दाजी यहाँ ध्यान के समय मिलने वाली चेतना की अवस्थाओं को अपने दैनिक जीवन का अंग बनाने का एक सरल तरीका समझा रहे हैं। इससे आंतरिक स्मरण की एक अवस्था उत्पन्न होती है जो आगे चलकर सतत स्मरण बन जाती है।

हृदय-आधारित-ध्यान का अभ्यास शुरू करने के बाद जल्द ही हम इसके दैनिक अभ्यास से अपने जीवन में होने वाले फ़ायदों की कदर करने लगते हैं। हम सुबह के ध्यान के हर सत्र के बाद मिलने वाली स्थिरता व शांति का आनंद लेने लगते हैं।

धीरे-धीरे यह दशा सारा दिन बनी रहने लगती है। हम इस आंतरिक दशा को बार-बार स्मरण करने लगते हैं और अंदर मौजूद इस स्थिरता के साथ हम भावनाओं से कम से कम विचलित हुए अपने सांसारिक जीवन की ज़िम्मेदारियों का निर्वाह प्रभावी ढंग से करने लगते हैं। दूसरे शब्दों में हम ध्यानमयी रहते हुए सक्रिय रहने लगते हैं अर्थात आंतरिक रूप से हमारी अवस्था ध्यानमयी बनी रहती है जबकि बाह्य रूप से हम सक्रिय रहते हैं। यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है क्योंकि सक्रिय ध्यान से हम ध्यानमयी होकर कार्य करते रहते हैं।

लेकिन अक्सर यह अवस्था अधिक देर तक टिक नहीं पाती क्योंकि अपनी दैनिक गतिविधियों के बीच ध्यानमयी अवस्था को बनाए रखना कठिन होता है। जैसे-जैसे दिन चढ़ता है हमारी अवस्था मंद पड़ने लगती है। हम अपनी आंतरिक स्मरण की अवस्था को खोने लगते हैं और उसे फिर से प्राप्त करना कठिन लगता है। लेकिन क्या ऐसा संभव है कि हम इस ध्यानमयी अवस्था को सारा दिन बनाए रख पाएँ?

ऐसी स्थिति में पहुँचने के लिए जिसमें यह अवस्था स्थायी रूप से बनी रहे, हमें एक विधि की आवश्यकता होती है जिसे हम AEIOU द्वारा समझाते हैं। यह ध्यानमयी अवस्था को अपने अंदर गहनता से आत्मसात करने का एक तरीका है। इसका प्रयोग ध्यान के बाद कुछ मिनिटों के लिए किया जाता है। इसे दिन में किसी भी समय कुछ मिनटों के लिए किया जा सकता है, जैसे जब हम अपने कार्य में कोई बदलाव करें, ताकि वह ध्यानमयी अवस्था हमारी चेतना में बनी रहे।

AEIOU का अभ्यास कैसे करें?

अंग्रेज़ी के अक्षर ‘A’ यानी Acquire से तात्पर्य है ‘दशा को प्राप्त करना। इसके लिए हम ध्यान के ठीक बाद अपनी दशा का बारीकी से अध्ययन करते हैं। उदाहरणार्थ, हम अपनी श्वास प्रक्रिया, अपने विचारों और अनुभूतियों की गुणवत्ता और उनकी तीव्रता, ध्यान के दौरान अपने किसी चक्र पर अनुभव की गई सक्रियता या गति और प्राप्त की गई कोई प्रेरणा पर गौर कर सकते हैं। हम इनकी तुलना ध्यान के पहले की स्थिति से कर सकते हैं जिससे जो हमने प्राप्त किया है उसके महत्व को समझ सकते हैं। 

यह हमें अगले अक्षर ‘E’ यानी Enliven पर ले जाता है जिसका अर्थ है ‘दशा को जीवंत बनाना। ऐसा हम प्राप्त दशा का आनंद लेकर कर सकते हैं। यह एक विशेष उपहार है जो हमें दिया जाता है और इसके लिए हमारी कृतज्ञता इस दशा के आनंद को और बढ़ा देती है।

इसके बाद हम ‘I’ यानी Imbibe पर पहुँचते हैं जो दशा को आत्मसात करना है। इसके लिए हम स्वयं को एक सुझाव देते हैं और महसूस करते हैं कि यह दशा हमारे स्थूल शरीर की हर कोशिका में और हमारे सूक्ष्म शरीर के हर भाग में रिस रही है। इस तरह हम उस दशा को आत्मसात करने की प्रक्रिया का आरंभ करते हैं। 

इसके बाद का चरण है ‘O’ यानी becoming One अर्थात दशा के साथ एकाकार हो जाना। इसके लिए हम यह सुझाव लेते हैं कि हमारे चारों ओर मौजूद सब कुछ जैसे हवा के कण, पक्षी, पेड़-पौधे आदि इसी दशा से भर रहे हैं।

इसके बाद हम ‘U’ यानी Union पर आते हैं। इसका अर्थ दशा में विलय होना है। इसे प्राप्त करने के लिए हम एक सुझाव लेते हैं कि हम इस दशा में घुल रहे हैं और अब सिर्फ़ यह दशा ही बाकी रह गई है।


(हम ध्यानमयी रहते हुए सक्रिय रहने लगते हैं जिसमें आंतरिक रूप से हमारी अवस्था ध्यानमयी बनी रहती है जबकि बाह्य रूप से हम सक्रिय रहते हैं।)


अगर हम ध्यान के बाद कुछ मिनटों के लिए इस अभ्यास को करें, आँखें बंद करके, तो हमारी चेतना में वह दशा गहराई तक समा जाएगी। ऐसा करने से दिन के समय इस दशा को बार-बार लौटा लाने व पुन: अनुभव करने की हमारी योग्यता बढ़ जाती है। जिस तरह हम किसी अच्छे चुटकुले को याद करके हँसते हैं, उसी तरह हम उस ध्यानमयी दशा को स्मरण करके उसका पुनः आनंद उठा सकते हैं। इस तरह हम अपनी दशा पर अधिकार पाने लगते हैं और उसपर पूर्ण नियंत्रण पा लेते हैं।

remembrance-made-simple2.webp

दिन में थोड़ी-थोड़ी देर के बाद कुछ मिनटों के लिए विराम लें और AEIOU का अभ्यास भी करें। इससे धीरे-धीरे स्मरण बार-बार होने लगेगा और अंतत: सतत स्मरण बन जाएगा। 

तंत्रिका वैज्ञानिक सहमत हैं -

वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार भी AEIOU फ़ायदेमंद है। तंत्रिका-वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि दीर्घकालिक स्मृति (स्मृतितंत्र का वह भाग जो आपके अनुभवों को संचित करता है) में संचित जानकारी को कार्यशील स्मृति में लाने की हमारी योग्यता इस बात पर निर्भर करती है कि हम जानकारी को या घटना को उसके होने के तुरंत बाद कितने प्रभावी ढंग से दीर्घकालिक स्मृति पटल पर अंकित करते हैं। जब हम अपने अनुभव के एहसास से वाकई जुड़ पाते हैं तब स्मृति पटल पर अंकित करने की गुणवत्ता बढ़ जाती है। ध्यान के तुरंत बाद अनुभव को आंतरीकृत व आत्मसात करके हम यही करते हैं।

अपनी नई ध्यानमयी अवस्था को अपने अस्तित्व की गहराई में अच्छी तरह से अंकित करने के लिए ही हम ध्यान के बाद डायरी लिखने के लिए आग्रह भी करते हैं।

आत्मसात करने की प्रक्रिया 

AEIOU किसी भी अवस्था को अपने अस्तित्व के विभिन्न स्तरों से होते हुए भीतर की गहराई में आत्मसात करने का तरीका है। इसका प्रारंभ सतह पर मानसिक स्तर पर सोचने से होता है। इसे समझने के लिए हम मनस की क्षमताओं जैसे चिंतन, बुद्धि और पहचान करने का उपयोग करते हैं। इसके बाद यह हृदय की गहराई में, अनुभूति के स्तर पर आती है। जैसे-जैसे हम और अधिक गहराई में जाने लगते हैं, हम वह अवस्था ही बन जाते हैं। हम भावना और अनुभव से आगे बढ़कर वही बन जाते हैं। अगला चरण है वह अवस्था ‘होना। यहाँ एकत्व या ‘ऑस्मोसिसविकसित होने लगता है। अंतत: उस अवस्था के होने या न होने का बोध भी चला जाता है क्योंकि अब हम उसमें इस कदर डूब जाते हैं कि उसे अवस्था के रूप में पहचाना नहीं जा सकता। हम अनस्तित्व की ओर बढ़ चुके होते हैं। ये सब हृदय के स्तर हैं - सोचना, महसूस करना, बनना, वही होना और अंतत: अनस्तित्व की अवस्था प्राप्त करना।

remembrance-made-simple3.webp


(हम अनस्तित्व की ओर बढ़ चुके होते हैं। ये सब हृदय के स्तर हैं - सोचना, महसूस करना, बनना, वही होना और अंतत: अनस्तित्व की अवस्था प्राप्त करना।)


व्यावहारिक स्तर पर देखें तो अपनी आंतरिक अवस्था में गहराई से डूब जाने का हमारे आत्म संवाद पर गहन प्रभाव पड़ता है। हमारा स्वयं से आंतरिक संवाद और खासकर नकारात्मक आंतरिक संवाद, जिसके हममें से अधिकांश लोग आदी होते हैं - जैसे आत्म-आलोचना, आत्म-दोष, आत्म-निर्धारण, चिंता करना आदि - दूर हो जाता है और उसका स्थान एक शांत आत्म-संवाद और आंतरिक आनंद ले लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप हृदय में रिक्तता पैदा हो जाती है जो दिव्य कृपा को आकर्षित करती है जिससे यह आंतरिक आनंद कई गुना बढ़ जाता है। इस तरह एक सुचक्र स्थापित हो जाता है।

दूसरों पर प्रभाव 

हमारे आंतरिक ऐक्य के प्रभाव से हमारे आस-पास रहने वालों को भी शांति मिलती है। हमारा बातचीत का ढंग शांत और प्रेमपूर्ण हो जाता है क्योंकि हम लोगों से जुड़ना चाहते हैं। दूसरों को आहत करने का मनोभाव नहीं रहता और अहिंसा हमारे अस्तित्व का हिस्सा बन जाता है। भावनाओं का भार कम हो जाने से हमारे बातचीत के लहज़े में बदलाव आ जाता है। हमारा आंतरिक ऐक्य हमारे बाहरी संवाद में झलकने लगता है। लोग स्वयमेव ही हमारी ओर खिंचते हैं और हमारे विचारों व सुझावों के प्रति अधिक ग्रहणशील हो जाते हैं।

remembrance-made-simple4.webp

धीरे-धीरे आंतरिक शांति प्रकट होने लगती है। दूसरों को सुनने की हमारी क्षमता बढ़ने लगती है। फिर चाहे कोई आक्रामक हो या हमें आहत करने की कोशिश करे, हम अप्रभावित बने रहते हैं। लोग हमारे साथ सुरक्षित महसूस करने लगते हैं। भले ही हम ज़्यादा कुछ न कहें, फिर भी हमसे बातचीत करने में वे स्पष्टता, जुड़ाव और राहत का अनुभव करने लगते हैं। हमारा परस्पर संवाद समन्वय में विकसित हो जाता है। हमारा आंतरिक आनंद भी चारों ओर प्रसारित होने लगता है।


(हमारा परस्पर संवाद समन्वय में विकसित हो जाता है। हमारा आंतरिक आनंद भी चारों ओर प्रसारित होने लगता है।)


इस संबंध में भगवान बुद्ध की एक सुंदर कथा है। एक बार एक भयानक चोर बुद्ध को हानि पहुँचाने के इरादे से उनसे मिला। लेकिन बुद्ध के आनंदमय शांत स्वरूप को देखकर उसका हिंसात्मक व्यवहार बदल गया। आगे चलकर वह चोर बुद्ध का सबसे समर्पित शिष्य बना। आंतरिक स्थिरता में ऐसी शक्ति होती है - यह ब्रह्मांड में एक प्रतिध्वनि उत्पन्न करती है। आज के संसार को इस तरह की गहन और रूपांतरकारी स्थिरता की अत्यधिक आवश्यकता है।

ध्यान में महारत

AEIOU के प्रयोग से हमारे ध्यान में गहनता और संपन्नता आ जाती है। हम अपना ध्यान इस विचार के साथ शुरू करते हैं, “दिव्य प्रकाश का स्रोत हमारे हृदय में पहले से ही विद्यमान है और हमें भीतर से आकर्षित कर रहा है। जब हम इस विचार में स्थिर हो जाते हैं तब हम इस विचार के पीछे छुपी भावना की गहनता में उतरने लगते हैं - हम अपने हृदय में दिव्य प्रकाश के स्रोत का अनुभव करना चाहते हैं। जब यह अनुभूति हमारे अस्तित्व में व्याप्त हो जाती है तब हम वह प्रकाश बनने लगते हैं और आगे चलकर हमारा अस्तित्व स्वयं प्रकाश बन जाता है। अंतत: यह सब शून्यता में या अनस्तित्व में विलीन हो जाता है। यही कारण है कि ध्यान को सतत स्मरण की जननी कहा जाता है। जब हम अच्छी तरह से ध्यान करते हैं तब हम जान जाते हैं कि ध्यान में प्राप्त आध्यात्मिक अवस्था को कैसे आत्मसात करें और अपने अस्तित्व के गहनतम स्तर पर इससे एकाकार कैसे हों।

अत: AEIOU, ध्यान के दौरान उपहार में मिली अवस्था को आत्मसात करके उस पर वास्तविक प्रभुत्व प्राप्त करने की मात्र विधि नहीं है, यह हमारी आंतरिक अवस्था को अगले स्तर पर ले जाने का मार्ग भी है। यह हमें विभिन्न स्तरों से होकर गहनता में गोता लगाने में मदद करता है - सोचने से महसूस करने, फिर बनने से होने तक और आगे अनस्तित्व तक। दूसरे शब्दों में यह हमें सतह से केंद्र की ओर ले जाता है। इससे हमारा आध्यात्मिक विकास भी होता है और संसार के साथ होने वाले हमारे संवाद पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 


(AEIOU, ध्यान के दौरान उपहार में मिली अवस्था को आत्मसात करके उस पर वास्तविक प्रभुत्व प्राप्त करने की मात्र विधि नहीं है, यह हमारी आंतरिक अवस्था को अगले स्तर पर ले जाने का मार्ग भी है। यह हमें विभिन्न स्तरों से होकर गहनता में गोता लगाने में मदद करता है - सोचने से महसूस करने, फिर बनने से होने तक और आगे अनस्तित्व तक।)


आप इस प्रक्रिया को अपने स्मरण के अभ्यास में भी लागू कर सकते हैं। आपका स्मरण कितना गहरा है? आप दिव्यता के बारे में सोचने से विकसित होकर अपने आंतरिक सारतत्व के साथ कैसे अनुनादित हो सकते हैं ताकि अंतत: आप अनस्तित्व की अवस्था में पहुँचकर अपने संपूर्ण अस्तित्व को ही भूल जाएँ?


Comments

दाजी

दाजी हार्टफुलनेसके मार्गदर्शक

उत्तर छोड़ दें