धार्मिक नेताओं की विश्व परिषद के महासचिव बावा जैन उस महानतम सौभाग्य पर और अपने मौलिक सिद्धांत पर अपना नज़रिया बताते हैं जो जीवन में उन्हें मार्गदर्शित करता है।

गर कोई मुझसे पूछे, “जीवन में महानतम सौभाग्य क्या है?” मैं केवल एक ही बात कह सकता हूँ और यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमारा महानतम सौभाग्य है, जीवन में गुरु का होना।

यह महत्वपूर्ण क्यों है? क्योंकि जीवन में अक्सर हम खुद को एक चौराहे पर पाते हैं। हमारे जीवन में जितनी बार ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं उतनी बार यह तय करके कि हम किस रास्ते पर चलें, हम अपने चरित्र का निर्माण करते हैं। तय करते समय हमारे अंदर विफल होने का कोई भय नहीं होना चाहिए क्योंकि विफलताओं के माध्यम से ही हमारा मूल चरित्र निर्मित होता है। लेकिन जब हमारे साथ गुरु होते हैं तब वे हमारी बेहतरी के लिए हमें सही दिशा दिखाते हैं। अगर मैं अपनी बात करूँ तो मेरे जीवन में मेरे गुरु की उपस्थिति ने मुझे जीवन का उद्देश्य दिया और साथ ही इस बात की समझ भी दी कि मुझे अपने जीवन में क्या करना चाहिए।

हार्टफुलनेस के अभ्यासी वास्तव में धन्य हैं कि उन्हें जीवन में दाजी जैसे गुरु मिले हैं। मैं दाजी को जाने बिना कान्हा शांतिवनम् पहुँचा। यहाँ दाजी के साथ उनके घर पर कुछ लोगों सहित दोपहर का भोजन करने का निमंत्रण देकर मुझे सम्मानित किया गया। दाजी ने हमारे साथ दो-तीन घंटे बिताए और उस दौरान मुझे एक पल भी ऐसा नहीं लगा कि वह हमारी पहली मुलाकात थी। उनमें यह विलक्षण योग्यता है कि वे केवल अपनी उपस्थिति से ही हमें शांति और आराम महसूस कराते हैं।

मैं आपको तीन शब्दों का एक मूलभूत सिद्धांत बताना चाहता हूँ जो मुझे अपने गुरु की प्रेरणा से प्राप्त हुआ और जिसका मैं अपने जीवन में पालन करने का प्रयास करता हूँ।

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पहले शब्द को समझाने का मौका मुझे तब मिला जब इस महोत्सव के दौरान मुझे चिन्ना जीयर स्वामी से मिलने का अवसर मिला। उन्होंने मुझसे वही प्रश्न पूछा जो मैं अक्सर हर किसी से पूछता हूँ, “आपके जीवन का उद्देश्य क्या है?” मेरा उत्तर था ‘सेवा’ - मैं सेवा करना चाहता हूँ और लोगों के लिए हमेशा उपयोगी बनना चाहता हूँ। यही मेरे गुरुदेव की सीख है। उन्होंने मुझे एक और महत्वपूर्ण बात याद दिलाई - उपयोगी बनो लेकिन किसी को भी अपने से बुरा बर्ताव मत करने दो। तो ‘सेवा’ पहला शब्द है।

दूसरा शब्द है ‘साझा करना’। जहाँ भी आप साझा कर सकते हैं, ज़रूर करें। जीवन का सबसे बड़ा आनंद साझा करने यानी बाँटने में है, प्राप्त करने में नहीं।

तीसरा शब्द है – ‘त्याग’ जो हिंदू परंपरा और वसुधैव कुटुंबकम की भावना में मूलभूत है। सच तो यह है कि जीवन में हमें बहुत सारे समझौते करने पड़ते हैं। क्यों? अपनी भलाई के लिए और अपने सबसे बड़े दुश्मन, अहंकार, से अलग होने के लिए।

हमारे जीवन में सबसे बड़ी चुनौती है, अपने अहंकार पर काबू पाना। यह आंतरिक दानव अक्सर हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है और हमें गलत रास्ते पर ले जाता है। अगर मैं सबसे नज़दीकी उदाहरण दूँ तो मैं यह कहूँगा कि दाजी विनम्रता की प्रतिमूर्ति हैं। यदि आप गौर करें तो पाएँगे कि वे लंबी बात करने के बजाय अपनी आँखें बंद करके मौन रहना पसंद करते हैं। मैंने देखा है कि मंच पर भी जब कोई कार्यक्रम चल रहा होता है तब वे ध्यानमग्न होते हैं। उन्हें बोलना ज़रूरी नहीं लगता। जितनी अधिक हममें खुद को प्रदर्शित करने की इच्छा होगी उतनी अधिक हमें अपने जीवन में बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। आपको इस अहंकार को छोड़ना होगा। खासकर जो लोग यहाँ कान्हा में आए हैं, यहाँ पढ़ रहे हैं, यहाँ पले-बढ़े हैं – उनको ध्यान से प्राप्त होने वाली शक्ति और ऊर्जा का आशीर्वाद मिला है। सेवा करें, साझा करें, त्याग करें लेकिन अपने अहंकार को पीछे छोड़ दें। जहाँ भी जाएँ इस अहंकार को अपने साथ मत ले जाएँ। ऐसा न हो कि यह आपकी आगे की यात्रा पर बोझ बन जाए।


जहाँ भी आप साझा कर सकते हैंज़रूर करें।


अपनी जीवन-यात्रा में मुझे कई गणमान्य व्यक्तियों और राष्ट्राध्यक्षों से मिलने का सौभाग्य मिला है। एक बार मैं राष्ट्रपति मंडेला से मिलने और उन्हें अहिंसा के लिए गाँधी-किंग पुरस्कार देने के लिए दक्षिण अफ़्रीका गया था। उस समय वे सारी दुनिया के ज़मीर की तरह बन गए थे। उस दिन, जब मैं राष्ट्रपति मंडेला से मिलने की तैयारी कर रहा था, मेरे मन में कई विचार आ रहे थे। मैं उनसे क्या कहूँगा? यह एक विलक्षण अवसर था - दुनिया के एक महानतम नेता के साथ आमना-सामना होना जो एक आतंकवादी व सेनापति से परिवर्तित होकर अहिंसावादी बन गए थे और जिन्होंने दक्षिण अफ़्रीका को रंगभेद नीति से मुक्ति तथा स्वतंत्रता दिलाने के लिए शांतिपूर्ण विरोध किया था। अचानक वे बाहर आए। आलंकारिक रूप से कहूँ तो वे शारीरिक रूप से भी बड़े थे। उन्होंने मुझे गले लगा लिया और मुझसे पूछा, “आप कैसे हैं?” मैं स्तब्ध रह गया। एक-दो पल के लिए मैं निःशब्द था। उन्होंने मुझे पूरी तरह अपने वशीभूत कर लिया था।

मैं आपको यह क्यों बता रहा हूँ? क्योंकि एक नेता के सबसे महान गुणों में से एक है - हमें सहज महसूस कराने की उनकी आंतरिक क्षमता। एक बार फिर मैं दाजी के पूर्वोक्त उदाहरण का उल्लेख करना चाहूँगा। हालाँकि मैं उनसे पहली बार मिल रहा था लेकिन उन्होंने मुझे ऐसा महसूस कराया जैसे मैं उन्हें हमेशा से जानता था। यह अद्वितीय क्षमता है। एक महान नेता अनुयायी नहीं बनाता, वास्तव में वह नेता बनाता है। आप में से हर एक नेता है क्योंकि दाजी ने आपके दिलों में नेतृत्व के बीज बोए हैं। आप अपने जीवन में इस उद्देश्य से इतने संपन्न हो जाएँगे कि आप देखेंगे कि आपके सामने आने वाली हर बीमारी या बाधा गायब हो जाएगी, वह आपके सामने नहीं टिकेगी। और जब आप इस दुनिया को छोड़कर जाएँगे तब आपको इन गुणों के लिए याद किया जाएगा।

अगर आज आपके जीवन का आखिरी दिन हो तो आप खुद को किस रूप में याद किया जाना चाहेंगे? जिन प्रवृत्तियों को परिवर्तित करने की ज़रूरत है उन्हें बदलें और इस बात पर केंद्रित रहें कि आप अपने पीछे क्या छोड़कर जा रहे हैं क्योंकि जो कुछ भी आपने भौतिक रूप से इकट्ठा किया है वह यहीं छूट जाएगा। जो बचेगा वह यही होगा कि आपने क्या अच्छा किया है, आपने क्या सेवा की है, आपने दूसरों के साथ क्या साझा किया है और आपने क्या त्याग किया है।

इसलिए जब आप दुनिया में काम करने निकलते हैं तब हार्टफुलनेस के सच्चे दूत बनें। ऐसा बनें कि लोग कह सकें, “हाँ, वे यहाँ थे, उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसे हम हमेशा याद रखेंगे।”

(वैश्विक आध्यात्मिक महोत्सव, मार्च 2024 में दिए गए व्याख्यान के अंश)

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अगर आज आपके जीवन का आखिरी दिन हो तो आप खुद को किस रूप में याद किया जाना चाहेंगेजिन प्रवृत्तियों को परिवर्तित करने की ज़रूरत है उन्हें बदलें और इस बात पर केंद्रित रहें कि आप अपने पीछे क्या छोड़कर जा रहे हैं क्योंकि जो कुछ भी आपने भौतिक रूप से इकट्ठा किया है वह यहीं छूट जाएगा। जो बचेगा वह यही होगा कि आपने क्या अच्छा किया हैआपने क्या सेवा की हैआपने दूसरों के साथ क्या साझा किया है और आपने क्या त्याग किया है।


 


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बावा जैन

बावा जैन अंतरधार्मिक संवाद के समर्थक हैं तथा विश्व धार्मिक नेताओं की परिषद के संस्थापक और महासचिव हैं। ... और पढ़ें

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