परिवार व मित्रों को पत्र

प्रिय पिताजी,

हमें परिवर्तन के बारे में बताइए।


प्रिय सहज और मार्ग,

परिवर्तन शाश्वत है। तुम इससे बच नहीं सकते। यदि यह जगत के कल्याण के लिए है तो यह विकासपरक होगा। परिवर्तन के लिए हमें बदलने की आवश्यकता होती है। जितना तेज़ परिवर्तन होता है उतनी ही तेज़ हमारे बदलने की प्रक्रिया होती है। परिवर्तन को लागू करने के लिए केंद्रीयता और शीघ्रता की आवश्यकता होती है। भले ही यह कोई प्रक्रिया हो या फिर किसी रिश्ते से संबंधित व्यक्तिगत मामला, ऐसी किसी भी परिस्थिति में ऊर्जा का निवेश और प्रयास करने की ज़रूरत पड़ती है। जिस भी चीज़ में ऊर्जा लगानी पड़े वह महंगी तो होगी और उससे अस्थिरता भी आएगी। स्थिरता जीवन है। आधुनिक जीवन लगातार बदल रहा है, इसलिए निरंतर बदलने और कुछ 'नए' को बार-बार सीखने के अलावा, शायद ही कोई चीज़ दोहराई जाती है। यह हम सभी को अस्थिरता की ओर ले जाता है। इससे अगला कदम है कि जहाँ तक ऊर्जा के व्यय होने की बात है, हम ऊर्जा व्यय करनें से बचते हैं। अव्यवस्था या संघर्षण इसके स्वाभाविक परिणाम हैं।

जितना बड़ा उद्देश्य होता है उतना ही अधिक वर्तमान और पूरा किए जाने वाले लक्ष्य के बीच अंतर होता है, इसलिए और भी अधिक प्रयास और ऊर्जा की आवश्यकता होती है। क्या इसका अर्थ है कि हमें परिवर्तन से बचना चाहिए? नहीं, बिलकुल नहीं। यदि हम परिवर्तन से बचने की कोशिश करते हैं तो अगला सवाल यह उठता है कि मेरे विकास का क्या होगा? यदि हमारा लक्ष्य ईश्वर या अनंत है तो कल्पना करें कि हमारी ओर से कितने अधिक यानी अनंत प्रयास की आवश्यकता होगी! तुम कभी भी कह सकते हो, "हे भगवन, जो कुछ मेरे बस में था, मैंने सब कुछ लगा दिया है। अब मैं समर्पण करते हुए इस मामले को आपके हाथों में सौंपता हूँ।" ऐसी प्रार्थना सच्ची होनी चाहिए व दिल से की जानी चाहिए।

परिवर्तन कई तरीकों से आता है - भौतिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक। इन सभी में एक बात समान है और वह है जीवन के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन। अपने आप से पूछो, "क्या हाल ही में जीवन के प्रति मेरा दृष्टिकोण बदला है?" यदि नहीं तो समझ लो कि तुम कहीं अटक गए हो या फिर तुम उस अंतिम सीमा तक पहुँच गए हो जहाँ से आगे कोई प्रगति नहीं हो सकती।

परिवर्तन तब कठिन हो जाता है जब यह तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध होता है। जब तुम प्रेम करते हो तब तुम बिना किसी प्रतिरोध के अपने प्रियतम के हर छोटे इशारे के अनुसार काम करते हो और उसे पूरा करते हो। प्रेम न होने पर जो चीज़ें तुम्हें पसंद हैं वे भी बोझ बन जाती हैं।

तो अब तक मैंने क्या सीखा है? सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जब भी कोई आंतरिक पुकार होती है और अंदर एक उत्कट इच्छा होती है कि चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे 'यह' प्राप्त करना ही है, तब यह परिवर्तन के लिए सभी प्रकार के प्रलोभनों को पीछे छोड़ देता है। यह आत्म-निर्भर होता है और एक गहरे आंतरिक दृढ़-विश्वास से उत्पन्न होता है। मुझे आशा है कि तुम सहज तरीके से परिवर्तन को आमंत्रित करोगे।

बहुत सारे प्रेम के साथ,

तुम्हारा पिता


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दाजी

दाजी हार्टफुलनेसके मार्गदर्शक

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