जोसेफ़ रॉबिन्सन शांति के लिए तड़प और अधिक पाने की चाह के बीच के खिंचाव पर और उस खिंचाव से परे क्या हैउस पर चिंतन करते हैं।

मैं, और अधिकांश लोग जिन्हें मैं जानता हूँ,अंदर ही अंदर एक तरह का तनाव लिए हुए जीते हैं। एक ओर तो वर्तमान में अधिक उपस्थित रहने, अधिक स्थिर रहने और कम तनावग्रस्त होने की सच्ची इच्छा होती है। दूसरी ओर, अधिक पाने, अधिक करने और कुछ अधिक बनने का खिंचाव होता है।

मेरे जीवन में इस द्वंद्व ने मुझे बहुत दुख दिया है। छोटी उम्र में मैंने महत्वाकांक्षा को सतही समझकर नज़रअंदाज़ किया, जब तक कि मैं आर्थिक रूप से कंगाल नहीं हो गया। अब वयस्क होने पर मैं दुखद रूप से समझता हूँ कि आगे बढ़ने की दौड़ में मैं उन रिश्तों को पोषित और गहरा करने के अवसर खो रहा हूँ जो मेरे लिए सबसे अधिक मायने रखते हैं।

इस द्वंद्व को समझने की कोशिश करते हुए मैंने अंततः समझा कि भले ही ये इच्छाएँ विरोधाभासी लगती हों, लेकिन दोनों ही इसलिए उत्पन्न होती हैं क्योंकि हम अपने जीवन को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं - “यह पर्याप्त नहीं है।” यदि हम वास्तव में संतुष्ट होते तो हमारे ऊपर न तो परिस्थितियों को सुधारने का दबाव होता और न ही उनसे भागने का। हम बस वर्तमान क्षण में जीते। इस प्रकार, ‘अधिक’ की इच्छा और ‘शांति’ की इच्छा दोनों ही इस भावना के प्रति जुड़वाँ प्रतिक्रियाएँ हैं कि हमारा जीवन जैसा है, अधूरा है।

मेरी पहली स्वाभाविक सोच यह थी कि अधिक पाने की कोशिश करना आध्यात्मिक रूप से अपरिपक्व होने का संकेत है। लेकिन जब इस विचार को गहराई से परखा तब मुझे लगा कि ऐसा सोचना सही नहीं है। एक पिता और पालनकर्ता होने के नाते मुझे नहीं लगता कि मेहनत करने की प्रवृत्ति गलत है क्योंकि कमी की समस्याएँ तो स्पष्ट रूप से वास्तविक हैं। जब पैसों की तंगी होती है, रिश्ते तनावपूर्ण हो जाते हैं और जब हम खुद को बाधित करने लगते हैं तब बड़ा सपना देखने, खुद को संभालने और अधिक मेहनत करने की इच्छा कोई मानसिक कमज़ोरी नहीं होती, वह ज़रूरी होती है। इसके अलावा, आध्यात्मिकता इस ‘अधिक पाने की चाह’ के बिना कहाँ होगी? यदि भीतर कोई असंतोष की भावना नहीं होगी तो कोई अपनी भोगवादी प्रवृत्तियों से ऊपर उठकर किसी बड़े उद्देश्य के प्रति कैसे समर्पित होगा?


इस सब के साथ समस्या यह है कि यदि हम ध्यान से देखें तो हममें से अधिकांश लोग अपने भीतर एक ऐसी आवाज़ पाएँगे जो कभी संतुष्ट नहीं होतीचाहे हम जितना भी हासिल कर लें। यह आवाज़ हमारी शर्म सेइस भावना से उत्पन्न होती है कि हमारे भीतर कुछ गलत है - अपने किए किसी काम के कारण नहींबल्कि जो हम हैंउस कारण।


समस्या यह है कि यदि हम ध्यान से देखें तो हममें से अधिकांश लोग अपने भीतर एक ऐसी आवाज़ पाएँगे जो कभी संतुष्ट नहीं होती, चाहे हम जितना भी हासिल कर लें। यह आवाज़ हमारी शर्म से, इस भावना से उत्पन्न होती है कि हमारे भीतर कुछ गलत है - अपने किए किसी काम के कारण नहीं, बल्कि जो हम हैं, उस कारण। यह शर्म हमें महसूस होने वाली सबसे गहरी और अकेलापन पैदा करने वाली पीड़ाओं में से एक है और जब हम इसे छिपाने या इससे बचने की कोशिश करते हैं तब यह हमारे जीवन पर बहुत नकारात्मक प्रभाव डालती है। और जब वह नकारात्मक सोच हमारी बढ़ने की स्वाभाविक इच्छा से जुड़ जाती है तब हमारा प्रयास आसानी से “मैं पर्याप्त नहीं हूँ” की एक और अभिव्यक्ति बन सकता है।

यदि हम यह पहचान नहीं पाते कि हमारा कौन-सा प्रयास सच्चा है यानी अपनी क्षमता का सम्मान करने वाला है और कौन-सा प्रयास मानसिक दबाव से प्रेरित है यानी केवल इस कमी की भावना कि “मैं पर्याप्त नहीं हूँ,” से आगे निकलने का संघर्ष है तो हम सालों, दशकों, पूरी ज़िंदगी उस चीज़ के पीछे भागते रह सकते हैं जो असल में समाधान नहीं है।

इस क्षेत्र में मुझे पर्याप्त अनुभव है इसलिए मैं यह बात करुणा के साथ कह रहा हूँ। आशा है कि आपको भी निम्नलिखित भेद उतने ही उपयोगी लगेंगे जितने मुझे लगते हैं।

सच्चा प्रयास

मैं पहले से ही पर्याप्त हूँ। विकास मेरी संतुष्टि को व्यक्त करने का तरीका है।”

पहलू

यह किस तरह महसूस होता है

यह कैसा दिखाई देता है

प्रेरणा

प्रेरित, उत्सुक, आत्म-सम्मानित

मूल्यों और खुशी के साथ
तालमेल रखता विकास

आत्म-संबंध

करुणापूर्ण, सुरक्षित, स्वीकार करने वाला

दयालु, उत्साहित करने वाला आत्म-संवाद

भावनात्मक स्थिति

स्थिर, ग्रहणशील, विनम्र

प्रक्रिया का आनंद लेना

विफलता

प्रतिक्रिया, सीखना

आत्म-आलोचना के बजाय आत्म-चिंतन

अनुशासन

आत्म-सम्मान, सीमाएँ

वहनीय आदतें

सफलता

खुशी मनाना, आभार

बिना तुलना के सफलता साझा करना

तंत्रिका तंत्र

नियंत्रित, शांत, रचनात्मक

बिना थकावट के निरंतरता बनाए रखना

 

मानसिक दबाव से प्रेरित प्रयास

मैं अभी पर्याप्त नहीं हूँ। विकास द्वारा ही मैं प्रेम या सुरक्षा प्राप्त करता हूँ।”

पहलू

यह किस तरह महसूस होता है

यह कैसा दिखाई देता है

प्रेरणा

दबाव, अपर्याप्तता, तात्कालिकता

बाहरी मान्यता से प्रेरित होना

आत्म-संबंध

आलोचनात्मक, हमेशा असंतुष्ट रहना

निरंतर आत्म-निगरानी

भावनात्मक स्थिति

चिंता, तनाव

या सब कुछ करना या फिर कुछ भी नहीं

विफलता

अयोग्यता का प्रमाण

छिपना, स्वयं को दोष देना

अनुशासन

सजा, नियंत्रण

अत्यधिक थकान के चक्र

सफलता

क्षणिक राहत

तुलना, अधिक की लालसा

तंत्रिका तंत्र

सामना करना / भाग जाना /
कुछ न कर पाना

कार्य को टालते रहना या
अत्यधिक काम करना

इस अंतर को पहचानना गहन ईमानदारी का कार्य है। यदि दूसरी आवाज़ परिचित लगती है तो मैंने दो अभ्यासों को विशेष रूप से उपचारकारी पाया है –

संतोष

संतोष, पतंजलि के योगसूत्रों में दूसरा नियम, एक आंतरिक दृष्टिकोण है जो इस बात की पुष्टि करता है - “इस क्षण में कुछ भी कमी नहीं है।” “मैं जीवन को ठीक उसी रूप में स्वीकार कर सकता हूँ जैसा यह है।” “मेरा स्वीकार करना सुधार पर निर्भर नहीं है।”

संतोष का अर्थ है पर्याप्तता, समभाव और अप्रतिरोध। यह कृतज्ञता या सकारात्मकता की अपेक्षा नहीं करता। यह हमें केवल वास्तविकता का विरोध करना बंद करने के लिए और वर्तमान में, चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, संतोष का भाव विकसित करने के लिए कहता है।

हम में से बहुतों के लिए इस दृष्टिकोण को समझना कठिन है, क्योंकि यह उस अपर्याप्तता की भावना के विपरीत है जो हममें से कई लोग महसूस करते हैं। इसके आलावा, हम अपने विचारों के साथ जुड़ने के और असुविधा के समय अपने आप में सिमट जाने के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि अनुभव को बिना किसी हस्तक्षेप के स्वाभाविक रूप से घटित होने देना हमें असामान्य लगता है।

लेकिन संतोष विकसित करने से हम अपने भीतर होने वाले संकुचन और उसके जीवन में प्रकट होने के तरीकों के प्रति अधिक जागरूक होने लगते हैं। इस जागरूकता के आने पर जब ‘अपर्याप्तता’ की भावना सामने आती है तब हम उसे पहचान सकते हैं और शायद उसे दबाने अथवा संयम या प्रयास द्वारा संभालने की प्रवृत्ति से बच सकते हैं।


संतोष विकसित करने के लिए मुझे यह मंत्र लाभकारी लगता है – “मैं पर्याप्त हूँ। यह क्षण पर्याप्त है।”


 

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कृतज्ञता - हार्टफुलनेस पद्धति में

जैसा कि एरिक फ़्रॉम ने कहा है, किसी चीज़ से मुक्ति - इस मामले में शर्म की विकृतियों से - पूरा समाधान नहीं है। अपनी महत्वाकांक्षा को सच में शुद्ध करने के लिए हमें अपनी प्रगति की इच्छा को किसी उच्चतर लक्ष्य से जोड़ देना चाहिए। हार्टफुलनेस के साधक के रूप में मैं समझता हूँ कि वह लक्ष्य परमसत्ता के साथ एक सच्चा संबंध विकसित करना है।

चूँकि परम अस्तित्व संबंधपरक है इसलिए दाजी हमें सिखाते हैं कि सच्ची आध्यात्मिकता का अर्थ स्वयं को जीतना या मिटा देना नहीं है, बल्कि हृदय को इतना विस्तृत करना है कि हमारे संसार के साथ संपर्क के मूल में जो आत्मकेंद्रितता है, वह धीरे-धीरे विलीन हो जाए।

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इस कार्य में सहायता करने और स्वार्थ के साथ दैनिक संघर्ष में अपने आप को मज़बूत बनाने के लिए मैं हर चीज़ पर अपनी निर्भरता के बारे में विचार करता हूँ; यह मुझे उपचारात्मक लगता है। हमने अपने माता-पिता और पूर्वजों से; मार्गदर्शकों, समुदायों और सामाजिक संस्थाओं से; संस्कृति, भाषा और पारंपरिक ज्ञान से; जैवमंडल से; और अंततः उस ब्रह्मांड से, जो चेतना, विकास और प्रेम को संभव बनाता है, बहुत कुछ प्राप्त किया है। दूसरों का हर समय सहारा पाना एक सौभाग्य है कि हम अकेले नहीं हैं। इसके लिए दूसरों का एहसान कैसे चुकाएँ? हम इस सौभाग्य के लिए कि हमें इतनी पूर्णता से सहारा मिला है, अपने अस्तित्व के प्रति एहसान कैसे मानें? जब मैं अपने आप से ये प्रश्न पूछता हूँ तब मेरे हृदय में जो उत्तर उभरता है, वह है – कृतज्ञता की भावना। हृदय की पूर्णता प्राप्त कर मैं अपनी संकीर्णता को भूल जाता हूँ और याद करता हूँ कि मैं यहाँ सेवा करने के लिए हूँ। यही भक्ति का सार है - कर्म के माध्यम से व्यक्त की गई भक्ति। रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में – “मैं सोया और स्वप्न देखा कि जीवन आनंद है। “मैं जागा और देखा कि जीवन सेवा है। मैंने कर्म किया और पाया - सेवा ही आनंद है।”

निष्कर्ष - प्रारंभ की ओर लौटना

शांति की लालसा और अधिक पाने की चाह के बीच के जिस खिंचाव से हमने शुरू किया था, वह तब कम हो जाता है जब हम अपने प्रयासों के स्रोत को पहचानना सीख लेते हैं।

संतोष सीधे अपर्याप्तता के भाव को संबोधित करता है। यह हमें सिखाता है कि हम जीवन और स्वयं को मौजूदा रूप में स्वीकार करें तथा वर्तमान में बने रहें। कृतज्ञता इस चक्र को पूरा करती है, हमारे प्रयास करने की प्रवृत्ति को बाहर की ओर मोड़ देती है, महत्वाकांक्षा को सेवा का रूप देती है और विकास को दुनिया से अधिक ईमानदारी से जुड़ने की इच्छा बना देती है।

इन सभी अभ्यासों से यह स्पष्ट होता है कि उपस्थिति और आकांक्षा एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं। जब ये पर्याप्तता पर आधारित होती हैं और भक्ति की ओर उन्मुख होती हैं तब प्रयास करना पूर्ण रूप से जीवंत होने की अभिव्यक्ति बन जाता है। शांति का अर्थ विकास की अनुपस्थिति नहीं है और विकास शांति का शत्रु नहीं है। वे उस हृदय में मिलते हैं जो यह याद रखता है –

कुछ भी खोया नहीं है - क्योंकि प्रेम हमेशा से मौजूद था। फिर भी, सेवा को और गंभीरता से करने की गुंजाइश हमेशा रहती है।”

यही हार्टफुलनेस का मार्ग है।


संतोष सीधे अपर्याप्तता के भाव को संबोधित करता है। यह हमें सिखाता है कि हम जीवन और स्वयं को मौजूदा रूप में स्वीकार करें तथा वर्तमान में बने रहें। कृतज्ञता इस चक्र को पूरा करती हैहमारे प्रयास करने की प्रवृत्ति को बाहर की ओर मोड़ देती हैमहत्वाकांक्षा को सेवा का रूप देती है और विकास को दुनिया से अधिक ईमानदारी से जुड़ने की इच्छा बना देती है।


 


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जोसेफ़ रॉबिन्सन एक हार्टफुलनेस प्रशिक्षक और योग शिक्षक हैं। वे लगभग 20 और पढ़ें

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