अलैंडा ग्रीन भय, आत्म-संदेह और अपने आप को व्यक्त करने के बारे में लिखती हैं।
ऐसा नहीं है कि मैंने कभी चुनौतियों का सामना नहीं किया। पर्वत शिखर से सूर्योदय को देखने के लिए मैं रात के समय अकेले पर्वत पर चढ़ी हूँ जहाँ जंगल में भालुओं और तेंदुओं का होना आम बात है। कई बार मैं अपने प्रियजनों के साथ, उनके अंतिम क्षणों में उनके शरीर को थामे हुए बैठी हूँ जब मुझे ऐसा लगा मानो मैं दुख के सागर में डूब जाऊँगी। मेरे साथ ऐसे विश्वासघात हुए जिनसे मेरे भरोसे का आधार ही पूरी तरह से मिट गया। मुझे ऐसी बीमारियों से जूझना पड़ा जिन्होंने मुझे मृत्यु के करीब पहुँचा दिया। इन चुनौतियों से मैंने सीखा कि मैं कुछ मूलभूत डरों का सामना बिना मुँह मोड़े, बिना छिपे या बिना उन्हें नकारे कर सकती हूँ।
इसलिए क्रिसमस कार्यक्रम में अकेले गीत गाने के लिए कहे जाने पर मेरा डर पूरी तरह से गलत और समझ से बाहर था। मेरा मतलब है कि वास्तव में असली चुनौतियों की तुलना में यह कोई बड़ी बात नहीं थी। मैं एक छोटे से ग्रामीण समुदाय में रहती हूँ जिसमें शायद 100 श्रोता ही होंगे जो मेरे मित्र व पड़ोसी हैं।
जब मैं 70 वर्ष की हुई तब एक समय मुझमें ऐसा फ़र्ज़ी साहस आ गया या भ्रम पैदा हो गया जिसके चलते मैंने तय किया कि अब समय आ गया है कि मैं नई चुनौतियों का सामना करूँ। जब मुझे ऐसे काम करने के लिए कहा जाए, जो मुझे असहज परिस्थितियों में ले जाएँ, तो मैं उन्हें स्वीकार कर लूँ। मैंने अपने कई मित्रों, परिवारजनों और परिचितों को, जिनकी उम्र बढ़ रही थी, आसान रास्ता चुनते हुए देखा था। मुझे लगता था कि हम जीवन के उस दौर में पहुँच चुके थे जहाँ हमारे पास जीवन का अच्छा-खासा अनुभव था, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हम इतना लंबा जीवन जी चुके थे। जो भी मुश्किलें आईं, हमने उनसे निपटने के लिए काफ़ी अच्छे तरीके सीख लिए थे। अब हमें कोई भी अनावश्यक प्रयास करने की ज़रूरत नहीं थी। हम अपनी ज़िम्मेदारी निभा चुके थे।
लेकिन फिर मैंने देखा कि लोगों ने स्वयं को जितना कम नए प्रयासों में लगाया उतनी ही तेज़ी से वे बूढ़े होते दिखे। जो लोग निरंतर सीखते रहे और अलग-अलग तरीकों से खुद को सक्रिय रखते रहे, उनमें बुढ़ापा कम तेज़ी से आते दिखा; कभी-कभी तो उनकी उम्र का मुश्किल से ही पता चलता था।
अपने समुदाय की छोटी सी आबादी के अध्ययन और संदेहास्पद वैज्ञानिक परिणामों को देखते हुए, मैंने आसान रास्ता अपनाने से और उम्र के जल्दी ढलने से बचने का फैसला किया। अपने 70वें जन्मदिन पर मेरे द्वारा किया गया यह फैसला मेरे लिए आंतरिक उत्साहवर्धक था। मैंने खुद से एक वादा किया कि जब भी मुझे अपनी सीमाओं से आगे बढ़ने के अवसर मिलेंगे, मैं उन चुनातियों का सामना ज़रूर करूँगी।
मैं खुद से ऐसा वादा कभी नहीं करती यदि मुझे पहले से पता होता कि मुझे एकल गीत गाने को कहा जाएगा, चाहे श्रोता कोई भी होते।
मुझे गाना पसंद है और मैं इसके लिए अवसर ढूँढती रहती हूँ। मेरी आवाज़ मधुर है और औसत दर्जे की है। मैंने सालों संगीत की शिक्षा दी है और रोज़ाना अपने छात्रों के साथ गाया है। मैं सप्ताह में एक बार गिटार बजाकर अपने मित्रों के साथ भी गाती हूँ। हमारे छोटे से ग्रामीण समुदाय में सामूहिक गीत गाने के आए दिन मौके मिलते रहते हैं। पिछले पाँच सालों में तो नियमित रूप से एक ‘पॉप-अप’ गायन समूह बनाया जाता रहा है जिसे बड़े शहर की पूर्व शिक्षिका आयोजित करती हैं। मैं मध्य से निम्न स्वर में गाती हूँ। और मैं समूह में गाती हूँ। मैं ऊँचे स्वर में या अकेले नहीं गाती हूँ। इसके पीछे एक कारण है।
शरद ऋतु में जब डेबेरा ने मुझे फ़ोन किया और कहा, “मैं सोच रही थी कि क्या वह हिस्सा तुम अकेले गाना चाहोगी जो हिस्सा एंथनी गाता है। इस साल वह नहीं गा पाएगा।” मैंने हकलाते हुए टूटे-फूटे शब्दों में कहा, “माफ़ करना, मुझे नहीं लगता कि मैं कर पाऊँगी। मैं वास्तव में एकल गायिका नहीं हूँ।” मेरे मन का एक हिस्सा उन कारणों की सूची बना रहा था कि मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकती, जबकि दूसरा हिस्सा मुझे वह वादा याद दिला रहा था जो मैंने खुद से अपनी 70वीं वर्षगाँठ पर किया था। साथ ही मेरे मन का एक अन्य हिस्सा इस बात को लेकर परेशान था कि मैं अपने सामूहिक गायन की निर्देशक को, जिनके काम की मैं बहुत सराहना करती थी और जिन्हें मैं बहुत पसंद करती थी, निराश नहीं करना चाहती थी। इसलिए यह बताने के बजाय कि मैं क्यों नहीं गा पाऊँगी, जैसा कि ऐसे में अपेक्षित होता, मैंने धीमी आवाज़ में कहा, “मैं कोशिश कर सकती हूँ।”
मैं रोज़ाना अपनी डायरी में उस असंगत डर के विषय पर लिखने लगी जो गायन के अनुरोध ने मेरे भीतर जगाया था। यह लेखन मेरे उन विचारों के बारे में था कि मैं एकल गायन के लायक नहीं हूँ, मैं दूसरों को निराश नहीं करना चाहती और मैं नहीं चाहती कि कोई मेरी आलोचना करे, मेरा मज़ाक उड़ाए या मेरा आंकलन करे। यह मेरी अपनी आवाज़ को दबाने के बारे में था। यह फिर से उस डर का सामना करने के लिए साहस जुटाने के बारे में था। लेकिन मुझे यह समझने की ज़रूरत थी कि वास्तव में यह डर क्या था।
मैंने फ़ोन रखा और सोचने लगी कि मेरे मुँह से ये शब्द कैसे निकले। मैं हक्की-बक्की रह गई और मेरे मन में कई विचार दौड़ने लगे, “यह एकल गायन है। तुम एकल नहीं गा सकतीं। यह ऊँचे स्वर का गायन है। ऊँचे स्वर में तो तुम बिलकुल भी नहीं गा सकतीं। तुम्हें पीछे हटना होगा। जैसे ही वह तुम्हें ऊँचे स्वर का गाना गाते हुए सुनेगी, वह शर्मिंदा होकर एंथनी के पास जाएगी और उससे विनती करेगी कि वह वापस आकर यह हिस्सा गाए।”
यह चिंता से भरी आवाज़ों के भीतरी शोर की शुरुआत थी जिसमें एक ऐसी आवाज़ भी थी जो उन्मादी, डरी हुई आवाज़ों को सलाह देने की कोशिश कर रही थी।
फिर इस बात से अपना ध्यान हटाने के लिए मैं अपने आप को कुछ सार्थक कामों में व्यस्त रखने के बारे में सोचने लगी, जैसे मोज़ों की दराज में बेमेल जोड़ियों को ठीक करना या रसोई भंडार के सबसे ऊपर वाले खाने को साफ़ करना। इस डर से बचने के लिए मैं कुछ भी करने के लिए तैयार थी। फिर भी, एक अजीब सी बेचैनी मुझे बता रही थी कि यह एकल गायन इन ध्यान हटाने के उपायों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। इसलिए इन कामों को करने के बजाय मैं अपनी डेस्क पर लौट आई, अपनी डायरी खोली और लिखने लगी। मैं अपने मन में उठ रही विभिन्न आवाज़ों को सुनती रही और लिखती रही।
उस दिन से, मैं रोज़ाना अपनी डायरी में उस असंगत डर के विषय पर लिखने लगी जो गायन के अनुरोध ने मेरे भीतर जगाया था। यह लेखन मेरे उन विचारों के बारे में था कि मैं एकल गायन के लायक नहीं हूँ, मैं दूसरों को निराश नहीं करना चाहती और मैं नहीं चाहती कि कोई मेरी आलोचना करे, मेरा मज़ाक उड़ाए या मेरा आंकलन करे। यह मेरी अपनी आवाज़ को दबाने के बारे में था। यह फिर से उस डर का सामना करने के लिए साहस जुटाने के बारे में था। लेकिन मुझे यह समझने की ज़रूरत थी कि वास्तव में यह डर क्या था। पहाड़ पर चढ़ना, भरोसे और मित्रता का खोना, अपनी मृत्यु को निकट आते देखना और अपने प्रियजनों की मृत्यु की वास्तविकता स्वीकारना - ये चुनौतियाँ ऐसी थीं जो भयभीत कर सकती थीं और जिनका सामना करने के लिए साहस जुटाना आवश्यक था। लेकिन क्रिसमस कार्यक्रम के सामुदायिक सामूहिक गान में एकल गायन में डरने वाली ऐसी क्या बात थी? इतनी छोटी सी बात के लिए मेरी भावनात्मक प्रतिक्रिया उन परिस्थितियों का अपमान जैसी लग रही थी जो वास्तव में चुनौतीपूर्ण थीं।
फिर भी मैंने अपनी डायरी में ये शब्द लिखे – “यह बहुत महत्वपूर्ण, बहुत ज़रूरी लगता है, लेकिन पता नहीं क्यों।”
अगले कुछ दिनों में मुझे धीरे-धीरे समझ आने लगा कि मेरे लिए इस हिस्से को गाने का अपना वादा निभाना क्यों ज़रूरी था। “यह अपने आप को व्यक्त करने के बारे में है” - यह बात कागज़ पर लिखी हुई थी, जिसे मैंने ही लिखा था। “यह क्या है?” मैंने खुद से पूछा। मेरी एक आवाज़ है — यानी मेरे विचार जिन्हें मैं लिखती हूँ, बोलती हूँ, जिनके माध्यम से खुद को अभिव्यक्त करती हूँ। अंदर की एक आवाज़ कहती है, “हाँ! लेकिन इससे वह आवाज़ छिप जाती है जिसे तुम व्यक्त नहीं करती।”
मैं उन आवाज़ों को जानने की कोशिश करने लगी जो बाहरी दुनिया को तो सुनाई नहीं दे सकती थीं लेकिन अंदर ही अंदर वे एकसाथ बोल रही थीं। वे सुने जाने का अवसर पाने के लिए उत्सुक थीं। मैंने उनकी काट-छाँट करने या हटाने की इच्छा को रोका। एक आवाज़ पूछने लगी, “सचमुच? तुम ‘यह’ लिख रही हो?”
मैंने डायरी में लिखा, “अपने आप को अभिव्यक्त करने के तरीकों के बारे में मैं अपनी पुरानी यादों, अवधारणाओं, विचारों, डरों, प्रतिबंधों और मुझ पर लागू की गई बातों को अपने अंदर से निकाल रही हूँ। मैंने मित्रों, भाई, पति और शिक्षक से मिली आलोचनाएँ सुनी हैं। मैंने सब कुछ अपने अंदर समा लिया है। मैं खुद पर संदेह करने लगी हूँ कि मैं यह कर सकती हूँ या नहीं।”
मेरे भीतर की बहुत सारी आवाज़ें इसके समर्थन में खुश थीं। एक शांत आवाज़ ने धीरे से कहा, “तुम कर सकती हो।” दूसरी आवाज़ ने स्पष्ट रूप से कहा, “नहीं, तुम नहीं कर सकतीं। तुम डेबेरा को निराश कर दोगी। तुम गायन समूह और बैंड को शर्मिंदा कर दोगी। तुम्हारे मित्र तुम्हारे लिए बुरा महसूस करेंगे। जो लोग तुम्हारे मित्र नहीं हैं, तुम्हारा मज़ाक उड़ाएँगे।”
मैं गायन समूह के साथ अभ्यास करने लगी। मेरी आवाज़ धीमी सुनाई पड़ रही थी; मुझसे कुछ स्वर छूट जाते थे और आवाज़ में तीव्रता भी नहीं थी। मैं थोड़ा शर्मा गई। डेबेरा ने सुझाव दिया कि मैं अपनी श्वास पर काम करूँ। मैं बहुत समय से योग सीखती रही हूँ और मुझे पता है कि मुझे श्वास का प्रयोग कैसे करना है। लेकिन जब मैं गाने के उस हिस्से को गाने की कोशिश कर रही थी तब कुछ तो था जो मेरी श्वास को पकड़े हुए था, रोके हुए था, मेरी छाती को जकड़े हुए था और गले से निकलती आवाज़ को दबा रहा था।
मैंने अपनी डायरी में लिखा, “ठीक है, मैं इस अवधारणा को चुनौती दूँगी - तुम गाने के लिए पर्याप्त योग्यता नहीं रखती हो, खुद को आगे मत लाओ, मंच पर मुख्य भूमिका मत निभाओ।” लेकिन फिर यह प्रश्न उठता है, “क्यों नहीं? उसके पीछे क्या है?” कुछ तो था जो मेरे मन के किसी कोने में छुपा बैठा था, कुछ ऐसा करने के बारे में जो मेरी बहन न कभी कर सकी या न कभी उसने किया। मन में यह विचार आया, “तुम्हारी बहन बहुत प्रतिभाशाली थी। इसीलिए वह गायन और पियानो सीखती थी। वही थी जिसकी आवाज़ सुरीली थी। लेकिन वह लोगों के सामने गाने के मामले में बहुत डरपोक और शर्मीली थी। तो तुम्हारा आगे बढ़ना गलत होगा। दूसरों को असहज महसूस मत कराओ।” लेकिन यह बात मेरी बहन के बारे में नहीं थी। उस आवाज़ में एक ऐसा सच छिपा था जो और भी ज़्यादा कोने में था। यह मुद्दा तो सामर्थ्य व संभावना के और उन सभी आवाज़ों के बारे में था जो मुझे और हममें से हर किसी को पीछे खींचती हैं।
मैंने खुद से बार-बार कहा, “मैं कभी भी पीछे हट सकती हूँ।” लेकिन इसमें कुछ सीखने के लिए भी था, कुछ ऐसा जो मुझे हार नहीं मानने दे रहा था। यह, मैं जो कर सकती हूँ, उसके बारे में मेरे मन में बसी धारणाओं को चुनौती देने की बात थी। मैं अपने मन में उठते विचारों को लिखती थी, गाने का अभ्यास करती थी। फिर भी मैं रात में जाग जाती थी और मेरा गला सूखा और तनावग्रस्त होता था।
कार्यक्रम करीब था। कभी-कभी मेरे सुर लग जाते थे और कभी नहीं लगते थे। मैं अपने गले को आराम देने और उसे तनावमुक्त व खुला रखने का अभ्यास करती थी। कई बार शब्द अनायास ही मुँह से निकल जाते थे जब उन्हें नहीं निकलना चाहिए था। कभी-कभी लोगों को उन्हें सुनना अच्छा नहीं लगता था। इन सब बातों में मुझे ऐसा प्रतीत होता था जैसे अपने शब्दों पर मैंने अपना नियंत्रण छोड़ दिया हो। फिर भी जब भी यह विचार शब्दों का रूप लेकर पन्नों पर उतरता था या मेरे मुँह से निकलता था, यह मूर्खतापूर्ण, गलत, बेवकूफ़ी भरा और अनुचित लगता था।
आखिरकार, कार्यक्रम का दिन आ गया। हालाँकि मैं कोई प्रभावशाली और शानदार गायिका नहीं बनी थी, लेकिन कार्यक्रम अच्छा रहा। अब मेरे लिए परिणाम इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा। मैं अब अंदर की आवाज़ों से मिले ज्ञान को समझने में व्यस्त हूँ। फिर भी, मैं खुश हूँ कि मैंने कोई गड़बड़ नहीं की।
मेरे अंदर डर अब भी काफ़ी ज़्यादा है लेकिन मैं जानती हूँ कि मेरे अंदर गहराई से और लंबे समय तक बसी कोई भावना थोड़ी-बहुत तो बाहर निकली है, खुली है, आज़ाद हुई है। इस पर और भी काम करना बाकी है। जब बात अपनी योग्यता के बारे में उन पुरानी, दबी हुई सोच का सामना करने की आती है कि क्या करना या न करना ठीक है - जैसे मेरी आवाज़ पर किसका अधिकार है - तब उसकी तुलना में अंधेरे में अकेले पहाड़ चढ़ना भी बहुत आसान लगने लगता है।


