आचार्य श्री वर्मा जिन्हें डॉक्टर कृष्ण वर्मा के नाम से भी जाना जाता है, आयुर्वेदिक चिकित्सकों की उस वंशावली से ताल्लुक रखते हैं जो पिछली चार शताब्दियों से आयुर्वेदिक चिकित्सा के क्षेत्र में कार्य करती रही है। अपने इस ज्ञान को मानवजाति में व्यापक रूप से फैलाने की अंत:प्रेरणा लिए उन्होंने वर्ष 2001 में ‘श्री वर्मा ऑर्गेनाइज़ेशन’ की स्थापना की। हार्टफुलनेस योग अकैडमी की मेरियन मारसो ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के बारे में उनका साक्षात्कार लिया जो यहाँ प्रस्तुत है।

प्रश्न - नमस्ते डॉक्टर श्री वर्मा, आपका स्वागत है। क्या आप हमें अपनी पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताएँगे?

मेरियन, आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई। मैं दुरंगो परंपरा से हूँ और मेरा जन्म दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल के कन्याकुमारी ज़िले के सीमावर्ती गाँव में हुआ। हमारे परिवार की नौ पीढ़ियों ने आयुर्वेद, योग और वर्म चिकित्सा की सहायता से दीर्घकालिक बीमारियों का इलाज किया है लेकिन मैं अपने परिवार का पहला व्यक्ति हूँ जिसने आयुर्वेदिक चिकित्सा के क्षेत्र में विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। मेरे पिताजी कहते थे कि हालाँकि आयुर्वेद ने सदियों से अपने आप को सिद्ध किया है पर वे चाहते थे कि मैं इस क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण करूँ। इसलिए उन्होंने मुझे चेन्नई के डॉक्टर एम.जी.आर. मेडिकल विश्वविद्यालय में बैचलर आफ़ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी की डिग्री लेने के लिए भेजा। उस डिग्री से ही मुझे ‘आचार्य’ की उपाधि मिली।

हम रोग मुक्त जीवन के लिए निवारक स्वास्थ्य सेवा सिखाते हैं ताकि हम एक स्वस्थ मनुष्य में अच्छा स्वास्थ्य बनाए रख सकें और बीमारियों का इलाज आयुर्वेद, योग और वर्म चिकित्सा की मदद से कर सकें।

प्रश्न - योग और आयुर्वेद में क्या संबंध है?

आयुर्वेद केवल चिकित्सा विज्ञान ही नहीं है। हम इसे ‘शतायु’ कहते हैं - यदि कोई 100 साल बिना रोग के जीना चाहता है तो आयुर्वेद उसको वह दर्शन और उससे संबंधित सिद्धांतों को सिखाता है। इसके तीन भिन्न आयाम हैं।

पहला है बचाव - ‘दिनचर्या’ यानी दैनिक नित्य-कर्म और ‘ऋतुचर्या’ यानी मौसम के अनुसार नित्य-कर्म संबंधित मार्गदर्शन। यह जीवन के सिद्धांतों के बारे में बताता है - किस तरह से दिन की शुरुआत करें, किस तरह से अपने दिन को बिताने के लिए योजना बनाएँ। यह एक स्वस्थ जीवन जीने के तरीके बताता है। आप सूर्योदय से डेढ़ घंटे पहले उठें और अपने दिन की शुरुआत प्राणायाम से करें। यह ध्यान और शारीरिक व्यायाम के बारे में भी बात करता है। इसलिए सुबह के समय सर्वप्रथम योग किया जाना चाहिए जिससे 100 साल तक स्वस्थ जीवन को सुनिश्चित किया जा सके।

आयुर्वेद में स्वास्थ्य की परिभाषा क्या है? शरीर, मन और आत्मा का आनंदमय स्थिति में होना। हम शारीरिक दोषों यानी ‘वात’, ‘पित्त’ और ‘कफ’ के संतुलन और भावनात्मक दोषों यानी ‘सत्व’, ‘रजस’ और ‘तमस’ के संतुलन की आवश्यकता पर ज़ोर देते हैं। इसलिए स्वस्थ जीवन जीने के लिए अपना दिन योग से शुरू करें। यह दिनचर्या कहलाती है - अपने दिन की योजना बनाना।


पहला है बचाव - ‘दिनचर्या’ यानी दैनिक नित्य-कर्म और ‘ऋतुचर्या’ यानी मौसम के अनुसार नित्य-कर्म संबंधित मार्गदर्शन। 
यह जीवन के सिद्धांतों के बारे में बताता है - किस तरह से दिन की शुरुआत करें, किस तरह से अपने दिन को बिताने 
के लिए योजना बनाएँ। यह एक स्वस्थ जीवन जीने के तरीके बताता है।


ऋतुचर्या बताती है कि मौसम के बदलाव के अनुसार हम अपनी दिनचर्या को किस तरह से समायोजित करें - क्या खाएँ, क्या पिएँ, कैसे साँस लें और कैसे अपने स्थूल शरीर व मन को लचीला और आत्मा को शांतिपूर्ण बनाएँ। ये सारी चीज़ें आपके आंतरिक स्वास्थ्य को निर्धारित करती हैं। इस प्रकार आयुर्वेद और योग पूरी तरह से आपस में जुड़े हुए हैं।

आयुर्वेद का पहला सिद्धांत है सुरक्षात्मक स्वास्थ्य यानी योग और ध्यान। और दूसरा सिद्धांत है इलाज। यदि कोई योग का अभ्यास नहीं करता और अपने शरीर व मन का ध्यान नहीं रखता तो संभव है कि गलत खानपान, गलत जीवन शैली, दुर्घटना, संक्रमण और वंशानुगत समस्याओं के कारण रोग से ग्रस्त हो जाए।

शरीर में विषाक्त पदार्थ उत्पन्न होने के कई कारण हो सकते हैं जिनकी वजह से बीमारियाँ होती हैं। आयुर्वेद मूल कारण का इलाज करता है। इसलिए इलाज के पहले चरण में इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि बीमारी के मूल कारण को कैसे दूर करें। सबसे पहले यह जानने का प्रयास करें कि किस कारण से रोग उत्पन्न हुआ है। फिर अपने को अंदर से परेशान करने वाले समस्या के कारक तत्वों से अलग करके या उस बात से ध्यान हटाकर ‘प्रत्याहार’ का अभ्यास करें। एक बार यह अलगाव स्थापित हो जाए तब इलाज शुरू हो सकता है। 

इलाज चिकित्सा के सिद्धांतों पर आधारित होता है जिसका तब तक पालन करना होता है जब तक व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ न हो जाए। यदि कोई उन सिद्धांतों का अनुसरण नहीं करता है तो वह रोग जड़ से समाप्त नहीं हो पाता और रोग की जड़ें गहरी हो जाती हैं जिससे वह असाध्य रोग की श्रेणी में आ जाता है। यदि आपके रोग को असाध्य मान भी लिया जाता है तब भी आयुर्वेद के अनुसार एक अच्छा चिकित्सक आपको यह बता सकता है कि आप अपना उपचार कैसे करें। योग और विषाक्त पदार्थों को हटाने वाली दवाओं के उपयोग से चिकित्सक आपको पूरी तरह से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने में मदद कर सकता है। बस रोगी को किसी के सहारे की ज़रूरत होती है - चाहे वह योग का शिक्षक हो, चिकित्सक हो या परिवार का सदस्य। इनसे रोगी को ठीक होने में सहायता और आत्मविश्वास मिलता है। फिर भी जब तक रोगी अपनी ओर से प्रयास न करे रोग निवृत्ति कठिन बनी रहती है।

इसलिए आयुर्वेद बचाव, इलाज और पुनर्वास के लिए काम करता है तथा कष्टों की पीड़ा कम करता है। जब आयुर्वेद और योग दोनों को मिला लिया जाता है तब हम व्यक्ति की पीड़ा को कम कर सकते हैं। योग आयुर्वेद का एक ऐसा साधन है जिससे रोगी भले ही पूरी तरह से ठीक न हो पाए लेकिन उसके स्वास्थ्य में संतुलन अवश्य आ सकता है।

mental-wellbeing-ayurveda2.jpg


आयुर्वेद में स्वास्थ्य की परिभाषा क्या है? शरीर, मन और आत्मा का आनंदमय स्थिति में होना।


प्रश्न - आयुर्वेद मानसिक स्वास्थ्य में किस तरह मदद करता है? क्या यह कुछ नया है या आयुर्वेद मानसिक स्वास्थ्य का लंबे समय से इलाज करता रहा है?

आयुर्वेद को मन के इलाज करने में विशेषज्ञता प्राप्त है। हम मनुष्य को पाँच कोशों के संयोजन के रूप में देखते हैं - अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश। ये हमारे शरीर व मन में मौजूद ऐसी लाक्षणिक परतें हैं जिनके अंदर आत्मा निवास करती है।

एक उत्कृष्ट आयुर्वेदिक चिकित्सक यह सीखता है कि किस तरह से इन पाँच कोशों के ज़रिए शरीर को स्वस्थ करना है। अन्नमय कोश बाहरी शारीरिक ढाँचा है और प्राणमय कोश वह ऊर्जा है जो मनुष्य के शरीर और मन को जोड़ती है। मनोमय कोश मनुष्य में बहुत ही महत्वपूर्ण होता है (मनुष्य शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘मनस’ शब्द से हुई है) क्योंकि मनुष्य के संसार में मन पूरी तरह उस पर हावी रहता है। हर बीमारी कोष्ठ यानी पेट से शुरू होती है और अन्नमय कोश यानी स्थूल शरीर प्रभावित हो जाता है। जब इस पर ध्यान नहीं दिया जाता तब यह प्राणमय कोश को प्रभावित करता है जिसके कारण मनोमय कोश भी प्रभावित होता है।

मनुष्य होने के नाते हमारे भीतर भावनाएँ होती हैं। जब भावनात्मक चुनौतियों या आवश्यकताओं को ठीक से संभाला नहीं जाता तब हमारी जीवन शैली बिगड़ जाती है। हम गलत लोगों के संपर्क में आने लगते हैं और हमारी भावनाओं की समझ गलत होने लगती है। उसके कारण मन पर छापें पड़ती हैं यानी संस्कार बनते हैं। अगर ये संस्कार ठीक से साफ़ नहीं किए जाते तो यह भावनात्मक असंतुलन हमारे प्राणमय कोश को प्रभावित करता है जो हमारी शारीरिक बीमारियों का कारण बनता है।

आयुर्वेद में यद्यपि पाँचों कोशों का ध्यान रखा जाता है फिर भी मनोमय कोश अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यहाँ हम एलोपैथिक चिकित्सा से अलग हैं, जो कहती है कि रोग या तो साध्य है या फिर वह असाध्य है। आयुर्वेद कहता है कि अगर आप बीमारी को ‘असाध्य’ कह देते हैं तो मन इसको बहुत गंभीरता से लेता है। वह यह महसूस करता है कि अब कुछ भी नहीं किया जा सकता और फिर वह इसको ठीक करने के लिए कोई भी प्रयास नहीं करता। आयुर्वेद के फ़ायदों के बारे में बहुत से अनुसंधान हो चुके हैं और बहुत से शोध-पत्र मौजूद हैं। हमारे पूर्वजों ने भी इस दिशा में जो भी किया, उन्होंने उसको लिखकर रखा। लेकिन हम केवल उनके अनुसंधानों पर निर्भर नहीं रहते। हम व्यक्ति को इसके जीवित उदाहरण के रूप में देखते हैं।

mental-wellbeing-ayurveda3.jpg


इसलिए आयुर्वेद बचाव, इलाज और पुनर्वास के लिए काम करता है तथा कष्टों की पीड़ा कम करता है।


एक अच्छा चिकित्सक हर रोगी के बारे में अपने ज्ञान के आधार पर यह तय करता है कि आयुर्वेद उसके जीवन को कैसे बेहतर कर सकता है। चाहे वह भावनात्मक चुनौती हो, मानसिक विकार हो या फिर शारीरिक समस्या, हम स्वास्थ्य के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं और रोगी के मन को यही बताते हैं, “हाँ, आपका इलाज संभव है।” निश्चित ही उसे प्रयास करने होंगे नहीं तो यह एक झूठा वादा होगा - हम उसकी स्वयं ही स्वस्थ होने में सहायता करते हैं। चिकित्सक, दवाइयाँ, उपचार पद्धति, योग और ध्यान, ये सब स्वस्थ करने में 75% योगदान देते हैं, बाकी के 25% के लिए कष्ट सहने वाले यानी रोगी को यह भरोसा होना चाहिए कि ठीक हुआ जा सकता है और उसे इसके लिए प्रयास करने होंगे।

यदि रोगी अपना प्रयास नहीं कर पाता तब आयुर्वेद अन्नमय कोश यानी स्थूल शरीर का इलाज करता है। यह उसे विष-मुक्त करता है और रोगी को सामान्य प्राणायाम सिखाता है। यही प्राणमय कोश है जो हमें ऊर्जा देता है। जब अन्नमय कोश में विषाक्तता होती है तब प्राणमय कोश तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है। पंचकर्म विधि से अन्नमय कोश को साफ़ करने के बाद आप प्राणायाम के सरल अभ्यास शुरू कर सकते हैं। यह अत्यधिक आत्मविश्वास और अंदर अत्यधिक ऊर्जा देता है जिससे आपको समझ आता है कि आपके मन में क्या हो रहा है। आयुर्वेद मन की बहुत गहरी समझ रखता है, इसलिए आयुर्वेद और योग द्वारा भावनात्मक चुनौतियों का इलाज करना बहुत आसान है।

mental-wellbeing-ayurveda4.jpg


यह अत्यधिक आत्मविश्वास और अंदर अत्यधिक ऊर्जा देता है जिससे आपको समझ आता है कि 
आपके मन में क्या हो रहा है। आयुर्वेद मन की बहुत गहरी समझ रखता है।


मैं दरअसल स्वास्थ्य को बहाल करने में रोगी, उपचारक, चिकित्सक और योग शिक्षक के सामूहिक कार्य को बहुत पसंद करता हूँ। मैं वास्तव में महसूस करता हूँ कि यह बहुत महत्वपूर्ण है। हम स्थूल शरीर को विषाणु मुक्त करने से शुरू करते हैं। इससे रोगी को अंदर से ऊर्जा मिलती है और उसके मन को मदद मिलती है ताकि वह अपने उपचार का कार्य स्वयं ही करने लगे।

...... अगले अंक में जारी रहेगा

कलाकृति - जस्मी मुद्गल 


Comments

श्री वर्मा

श्री वर्मा

आचार्य श्रीवर्मा, जिन्हें

उत्तर छोड़ दें