मल्लिका रेड्डी ‘कैंसल्ड प्लान्स’ नामक कंपनी की संस्थापक हैं जो भारत में पर्यावरण के अनुकूल वस्त्रों की और पॉडकास्ट में एक उत्तम ब्रांड है। ममता सुब्रमण्यम के साथ बातचीत की इस कड़ी में दोनों मानसिक स्वास्थ्य की आवश्यकता, मानसिक स्वास्थ्य को सशक्त करने के साधन और अपने आंतरिक प्रकाश को उजागर करने के लिए ज़िम्मेदारी लेने जैसे विषयों पर चर्चा कर रही हैं।
प्रश्न - नमस्ते ममता। कुछ अरसे पहले तक आपके लिए डॉक्टर बनना ही एकमात्र लक्ष्य था क्योंकि आपके परिवार में चिकित्सा क्षेत्र में बहुत सारे लोग काम कर रहे हैं। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यह एक कैंसल्ड प्लान था यानी एक ऐसी योजना जो रद्द हो गई।
हाँ, वह मेरी ऐसी सबसे बड़ी योजना थी जो रद्द हुई। एक बड़े लंबे अरसे तक वही एक मार्ग था जिस पर मैं चल रही थी। सभी को लग रहा था कि मैं भी डॉक्टर बनूँगी। मुझे भी लगता था कि मैं डॉक्टर बनूँगी, हालाँकि मैं ऐसा नहीं चाहती थी। कॉलेज के दौरान बीच में प्री-मेड की कक्षाओं में मेरा प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, इसलिए नहीं कि मुझमें इसके प्रति रुचि नहीं थी या मुझमें बुद्धि नहीं थी। मेरे खुद के मानसिक स्वास्थ्य के कुछ मसले और उन विषयों में स्वाभाविक रूप से कमज़ोर होने के कारण यह गड़बड़ हुई।
मैं अपनी माँ का आभार मानती हूँ जिन्होंने मेरा संघर्ष देखा और समझ गईं कि मैं यह नहीं करना चाहती हूँ। उन्होंने कहा, “कोई बात नहीं, शायद तुम्हें कुछ और करके देखना चाहिए।”मेरे सहित कई लोगों को इस बात से निराशा हुई। एक लंबे अरसे तक मैंने यही सोचा था कि मुझे डॉक्टर ही बनना है। इस सपने को बनाने में कई लोगों का हाथ था और मैं उसे ही अपनी पहचान समझती थी। मैं अब भी संघर्ष कर रही हूँ क्योंकि उस निर्णय ने सब कुछ अस्तव्यस्त कर दिया।
प्रश्न - ऐसा निर्णय लेना आसान नहीं हुआ होगा। आपने कहा कि उस वक्त आप अपने मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रही थीं, तो उस निर्णय पर कैसे आगे बढ़ीं?
अप्रवासी माता-पिता के यहाँ पैदा होने और अमरीका में पलने-बढ़ने के कारण मेरा एक हिस्सा ऐसा था जो मेरे माता-पिता के सपनों को पूरा करना चाहता था। मैं सपनों के साथ जीने वाले अप्रवासी माता-पिता की आलोचना नहीं कर रही हूँ परंतु उन पर और उनके बच्चों पर बहुत ज़्यादा दबाव होता है। आखिरकार, हम उस जगह पहुँच गए हैं जहाँ समाज में इसे व्यक्त करने के लिए शब्द हैं, एक भाषा है। उस ज़माने में मैं इतनी अधिक नमनशील थी कि अपने उस दायरे से बाहर निकलने के खयाल से ही भयभीत हो जाती थी क्योंकि एक लंबे समय तक मैं अपने आरामदायक क्षेत्र में असुरक्षित महसूस करती थी।
अपने अधिकांश जीवन में मैं तनाव से जूझती रही हूँ। आज मैं यह समझ सकती हूँ की मेरा वह तनाव सबको खुश करने वाली मेरी मानसिकता की उपज थी जो शायद बचपन में हुई कुछ घटनाओं के चलते विकसित हुई या फिर मेरे सहज स्वभाव के कारण थी। अगर मैं औरों की अपेक्षा के अनुसार काम नहीं करती हूँ तो मुझे लगता है जैसे मैं अंदर से टूट रही हूँ और इससे मेरा तनाव बेहद बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, मुझे चिकित्सा क्षेत्र से परे की दुनिया के बारे में कुछ भी पता नहीं था। इसके बावजूद कि मैंने उस डिग्री के लिए दाखिला लिया जो मुझे बहुत पसंद थी, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं कौन हूँ और मुझे किस दिशा में जाना है।
प्रश्न - अतिसंवेदनशीलता के साथ इस बात को पूरी ईमानदारी के साथ बताने के लिए धन्यवाद। दिल की ऐसी बातें जब आसानी से ज़बान पर आ जाती है, उसे हम बहुत हलके में लेते हैं, लेकिन ये बातें बताना तब बहुत ही मुश्किल होता है जब लोग सुन रहे होते हैं। आपने यकीनन अपने आप पर बहुत काम किया है क्योंकि आपकी बातों में आपकी आत्म-जागरूकता स्पष्ट झलकती है।
मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने और खुद की देखभाल करने की आपकी यात्रा कैसी रही है? और आपके जीवन में ध्यान का पदार्पण कैसे हुआ?
वर्ष 2015 में जब मैं न्यूयॉर्क गई तब मैं वास्तव में अपने मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने लगी। उस वक्त काम के दौरान जो तीव्र घबराहट के दौरे मुझे पड़ते थे उन्हें मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाती थी। मेरी व्यक्तिगत ज़िंदगी में उस वक्त बहुत कुछ हो रहा था और उसका प्रभाव मेरे व्यवसायिक जीवन पर भी पड़ रहा था। अपनी भावनाओं के बारे में मैं मित्रों के सामने भावुक होकर बहुत कुछ बोलने लगती थी। उस समय मुझे कुछ समझ नहीं आता था लेकिन अब हाल ही में मुझे अपने इस बर्ताव का कारण समझ में आया। मैं सोचती थी कि अपने भरोसेमंद लोगों के सामने अपने अंदर की बात बाहर निकालने से मैं ठीक हो जाऊँगी। मुझे लगता था कि वे लोग मुझे समाधान देंगे, वह व्यक्ति या वह रिश्ता (चाहे कितना भी खराब क्यों न हो) मुझे ठीक कर देगा।
उस समय मुझे पता नहीं था लेकिन आज मैं जानती हूँ कि, भले ही कोई और नुकसान पहुँचाता था, परंतु उससे होने वाली परेशानी को ताकत हमेशा मुझ से ही मिलती थी यानी परेशानी की वजह मेरी खुद की सोच होती थी। रोशनी हरदम मेरे भीतर ही थी। हालाँकि यह कहना सही नहीं है कि किसी व्यक्ति ने या परिस्थिति ने मुझे नुकसान पहुँचाया था, लेकिन फिर भी अपनी रोशनी को और तेज़ करने की ज़िम्मेदारी लेने से एक अलग ही ताकत मिलती है। पहले उसे अंदर प्रकाशमान होना है और तभी वह कहीं और प्रकाशमान हो सकती है। हकीकत में मुझे यह बात इसी साल अपनी शादी के बाद समझ आई।
जब किसी का हाथ टूटता है, सिर पर चोट लगती है या कहीं कट जाता है और वह बार-बार उसका ज़िक्र करता है तो उसमें किसी को कुछ गलत नहीं लगता। लेकिन अगर आप यह कहें, “मुझे तनाव महसूस हो रहा है” या फिर, “मैं डिप्रेशन की शिकार हूँ” तो लोग ऐसी बातें सुनना नहीं चाहते हैं। वे कुछ देर तो आपकी बात सुन लेंगे लेकिन फिर बर्दाश्त नहीं कर पाते।
अपने आपको कुछ बहुत ही अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों से बाहर निकालने के बाद मुझे समझ आया कि मेरे पास ध्यान नामक एक साधन है जिसे मैंने कभी कोई खास महत्व नहीं दिया था। मैं हार्टफुलनेस ध्यान पद्धति में पली-बढ़ी थी और मुझे हमेशा से यह पता था कि यह मेरी ज़िंदगी का आधार रहेगा पर मैंने इसका वैसे इस्तेमाल नहीं किया जैसे मैं कर सकती थी।
जब मैं पूरी तरह से निराश हो गई तब मुझे समझ आया कि मुझे अपनी देखभाल करने के लिए खुद भी उसी का अभ्यास करना था जिसके बारे में अब तक मैं लोगों को कहती आ रही थी। औरों को सिखाने से पहले मुझे खुद ध्यान के अभ्यास को नियमित रूप से करने की ज़रूरत थी (मैं 2015 में प्रशिक्षक बनी थी)। इस तरह, ध्यान करने के साथ-साथ अपने मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल करना मेरे लिए बेहद ज़रूरी हो गया।
मुझसे बहुत लोगों ने कहा, “तुम अपने तनाव के बारे में बहुत ज़्यादा बोलती हो,” “तुम अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बहुत ज़्यादा बोलती हो।” ऐसी बातों का मुझ पर इतना ज़्यादा प्रभाव पड़ा कि मैंने इन विषयों पर बात करना बंद कर दिया। लेकिन अगर मैं उन चीज़ों के बारे में बात करना छोड़ दूँ जिनके बारे में बोलना ज़रूरी है तो एक पक्षसमर्थक कम हो जाएगा। मेरी बातें खराब लग सकती हैं और कभी-कभी मैं बहुत ज्यादा बोलती हूँ लेकिन यह एक ऐसा विषय है जिसके बारे में बोलना ज़रूरी है।

अपने अधिकांश जीवन में मैं तनाव से जूझती रही हूँ। आज मैं यह समझ सकती हूँ की मेरा वह तनाव सबको खुश करने वाली मेरी मानसिकता की उपज थी जो शायद बचपन में हुई कुछ घटनाओं के चलते विकसित हुई या फिर मेरे सहज स्वभाव के कारण थी।
मैं अपने सौभाग्य को समझती हूँ - मैं उस स्थिति में थी कि आगे चलकर डॉक्टर बन सकती थी और मुझे अपने माता-पिता से हमेशा पूर्ण सहयोग मिला है। लेकिन इस सौभाग्य के बावजूद मैंने सीखा है कि संघर्ष करके खुद चीज़ों को समझने में कोई बुराई नहीं है, खासकर अगर मेरे दिमाग में जो चल रहा है और जो होना चाहिए, उन दोनों के बीच कोई तालमेल नहीं बैठ रहा है।

प्रश्न - आप ऐसे इंसान को क्या सलाह देंगी जो अपने मानसिक स्वास्थ्य से, तनाव से, इस दुनिया में रहने से उत्पन्न समस्याओं से जूझ रहा है?
जब कभी मैं अपनी भावनाओं को व्यक्त करती हूँ और कोई मित्र या प्रियजन या कोई अन्य व्यक्ति यह कहता है, “कोई बात नहीं, हल निकल आएगा”, “सब ठीक हो जाएगा”, या “जो भी होता है उसके पीछे कोई कारण ज़रूर होता है”, तो मुझे बहुत गुस्सा आता है। हो सकता है कि वे सच कह रहे हों, लेकिन वह सच मेरे तनाव को, उस पल के अकेलेपन को, मेरी कुंठा को दूर नहीं करता। भले ही आपके तनाव और निराशा के अनुभव औरों से भिन्न हों, परंतु आपकी भावनाएँ उचित हैं। यह बहुत ही डरावना व एकाकी अनुभव है और बहुत कम लोग होते हैं जो यह सच में समझ पाते हैं कि आप पर क्या गुज़र रही है।
लेकिन एक इंसान हमेशा समझ पाएगा और वो खुद आप हैं! इस पिछले साल में जो सबसे अच्छा पाठ मैंने सीखा है, वह है खुद का सम्मान करना। आप स्वयं अपने मित्र हैं। जिस तरह आप औरों का सम्मान करते हैं उसी तरह खुद का सम्मान करें। ऐसा करने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि आप अपने प्रकाश की तरफ़ लौट जाते हैं जो हमेशा से आपके पास ही है; आपको बस खुद को याद दिलाने की ज़रूरत है।
सहायता का अर्थ सबके लिए अलग होता है। मैंने एक लंबे समय तक मानसिक उपचार लिया और उसका बहुत फ़ायदा भी हुआ। साथ ही डायरी लिखने, टहलने जाने, ध्यान करने से भी मुझे बहुत मदद मिली लेकिन हो सकता है कि सबको इनसे फ़ायदा न हो। तो खोजें कि आपको क्या करना पसंद है। मेहनत करने के लिए तैयार रहें। अपने आपसे कुछ वादे करने के लिए तैयार रहें और उन्हें निभाएँ भी क्योंकि वादा तोड़ने पर सिर्फ़ आपको ही नुकसान पहुँचेगा।
इस पिछले साल में जो सबसे अच्छा पाठ मैंने सीखा है, वह है खुद का सम्मान करना। आप स्वयं अपने मित्र हैं। जिस तरह आप
औरों का सम्मान करते हैं उसी तरह खुद का सम्मान करें। ऐसा करने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि आप अपने प्रकाश की
तरफ़ लौट जाते हैं जो हमेशा से आपके पास ही है; आपको बस खुद को याद दिलाने की ज़रूरत है।
कुछ दिन ऐसे भी होंगे जो बहुत मुश्किल होंगे; शायद बिस्तर से उठना भी मुश्किल लगे। यह भी जायज़ है। उन दिनों खुद से किया हुआ कम-से-कम एक छोटा वादा ज़रूर निभाएँ, चाहे वह खुद के लिए चाय बनाना हो, डायरी लिखना हो या फिर टहलने जाना हो। हर दिन खुद से किसी न किसी तरह से जुड़े रहने का तरीका ज़रूर ढूँढें।
यह सचमुच बहुत ही अच्छी सलाह है, धन्यवाद। इससे कई लोगों को यह समझने में मदद ज़रूर मिलेगी की उनके पास क्या विकल्प हैं और वो कौन सी छोटी-छोटी चीज़ें हैं जिनसे वे शुरुआत कर सकते हैं।
अगर यह बातचीत आप पूरा सुनना चाहते हैं तो; https://open.spotify.com/episode/772Ab2SsGdM2nWR2BFbZis?si=c7d8b4d0ec564050 पर जाएँ।
कलाकृति - लक्ष्मी गद्दाम

ममता सुब्रमण्यम
ममता मानसिक स्वास्थ्य एवं ध्यान को अपनी कहानियाँ सुनाने के शौक के साथ जोड़ती हैं और वे इंस्टाग्राम को एक ऐसे मंच की तरह इस्तेमाल करती हैं जिसमें सभी जुड़ सकें। वर्ष 2016 की उनकी टेड प... और पढ़ें
