आधुनिक जीवन के लिए आध्यात्मिक अभ्यास और मनोभाव
आध्यात्मिक अभ्यासों पर आधारित इस नई श्रृंखला की दूसरी कड़ी में, दाजी ध्यान के बारे में पूछे जाने वाले कुछ सबसे सामान्य प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं। सबसे पहले वे इस बारे में बता रहे हैं कि ध्यान क्या है। आजकल कई तरह के ध्यान उपलब्ध हैं। इसलिए वे बता रहे हैं कि वे हृदय पर ध्यान करने की सलाह क्यों देते हैं और अपने सतही अस्तित्व से परे, अपने अस्तित्व के गहनतम पहलुओं तक ले जाने में हृदय-आधारित ध्यान का क्या महत्व है जिससे जीवन में खुशी और सार्थकता आती है।
ध्यान क्या है?
ध्यान की सबसे सामान्य समझ यह है कि आप अपने ध्यान का उद्देश्य बन जाते हैं। आप उस उद्देश्य के गुणों को आत्मसात करते हैं। तो आप इस जीवन में वास्तव में क्या चाहते हैं? और यदि आपकी रुचि मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य में है तो वह कौन सी वस्तु होगी जो आपको उस सर्वोच्च लक्ष्य या सार्वभौमिकता की ओर ले जाएगी?
अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं, “दाजी, आप हृदय पर ध्यान करने की सलाह क्यों देते हैं?” इसके उत्तर में मैं कहता हूँ, “क्या आप अपने पैरों से महसूस करने की कोशिश करेंगे? क्या आप अपने जिगर या गुर्दे से महसूस कर सकते हैं? नहीं। आप अपनी आँखों से चीज़ें देख सकते हैं लेकिन हृदय ही एकमात्र ऐसा साधन है जिसके माध्यम से आप अपनी इंद्रियों और अपने व्यक्तिगत मन से परे जाकर अस्तित्व की सार्वभौमिकता के साथ एक हो सकते हैं।”
ध्यान एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा आप सोचने से महसूस करने की ओर बढ़ते हैं। यह मन की जटिलता से हृदय की सरलता की ओर एक यात्रा है। |
इसलिए हार्टफुलनेस ध्यान का लक्ष्य हृदय के माध्यम से उच्चतर ‘स्व’ या स्रोत से मिलन है और यही योग का अर्थ और उद्देश्य है। केवल समान धर्मी ही समान धर्मी से मिल सकता है। तेल पानी के साथ नहीं मिल सकता। इसलिए स्रोत के साथ एक होने के लिए आपको सबसे पहले स्रोत जैसा बनना होगा। यह संभव है क्योंकि हम सभी का एक ही दिव्य स्रोत है जो हमारे अस्तित्व का आवश्यक पहलू है।
दिव्य प्रकाश का स्रोत, जो हार्टफुलनेस ध्यान का उद्देश्य है, क्या है ?
आप अपने हृदय में दिव्य प्रकाश के स्रोत पर ध्यान करते हैं। अपने आप में यह स्रोत इतना सूक्ष्म है कि सामान्य समझ से परे है। स्रोत से आने वाला ‘प्रकाश’, उसकी सबसे निकटतम अवधारणा है जिसे हम ध्यान के एक लक्ष्य के रूप में ले सकते हैं। लेकिन किसी भी प्रकाश को देखने की आवश्यकता नहीं है। हम इसे ‘बिना दीप्ती वाला प्रकाश’ कहते हैं। आप केवल इस विचार पर ध्यान कर सकते हैं, प्रकाश पर नहीं।
ध्यान को आमतौर पर किसी वस्तु के बारे में लगातार सोचने के रूप में परिभाषित किया जाता है लेकिन वास्तव में यह पहला कदम है यानी ध्यान की प्रस्तावना है। इसे योग में ‘धारणा’ कहते हैं। मेडिटेशन या ध्यान इससे कहीं अधिक दिलचस्प है। ध्यान उस वस्तु की वास्तविक प्रकृति का अनुभव करने के लिए गहराई में गोता लगाने की प्रक्रिया है जिस पर आप ध्यान कर रहे हैं - जो इस मामले में स्रोत से आने वाला दिव्य प्रकाश है। स्रोत के बारे में सोचने के बजाए आप चाहते हैं कि यह आपके सामने प्रकट हो। यह प्रकटीकरण विचार के रूप में नहीं, बल्कि शुरुआत में भावना के रूप में या अनुभव के रूप में होता है।
ध्यान एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा आप सोचने से महसूस करने की ओर बढ़ते हैं। यह मन की जटिलता से हृदय की सरलता की ओर एक यात्रा है। मुख्यतः इसी कारण से हम ध्यान में हृदय को शामिल करते हैं।

फिर भी, महसूस करने की भी अपनी सीमाएँ होती हैं। सच्चे ध्यान में आप महसूस करने और अनुभव करने से परे, ध्यान के लक्ष्य के साथ एकात्मकता की अवस्था में चले जाएँगे और अंततः यह अवस्था उसमें विलीन हो जाती है जो अनुभव से परे है अर्थात अस्तित्व का संपूर्ण परम सार है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यह स्रोत के साथ तारतम्य (osmosis) में होने का संकेत है।
प्राणाहुति क्या है?
हार्टफुलनेस का सबसे आकर्षक पहलू प्राणाहुति है जिसे यौगिक ट्रांसमिशन भी कहा जाता है। प्राणाहुति को “मनुष्य के रूपांतरण के लिए दिव्य ऊर्जा के उपयोग” के रूप में परिभाषित किया गया है। यहाँ मैं शारीरिक रूपांतरण के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ क्योंकि हमारे शरीर, हमारी आनुवंशिक संरचना द्वारा सीमित हैं। मैं अपने व्यक्तित्व, अपने चरित्र और अपने मानसिक, बौद्धिक एवं अहंकार के क्षेत्रों में परिवर्तन का उल्लेख कर रहा हूँ।
अंततः यह रूपांतरण हमें अस्तित्व के आध्यात्मिक क्षेत्रों में ले जाता है। प्राणाहुति वह पोषण है जिसकी वजह से सूक्ष्म आध्यात्मिक स्तर पर इस तरह का असीमित विकास हो पाता है। प्राणाहुति को ऊर्जा के रूप में समझना पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि ऊर्जा भौतिक दुनिया या भौतिक आयाम से संबंधित है जबकि प्राणाहुति को भौतिकी के मानक प्रतिमान द्वारा ऊर्जा के रूप में मापा नहीं जा सकता। आध्यात्मिक कवि कबीर ने “अनाहत नाद” की ध्वनि का उल्लेख किया था जिसका अर्थ है, वह संगीत जो किसी ऐसे वाद्य से निकलता है जिस पर आघात नहीं हुआ हो अर्थात बजाया नहीं गया हो। कबीर किस तरह की ध्वनि का उल्लेख करते हैं? वे भौतिक यानी प्रकट दुनिया की नहीं बल्कि अप्रकट दुनिया की बात करते हैं - वह स्रोत जिससे हम सभी उत्पन्न हुए हैं। प्राणाहुति इसी आयाम से संबंधित है और इसका उद्देश्य हममें से हर एक के भीतर उसी मूल, वास्तविक अवस्था को उजागर करना है जो हमारे अस्तित्व के केंद्र में है।
अंग्रेज़ी में इसके लिए हम ‘ट्रांसमिशन’ शब्द का उपयोग करते हैं क्योंकि यह सूक्ष्म ऊर्जा प्रशिक्षक के हृदय से अभ्यासी के हृदय में ट्रांसमिट यानी संचारित होती है। प्राणाहुति के लिए किसी शारीरिक संपर्क की आवश्यकता नहीं होती बल्कि यह विचार की शक्ति द्वारा सक्रिय होती है। जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने अपने ग्रंथ ‘राज योग’ में लिखा है, “विचार उसी तरह एक शक्ति है जैसे गुरुत्वाकर्षण या प्रतिकर्षण। प्रकृति में शक्ति के अनंत भंडार से, चित्त (चेतना) नामक उपकरण उसके कुछ भाग को पकड़ता है, उसे अवशोषित करता है और विचार के रूप में उसे बाहर भेजता है।”
प्राणाहुति प्राप्त करने की प्रक्रिया के सार को कभी भी शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इसे बौद्धिक रूप से समझने का प्रयास आम के स्वाद या चमेली के फूल की खुशबू को बिना अनुभव किए समझने की कोशिश करने जैसा है। प्राणाहुति को जानने के लिए उसका अनुभव करना आवश्यक है। आप जो भी महसूस करें, वह आपका अपना आंतरिक अनुभव होना चाहिए। किसी और के अनुभव के आधार पर समझने की ज़रूरत नहीं है।
आपके भीतर एक शांति
और एक शरण-स्थान है
जहाँ आप कभी भी शरण लेकर
जो आप हैं वही बने रह सकते हैं।
- हरमन हेस

ध्यान के दौरान आने वाले विचारों को कैसे संभालें?
मन आपका मित्र है, शत्रु नहीं। जैसे आँखें देखने के लिए और कान सुनने के लिए हैं वैसे ही मन सोचने के लिए है।
आप इसकी गतिविधि को बलपूर्वक क्यों दबाना चाहेंगे? ध्यान के दौरान कभी-कभी बहुत सारे विचारों के आने के पीछे कोई न कोई कारण होता है। सोचें कि जब आप एक गैस मिश्रित पेय की बोतल खोलते हैं तब क्या होता है - सतह की ओर तेज़ी से बुलबुले आने लगते हैं। अंदर फंसी हुई सारी कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकल जाती है जिसके कारण बुलबुले तेज़ी से बाहर आते हैं। यदि आप बोतल का ढक्कन खोलकर उसे कुछ देर के लिए रख दें तो सारी गैस बाहर निकल जाएगी।
सबसे अच्छा तरीका यह है कि विचारों को आसमान में गुज़रते बादलों के जैसा समझें। उनकी ओर ध्यान न दें और उन्हें ज़बरदस्ती हटाने की कोशिश न करें। बस उन्हें गुज़र जाने दें और यदि ज़रूरत हो तो खुद को याद दिलाएँ कि आप ध्यान कर रहे हैं। |
इसी तरह ध्यान में, यदि आप अपना मन खुला रखते हैं तो आपके अंदर जमा हुए विचार और भावनाएँ बाहर आ सकती हैं। उनके बाहर निकलने का अनुभव आप बहुत सारे विचारों के आने के रूप में करेंगे। हालाँकि इससे परेशानी हो सकती है लेकिन इसका परिणाम शांति होता है - बशर्ते कि आप बहुत सारे विचारों के आने के बारे में चिंता करके अशांति को नहीं बढ़ाते। इसलिए सबसे अच्छा तरीका यह है कि विचारों को आसमान में गुज़रते बादलों के जैसा समझें। उनकी ओर ध्यान न दें और उन्हें ज़बरदस्ती हटाने की कोशिश न करें। बस उन्हें गुज़र जाने दें और यदि ज़रूरत हो तो खुद को याद दिलाएँ कि आप ध्यान कर रहे हैं। यदि अशांति बहुत अधिक है तो आप कुछ क्षणों के लिए अपनी आँखें खोलकर नीचे की ओर देख सकते हैं जिससे अशांति की वह दशा ठीक हो जाएगी।
जब मैं ध्यान करता हूँ, मुझे अक्सर ऐसा लगता है कि मैं सो गया हूँ। मुझे क्या करना चाहिए?
क्या कुछ ही मिनटों में सीधे बैठकर सो जाना इतना आसान है? वास्तव में, गहरे ध्यान में आपकी स्थिति एक सोते हुए व्यक्ति जैसी होती है जिसे समाधि जैसी अवस्था के रूप में जाना जाता है। आप ध्यान के बाद कैसा महसूस करते हैं, इससे आसानी से समझ सकते हैं कि आप सो रहे थे या ध्यान कर रहे थे। यदि आप सो जाते हैं तो आपको सुस्ती महसूस होती है जबकि यदि आप गहरे ध्यान में होते हैं तो आपको ताज़गी महसूस होती है।
जैसे-जैसे आप प्रगति करते जाते हैं आप ध्यान की उन गहरी अवस्थाओं में भी जागरूक रहने लगते हैं। आप एक साथ जागृत और गहरी नींद की अवस्था में होते हैं। जैसे-जैसे यह अवस्था विकसित होती जाती है, आप पाएँगे कि जागृत दैनिक जीवन में आपके विचार और कर्म इतने स्वाभाविकता व सहजता से और यहाँ तक कि स्वचालित रूप से होने लगते हैं कि आपको ऐसा महसूस ही नहीं होता कि आप उनके कर्ता हैं।
क्या किसी विशिष्ट मुद्रा में ध्यान करना सबसे अच्छा है?
ध्यान के लिए सबसे अच्छी मुद्रा वह है जिसमें आप आराम से बैठे हों। ऋषि पतंजलि अपने योग सूत्र में लिखते हैं, “आसन ऐसा होना चाहिए जो स्थिर और आरामदायक हो।” आपकी मुद्रा इतनी स्थिर होनी चाहिए कि आप अपने ध्यान की अवधि के दौरान इसे आसानी से बनाए रख सकें। जैसा कि ऋषि पतंजलि बताते हैं कि केवल एक आरामदायक मुद्रा ही वास्तव में स्थिर हो सकती है। अन्यथा आप बेचैन हो जाएँगे और अपनी असुविधा के चलते विचलित हो जाएँगे।

ऐसा कहा गया है कि पालथी मारकर बैठने से गहरे ध्यान में जाना आसान होता है - यदि पालथी मारकर बैठना आपके लिए आरामदायक हो। आप एक कुर्सी पर भी बैठकर अपने पैरों को टखनों को एक के ऊपर एक रख सकते हैं।
सीधे बैठना भी बहुत अच्छा है लेकिन तनकर बैठना नहीं। अपनी पीठ को सहारा देना भी ठीक है लेकिन अपने सिर को सहारा न दें नहीं तो आप सो जाएँगे। सबसे महत्वपूर्ण यह याद रखना है कि यह ध्यान है व्यायाम नहीं। ध्यान की मुद्रा का मुख्य उद्देश्य है कि आप अपने शरीर को भूलकर अपने भीतर जा पाएँ।
परंपरागत रूप से हमें दिन के विशेष समयों का लाभ उठाने की सलाह दी जाती है जो विशेष रूप से ध्यान के लिए अनुकूल होते हैं। वे समय रात और दिन का मिलन बिंदु होते हैं - भोर से ठीक पहले और सूर्यास्त के समय।
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मैं कितनी देर तक ध्यान में बैठ सकता हूँ?
ध्यान की अवधि इस बात पर निर्भर करती है कि आप कैसा महसूस करते हैं। यदि आपको फ़ायदा लग रहा है तो आप अधिक समय तक बैठेंगे। यदि आप परेशान हैं तो 10 मिनट की हार्टफुलनेस सफ़ाई से शुरू करना एक अच्छा विचार है। उसके बाद ध्यान का प्रयास करें। यदि आप कुछ मिनटों के भीतर गहरे ध्यान में डूब पाते हैं तो शायद आपको केवल थोड़ी देर के लिए ध्यान करने की आवश्यकता है। यदि आपको इसमें ज़्यादा समय लगता है तो ज़्यादा देर तक बैठें। गहरी तल्लीनता या समाधि की अवस्था में जाने का प्रयास करने की ज़रूरत नहीं है। इसे बिना किसी ज़ोर-ज़बरदस्ती के स्वाभाविक रूप से होने दें। कुछ दिनों में आपको दूसरे दिनों की तुलना में ज़्यादा गहराई हासिल होगी।
शुरू में, कम से कम 20 मिनट तक रोज़ाना नियमित रूप से ध्यान करने का प्रयास करें। फिर जैसे-जैसे आप अपनी लय में आ जाते हैं धीरे-धीरे समय बढ़ाकर एक घंटा कर सकते हैं। एकमात्र सख्त निर्देश यह है कि ध्यान की अवधि एक घंटे से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए।
बहुत ज़्यादा समय तक ध्यान करने से मानसिक दबाव बनता है। यदि आपके पास फिर से ध्यान करने का समय और इच्छा है तो कृपया ऐसा अवश्य करें बशर्ते कि आप बीच में कम से कम पंद्रह मिनट का अंतराल दें। आप दिन में कितनी बार ध्यान करें इस पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है जब तक कि आप अपने कर्तव्यों की उपेक्षा न कर रहे हों।
अंततः आपकी जीवनशैली ध्यानमय हो जाएगी। आप चाहे किसी भी गतिविधि में लगे हों आप ध्यानमय और अपने भीतर केंद्रित रह सकते हैं। ध्यान करने की क्रिया से एक अनवरत बनी रहने वाली ध्यानमयी अवस्था विकसित होती है जो आपकी सभी गतिविधियों में सहायता करती है।
क्या दिन के किसी विशेष समय पर ध्यान करना सबसे अच्छा है?
नियमित रूप से हर दिन एक ही समय पर ध्यान करने से ध्यान करना आसान हो जाता है। यह उस समय आपका स्वाभाविक रुझान बन जाएगा - जैसे कि रोज़ाना एक ही समय पर नाश्ता करने से आपको उस समय स्वाभाविक रूप से भूख लगने लगती है। समय की नियमितता होने से, आप बैठते ही गहरे ध्यान में डूब जाएँगे। नियमितता एक जैविक लय बनाती है जो हमारे भीतर एक जैविक घड़ी स्थापित कर देती है।
परंपरागत रूप से हमें दिन के विशेष समयों का लाभ उठाने की सलाह दी जाती है जो विशेष रूप से ध्यान के लिए अनुकूल होते हैं। वे समय रात और दिन का मिलन बिंदु होते हैं - भोर से ठीक पहले और सूर्यास्त के समय। यदि आप उन समयों पर ध्यान करने में असमर्थ हैं तो जब भी संभव हो, ध्यान करने का प्रयास करें। नियमितता महत्वपूर्ण है चाहे आप ध्यान के लिए कोई भी समय चुन लें।

क्या बच्चे ध्यान कर सकते हैं?
पाँच वर्ष की आयु से बच्चे हार्टफुलनेस रिलैक्सेशन और हार्टफुलनेस प्रार्थना दोनों सीख सकते हैं। कई बच्चों को इन अभ्यासों को करना अच्छा लगता है लेकिन उन पर ज़ोर डालने की भी आवश्यकता नहीं है।
जो बच्चे 15 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं, लेकिन कानूनी रूप से वयस्क नहीं हैं, वे माता-पिता या अभिभावक की अनुमति से हार्टफुलनेस ध्यान सीख सकते हैं ।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ध्यान को रुचि, उत्साह और यह देखने की इच्छा के साथ करें कि यह आपको आध्यात्मिक मार्ग पर कहाँ तक ले जाता है। यह दृष्टिकोण आपको प्रगति के मार्ग पर बहुत आगे ले जाएगा।