दृढ़ता से खड़े रहना – 

महिलाएँ हिंसा के चक्र को कैसे तोड़ती हैं

 

डॉक्टर सिला एल्वर्दी अनन्या पटेल के साथ अपनी बातचीत में सशस्त्र संघर्ष रोकने में महिलाओं की भूमिका और उस प्रशिक्षण के बारे में चर्चा कर रही हैं जिससे शांति स्थापित करने के लिए आवाज़ उठाने और कार्रवाई करने में मदद मिलती है।

 

अनन्या पटेल - आप दशकों से शांति की स्थापना के लिए कार्य करती रही हैं और आपके कार्य का प्रमुख विषय है, सशस्त्र संघर्ष रोकने में महिलाओं की भूमिका। क्या आप अपने वर्तमान शोध के बारे में हमें कुछ बता सकती हैं? और आपके विचार में आज शांति स्थापना एवं शासन प्रणाली के लिए क्या आवश्यक है?

सिला एल्वर्दी - सबसे पहले तो मुझे बहुत खुशी हो रही है कि मैं आपसे बात कर रही हूँ और मुझे इस विषय पर चर्चा करने का अवसर मिला है कि आज संसार में शांति की स्थापना के लिए महिलाओं की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण क्यों है। यह इसलिए है क्योंकि माहिलाएँ सामान्यतः हिंसा चक्र की शुरुआत नहीं करतीं। वे अपनी बात अलग तरह से शुरू करती हैं और उनमें भावनात्मक उत्तेजना का भार कम होता है। उन्हें युद्ध के ज़ख्मों और उसकी त्रासदियों के बारे में इतनी अधिक फ़िक्र होती है कि वे युद्ध रोकने के लिए बहुत उत्साहित रहती हैं। वे अपने अंतर्ज्ञान से युद्धरत पक्षों को यह समझने में मदद करती हैं कि वर्तमान क्षण की ज़रूरत क्या है। वे उन्हें “किस पक्ष के पास कितने हथियार हैं,” के बारे में सोचने के बजाय समस्या के विषय में अधिक गहनता से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। हम जानते हैं कि मर्दों की बदला लेने की प्रवृत्ति शर्म और अपमान के एहसास से शुरू होती है जिसमें उनकी अपने परिवार की सुरक्षा में असफल हो जाने की भावना भी अक्सर शामिल होती है। इसलिए वे अपने आत्मगौरव को बनाए रखने के लिए बदला लेना चाहते हैं। ऐसा देखा गया है कि समझौता करने वाले दल में संतुलित संख्या में महिलाओं के शामिल होने से ऐसे शांति समझौते होने में मदद मिली है जो लंबे समय तक कायम रहे हैं। मुझे विशेष रूप से यह बात बड़ी दिलचस्प लगती है - यदि आप आँकड़ों की दृष्टि से जानना चाहें तो वर्ष 1989 से 2011 के बीच हुए 182 शांति समझौतों में से वे समझौते जिनमें महिलाएँ शामिल थीं, उनके पंद्रह वर्षों से अधिक समय तक कायम रहने की संभावना 35% अधिक है।

व्यावहारिक रूप से, मैंने कई अलग-अलग देशों में काम किया है जहाँ महिलाएँ किसी समय पर खड़ी होकर कहती हैं, “बहुत हो गया, अब इसे बंद कीजिए। आपको इस युद्ध के कारण पैदा हुई अराजकता और शस्त्रों से पैदा होने वाले सतत भय पर पुनर्विचार करना चाहिए।” उत्तरी आयरलैंड का एक उदाहरण है जो मेरे दिल के बहुत करीब है और जहाँ मैंने उन लोगों के साथ काम किया है जो दोनों पक्षों को साथ लाकर बातचीत करने के लिए वर्षों प्रयास करते रहे हैं। और दूसरा उदाहरण है लाइबेरिया का, जहाँ आप जानते हैं कि चौदह वर्ष तक गृहयुद्ध चलता रहा। फिर दो अद्भुत महिला शांति कार्यकर्ताओं, जिनमें से एक थीं लीमाह बोवी, ने इसे रोकने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास किया। उन्होंने ईसाई और मुस्लिम स्त्रियों को एकसाथ लाकर एक अंतर्धार्मिक आंदोलन ‘वीमेन ऑफ़ लाइबेरिया मास एक्शन फ़ॉर पीस’ चलाया। उन्होंने उस समय के सेना प्रमुख चार्ल्स टेलर और विरोधी समूह के नेताओं के बीच मध्यस्थता की। उन्होंने पुरुषों को लड़ाई से रोकने के लिए यौन संबंधों की हड़ताल (sex strike) का भी उपयोग किया यानी महिलाओं ने पुरुषों के साथ शारीरिक संबंध बनाने से इंकार कर दिया। उनके प्रयासों के आधार पर ही उनकी नेता, एलन जॉनसन सरलीफ़, वहाँ की पहली अफ़्रीकी महिला राष्ट्राध्यक्ष बनीं। इस तरह आप समझ सकते हैं कि वास्तविक परिणाम सदैव महिलाओं की मध्यस्थता से ही आते हैं।

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यूनाइटेड किंगडम में वर्ष 1981 में ‘ग्रीन्हम कॉमन’ नामक महिलाओं का शांति शिविर स्थापित किया गया था जो परमाणु क्रूज़ मिसाइलों को रॉयल एयर फ़ोर्स के शिविर में रखने का विरोध कर रहा था। और मैं उन तीस हज़ार महिलाओं में से एक थी जो सैन्य अड्डे के आसपास जमा हुई थीं। सैन्य अड्डे को पूरी तरह से घेरने के लिए हम पर्याप्त संख्या में महिलाओं को जुटाने में सफल रहे। उस अभियान को ‘एंब्रेस द बेस’ कहा गया। वर्ष 1983 में यह बात सुर्खियों में थी और मीडिया इससे प्रेरित होकर मिसाइल स्थल पर डेरा डाले बैठी महिलाओं के शिविर के बारे में समाचार प्रसारित करने लगा। ये माहिलाएँ उस साइट पर और अधिक मिसाइलों के जमा किए जाने का विरोध कर रही थीं। उन्हें इसमें दस साल लगे लेकिन वे सतत लगी रहीं और अंत में वर्ष 1991 में सभी मिसाइलें वहाँ से हटा ली गईं।

अनन्या पटेल - ये कहानियाँ अद्भुत हैं। और इनमें महिलाओं को शामिल करने का आपका विचार मुझे बहुत स्वाभाविक लगता है। लेकिन मुझे लगता है कि प्रमाणों और जन समर्थन के बावजूद ऐसी पहल को प्रशासनिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है। आपने उस स्तर पर महिलाओं को सम्मिलित करने की ज़रूरत को कैसे समझाया ?

सिला एल्वर्दी - मैं इन मामलों में अपने रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के रवैये को जानती थी। और अपनी उच्च शिक्षा के कारण मुझे ऐसी कुछ बैठकों में सम्मिलित होने दिया जाता था जिनमें इस तरह की कार्य नीतियों पर चर्चा की जाती थी। सेना और विदेशी मामलों के मुख्यालय व्हाइटहॉल में हुई एक ऐसी ही बैठक में मैं उपस्थित थी। उस कमरे में 250 पुरुष थे और केवल पाँच महिलाएँ थीं। बात यहाँ तक पहुँच गई कि जिस विषय पर चर्चा हो रही थी और जो योजना बनाई जा रही थी, उसमें स्पष्ट रूप से महिलाओं को संघर्षों के समाधान में हर भूमिका से बाहर रखा जा रहा था। यह मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ और मैंने अपना हाथ उठाकर व खड़े होकर शांति संबंधी वार्ताओं और अनुबंधों में महिलाओं को शामिल करने की आवश्यकता के बारे में कहना शुरू किया। सभा के अध्यक्ष का चेहरा गुस्से से लाल हो गया और मेरे तीन वाक्य बोलने के बाद ही उन्होंने कहा, “मैडम बैठ जाइए, जो आप कहना चाह रही हैं, उसमें यहाँ किसी की रुचि नहीं है।” उस समय तो मैं सहमकर बैठ गई लेकिन फिर मैंने सोचा कि यह ठीक नहीं है। इसलिए मैंने फिर से खड़े होकर कहा, “अध्यक्ष महोदय, आपका धन्यवाद, लेकिन मैं नहीं समझती कि जिस मसले का संबंध हम सभी से और पूरे देश से है, उसमें महिलाओं की भागीदारी को नकारना प्रासंगिक और मददगार होगा।” इसके बाद वे मुझे बोलने देने के लिए मजबूर हो गए। लेकिन मैं घबरा गई थी और मुझे बोलने के लिए अपना संपूर्ण साहस जुटाना पड़ा। मुझे अपने पिछले अनुभव भी याद हो आए - यदि एक बार आप लोगों के दबाव में आकर चुप हो जाते हैं तो वे सोचते हैं कि वे ऐसा फिर से कर सकते हैं। इसलिए हम महिलाओं को विगत सैकड़ों वर्षों में उन सभी महिलाओं के साहस से प्रेरणा लेने की ज़रूरत है जिन्होंने अपने मुद्दे के लिए अपना जीवन खतरे में डाला और उनमें से कुछ को उसके लिए जला भी दिया गया। हमें उन्हें याद करते हुए उनका सम्मान करना चाहिए और उन आवाज़ों को उठाना चाहिए जो अब शांत हो चुकी हैं। क्या यह आपको सही लगता है?

अनन्या पटेल - बिलकुल! क्या आप दर्द और हानि की स्थिति को दृढ़ता से लोगों के सामने अपनी बात रखने की स्थिति में बदलने के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं और यही सिखा रही हैं?

सिला एल्वर्दी - यह एक प्रशिक्षण है और हम जानते हैं कि यह कई स्थितियों में महिलाओं के लिए आसान नहीं होता। कई संस्कृतियों में महिलाओं का इस तरह दृढ़ता से अपनी बात कहना और उस पर चर्चा करना स्वीकार्य नहीं है। वे बाल शिक्षा या चिकित्सकीय सेवा प्रशिक्षण के बारे में बोल सकती हैं लेकिन सेना और युद्ध के बारे में नहीं। इसलिए हम प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित करते हैं जिनमें दृढ़ता से अपनी बात कहने के लिए आवश्यक कौशल सिखाए जाते हैं। दृढ़ता से अपनी बात कहना बहुत ज़रूरी है और प्रशिक्षण का पाठ्यक्रम महिलाओं में आंतरिक आत्मविश्वास विकसित करने में मदद करता है। इसकी हमें महिला होने के नाते, लड़की होने के नाते बहुत ज़रूरत है, विशेषकर ऐसे समय या जगह पर जब किसी महिला के लिए ऐसा निर्णय लिया जा रहा हो जो उसको पीड़ा देने वाला और अक्षम बनाने वाला हो। इसलिए हम उन्हें सिखाते हैं कि अपनी उपस्थिति को प्रभावी कैसे बनाएँ। यह सब अजीब लग सकता है लेकिन आपको पता है कि एक सार्वजनिक व्यक्ति होने के नाते आपको कभी-कभी यह भी सीखना होता है कि अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए गहरी साँस लेने की आदत कैसे विकसित करें। मैं यही करती हूँ। जो भी हो रहा हो, मैं गहरी साँस लेती हूँ और दस तक गिनती हूँ क्योंकि जब तक मैं खुद स्थिर नहीं होती, मैं स्पष्टता से बात नहीं कर सकती। मेरी आवाज़ लड़खड़ा जाएगी। मेरी घबराहट साफ़ दिखाई देने लगेगी। बेशक हमें घबराहट होती है। हमें अपने जीवन में पुरुषों की तरह इसके लिए प्रशिक्षित नहीं किया जाता है। इसलिए हमें अपने अंदर इस साहस और विश्वास को विकसित करना होता है कि जितना हो सके अपने सत्य को कह पाना ही संपूर्ण मानवता की सेवा है और इसका विस्तार अवश्य होगा।

हम संसार भर में महिलाओं को प्रशिक्षण दे रहे हैं कि जो ज़रूरी बातें हैं, उन पर महिलाओं का दृढ़ता से अपनी बात कहना और अपना स्पष्ट मत व्यक्त करना सही है। अपनी राय, चाहे सेना के बारे में हो या अग्रणी पुरुषों के व्यवहार के बारे में हो या फिर यह प्रशासनिक संस्थाओं द्वारा लिए जा रहे निर्णयों के बारे में हो, व्यक्त करना सही है। इसके लिए हमें महिलाओं में न सिर्फ़ दृढ़ निश्चय विकसित करना होता है बल्कि आत्मसम्मान भी पैदा करना होता है ताकि वे दृढ़ता से यह कह सकें कि इस बारे में बोलना मेरा अधिकार भी है और कर्तव्य भी।


दृढ़ता से अपनी बात कहना बहुत ज़रूरी है और प्रशिक्षण का पाठ्यक्रम महिलाओं में आंतरिक आत्मविश्वास विकसित करने में मदद करता है। इसकी हमें महिला होने के नातेलड़की होने के नाते बहुत ज़रूरत हैविशेषकर ऐसे समय या जगह पर जब किसी महिला के लिए ऐसा निर्णय लिया जा रहा हो जो उसको पीड़ा देने वाला और अक्षम बनाने वाला हो।


संसार भर से लोग हमारे प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए आते हैं और जो लोग सोचते हैं कि उनकी अंग्रेज़ी अच्छी नहीं है, हम उन्हें भी अपने आप को व्यक्त करने का पूरा अवसर देते हैं। और क्यों वे अंग्रेज़ी में ही अपनी बात रखें? वे अक्सर अनुवाद के माध्यम से बात करते हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि जो ऐसे प्रशिक्षण नहीं ले पाते हैं, वे भी कठिन मुद्दों पर अपनी आवाज़ उठा सकें, विशेषकर जिनमें उन्हें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है। कभी-कभी महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान निजता की ज़रूरत पड़ती है। कभी-कभी महिलाओं को सेना में विशेष भत्ते दिए जाने की ज़रूरत होती है ताकि वे अपनी देखभाल कर सकें। ये सभी ऐसी बातें हैं जिनके बारे में बात करने से महिलाएँ कतराती हैं क्योंकि उन्हें शर्मिंदगी होती है। और शर्मिंदगी इसलिए होती है क्योंकि उन्हें बहुत लंबे समय तक बोलने नहीं दिया गया। इसलिए इसके लिए थोड़े प्रशिक्षण और थोड़े साहस की ज़रूरत होती है और जब आप अपनी बात कह पाते हैं तो यह अद्भुत होता है, है न?

अनन्या पटेल - निस्संदेह। ‘द माइटी हार्ट’ पुस्तक के माध्यम से आप महिलाओं में अपनी बात को दृढ़ता से कहने की योग्यता विकसित करने में मदद कर रही हैं। हार्टफुलनेस के हृदयपूर्ण संवाद के कोर्स के अपने अनुभव से मैं जानती हूँ कि उस तरह से खुलकर बात करना काफ़ी कठिन हो सकता है। आपके अनुभव में शांति की स्थापना करने में इस तरह का प्रशिक्षण किस तरह कारगर हो सकता है?

सिला एल्वर्दी - मुझे उन सभी महिलाओं पर बहुत गर्व है जिनके साथ हम दुनिया भर में काम करते हैं। जिन अनुभवों या घटनाओं से वे गुज़री हैं, उनके बारे में बोल पाना ही अपने आप में दृढ़ रुख अपनाना है। हम लोगों को सलाह देते हैं कि जब उन्हें घबराहट हो तब वे उठकर खड़े हो जाएँ, भावनात्मक रूप से स्थिर हों और इस बात को महसूस करें कि सदियों से महिलाएँ बहुत कुछ कहना चाहती थीं लेकिन कभी कह नहीं पाईं। आज हम मार दिए जाने के डर के बिना वह सब कह सकती हैं। यह महिलाओं के लिए शक्तिशाली वैधता (कानूनी व्यवस्था) है, विशेषकर विकासशील संस्कृतियों में, जहाँ ऐतिहासिक रूप से महिलाओं ने अपनी आवाज़ नहीं उठाई है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण केन्या से है। जब केन्या के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बहुत हिंसा भड़क उठी थी तब एक अद्भुत महिला ‘देखा इब्राहीम अब्दी’ ने एक महिला संस्था की साठ हज़ार महिलाओं से कहा कि वे जो भी देखें, उसके बारे में अपने सेल फ़ोन से सूचना दें। जब उन्होंने यह सूचना दी तब शांति स्थापना करने वालों को यह पता चल सका कि हिंसा के प्रमुख क्षेत्र और शांति वाले क्षेत्र कौन से थे ताकि लोग जान सकें कि सुरक्षित रहने के लिए किस क्षेत्र में जाया जा सकता था। उन्होंने विश्वस्त स्थानीय नेताओं के साथ मिलकर हर क्षेत्र के लिए रणनीतियाँ बनाईं। और छह सप्ताह के अंदर ही हिंसा पूरी तरह से रुक गई। उन स्थानों की महिलाओं को सिर्फ़ यह जानकारी देकर हिंसा रोकी जा सकी कि वे अपनी आवाज़ उठा सकती थीं, उसके लिए उनके मारे जाने का कोई खतरा नहीं था और उनकी आवाज़ का महत्व था।

शांति स्थापना में महिलाओं का इस तरह का बीच-बचाव करना मुझे गर्व से रोमांचित कर देता है क्योंकि मैं जानती हूँ कि उनके लिए अपने घर-परिवार की ज़रूरतों और ज़िम्मेदारी को छोड़कर बाहर निकलना और लड़ाई-झगड़ों को रोकने के लिए प्रयास करना कितना कठिन हो सकता है।

 

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शांति स्थापना में महिलाओं का इस तरह का बीच-बचाव करना मुझे गर्व से रोमांचित कर देता है क्योंकि मैं जानती हूँ कि उनके लिए अपने घर-परिवार की ज़रूरतों और ज़िम्मेदारी को छोड़कर बाहर निकलना और लड़ाई-झगड़ों को रोकने के लिए प्रयास करना कितना कठिन हो सकता है।


अनन्या पटेल - आजकल जिस तरह भौतिक और डिजिटल दोनों ही स्तर पर हिंसा बढ़ रही है क्या आप शांति स्थापना की रणनीतियों में संचार और संपर्क के नए माध्यमों के कारण कोई बदलाव देखती हैं?

सिला एल्वर्दी - यह बहुत अच्छा प्रश्न है लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसका सही उत्तर देने के लिए मेरे पास पर्याप्त वैश्विक जानकारी है। लेकिन सेल फ़ोन के आने के बाद महिलाओं के अनुभव में बहुत बदलाव आया है। मेरे पास इसकी ठीक-ठीक जानकारी तो नहीं है लेकिन मैं यह ज़रूर जानती हूँ कि महिलाओं की दूरस्थ लोगों से जुड़ने और हमारी व अन्य वेब साइट के माध्यम से आसपास की महिलाओं के कार्यों के बारे में जानने और उनसे संपर्क करने की यह सुविधा अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई है। तीस साल पहले यह सब हमारे पास नहीं था। हममें से बहुत ही थोड़े लोगों के पास सेल फ़ोन थे और ऐसे नेटवर्क भी उपलब्ध नहीं थे जिनके माध्यम से हम लोगों से जुड़ सकते थे। आज आप यदि किसी संस्था का हिस्सा हैं जिसे महिलाओं को किसी कार्य के लिए जल्दी में भरती करना है तो एक हज़ार महिलाओं से एकसाथ बात की जा सकती है। अतः आजकल हम पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्षम हैं। अब निर्णय लेने वालों पर, विशेषकर महिला केंद्रित निर्णय लेने वालों पर अधिक दबाव पड़ने लगा है, क्योंकि वे समझ गए हैं कि महिलाओं की आवाज़ सुनी जानी चाहिए। लेकिन जब महिला और पुरुष नीति-निर्माताओं को किसी मुद्दे पर बहुत सारे टेलीफ़ोन कॉल आने लगते हैं, जब महिलाएँ उन्हें रचनात्मक तरीकों से मौलिक संदेश भेजती हैं, जैसे पोस्टर बनाकर भेजना जिन्हें वे अपने कार्यालय में लगा सकें, तब वे उस मुद्दे पर ध्यान देते हैं। यह पुरानी और नई तकनीकों का मिश्रण हमारे लिए हमेशा से कहीं अधिक सुविधाजनक हो गया है।

अनन्या पटेल - आपको आजकल की जटिल और परस्पर जुड़ी हुई चुनौतियों का सामना कर रहे युवा कार्यकर्ताओं के लिए सबसे ज़रूरी क्या लगता है?

सिला एल्वर्दी - मैं उनसे कई तरीकों के बारे में बात करना चाहूँगी लेकिन मुझे लगता है कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है अपनी उपस्थिति को प्रभावी बनाना। आप जानती हैं और मैं भी जानती हूँ कि जैसे ही हम किसी विवाद में पड़ते हैं, हम अंदर ही अंदर समझ जाते हैं, भले ही हम उसे शब्दों में व्यक्त न कर पाएँ कि सामने वाले लोग घबराए हुए हैं या आत्मविश्वास होने का दिखावा कर रहे हैं या हम पर सिर्फ़ धौंस जमा रहे हैं। और इसलिए प्रशिक्षण के एक हिस्से में मैं हरेक को यह सलाह देती हूँ कि हर दिन अपने पैर स्थिरता से ज़मीन पर रखने का अभ्यास करें ताकि हम खड़े होकर धरती से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को अपने शरीर में प्रवेश करते हुए और फिर ऊपर हृदय, मन तथा अपनी आवाज़ तक जाते हुए महसूस करें। यदि हम एक मिनट के लिए भी यह करते हैं और साथ ही गहरी साँसें भी लेते हैं तो जैसा कि आपको पता है, गहरी साँस लेकर हम अपनी बात को सबसे जल्दी और स्पष्टता से समझा पाते हैं। इससे आप न तो व्यर्थ बातें बोलेंगे और न ही इतनी जल्दी-जल्दी बोलेंगे कि कोई आपकी बात को ठीक से समझ ही न सके। अतः गहरी साँस लेने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि जब शब्द आपके मुख से निकलते हैं तब वे स्पष्ट होते हैं, उनमें वज़न होता है और वे हृदय की गहराई से निकलते हैं। इसीलिए हृदय से बोलने का इतना महत्व है क्योंकि जब आप सिर्फ़ मन से बोलते हैं तो जीतने के उद्देश्य के कारण आप सिर्फ़ बहस करने लगते हैं। किसी सभा या मीटिंग के अंत में यदि आप किसी से पूछें कि उन्हें उस चर्चा में से क्या याद रहा, तो आप देखेंगे कि उन्हें वह बात याद होगी जो किसी ने गहरी साँस लेकर कही थी, “मैं चाहता हूँ कि आप यह बात जानें।” दो वाक्यों में कही गई बात ही लोगों को याद रह पाती है। इसलिए यदि आप किसी सार्वजनिक सभा में बोल रहे हैं तो अपनी बात को दो या तीन वाक्यों तक सीमित रखना उपयोगी रहता है। वे बातें आपके दिमाग में पूरी तरह स्पष्ट रहती हैं और वे जितनी छोटी हों उतना अच्छा रहता है। मैंने देखा है कि जब मुझे कोई भाषण देना होता है और मैंने दो या तीन पन्नों का भाषण तैयार किया होता है तो वह लोगों को उतना अच्छा नहीं लगता जितना अच्छा तब लगता है जब मैं छह बिंदुओं से बात शुरू करती हूँ और दो बिंदु बताने के बाद मैं कहती हूँ, “मुझे बताइए कि आप मुझसे सबसे ज़्यादा क्या सुनना चाहते हैं - मैं आपकी ज़रूरत कैसे पूरी कर सकती हूँ?”


गहरी साँस लेने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि जब शब्द आपके मुख से निकलते हैं तब वे स्पष्ट होते हैंउनमें वज़न होता है और वे हृदय की गहराई से निकलते हैं। इसीलिए हृदय से बोलने का इतना महत्व है क्योंकि जब आप सिर्फ़ मन से बोलते हैं तो जीतने के उद्देश्य के कारण आप सिर्फ़ बहस करने लगते हैं।


अनन्या पटेल - आपने बताया कि स्वयं को शारीरिक रूप से स्थिर करने के लिए ज़मीन पर खड़ा होना, गहरी साँस लेना और अपने पैरों के नीचे की ज़मीन को महसूस करना चाहिए। मैं जानती हूँ कि बागवानी आपके लिए महत्वपूर्ण है। ज़मीन से यह जुड़ाव आपके काम में कैसे मदद करता है?

सिला एल्वर्दी - इस प्रश्न के लिए धन्यवाद क्योंकि यह मेरे दिल के बहुत करीब है। मेरी परवरिश एक छोटे से खेतिहर क्षेत्र में हुई थी। मैंने वहीं धरती से प्रेम करना सीखा। मेरे पिता बहुत ही तानाशाही प्रकृति के थे जो मुझ पर बहुत चिल्लाते थे और सब उनसे डरते थे। मुझे अपनी बात पर अडिग होना सीखना पड़ा। मुझे एहसास हुआ कि ज़मीन पर खड़ा होना ही हमें अडिग बनने में मदद करता है। इस तरह मैंने यह सीखा और इसे हर समय करती हूँ, विशेषकर जब मुझे कहीं जाकर भाषण देना होता है, जो काफ़ी तनावपूर्ण होता है, तब मैं कहीं भी घास वाली जगह पर जाकर खड़ी हो जाती हूँ (यह कहाँ है इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इसके लिए आपके पास कोई बगीचा होना ज़रूरी नहीं है)। आप निकट के किसी पार्क में या कहीं भी जा सकते हैं जहाँ ज़मीन पर घास हो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वह ज़मीन कहाँ है। ऐसी जगह पर खड़े होकर आप वास्तव में महसूस करते हैं कि वह धरती, वह ज़मीन आपको सहारा दे रही है और अपनी बात आपके माध्यम से व्यक्त करना चाहती है। यह आपका कर्तव्य है कि आप अपना सत्य जितनी स्पष्टता से कह सकते हैं, कहें और अपने सत्य को कम से कम शब्दों में कहें। लोग यही याद रखेंगे। मैं कोशिश करती हूँ कि मेरा स्वर धीमा हो क्योंकि यदि मैं लगातार तेज़ी से और ऊँची आवाज़ में बोलती रहूँ तो वे बातें लोगों के मन में बैठती नहीं हैं और वे मेरी कही बातों में से कुछ भी याद नहीं रख पाते। इसलिए मैं अपनी आवाज़ को अपने हृदय के साथ मिलाती और लयबद्ध रखती हूँ ताकि जो भी मेरे मुख से निकले, वह जितना संभव हो, सत्य ही हो। मैंने यही सत्य सीखा है और यही मैं सबको सिखाना चाहती हूँ।

अनन्या पटेल - यह संवाद मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक रहा और मैं जानती हूँ कि मेरी उम्र के और अन्य लोग, जो जटिलताओं का सामना कर रहे हैं और उनको पार करने की कोशिश कर रहे हैं, इसे अवश्य समझेंगे। आपके काम के पीछे के शोध और अनुभवों के बारे में सुनकर और साथ ही उन व्यावहारिक तरीकों के बारे में जानकर जिन्हें आपने चुनौतियों से निपटने और कार्रवाई करने के लिए अपनाया, हमें हिम्मत मिलती है। आपके साथ यह चर्चा कर पाने के लिए मैं आभारी हूँ। धन्यवाद सिला।


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सिला एलवर्दी

सिला एलवर्दी

सिला एलवर्दी ऑक्सफ़ोर्ड रिसर्च ग्रुप के साथ परमाणु अस्त्रों पर नीतियाँ बनाने वालों और आलोचकों के बी... और पढ़ें

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