कपिल नायडू याद रखने और भूलने के विरोधाभास के बारे में अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि उन्होंने इसे अनुभव द्वारा कैसे हल किया। उस दौरान, उन्होंने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण सबक भी सीखे।
“कपिल, अपना ध्यान रखना और याद रखना कि कभी कुछ भूलना नहीं है।”
जब मैं अपनी स्नातक की पढ़ाई के लिए अमेरिका जा रहा था तब मेरे पिताजी ने हवाई अड्डे पर मुझसे यही आखिरी बात कही थी।
जाते हुए मैंने हँसकर कहा, “जी पापा, मैं नहीं भूलूँगा।”
मुझे उस समय यह वाक्य बहुत अजीब लगा और जब मैं अपनी चेक-इन की प्रक्रिया पूरी कर रहा था तब मैं इसके बारे में सोचने लगा। “याद रखना कि कभी कुछ भूलना नहीं है,” उनके इस कथन का क्या मतलब है?
मुझे चीज़ें भूलने की बुरी आदत थी और मैं लंबे समय तक इस तथ्य से अनजान था। मुझे याद है कि जब मैं बड़ा हो रहा था, मेरे माता-पिता मुझे हमेशा टोकते रहते थे कि मैं शैम्पू की बोतल खुली छोड़ देता हूँ, सामने का दरवाज़ा खुला छोड़ देता हूँ, मुझे अपना कमरा साफ़ करना था। और इस तरह की बातों की एक अंतहीन सूची थी। ऐसी तथाकथित ‘याद रखने में चूक’ केवल आवश्यक कार्यों में ही होती थी।
एक रात जब मैं 7:30 बजे सोने जा रहा था, मुझे याद आया कि अगले दिन मुझे एक स्कूल-प्रोजेक्ट देना था। मैं अपनी माँ के पास गया और कहा “माँ, मुझे कल एक स्कूल-प्रोजेक्ट देना है।” वे इस बात से बहुत हैरान नहीं दिखीं क्योंकि मैं अक्सर अपने गृहकार्य को लेकर ऐसे तमाशे करता था और फिर सोने से पहले वे मेरे साथ बैठकर उसे पूरा कराती थीं। उन्होंने मुझसे पूछा कि वह क्या प्रोजेक्ट है और मैंने बताया कि मुझे अगले दिन स्कूल में मिस्र के पिरामिड का एक मॉडल ले जाना है। अब, यह उनके लिए भी एक झटका था। वे क्रोधित हो गईं और उन्होंने मुझे बहुत डाँटा। लेकिन, अंततः जब वे शांत हो गईं तब उनमें निःस्वार्थ मातृ-प्रेम उमड़ आया और उन्होंने 1:00 बजे तक मेरे साथ बैठकर प्रोजेक्ट का काम किया। दुर्भाग्य से, यह ऐसी घटनाओं का अंत नहीं था। मुझे अपने कार्यों को लेकर कम लापरवाह और कम अज्ञानी बनने में कई वर्ष लग गए। अभी भी मैं भूलने की इस आदत से निजात पाने का प्रयास कर रहा हूँ।

मैंने अपनी चेक-इन की प्रक्रिया पूरी की और मैं अपने पिताजी के कथन के आशय पर विचार करता रहा। मैं जानता था कि सतही तौर पर उनके कहने का मतलब था कि मुझे अधिक सचेत और कम भुलक्कड़ होना चाहिए, लेकिन यह वाक्यांश एक विरोधाभास था। याद रखने का अर्थ है कि आप भूल गए हैं। लेकिन, इस वाक्यांश की एक पूरी तरह से अलग व्याख्या भी थी। हममें से बहुत से लोग अतीत को भूलने के लिए संघर्ष करते हैं और उन्हीं घटनाओं के बारे में बार-बार सोचते रहते हैं। तो क्या इसका अर्थ यह हो सकता है कि हमें अतीत को भूलने के लिए खुद को याद दिलाते रहना चाहिए?
मुझे इस विचारधारा ने मोहित कर दिया और मैंने यह देखने का फैसला किया कि लोगों ने इंटरनेट पर इस बारे में क्या कहा है। एक लेख में कहा गया था कि यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह उन बातों को याद रखता है जिन्हें भूल जाना चाहिए और उन बातों को भूल जाता है जिन्हें याद रखना चाहिए। यह इस बात पर ज़ोर देता है कि हमें उन बातों को याद रखना चाहिए जो भगवान चाहते हैं कि हम याद रखें और उन बातों को भूल जाएँ जिन्हें हमें पीछे छोड़ देना चाहिए। एक अन्य लेख में कहा गया कि इज़राइली कैसे बार-बार ईश्वर के कृत्यों को भूल जाते थे, जैसे लाल सागर पार करना एक चमत्कारी घटना थी जिसमें ईश्वर ने मिस्र से इज़राइलियों को मुक्त कराने के लिए समुद्र के जल को विभाजित किया था।
यह एक नया नज़रिया था, उस वाक्यांश का आध्यात्मिक अर्थ भी था!
हार्टफुलनेस ध्यान पद्धति का अभ्यास करने वाले परिवार में पले-बढ़े होने के कारण मैंने 14 साल की उम्र में ध्यान करना शुरू कर दिया था। इस अभ्यास का एक बड़ा भाग सुबह का ध्यान है, जिसमें आप अपनी आँखें बंद करते हैं और एक हल्का सुझाव देते हैं कि आपके हृदय में दिव्य प्रकाश मौजूद है और उस विचार के साथ बने रहते हैं। हमें यह सलाह दी जाती है कि ध्यान के बाद भी हम ध्यान में प्राप्त आंतरिक दशा से जुड़े रहने के लिए खुद को याद दिलाते रहें। अतः यह एक प्रयास होगा जिससे हम ध्यान द्वारा प्राप्त दशा को पूरा दिन याद रख पाएँगे। इसका मतलब था कि मुझे खुद को उस दशा को न भूलने की याद दिलाते रहना चाहिए।
अब मैं सच में असमंजस में पड़ गया। मैं इस बात से सहमत था कि यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि हम आवश्यक कार्यों और स्वयं से जुड़े रहने जैसी महत्वपूर्ण बातों को न भूलें। लेकिन मैं इस बात से भी सहमत था कि अतीत को भूलकर वर्तमान पल में जीना महत्वपूर्ण है। मैंने तय किया कि यह विषय विचार करने के लिए बहुत जटिल था और मैं कोई दार्शनिक नहीं था जो इस विरोधाभासी कथन को समझ सकूँ। उड़ान के दौरान मैं एक फ़िल्म देखने लगा और अपने काम करता रहा। मैं इस विचार प्रक्रिया को पूरी तरह से भूल गया।

लगभग दो साल बाद मैं अपने माता-पिता से मिलने भारत आया, जो हार्टफुलनेस संस्थान के मुख्यालय कान्हा शांतिवनम् में रहते हैं। एक दिन एक पुस्तक का विमोचन हुआ और वह पुस्तक दाजी द्वारा लिखित ‘द पॉवर ऑफ़ पैराडॉक्स’ थी। मुझे पढ़ना अच्छा लगता है, इसलिए मैंने एक प्रति खरीदी और उसे तुरंत पढ़ने लगा। यह पुस्तक उसी तरह के विरोधाभासों से भरी थी जिस तरह का विरोधाभास मैं पहले सोच रहा था। इसके एक अध्याय में दाजी सोचने और याद रखने के बारे में बात करते हैं। वे बताते हैं कि सच्चा स्मरण केवल पुरानी यादों को याद करना नहीं हैं, उससे परे है - यह समय और स्थान की सीमाओं को मिटा देता है और याद करने वाले व्यक्ति को जो कुछ भी उसे याद है, उसके साथ मिला देता है।
दाजी के शब्दों को पढ़ते समय मेरे मन में एयरपोर्ट पर मुस्कुराते हुए अपने पिता की एक स्पष्ट छवि उभर आई, जब उन्होंने मुझे याद दिलाया था, “याद रखना कि कभी कुछ भूलना नहीं है।” अब सब कुछ समझ में आ गया। वे मुझे सिर्फ़ कार्य या घरेलू काम याद रखने के लिए नहीं कह रहे थे। बल्कि वे कुछ ज़्यादा गहरी बात कह रहे थे - अपनी वास्तविकता से जुड़े रहना, ध्यान से प्राप्त आत्म-शांति को बनाए रखना और अपने प्रियजनों द्वारा दिए गए मूल्यों एवं प्रेम को याद रखना। इसका मतलब यह भी था कि सचेत रूप से अतीत की गलतियों, पछतावों और नकारात्मकता को छोड़ देना, यानी अनिवार्य रूप से वह सब भूल जाना जो मेरी उन्नति व खुशी के लिए बाधक है।
दाजी ने बड़ी खूबसूरती से स्मरण को मात्र घटनाओं को याद करने से कहीं अधिक गहन भाव के रूप में वर्णित किया है - “वास्तविक स्मरण के माध्यम से आप जो याद करते हैं उसके साथ एक हो जाते हैं जिससे सभी सीमाएँ मिट जाती हैं। स्मरण तब शुद्ध अस्तित्व की अवस्था बन जाता है।” इसने मुझे बहुत अधिक प्रभावित किया। मैं समझ गया कि सच्चा स्मरण उनसे पूरी तरह से जुड़ा होना है जो सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं - हमारे भीतर का ईश्वर, वे लोग जिन्हें हम प्रेम करते हैं और वे अनुभव जो हमें प्रभावित करते हैं।
मैं एक पल के लिए चुपचाप बैठकर यह सोचता रहा कि कैसे मेरा जीवन अक्सर बेकार की बातों को याद रखने और वास्तव में महत्वपूर्ण बातों को भूलने के बीच झूलता रहा है। अब, यह मेरे लिए स्पष्ट हो गया था – ‘याद रखना कि कभी कुछ भूलना नहीं है’ का मतलब था कि सचेत रूप से उन चीज़ों को चुनना जो जीवन में मायने रखती हैं यानी प्रियजनों के साथ वास्तव में मौजूद रहना, खुद के प्रति सच्चे रहना और ऐसी किसी भी बात को छोड़ देना जो मुझे अतीत में फँसाए रखती है।

‘याद रखना कि कभी कुछ भूलना नहीं है’ का मतलब था कि सचेत रूप से उन चीज़ों को चुनना जो जीवन में मायने रखती हैं यानी प्रियजनों के साथ वास्तव में मौजूद रहना, खुद के प्रति सच्चे रहना और ऐसी किसी भी बात को छोड़ देना जो मुझे अतीत में फँसाए रखती है।
जिस विरोधाभास को मैं कभी भ्रमित करने वाला समझता था वह वास्तविक जीवन के अनुभव से हल हो गया था। उस दिन से वह सरल वाक्यांश सचेत रहने, सार्थक रिश्तों की सराहना करने और अनावश्यक बोझ को छोड़ने के लिए एक मूक स्मरण बन गया। और अब, जब भी मैं खुद को भटकते हुए, एकाग्रता खोते हुए या अतीत के बारे में सोचते हुए पाता हूँ तब मैं मुस्कुराता हूँ और धीरे से खुद को याद दिलाता हूँ, “याद रखना कि कभी कुछ भूलना नहीं है।”
