं उनके बारे में सुनता था पर समझ नहीं पाता था। वयस्क होने पर मैं उन्हीं बातों को फिर से सुनता हूँ और अब शब्दों में निहित कुछ और सुनाई देता है - ऐसा प्रेम जो इतना प्रगाढ़ था कि उसने कोई निशान नहीं छोड़ा यानी वह दिखाई नहीं देता, पर महसूस किया जा सकता है। मैंने बाबूजी के अपने गुरु, लालाजी, के प्रति प्रेम के बारे में अपने पिता से जाना। वह प्रेम निकटता या साथ बिताए समय पर आधारित नहीं था। वह उससे कहीं अधिक शक्तिशाली और उत्तम था। बाबूजी ने लालाजी की महासमाधि के बाद ही अपनी शक्ति पाई, फिर भी उन्होंने उनसे इतना गहरा प्रेम किया कि समय अप्रासंगिक हो गया।
लोग यह तो जानते हैं कि परवाना शमा में खुद को जलाकर राख हो सकता है। लेकिन वे यह भी कह सकते हैं कि बुझी शमा पर कुर्बान होना या उस गुरु के प्रति अपने आप को पूर्णतः समर्पित कर देना जो अब शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, तर्कसंगत नहीं है। लेकिन बाबूजी ने ठीक यही किया। उन्होंने अपने आप को लालाजी के आध्यात्मिक सत्व की अग्नि में समर्पित कर दिया और उनका उत्तराधिकारी बनकर, स्वयं वह ज्योति बनकर, जो उनके गुरु थे, उस ज्योति को जीवित रखा।
मेरे पिताजी ने बताया कि बाबूजी ने कभी लालाजी को अतीत का व्यक्ति नहीं माना। लालाजी के लिए उनका प्रेम स्मृतियों से प्रेरित नहीं था, बल्कि निष्ठा से प्रेरित था। बाबूजी ने लालाजी के लिए जीवन जिया - उन्हें स्मृति के रूप में नहीं, बल्कि परम आदेश, मार्गदर्शक और आंतरिक सत्ता के रूप में मानकर। इस तरह प्रेम करने के लिए साहस चाहिए। जब गुरु आपको देख सकते हैं तब भक्ति आसान होती है। लेकिन एक मौन सत्ता का पालन करना या ऐसी आंतरिक उपस्थिति के अनुसार जीवन ढालना जो बाहरी रूप से कोई आराम नहीं देती - बिलकुल अलग बात है।
और फिर मैंने अपने पिताजी के प्रेम को भी देखा है - पहले बाबूजी के लिए और फिर चारीजी के लिए। मैंने यह भी शब्दों के माध्यम से नहीं जाना। मैंने इसे उनके जीने के ढंग को देखकर समझा। उनकी ईमानदारी, आत्मविश्वास और सत्य के प्रति अडिग प्रतिबद्धता ने हमेशा उन्हें विशिष्ट बनाया है। वे लोगों की सुविधा के लिए या उनकी सहमति पाने के लिए सत्य को तोड़ते-मरोड़ते नहीं हैं। अब मुझे समझ आता है कि यह मज़बूती प्रेम का प्रतीक है।
मैं लालाजी या बाबूजी से नहीं मिला, लेकिन मुझे उनके प्रेम की उत्तरदीप्ति में जीने का सौभाग्य अवश्य मिला है। अपने पिता के माध्यम से मैं देखता हूँ कि प्रेम से जली लौ कभी नहीं बुझती। वह बस एक से दूसरे को दे दी जाती है और हर हस्तांतरण के साथ एक मौन प्रश्न छोड़ जाती है - क्या तुम प्रेम में जलने को तैयार हो?
मैं यह गुण अपने पिता के बाबूजी और चारीजी के साथ संबंध में देखता हूँ। उन्होंने कभी उनकी नकल करने की कोशिश नहीं की; बल्कि उनके प्रति ग्रहणशील बने रहने का प्रयास किया। उनकी दृढ़ आवाज़ के पीछे एक शांत सम्मान है, जैसे कि वे अपने भीतर की बात सुन रहे हों और अपनी सोच को किसी उच्चतर सत्य से मिलाकर जाँच रहे हों। इस तरह वे हमेशा अटल बने रहे हैं।
एक पुत्र के रूप में, उनकी जो बात मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है, उसे शब्दों में बाँधना कठिन है। हालाँकि मेरे पिता अनुशासनप्रिय हैं, निरंतर कार्य में लगे रहते हैं और एक प्रमुख वैश्विक भूमिका निभा रहे हैं फिर भी मैं उनके अंदर संसार में सार्वभौमिक प्रेम विकसित करने की गहरी चाह देखता हूँ। यह भावुक प्रेम नहीं है। यह प्रेम किसी भावना के रूप में नहीं है। यह ऐसा प्रेम है जो लोगों को विभाजित करने के बजाय जोड़ता है। और सबसे बढ़कर, यह ऐसा प्रेम है जो मान्यता नहीं बल्कि जुड़ाव चाहता है।
जब मेरे पिता गुरुओं के जीवन की कथाएँ सुनाते थे तब वह कभी जीवनी सुनने जैसा नहीं लगता था बल्कि एक आशीर्वाद जैसा प्रतीत होता था - कुछ ऐसा जो हमारे जीवन जीने के तरीके में प्रत्यक्ष दिखाई देता था। पूर्व गुरुओं की कथाओं ने प्रेम के बारे में हमारी समझ को आकार दिया। इसलिए हमारे परिवार में प्रेम कभी अतिशय नहीं लगा। वह बाहरी प्रेम नहीं था; वह संतुलित रहा। हमारे पारिवारिक जीवन के किसी भी कर्म में व्यक्तिगत दावा नहीं होता था ताकि गुरु के कार्य को अहं प्रभावित न करे। हमेशा छोड़ देने की एक इच्छा रही ताकि कुछ श्रेष्ठतर प्रकट हो सके।
शायद इसी तरह हार्टफुलनेस की परंपरा जीवित रहती है - उपाधियों या संस्थाओं की शक्ति से नहीं, बल्कि शाश्वत प्रेम की भूख से। लालाजी की ज्योति बाबूजी में प्रज्वलित रही, बाबूजी की स्पष्टता चारीजी में जीवित रही और चारीजी की निर्मलता मेरे पिता में जीवित है। और जो गुरु से शिष्य में संचारित होता है वह व्यक्तित्व नहीं होता, बल्कि सत्य पर बने रहने की दृढ़ता, सत्व से समझौता न करने का संकल्प और ऐसा प्रेम होता है जो उच्चतर उद्देश्य के लिए स्वयं को समर्पित कर देने को तैयार है।
मैं लालाजी या बाबूजी से नहीं मिला, लेकिन मुझे उनके प्रेम की उत्तरदीप्ति में जीने का सौभाग्य अवश्य मिला है। अपने पिता के माध्यम से मैं देखता हूँ कि प्रेम से जली लौ कभी नहीं बुझती। वह बस एक से दूसरे को दे दी जाती है और हर हस्तांतरण के साथ एक मौन प्रश्न छोड़ जाती है - क्या तुम प्रेम में जलने को तैयार हो?

मार्ग पटेल
मार्ग पटेल दाजी के छोटे पुत्र हैं। वे एक हार्टफुलनेस प्रशिक्षक हैं और औषधि एवं अचल संपत्ति के क्षेत... और पढ़ें
