परिवार और दोस्तों को पत्र
प्रिय दाजी,
समर्पण की अवधारणा मेरे व्यक्तित्व से मेल नहीं खाती है। मैं क्या करूँ?
प्रिय रॉबर्ट,
समर्पण की अवधारणा को बहुत लोगों ने गलत समझा है। संभवतः इसका कारण स्वतंत्रता खो जाने का भय ही है। हमें एक बात अवश्य समझनी होगी कि आध्यात्मिकता में सामान्य उलट-फेर तभी होता है जब हृदय से किया गया समर्पण हमें वास्तविक स्वतंत्रता दिलाता है।
मैं इस विषय की गहराई में जाकर बाबूजी का एक संदेश उद्धृत करना चाहूँगा - “सच्चाई तो यही है कि चाहे जो कुछ भी हो भगवान के प्रति समर्पित रहें। यदि आपको ईश्वर प्राप्ति के लिए अपना शीश भी देना पड़े तो इस सौदे को सस्ता ही समझना चाहिए (शीश दिए यदि हरि मिले, तो भी सस्ता जान)। प्राचीन काल के ऋषियों ने ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करना और उसी में खुश रहने की हालत को समर्पण माना है।”
अनेक साधक शायद अपना शीश अर्पित करने के तरीके को चुनेंगे। सती-प्रथा की परंपरा की तरह ईश्वर को प्राप्त करने का यह तरीका आसान है और इसमें एक ही बार दर्द को बर्दाश्त करना पड़ता है। मैंने स्वयं बार-बार यह अनुभव किया है और दूसरे लोगों में भी यह पाया है कि अपनी विचारधाराओं, राय, पसंद और दृष्टिकोण यानी अहंकार के विभिन्न पहलुओं को छोड़ना ज़्यादा मुश्किल होता है। हिंदी में अहंकार के अनेक पहलुओं को अभिमान यानी मन की अभिव्यक्तियाँ भी कहते हैं। यहाँ तात्पर्य अहंकार से है असली भौतिक सिर से नहीं। अहंकार के नकारात्मक पहलुओं से छुटकारा पाने की तुलना में मृत्यु का भय न के बराबर है।
यदि अहंकार पर महारत हासिल कर ली जाए तो आप मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर सकते हैं। वास्तव में आप को ‘अभयम्’ की दशा का वरदान मिल सकता है। मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेने से आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि अजन्मे को मृत्यु का कैसा भय! आत्मा की मृत्यु का अर्थ है दिव्यता का लोप हो जाना। क्या कभी ऐसा हो सकता है?
जब हम अहंकार को नियंत्रित, रूपांतरित व परिष्कृत कर लेते हैं और इसके परे चले जाते हैं तब हम वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त करते हैं जिससे फिर हम परमानंद प्राप्त करते हैं। तब सच्चे अर्थ में हमारा पुनर्जन्म होता है। क्या हमारी पहचान कभी खत्म हो सकती है? नहीं। अहम् आत्मा की छाया है। यह छाया या उज्जवल हो सकती है या गहरी हो सकती है। और यह जितनी कम या ज़्यादा गहरी होगी, उसी के अनुरूप व्यक्ति के चरित्र का गठन होगा।
इस निरंतर परेशान करने वाली समस्या को हल करने के लिए बाबूजी एक सरल-सा उपाय बताते हैं। वे कहते हैं, “अब मैं एक नुस्खा बताता हूँ - ईश्वर और केवल ईश्वर तक पहुँचने के लिए हमारे अंदर विशुद्ध व सहज ‘तड़प’ होनी चाहिए। यदि आरंभ में असल भाव न हो तो केवल उसकी नकल ही करें। यदि कोई लगातार पागल व्यक्ति की नकल करे तो उसका पागल हो जाना निश्चित है। ऐसे ही यदि व्यक्ति ईश्वर तक पहुँचने की लगातार कोशिश करता रहे तो अंततः उसे ईश्वर ज़रूर मिल जाएँगे। आमीन।”
“ईश्वर और केवल ईश्वर तक पहुँचने के लिए हमारे अंदर विशुद्ध तथा सहज ‘तड़प’ होनी चाहिए,” इस कथन में बहुत गहन सुझाव निहित हैं –
तड़प
विशुद्ध
सहज
ईश्वर तक पहुँचना
केवल ईश्वर तक
ईश्वर तक पहुँचने के लिए हमारी तड़प विशुद्ध और सहज होनी चाहिए। इसमें कोई स्वार्थ अथवा इच्छा नहीं होनी चाहिए - जैसे “यदि मैं ईश्वर तक पहुँच जाऊँ तो यह रोका जा सकता है और वह प्राप्त किया जा सकता है,” इत्यादि।
बाबूजी यह कहते हुए हमें अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित भी करते हैं कि ऋषियों ने समर्पण करने के लिए ईश्वर की इच्छा के प्रति स्वीकार्यता और उसी में प्रसन्न रहने की
अलग-अलग अवस्थाएँ बताई हैं। इन ऋषियों के लिए स्वीकार्यता, उनकी ‘शरणागति’ (आश्रय और सुरक्षा के भाव से समर्पण) की अवस्था को व्यक्त करने का एक तरीका था। लक्ष्य पर सहज ध्यान देना प्रभावशाली अहम् को कम करने में चमत्कार की तरह काम करता है। जब स्वीकार्यता सामान्य स्वीकार्यता न होकर प्रसन्नतापूर्वक की गई स्वीकार्यता होती है तब यह परिणाम को परिवर्तित कर उसे तत्काल संभव बना देती है।
शिष्य जब इस अवस्था में पहुँच जाता है तब गुरु की सजग दृष्टि उस पर हमेशा बनी रहती है। गुरु अत्यंत प्रेम और सराहना करते हुए ऐसे शिष्य को याद करने के लिए विवश हो जाता है। उपहार स्वरूप ऐसे शिष्य को पाकर गुरु ईश्वर का स्तुति गान करता है। एक ओर तो गुरु सदा अपने गुरु के प्रति कृतज्ञ रहता है जबकि दूसरी ओर गुरु का शिष्य के लिए प्रेम बढ़ता जाता है। गुरु और शिष्य के पारस्परिक स्मरण, पारस्परिक प्रशंसा और पारस्परिक प्रेम से उनके बीच तालमेल बढ़ता जाता है और दोनों हृदय ऐसे मिल जाते हैं जैसे दो विशाल महासागरों का मिलन हो रहा हो।
इसके बाद दोनों के लिए एक ही रास्ता है - वे इस लयावस्था को और अधिक गहन करते चले जाएँ।
नौ माह के बाद एक माँ के लिए अपने बच्चे को जन्म देना आवश्यक होता है और यदि ऐसा नहीं होता है तो दोनों का ही जीवन खतरे में पड़ जाता है। जन्म होने पर भ्रूण की लंबी निद्रा समाप्त हो जाती है। तब वह अंतहीन संभावनाओं की शुरुआत करने के लिए तैयार होता है। फिर भी यह अलग होने की प्रक्रिया तो है और इसमें भय भी होता है।
शिष्य की ओर से जब गुरु के प्रति शुद्ध शरणागति परिपक्व हो जाती है और गुरु की ओर से शिष्य के प्रति अत्यधिक प्रेम उत्पन्न होता है तब सात महीने के अंदर शिष्य का जन्म एक दूसरे आयाम में आध्यात्मिक अस्तित्व (S.E.) के रूप में होता है। गुरु के असीम गर्भ में गुरु और शिष्य के बीच यह पारस्परिक प्रेम शिष्य की आत्मा का पोषण करता रहता है।
आध्यात्मिक अस्तित्व बनने के लिए इतनी तेज़ी से उन्नति करने वाली आत्माएँ दुर्लभ हैं। यह बिलकुल एक दूसरा जन्म है - एक आध्यात्मिक जन्म। इसे पारंपरिक रूप से ‘द्विजन्मा’ या ‘द्विज’ कहते हैं। इस प्रकार के जन्म में भय और पीड़ा की अनुभूति बिलकुल नहीं होती जैसी इस भौतिक जगत में प्रत्येक जन्म के समय होती है।
इस तरह हम एक साधक के जीवन को धीरे-धीरे एक शिष्य के रूप में बदलते हुए देखते हैं जो फिर बाद में एक भक्त बनता है और एक आध्यात्मिक अस्तित्व के रूप में दिव्य लोक में जन्म लेता है। दिव्य लोक में एक आध्यात्मिक अस्तित्व का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि भौतिक संसार में उस भक्त की जीवन शैली कैसी है।
अपने अहंकार, जिसे लोग छोटा ‘स्व’ भी कहते हैं, का नाश करने से कुछ हासिल नहीं होता। साक्षात्कार हो जाने पर यही ‘स्व’ तब ‘आत्मन्’ के रूप में अपनी चमक बिखेरता है क्योंकि यह ‘परम-आत्मान्’ का अंश है। यदि आप इस छोटे ‘स्व’ को, इस नन्ही बूँद को नष्ट करने की कोशिश करेंगे तो यह उस अनंत सागर में कैसे लय होगी?
अपनी सुरक्षित यात्रा के लिए आश्वस्त रहें।
शुभकामनाओं सहित,
कमलेश

