महोत्सव के दूसरे दिन दाजी ने इस आयोजन के उद्देश्य के बारे में बताते हुए कहा कि विभिन्न धर्मों में अलग-अलग धार्मिक प्रथाएँ क्यों हैं, आत्मा को कैसे पोषित किया जाए और कैसे सभी लोग मिलकर संसार को बेहतर बना सकते हैं।
ईश प्रेमियों, आप सभी को मेरा हार्दिक प्रणाम। मुझे आशा है कि संसार भर में अब यह एक वार्षिक परंपरा बन जाएगी। एक साथ यहाँ आना तो केवल शुरुआत है। हेनरी फ़ोर्ड के शब्दों में जब हम साथ मिलकर काम करेंगे तो यह प्रगति में तब्दील हो जाएगा। जब हम हाथ मिलाकर आगे बढ़ते हैं तब हमें एक-दूसरे को समझना होगा और यह भी समझना होगा कि लक्ष्य को पूरा करने के लिए साथ मिलकर कैसे काम करना है।
कई लोग मुझसे पूछते हैं, “इस आयोजन का उद्देश्य क्या है?”
मेरा उत्तर होता है, “इस अवसर पर एक साथ मिलना, एक-दूसरे से सीखना, एक-दूसरे को समझना, एक-दूसरे को जानना और फिर सारे विश्व में कार्यक्रमों की शुरुआत करना।”
बहुत से संगठनों के स्वयंसेवक विशिष्ट परियोजनाओं पर एक साथ काम कर सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के कुछ सतत विकास लक्ष्य हैं जिनमें सभी प्रकार के प्रदूषण नियंत्रण (मिट्टी, पानी, हवा), महिलाओं की शिक्षा, समानता, गरीबी उन्मूलन आदि शामिल हैं। लेकिन मूल रूप से उन्होंने एक चीज़ को शामिल नहीं किया है जो कि बाकी सभी समस्याओं का कारण है।
फ़्रांस के एक प्रिय भाई ने मन को नियंत्रित करने के लिए ध्यान की आवश्यकता पर प्रकाश डाला ताकि सभी सतत विकास लक्ष्यों पर ध्यान दिया जा सके। एक ऐसा मन जो भिन्नताओं (द्वंद्वों) से परे है, वह सही व गलत में भेद कर सकता है जबकि एक अनियंत्रित मन हमेशा गलत काम करने के लिए बहक सकता है। एक समझदार, नियंत्रित मन वाला व्यक्ति हवा को प्रदूषित करने या पानी को प्रदूषित करने के बारे में क्यों सोचेगा? यह संभव नहीं है, इसीलिए ध्यान की आवश्यकता है। यदि संक्षेप में कहें तो संसार में जितने भी प्रकार के प्रदूषण हैं वे मानसिक प्रदूषण की ही देन हैं।
भारतीय परंपरा में हम तुलसी के पत्ते तोड़ते हैं। क्या तुलसी देवी हैं? नहीं। लेकिन फिर भी हम उसे देवी कहते हैं। क्यों? क्योंकि तुलसी में इतने उपचारी गुण हैं कि किसी को भी उसे नष्ट नहीं करना चाहिए। हमारे पूर्वज तुलसी को देवी कहते थे ताकि हम उसके पौधों को नष्ट न करें बल्कि उनकी पूजा करें। क्या यह अद्भुत नहीं है, एक छोटे से पौधे का सम्मान करना, उसकी पूजा करना?
इसी प्रकार कई अन्य प्रथाएँ भी हैं जैसे प्राणायाम आदि। क्या आपको लगता है कि श्वास खींचना और श्वास छोड़ना, ईश्वर को आपकी ओर आकर्षित करेगा? बिलकुल नहीं। लेकिन जब प्राणायाम धर्म से जोड़ दिया जाता है तो लोग इसे करते हैं। प्राणायाम मुख्य रूप से आपके स्वास्थ्य और कल्याण हेतु आपके शरीर के कोशों की देखभाल करने के लिए है।
हिंदू धर्म में सात्विक आहार नियत किया गया है। क्यों? क्योंकि सात्विक आहार के द्वारा हम अपने स्थूल शरीर का पोषण करते हैं। मानसिक गतिविधि के माध्यम से, जैसे अपने बड़ों के साथ बातचीत करना, स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय में पढ़ाई करना और अब ‘गूगल माता’ के माध्यम से, हम अपने मस्तिष्क को पोषित करते हैं।
हम आत्मा का पोषण कैसे करते हैं? हार्टफुलनेस के आदि-गुरु श्री रामचंद्र जी, जिन्हें लालाजी महाराज के नाम से भी जाना जाता है, ने हमें बताया कि अपनी आत्मा को समृद्ध बनाने के लिए हम अपने प्राण को किस प्रकार समृद्ध बनाते हैं। उन्होंने बताया कि यह ‘प्राणस्य प्राण:’ या ‘प्राणाहुति’ के माध्यम से होता है जो एक समर्थ योगी द्वारा प्रेषित सूक्ष्मतम प्राण है। यह हमारी सुप्त चेतना को जागृत करता है और मानव के मूलभूत आधार से मानवीय स्तर तक और मानवीय स्तर से दैवीय स्तर तक उस चेतना की यात्रा में मदद करता है। यह इसका वायदा है। यह कोई झूठा वायदा नहीं है। यह एक ऐसा वायदा है जिसे अनुभव किया जा सकता है।
विज्ञान में हमें किसी बात पर विश्वास करने की ज़रूरत नहीं होती। वहाँ तथ्य होते हैं - गुरुत्वाकर्षण, क्वांटम क्षेत्र, आनुवंशिकी के नियम, रासायनिक प्रतिक्रियाएँ, ऊष्मगतिकी (thermodynamics) के नियम - जहाँ मौलिक नियम अपरिवर्तनशील होते हैं। अध्यात्म में भी ऐसा ही है। यहाँ सभी को संचालित करने वाला मूलभूत नियम है प्रेम। फिर हम “एकम ब्रह्म द्वितीय न अस्ति” की बात करते हैं, जिसका अर्थ है कि ईश्वर केवल एक ही है। कुरान में भी यही कहा गया है “ला इलाहा इल्लल्लाह”, जिसका अर्थ भी यही है कि केवल एक ही ईश्वर है। ईसाई परंपरा में भी एक ही ईश्वर है।
..यह ‘प्राणस्य प्राण:’ या ‘प्राणाहुति’ के माध्यम से होता है जो एक समर्थ योगी द्वारा प्रेषित सूक्ष्मतम प्राण है। यह हमारी सुप्त चेतना को जागृत करता है और मानव के मूलभूत आधार से मानवीय स्तर तक और मानवीय स्तर से दैवीय स्तर तक उस चेतना की यात्रा में मदद करता है।
ईसा मसीह ने कहा, “मैं मार्ग हूँ, सत्य हूँ और जीवन हूँ। मुझसे हुए बिना कोई परमपिता तक नहीं पहुँचता। यदि तुम सचमुच मुझे जानते हो तो तुम मेरे पिता को भी जानते होगे।” भगवान कृष्ण ने कहा, “सभी धर्मों का त्याग कर मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सब प्रकार के पापों और क्लेशों से बचाऊँगा।“ बौद्ध धर्म में यह “बुद्धम् शरणम् गच्छामि” है, जिसका अर्थ है कि मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ। जब हम ऐसे वचन सुनते हैं और उन्हें समझ नहीं पाते तो वे सतही तौर पर अहंकारपूर्ण प्रतीत होते हैं। लेकिन वे ऐसे नहीं हैं। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि प्रेम का अर्थ समर्पण है।
यहाँ, मैं हार के रूप में समर्पण की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि मैंने स्वयं पर विजय प्राप्त कर ली है। मेरा अहंकार अब समाप्त हो गया है इसलिए अब ‘मैं’ का कोई अस्तित्व नहीं है। हम कहते हैं कि प्रिय ईश्वर, आप ही हमारे एकमात्र ध्येय हैं।
इस अवस्था का एहसास हम किसी भी धर्म के अनुयायी के रूप में कर सकते हैं। यदि आप हिंदू हैं तो सर्वश्रेष्ठ हिंदू बनें। यदि आप ईसाई हैं तो सर्वोत्तम ईसाई बनें और यदि आप मुसलमान हैं तो सबसे अच्छे मुसलमान बनें इत्यादि।
यदि आप अपने धर्म का पूर्णतः पालन करते हैं तो क्या युद्ध होंगे? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। सभी धर्म विश्वसनीय प्रणालियाँ हैं। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महानिदेशक कोफ़ी अन्नान ने एक बार कहा था, “समस्या धर्म में नहीं है बल्कि धर्म में श्रृद्धा रखने वालों में है।” श्रद्धालु केवल अपने धर्म को मानते हैं और सोचते हैं कि वे दूसरों से श्रेष्ठ हैं। यही समस्या है। मेरे गुरुजी महाराज कहते थे कि यह सोचने में कोई बुराई नहीं है कि आप महान हैं लेकिन हमेशा यह सोचें कि दूसरा व्यक्ति अधिक महान है।
तो, इस थोड़ी सी समझ के साथ व शांतिपूर्ण हृदय के साथ आइए हम सभी रोज़ाना अभ्यास करें। जब आप नमाज़ पढ़ें तो ईश्वरीय कृपा के प्रति ग्रहणशील रहें। जब आप अपने इष्ट की पूजा करें तो ग्रहणशील रहें, प्रेमपूर्ण बनें तथा अपना दिल खोलें। आप जो भी अभ्यास करते हैं उसे ग्रहणशील हृदय के साथ करें। भय या प्रलोभन के साथ एक धार्मिक क्रिया के रूप में नहीं, भीख माँगने के लिए भी नहीं बल्कि प्रेम के लिए प्रेम से करें।

आप जो भी अभ्यास करते हैं उसे ग्रहणशील हृदय के साथ करें। भय या प्रलोभन के साथ एक धार्मिक क्रिया के रूप में नहीं, भीख माँगने के लिए भी नहीं बल्कि प्रेम के लिए प्रेम से करें।
जब हम इस प्रकार से करेंगे तो हम बदल जाएँगे और जब हम बदल जाएँगे तो संसार बदल जाएगा। और इस प्रकार हम संसार के परिवर्तन में और भी अधिक योगदान दे पाएँगे।
कलाकृति - ए.आई. द्वारा रचित

