इस लेख में सेंथिल विश्वनाथन मानवीय इंजन को अच्छी हालत में चलते हुए रखने के बारे में अपने कुछ विचार प्रकट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि इसके लिए उसके कल-पुर्ज़ों के बीच घर्षण न्यूनतम होना चाहिए यानी ऊर्जा का अपव्यय नहीं होना चाहिए। साथ ही इंजन पर जमी हुई कालिख या गर्द को भी नियमित रूप से साफ़ करते रहना चाहिए ताकि इंजन अच्छी हालत में काम करता रहे।
चलिए ज़रा हम एक पिस्टन इंजन के काम करने के तरीके पर ध्यान दें - सिलेंडर के अंदर चलने वाला पिस्टन ईंधन और हवा के मिश्रण से पैदा हुई ऊर्जा का उपयोग करता है। जब प्रारंभिक चिंगारी जलती है और ईंधन-हवा के मिश्रण से मिलती है तब इंजन काम करने लगता है। यह प्रारंभिक चिंगारी इंजन में जान डालती है। इस प्रारंभिक चिंगारी के कारण हुए ज्वलन से पैदा होने वाली ऊर्जा का उपयोग किया जाता है और क्रैंकशाफ़्ट के माध्यम से उसे बाकी सारे पुर्ज़ों को पहुँचाया जाता है जिससे फिर वे काम करने लगते हैं। गाड़ी के चलने और फिर पर्याप्त गति पकड़ने के बाद इंजन ईंधन-हवा के मिश्रण को तब तक खींचता रहता है जब तक वह मिश्रण उपलब्ध होता है, बशर्ते कि गाड़ी बंद न की जाए। इंजन की यह ऊर्जा गियर और ट्रांसमिशन द्वारा गाड़ी के बाकी पुर्ज़ों को शक्ति देने के लिए स्थानांतरित कर दी जाती है। इसमें गाड़ी के पहियों को घुमाना और ऑल्टरनेटर को शक्ति देना शामिल हैं जिससे बिजली पैदा होती है और उससे गाड़ी के ऑडियो सिस्टम आदि चलते हैं।
उसी तरह मानव तंत्र में हृदय उसका इंजन है जो प्राण रूपी प्रारंभिक चिंगारी के उसमें उतरते ही काम करने लगता है। काम करना शुरू करते ही वह जीवन की इस स्पंदनीय ऊर्जा का उपयोग करके अंदर से लेकर बाहर तक, संपूर्ण अस्तित्व को शक्ति देता है। हृदय की यह प्राणदायी शक्ति को भोजन और श्वास के मिश्रण (इंजन के मामले में ईंधन और हवा का मिश्रण) से ऊर्जा मिलती है जिससे स्थूल शरीर को शक्ति मिलती है। यही शक्ति फिर हमारे मन और बुद्धि के विकास का आधार बनती है। ‘सर्वम् अन्नम्’ अर्थात ‘सब कुछ अन्न (भोजन) है’ हमारे शरीर में क्रियान्वित होते हुए दिखता है। हृदय की यह जीवनदायी शक्ति हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीरों के लिए भोजन या ऊर्जा का काम करती है - दोनों का एक-दूसरे के ऊपर प्रभाव पड़ता है जो धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। इस ऊर्जा का उपयोग किस तरह से होगा, यह हमारे मन पर निर्भर करता है जो हमारे स्थूल शरीर को (गाड़ी के एक्सीलरेटर, ब्रेक और पहियों की तरह) नियंत्रित करता है। हमारा स्थूल शरीर तीन गुणों (सत्व, रजस और तमस), बुद्धि और हृदय के गुणों से प्रभावित रहता है जो व्यक्ति के विचार व कर्मों के रूप में प्रकट होते हैं।
इस जीवनदायी शक्ति से हमारे गर्भनाल में स्थित भ्रूण की मूल कोशिकाओं के सबसे महत्वपूर्ण गुण को भी शक्ति मिलती है। भ्रूण की मूल कोशिकाओं से शरीर की किसी भी प्रकार की कोशिका बन सकती है। इसका उपयोग फिर खराब ऊतकों एवं अंगों को पुनर्जीवित करने या ठीक करने के लिए किया जा सकता है।
किसी भी वाहन में जो हमें दिखता है वह सब सिर्फ़ उसकी ऊर्जा का बाहरी प्रकटीकरण है, जैसे उसके पहियों का चलना या स्टीयरिंग का घूमना। उसका इंजन उसके गियर, ट्रांसमिशन और क्रैंकशाफ़्ट से पूरी तरह से ढका होता है। उसी तरह, हमारे संपूर्ण अस्तित्व को शक्ति देने वाला, जिसकी शुरुआत हृदय के भीतर की प्राणदायक शक्ति से होती है, हमारे अंदरूनी अंगों, हमारे स्थूल शरीर, मन और बुद्धि से ढका होता है। इसीलिए हम उसे भूल जाते हैं जो हममें भीतर से बाहर तक प्राण भरकर हमारे सारे अस्तित्व को ऊर्जित करता है।
इंजन के बेहतरीन ढंग से चलते रहने के लिए उसके कल-पुर्ज़ों के बीच का घर्षण न्यूनतम होना चाहिए ताकि ऊर्जा बर्बाद न हो। साथ ही उस पर जमी हुई कालिख और गर्द को भी नियमित रूप से साफ़ करते रहना चाहिए ताकि इंजन सुचारू रूप से और अच्छी हालत में चलता रहे।
उसी तरह, हृदय पर जमी कालिख और गर्द को भी साफ़ करते रहना चाहिए ताकि हृदय में प्राप्त होने वाले स्पंदनों का बिना किसी अपव्यय, दूषण या मिलावट के रूपांतरण और उपयोग हो सके। मानवीय अस्तित्व की इस कालिख का कारण वे छापें हैं जो हमारे दैनिक कर्म, गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) और हमारे अहंकार से प्रभावित हमारी पसंद-नापसंद से बनती हैं।
किसी भी मशीन के सुचारू रूप से चलने के लिए उसके ट्रांसमिशन में न्यूनतम हानि होनी चाहिए। उसी तरह, इंसान होने के नाते, जो ऊर्जा मेरे पूरे अस्तित्व को जीवंत करती है उसे भी संतुलित और नियंत्रित होना चाहिए ताकि ऊर्जा का उपयोग सही कार्यों के लिए किया जा सके। यह तभी संभव है जब हमारा मन नियंत्रित होता है ताकि वह हृदय के साथ सामंजस्य में रहते हुए उससे मार्गदर्शित हो और परिणामस्वरूप हमारा शारीरिक अस्तित्व भी संतुलित रहे।

इंसान होने के नाते, जो ऊर्जा मेरे पूरे अस्तित्व को जीवंत करती है उसे भी संतुलित और नियंत्रित होना चाहिए ताकि ऊर्जा का उपयोग सही कार्यों के लिए किया जा सके। यह तभी संभव है जब हमारा मन नियंत्रित होता है ताकि वह हृदय के साथ सामंजस्य में रहते हुए उससे मार्गदर्शित हो और परिणामस्वरूप हमारा शारीरिक अस्तित्व भी संतुलित रहे।

सेंथिल विश्वनाथन
सेंथिल दूरसंचार और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में इंजीनियरिंग प्रबंधन व्यवसायी हैं। इनके नाम पाँ... और पढ़ें
