भावना खेमलानी बैंकॉक स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में प्राध्यापक हैं। वे एक वेलनेस कोच और बैंकॉक महिला लेखक समूह के नेतृत्वकर्ताओं में से एक हैं। यहाँभावना अपने शहर में कचरा साफ़ करने के अपने प्रेरक अनुभव के बारे में लिख रही हैं।

म यहाँ शिविर (ग्लॅमपिंग) लगाकर रह रहे हैं ताकि हम उन वस्तुओं को उठा सकें जो दूसरे लोग छोड़कर चले जाते हैं। बहुत से लोग हमें कचरा इकट्ठा करने वाले कहते हैं। लेकिन हम अपने आप को ‘पर्यावरण के कवि’ कहते हैं।

एक ऐसी दुनिया में जहाँ कंक्रीट की इमारतें प्रकृति की ध्वनियों को दबा देती हैं, हम एक छुपे हुए उपवन में इकट्ठा होते हैं। हमारे शब्द बढ़ते उपभोक्तावाद के सामने एक ढाल हैं। हमारी कविताएँ वो बीज हैं जो उन लोगों के दिलों में रोपित किए जाते हैं जो सुनते हैं और हम आशा करते हैं कि इससे सचेत चुनाव करने की एक क्रांति पैदा होगी।

जैसे ही हम सरकार द्वारा सौंपी गई इस नई परियोजना पर काम करना शुरू करते हैं, बिखरे हुए कचरे पर पड़ते कदमों से चटकती प्लास्टिक की वस्तुएँ ऐसा शोर करती हैं मानो हमारे हस्तक्षेप का विरोध करती हैं। धातु के डिब्बों व काँच की बोतलों की खनखनाहट और साथ में कागज़ की सरसराहट व जैविक कचरे को कुचलने की आवाज़, सब मिलकर ऐसा सामूहिक कोलाहल पैदा करते हैं जो समुद्र तट पर गूँजने लगता है।

खनखनाहट

खनखनाहट

चरमराहट

चरमराहट

कौवों की काँव-काँव

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हम सात लोग हैं। यहाँ निश्चित रूप से बहुत शोर है। चटकती प्लास्टिक की वस्तुओं की आवाज़, तेज़ हवा की आवाज़ और हमारे लिए लोगों के चिल्लाने का शोर है। साथ ही यहाँ कारखाने से बची हुई चिंदियाँ हैं जो मज़दूरों की कड़ी मेहनत का प्रतीक हैं। हम अपने काम से कुछ समय के लिए विराम लेने का फ़ैसला करते हैं।

टेंट के डंडों को जोड़ने की खट-पट, पुनर्चक्रित किए गए तिरपाल को फैलाने की फड़फड़ाहट और हमारे समूह में होने वाले हँसी-मज़ाक का शोरगुल हवा में भर जाता है जिसमें दूर से आती मोटरबोट की आवाज़ भी घुलमिल जाती है। अलाव (bonfire) जलाने हेतु गिरी हुई शाखाओं को इकट्ठा करने के लिए हम कचरे की थैलियाँ लेकर टीमों में बँट
जाते हैं।

बाद में हम लोग जलते हुए अलाव के चारों ओर एकत्रित होते हैं और हमारे चेहरे उसकी गरमाहट से चमक उठते हैं।

प्राचीन वृक्षों के बीच बैठे हुए हम अपनी-अपनी कलम उठाकर लिखने लगते हैं। हमारी कलम हवा में नाचते हुए पत्तों की तरह प्रतीत होती है। अपनी पंक्तियाँ लिखते हुए हमारे विचार नदी की धारा की भाँति बहने लगते हैं। उनके भीतर भावनाएँ तूफ़ान की तरह उमड़ पड़ती हैं जिनमें पृथ्वी के नाज़ुक संतुलन के लिए चिंता है। हम प्लास्टिक से घुटते हुए महासागरों, लालच के वशीभूत काटे गए जंगलों और उपचार के लिए तरसती हुई पृथ्वी के बारे में लिखते हैं।

जैसे-जैसे हम लिखते हैं हमारे शब्द उपमाओं के साथ हास्यपूर्ण व्यंग गीत बन जाते हैं। प्रत्येक तुलना एक डोर की तरह मानवीय गतिविधियों को प्रकृति की लय से जोड़ती है। प्लास्टिक कचरा एक दम घोटने वाला साँप है जो पृथ्वी के गले में लिपटा हुआ है। वनों की कटाई ऐसा कृत्य है जिसने प्रकृति की संगीत रचना को खामोश कर दिया है; दिल को छू लेने वाली धुन खो गई है। ऐसे में हम संग्रहकर्ता, समुद्र तट और उपवन में जाने के लिए एक नई परियोजना को स्वीकार करते हैं।

हम गाते हैं

हम खाना बनाते हैं

हम लिखते हैं

हमारे हरे जूते

चरमराते हैं

थप-थप करते हैं

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लेकिन उदास स्वरों के बीच आशा की एक किरण उभरती है। हमारी कविता उन स्थायी संसाधनों की सराहना भी करती है जिन्हें अभी भी पोषित किया जा सकता है। इसमें उभरती हुई आशा की आवाज़ है। हमारे सामूहिक विचारों की आवाज़ है। हमारे जैसे लोगों की आवाज़ है जो दूसरे लोगों के द्वारा फेंकी गई चीज़ों को उठाने के लिए इकट्ठा होते हैं। यह आवाज़ सौर पैनलों की बात करती है जिनका रुख सूरजमुखी फूलों की तरह सूर्य की रोशनी की ओर होता है। हम पवन चक्कियों की बात भी करते हैं जो आधुनिक समय की पवन झंकार (विंड चाइम) की तरह अपनी ध्वनि प्रसारित करती हैं।

और फिर जैसे ही सूरज क्षितिज के नीचे डूबने लगता है एक सुगंध इस उपवन में फैल जाती है। थाई तुलसी और लेमनग्रास की खुशबू हवा में घुलमिल जाती है। यह इस बात का सुगंधित अनुस्मारक है कि सोच-समझकर उपभोग करने से पोषण मिलता है। स्थानीय सामग्री से तैयार एक दावत हमारा इंतज़ार कर रही है।

हम लकड़ी की एक मेज़ के चारों ओर इकट्ठा होते हैं जो व्यंजनों से सजी हुई है। ये व्यंजन हमारी कविताओं की तरह ऊर्जावान प्रतीत होते हैं। पाड थाई (एक व्यंजन) रंगों और स्वाद का एक पुंज है जो विविधता और एकता की बात करता है। टॉम खा काई नारियल और जड़ी-बूटियों से बना एक आनंददायक सूप है जो संतुलन की याद दिलाता है। प्रत्येक निवाला एक प्रतिज्ञा है, पृथ्वी की भलाई के प्रति निष्ठा की घोषणा है।

हम सात पर्यावरण के कवि देश भर में यात्रा करते हैं ताकि अव्यवस्था, उसे दूर करने और अपशिष्ट के बीच के अंतर को जान सकें। जमाखोरी करना आज के दौर की एक बीमारी है और पुनर्चक्रण, पुनर्नियोजन और पुनर्स्थापना हर दौर का इलाज है। जमाखोरी का कपटपूर्ण प्रभाव किसी छिपकर बैठे बड़े से अजगर की तरह धीरे-धीरे होता है। जिस प्रकार अजगर धीरे-धीरे रेंगता हुआ आकर अपने शिकार को पूरा निगल जाता है और उसके बाद भी अपनी अतृप्त भूख को संतुष्ट करने के लिए अगले शिकार को खोजता है, उसी प्रकार मनुष्य भी विशाल संपत्ति एकत्र करने के बाद भी संतुष्ट नहीं होते और अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ती के लिए और अधिक पाने की लालसा रखते हैं।

फुंकारना
निगलना
फुंकारना
निगलना

जब हम भोजन करते हैं तब हमारे हृदय की धड़कन भी प्रकृति की धड़कन से लयबद्ध हो जाती है। हम जानते हैं कि हमारी लड़ाई केवल शब्दों की नहीं है बल्कि निरंतर बढ़ते उपभोक्तावाद के विरुद्ध एक मानसिक युद्ध है। हम कविता एवं अन्य साधनों द्वारा लोगों में जागरूकता पैदा करते हैं। हम अच्छी भावनाओं के साथ एवं लोगों का भरण-पोषण करके उपभोक्तावाद के विरुद्ध अपनी लड़ाई लड़ते हैं और इन सब के साथ अपनी प्रिय पृथ्वी की रक्षा के लिए ढाल बनाते हैं।

भरे पेट व प्रेरित दिलों के साथ अगले दिन हम पुनः लिखने के लिए अपनी कलमों को उठाते हैं और कविता तथा उद्देश्य के अपने शस्त्रागार के साथ दुनिया का सामना करने के लिए मुस्तैद हो जाते हैं। हमारी कविताओं से, जो आशा और दृढ़ संकल्प से भरे समूहगान हैं, सारा उपवन गूँज उठता है। और जैसे-जैसे हम लिखते जाते हैं, हम जानते हैं कि हमारे शब्द उन लोगों के मनस में बीज की तरह जड़ें जमा लेंगे जो सुनते हैं और एक ऐसे आंदोलन को प्रेरित करेंगे जो हर किसी के सोचने की दिशा को बदल देगा।

लाल चींटियाँ और चूहे अपने सामूहिक काम में बहुत अच्छे होते हैं। उनके पास लंबे समय तक चलने वाला राशन होता है, इसलिए वे बहुत शोर मचाते हैं।

चीटियाँ समन्वित उन्माद के साथ बहुत तेज़ी से चलती हैं और उनके छोटे-छोटे पैर लकड़ी पर एक असंबद्ध लय में खटखटाते हुए चलते हैं। उनकी प्रत्येक गतिविधि के साथ पत्तों के हिलने की नरम सरसराहट और उनके जबड़े की बहुत धीमी ध्वनि उत्पन्न होती है। एक साथ काम करते हुए उनकी यह लगातार होती सूक्ष्म चहक और टिक-टिक की ध्वनि पूरे उपवन में गुंजायमान हो जाती है।

टिक टिक टिक
टिक टिक टिक

चूहे भी अपने प्रयासों में उतने ही उद्यमशील होते हैं। वे भी इस शोरगुल में अपना योगदान देते हैं। उनके कुतरने और खरोंचने की आवाज़ से उनके दृढ़ संकल्प का पता चलता है।

चंप चंप चंप - खटर खटर खटर
चंप चंप चंप - खटर खटर खटर

बड़ी-बड़ी कंक्रीट इमारतों से भरे शहर में एक छोटा सा हरा-भरा मरुउद्यान है जहाँ हर तरफ़ सरसराते पत्ते हैं। यह एक बगीचा, एक अभयारण्य है जहाँ प्रकृति रंग-बिरंगी छटाओं में धड़कती है। चमेली की कोमल डंठल आसमान की ओर ऐसे बढ़ती हैं जैसे बैले-नर्तक पैर की उँगलियों के बल पर घूमते हुए जम गए हों और उनकी सुगंधित साँसें शहर की लय के साथ घुलमिल रही हों। क्या हमने वास्तव में रुककर यह समझने की कोशिश की है कि उपभोक्तावाद और प्रौद्योगिकी ने कैसे शहरों को चूस लिया है यानी वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण को नष्ट कर दिया है?

चमेली के पौधों के पीछे हम हाथ में फावड़े लिए काम करने लगते हैं। धातु और धरती के मिलन की तालबद्ध खट-पट हवा में भर जाती है। हर बार फावड़े से खोदने पर मलबा नीचे गिरता है और उसके गिरने की आवाज़ के साथ मिट्टी के ज़मीन पर गिरने की धीमी आवाज़ भी होती है। फावड़े की धातु के फलक दृढ़ निश्चय के साथ मिट्टी में घुस जाते हैं और उनके पैने किनारे उपेक्षा और क्षरण की परतों को चीरते हुए आगे बढ़ते हैं। फिर हम बेलचों से मलबे और मिट्टी को उठाकर वहाँ रखे एकपहिया ठेले में डाल देते हैं। हमारे रबर के दस्तानों की नरम आवाज़ मलबा डालने की कर्कश आवाज़ में एक विपरीत स्वर जोड़ देती है। हम सुरक्षा हेतु हाथों में दस्ताने पहनकर गंदगी और कचरे को हटाने का अथक प्रयास करते हैं।

खड़ खड़ खड़
धड़ धड़ धड़
सर सर सर

आजकल कथावाचन अलग तरह से होता है। हम ज़्यादा से ज़्यादा बेचने के लिए कहानियाँ सुनाते हैं। पेड़ों की हरी छतरी के नीचे एक कवयित्री अकेली बैठी है। उसके हृदय रूपी कैनवास पर विभिन्न भावनाएँ उभर रही हैं, जो उसके आस-पास के फूलों की तरह ही जीवंत हैं। उसकी कलम से कविताएँ ऐसे निकल रही हैं जैसे गर्मियों की बारिश के बाद जंगली फूल खिलते हैं। ये कविताएँ इस परिवर्तनशील दुनिया के सार को प्रस्तुत करती हैं। वह एक सहानुभूतिपूर्ण महिला है जो आज की दुनिया के लिए एक आश्चर्य है।

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उसकी काव्यात्मक कल्पना के बीच हवा में एक लुभावनी सुगंध फैल रही है। थाई तुलसी की खुशबू फिर से उसकी इंद्रियों को गुदगुदा रही है मानो हवा ने कानों में कोई रहस्यमयी बात कह दी हो। थाई तुलसी के स्वाद वाले व्यंजन पाड थाई और टॉम खा काई उसके मनस में घूमने लगते हैं और उन्हें खाने की प्रत्याशा उसकी भूख जगा देती है। इन व्यंजनों के स्वाद उसके मन में नाटक के पात्रों की तरह नाचने लगते हैं और उन व्यंजनों को बनाने वाले शेफ़ की छवि उसके सामने उभर आती है। वह व्यंजनों से जुड़े शेफ़ और किसान को दुनिया का दूसरा आश्चर्य मानती है।

तभी कर्कश आवाज़ करते पहियों वाली एक मध्यम आकार की खाद्य-गाड़ी मरीचिका की तरह अचानक प्रकट होती है और वहाँ की हरी पृष्ठभूमि पर बहुत सारे रंग दिखने लगते हैं। शेफ़, जो एक पाक कलाकार है, जादूगर की छड़ी की तरह अपनी कड़ाही का उपयोग करता है। वह लोगों को ऐसा स्वादिष्ट भोजन खाने का अनुभव कराता है जो केवल पेट भरने के लिए भोजन करने से कहीं बढ़कर है। लपटें उठती हैं, कड़ाही छनछनाती है और कई तरह के व्यंजनों की सुगंध आपस में घुलमिल जाती हैं जिनसे स्वादों का ऐसा चरमोत्कर्ष बनता है जो कवयित्री की कविताओं के साथ मेल खाता है। जब हम बाकी के पाँच लोग देख रहे हैं - वह सहानुभूतिपूर्ण कवयित्री कड़ाही में बनते व्यंजनों को देखकर करुणा के साथ विस्मित हो रही है।

जैसे ही पहला निवाला उसके होंठों को छूता है, बगीचे का सार-तत्व उस निवाले में कैद हो जाता है। ‘पाड थाई’ के उलझे हुए नूडल्स आपस में उलझी लताओं के समान लगते हैं। प्रत्येक सामग्री वाद्य-वृंद के एक स्वर की तरह है। जिस प्रकार सभी स्वर मिलकर वाद्य-वृंद रचना बनाते हैं उसी प्रकार सभी सामग्रियाँ मिलकर व्यंजन को स्वादिष्ट बनाती हैं। ‘टॉम खा काई’ में डाले गए नारियल और लेमनग्रास का स्वाद किसी नाज़ुक बैले नृत्य की तरह उसकी जीभ पर घूमने लगता है और बगीचे में मौजूद फुसफुसाहट को जगा देता है यानी उसे व्यंजन में उपयोग की गई बगीचे की ताज़ी सामग्री की याद दिलाता है। यह उसके हृदय में कृतज्ञता का भाव जगाता है जो दुनिया का अगला आश्चर्य है।

हम में से हर कोई अपनी-अपनी भावनाओं को प्रकट करता है। जैसे-जैसे सूर्यास्त होने लगता है, अलाव जलाने का समय हो जाता है। अतः सावधानीपूर्वक अलाव को जलाया जाता है। हमारा मानना है कि यदि हम अपने जुनून को सावधानीपूर्वक पोषित करें तो हम बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं और इससे हम एक समय पर एक कदम उठाते हैं।

जैसे ही हम बचे हुए कचरे को साफ़ करते हैं, हम गीले कचरे से अपने स्वाद तंतुओं को खराब नहीं होने देते। हम केले के सरसराते पत्तों के साथ बहुत तालमेल बिठाए हुए हैं।

हम अलाव के चारों ओर केले के पत्ते रखना शुरू करते हैं। हमें कुछ भूसा पड़ा मिलता है और हम उसे भी रख देते हैं। फिर हम उसके चारों ओर अपने तौलिये बिछा देते हैं। यह हम सभी के बैठने के लिए पर्याप्त और बहुत आरामदायक जगह बन जाती है।

मुझे एहसास होता है कि हम सभी का यहाँ होना प्रकृति की दृढ़ता की याद दिलाता है। प्रेम की स्वाभाविकता दुनिया में संबद्धता के सौंदर्य के रंग भर देती है। अभी कई अन्य बातों के लिए आवाज़ उठाना बाकी है।

अब तक हमारे पास कचरे से भरी बहुत सारी बोरियाँ इकट्ठी हो चुकी हैं। बोरियों के ज़रा सा भी हिलने पर इनमें रखी प्लास्टिक की वस्तुएँ एक-दूसरे से रगड़ती हैं जिससे कर्कश ध्वनि पैदा होती है। कागज़ एवं कार्डबोर्ड की सरसराहट इस सामूहिक आवाज़ में एक मद्धम स्वर जोड़ देती है और बीच-बीच में काँच की खनक भी सुनने को मिल जाती है। ये सारी ध्वनियाँ मिलकर एक अलग ही धुन बनाती हैं - कचरे की धुन।

चटचटाहट, सरसराहट, थपथपाहट चटचटाहट, सरसराहट, थपथपाहट खनखनाहट - खनखनाहट- खनखनाहट


हम सहानुभूति रखने वाले सात लोग – शेफ़, करुणा, कृतज्ञता, जुनून, देखभाल और प्रेम की भावनाओं के बीज बोते हैं और उन वस्तुओं को उठाते हैं जिन्हें दूसरे लोग कचरे के रूप में इधर-उधर फेंक देते हैं।


हम कचरा इकट्ठा करने वाले लोग गाना और लिखना जानते हैं।

हमारी शानदार शिविर यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है।


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भावना खेमलानी

भावना खेमलानी

भावना बैंकॉक स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफ़ेसर, लेखिका और संपादकऔर पढ़ें

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