बृंदा मिलर वनेसा पटेल को बताती हैं कि कला के प्रति उनका विविधतापूर्ण दृष्टिकोण उनके जीवन जीने और नागरिक नेतृत्व के तरीके को भी दर्शाता है।
वनेसा पटेल - बृंदा आपके कला के कार्यों में एकल प्रदर्शनियाँ, निजी संग्रह और सार्वजनिक भित्ति-चित्र शामिल हैं। यह रचनात्मक यात्रा कैसे विकसित हुई है?
बृंदा मिलर - सच कहूँ तो शायद ऐसा लगे कि मैं कोई बहुत बड़ी योजनाएँ बनाती हूँ, लेकिन मैंने कभी कोई योजना नहीं बनाई। निश्चित रूप से मैं हमेशा कुछ हासिल करना चाहती थी, लेकिन मेरी बहुत सारी कृतियाँ मेरे अंतर्ज्ञान और आकस्मिक प्रेरणा - आप इसे जो भी नाम दें - पर आधारित रही हैं। यह उपलब्धि मेरे खुद के लिए थी - खुद को साबित करने के लिए कि मैं यह कर सकती हूँ, मैं सक्षम हूँ और मुझमें प्रतिभा है। जब आप युवा होते हैं तब आपके अंदर उतना आत्मविश्वास नहीं होता लेकिन बढ़ती उम्र के साथ यह बेहतर होता जाता है।
मैं बचपन में बहुत शर्मीली थी। लेकिन यह भी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है कि ज़्यादा मिलनसार होना बेहतर होता है। मैं यह अपने बच्चों में भी देखती हूँ। मैं हमेशा उन्हें जैसे हैं वैसे ही रहने देती हूँ क्योंकि मुझे पता है कि वे अंततः अपनी राह खोज लेंगे और उससे सीखेंगे। अंततः केवल हुनर ही महत्व रखता है, और कुछ नहीं।
आजकल आपको जनसंपर्क, बहुत प्रयास और सोशल मीडिया की ज़रूरत होती है। आप इससे सहमत हों या न हों, लेकिन सच्चाई यह है कि यही चीज़ें आपके काम आती हैं। मेरी माँ का परिवार बहुत संस्कारी और शांत स्वभाव का था और दूसरी ओर, मेरे पिता का परिवार बहुत अधिक दिखावे में विश्वास करने वाला था। वे हमेशा मुझसे कहते थे, “तुम्हें बाहर जाकर खुद को आगे बढ़ाना चाहिए।” इन दोनों के मेल ने ही वास्तव में मेरे व्यवसाय को वैसा बना दिया जैसा वह है।
वनेसा पटेल - आपने न्यूयॉर्क के पार्सन्स स्कूल ऑफ़ डिज़ाइन में वस्त्रकला और चित्रकला सीखी है। विभिन्न माध्यमों की ओर आपको क्या आकर्षित करता है?
बृंदा मिलर - वास्तव में, मेरी रचनात्मक यात्रा मिश्रित माध्यमों पर आधारित है। मैं हमेशा कहती हूँ कि मेरा जीवन भी मेरी कला की तरह है जिसमें बहुत विविधता रही है। मेरी शादी एक अलग समुदाय के व्यक्ति से हुई। मेरे माता-पिता भी एक-दूसरे से बहुत भिन्न थे। हम कभी बहुत अनुशासित नहीं रहे और हमें मेल खाते कपड़े पहनना भी पसंद नहीं था। हमने हमेशा अलग-अलग चीज़ों को मिलाकर संयोजन बनाए। यहाँ तक कि जो खाना हम बनाते थे, वह भी कभी किसी तयशुदा विधि से नहीं बनता था। वह हमेशा अलग-अलग प्रकार की सामग्रियों को मिलाकर तैयार किया जाता था। यही मेरी यात्रा रही है।
मेरी कला के साथ भी ऐसा ही है। यह कभी कपड़े का टुकड़ा हो सकता है या कागज़ का और फिर मैं उन्हें मिलाकर उस पर बहुत सारा रंग भर देती हूँ - यह बहुत स्वाभाविक और आकस्मिक होता है, जैसे मैं अपनी ज़िंदगी जीती हूँ। यह विविधतापूर्ण है। मेरे घर का फ़र्नीचर भी ऐसा ही है। मेरे पास अलग-अलग प्रकार का फ़र्नीचर है - कुछ आर्ट डेको (वर्ष 1920-1930 में प्रचलित) शैली का है तो कुछ आधुनिक शैली का है। और यह फ़र्नीचर अलग-अलग रंग का है।
मुझे लगता है कि यह गुण मेरी बेटियों में भी है। वे दोनों वास्तुविद (architect) हैं और अच्छी कलाकार भी हैं। इससे जीवन रोचक हो जाता है। अन्यथा जीवन बहुत नीरस होता। इसलिए मैं उन लोगों में से हूँ जो किसी तयशुदा दिनचर्या का पालन नहीं करते। मैं भले देर से उठूँ, लेकिन अंततः मैं पूरी तरह व्यवस्थित होती हूँ, अपनी ज़िम्मेदारी समझती हूँ और यह सुनिश्चित करती हूँ कि काम पूरा हो गया है। लेकिन हम समय की सीमाओं में बंधे नहीं हैं। हम किसी बंधन या प्रतिबंध में नहीं रहते। यह एक तरह से अव्यवस्थित रहते हुए भी व्यवस्थित जीवन जीने का तरीका है।
मेरी शादी ऐसे व्यक्ति से हुई है जो मुझ से बिलकुल विपरीत है। वह बहुत व्यवस्थित है। इससे एक अच्छा संतुलन बन जाता है और हम इसे निभाते हैं।
हमने हमेशा अलग-अलग चीज़ों को मिलाकर संयोजन बनाए। यहाँ तक कि जो खाना हम बनाते थे, वह भी कभी किसी तयशुदा विधि से नहीं बनता था। वह हमेशा अलग-अलग प्रकार की सामग्रियों को मिलाकर तैयार किया जाता था। यही मेरी यात्रा रही है।

वनेसा पटेल - आपने कई कलाकारों के साथ काम किया है। हाल ही में आप किस पर काम करती रही हैं?
बृंदा मिलर - हाँ, मैंने कई कलाकारों के साथ काम करने का आनंद लिया है। आप एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखते हैं। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो अपने काम को लेकर अधिकार जताते हैं यानी दूसरों को उसमें शामिल नहीं करते। मैं तो खुशी-खुशी अपने ‘राज़’ भी बता सकती हूँ।
कुछ समय पहले ही मैंने कलाकार राखी केन के साथ चीनी-मिट्टी की कृतियाँ बनाईं। शुरुआत से ही हमारे अच्छे मित्रवत संबंध बन गए, हालाँकि हम एक-दूसरे को पहले से नहीं जानते थे। मुझे पहले से यह जानने की ज़रूरत नहीं होती कि मैं किसी व्यक्ति के साथ सहज रहूँगी या नहीं। मेरे काम का एक हिस्सा यह भी है कि मैं दूसरे व्यक्ति को सहज महसूस कराऊँ। हमने मिलकर कुछ सुंदर चीनी-मिट्टी की कृतियाँ बनाईं और हाल ही में हमने एक प्रदर्शनी भी आयोजित की।
पहले मैंने उन कलाकारों के साथ काम किया जिनसे मैं कला शिविरों और कार्यशालाओं में मिली थी। तभी मैं वास्तव में अन्य कलाकारों को जान पाई। एक-दूसरे से सीखने और साझा करने के लिए बहुत कुछ है। हमें साथ में बहुत मज़ा भी आया और मैं हमेशा ऐसी परियोजनाओं का इंतज़ार करती हूँ।
वनेसा पटेल - आप एक ऐसी कलाकार हैं जो कई भूमिकाएँ निभाती हैं। आप संग्रहालय अध्यक्ष, उत्सव निदेशक, संग्रहालय ट्रस्टी और कई गैर-सरकारी संगठनों के लिए परामर्शदाता हैं। आप इन विविध भूमिकाओं को कैसे निभाती हैं?
बृंदा मिलर - मैं यह नहीं कहूँगी कि इन भूमिकाओं को निभाने में बहुत चुनौतियाँ हैं, सिवाय समय की कमी के। इसलिए हर चीज़ पर ध्यान देना थोड़ा कठिन हो जाता है। मुझे ऐसे कई कामों के लिए ‘ना’ कहना पड़ता है जिनके लिए मैं ‘हाँ’ कहना चाहती हूँ।
लेकिन मैं जितना कर सकती हूँ उतना करती हूँ क्योंकि मुझमें चीज़ों को समन्वित करने की योग्यता है। मैं हर साल कला उत्सव आयोजित करती हूँ, जिसमें मेरा आधा समय चला जाता है। बाकी आधे समय में मुझे पेंटिंग करना पसंद है। मुझे वह बहुत उपचारात्मक लगता है। वह ध्यान जैसा है और मैं उसे इसी तरह देखती हूँ।
हाँ, बाकी का आधा समय बहुत तनावपूर्ण होता है, लेकिन वह हमें एक अलग तरह का उत्साह देता है। वह निश्चित रूप से ध्यान जैसा तो नहीं है, लेकिन वह कुछ ऐसा है जिसके आप आदी हो जाते हैं। वह एक अलग तरीके से ऊर्जा प्रदान करता है। वह आपको उन कामों को करने के लिए प्रेरित करता है जिन्हें आप सोचते थे कि आप नहीं कर सकते। और जब सब पूरा हो जाता है तब आप महसूस करते हैं, “वाह, मैंने यह कर दिखाया। मैं कुछ भी कर सकती हूँ।”
वह एहसास कला उत्सव का आयोजन करने से होता है जबकि पेंटिंग तो मैं आँखें बंद करके भी कर सकती हूँ। अब यह मेरे लिए चुनौतीपूर्ण नहीं रहा और मैं मानती हूँ कि मुझे यह बहुत पसंद है।

वनेसा पटेल - काला घोड़ा कला महोत्सव भारत का सबसे बड़ा बहुसांस्कृतिक कला उत्सव है। आप उसकी निदेशक हैं और उसके साथ वर्ष 1998 से जुड़ी हुई हैं। इस संदर्भ में आपकी मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?
बृंदा मिलर - यह काम दिन-ब-दिन और कठिन होता जा रहा है और मेरी उम्र भी बढ़ रही है। लेकिन किसी तरह मैं संभाल रही हूँ। मेरे साथ काम करने वाले लोग अद्भुत हैं। इस काम को लेकर वे बहुत उत्साही हैं।
दर्शकों की बिलकुल भी समस्या नहीं है। यहाँ मुंबई में दर्शक शानदार हैं। वे ही हमें इसे जारी रखने की प्रेरणा देते हैं। वे हमारे पास आकर कहते हैं कि हमारे लिए यह आयोजित करने के लिए धन्यवाद। उन्हें पता है कि हम यह उनके लिए कर रहे हैं और वे इस बात की बहुत सराहना करते हैं।
अब एक कार्य जो बहुत चुनौतीपूर्ण है, वह है प्रायोजकता (sponsorship) - धन संचयन - क्योंकि हम इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत नए हैं। किसी के पास जाकर पैसे माँगना हमें अच्छा नहीं लगता, लेकिन यह हमारे काम का हिस्सा है। इसके लिए एक विशेष कौशल की आवश्यकता होती है। मुझे लगता है कि हम इसमें और बेहतर कर सकते हैं।
पहले हमें स्थानीय सरकार से अनुमति लेने में भी बहुत कठिनाई होती थी। लेकिन अब स्थिति काफ़ी बेहतर हो गई है। सरकार बहुत प्रोत्साहित कर रही है और इसे अपना ही आयोजन मानती है। सभी सरकारों को ऐसा ही होना चाहिए - अपने नागरिकों, संस्कृति और विरासत का समर्थन करना चाहिए। हम ही हैं जो इतने वर्षों से यह कार्य कर रहे हैं और शायद इसलिए टिके रहे हैं क्योंकि इसमें सरकार की ओर से कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ।

वनेसा पटेल - हाँ, और आपने बहुत काम किया है, यहाँ तक कि जगह की सुंदरता बढ़ाने का भी। आपने पुलिस कैफ़े और मुंबई के कई अन्य स्थानों पर सुंदर भित्ति चित्र बनाए हैं। इसलिए मुझे यकीन है कि वे आपके इस योगदान की बहुत सराहना करते हैं।
बृंदा मिलर – मैं दिखावा नहीं कर रही हूँ, यह तो बस मेरा शौक था। बहुत यात्रा करने के बाद हमने देखा है कि सार्वजनिक स्थानों पर कला किसी शहर को कितना सुंदर बना देती है। मेरे पिता की एक पहल थी, ‘ग्रीनिंग मुंबई’ यानी मुंबई को हरित बनाना। मेरे लिए किसी जगह को हरा-भरा बनाना या पेड़ लगाना भी एक कला है। मेरा मानना है कि यदि हर जगह कला नहीं हो सकती तो कम से कम अपने शहर को पौधारोपण से सुंदर बनाना चाहिए। हमारी परवरिश इसी तरह की सोच के साथ हुई है। इसलिए मुझे लगता है कि यह हमारी नसों में है कि हम इन सब चीज़ों की कद्र करते हैं।
वनेसा पटेल - यह शहर को कुछ लौटाने का एक तरीका भी है।
बृंदा मिलर – हाँ, बिलकुल! इसी वजह से मैंने कला महोत्सव के लिए काम करना शुरू किया, क्योंकि मैं शहर को कुछ लौटाना चाहती थी। मैं एक ऐसे तरीके से लौटाना चाहती थी जो सामान्य सहयोग के तरीकों से अलग हो, जो हम वैसे भी करते हैं। मैं कुछ रचनात्मक करना चाहती थी। इसलिए जब यह उत्सव का विचार सामने आया, मैं बहुत उत्साहित हुई। और अब ज़रा सोचिए! इसे आयोजित करते हुए सत्ताईस साल हो गए हैं।

वनेसा पटेल - यह स्पष्ट है कि आपने परिवार की परंपरा का पालन करते हुए एक सच्चे नागरिक होने का परिचय दिया है। आपके पिता मुंबई के जिलाधीश थे और आपने भी अपने विशिष्ट अंदाज़ में इस शहर पर अपनी छाप छोड़ी है। आप इस विरासत की निरंतरता को कैसे देखती हैं?
बृंदा मिलर – मैं भविष्य के बारे में नहीं जानती। सच कहूँ तो मुझे नहीं मालूम कि कौन इसे आगे जारी रखेगा। मेरी बेटियाँ निश्चित रूप से मेरे विचारों से सहमत हैं, लेकिन वे भी अपने व्यवसाय में बहुत व्यस्त हैं। वे चाहें भी तो समय कहाँ से निकालेंगी। मैं किसी पर कुछ थोपती नहीं हूँ। और मैं इस बारे में भी ज़्यादा नहीं सोचती कि मेरे बाद कौन इस कार्य को संभालेगा। जब समय आएगा तब अपने आप सब ठीक हो जाएगा।
वनेसा पटेल - आपकी तरह शायद वे भी इस कार्य की ओर आकर्षित हो जाएँ और फिर उसमें शामिल हो जाएँ। मेरा मानना है कि गहन रुचि भीतर से ही आती है। आप CSMVS संग्रहालय (पूर्व नाम, प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय) के साथ अपने काम के बारे में क्या कहना चाहेंगी?
बृंदा मिलर – संग्रहालय में पद मुझे केवल इसलिए मिला क्योंकि वहाँ के प्रबंधकों ने देखा कि मैं काला घोड़ा महोत्सव के लिए कैसे काम करती हूँ। साथ ही, वे भी उसी कला क्षेत्र में हैं और संग्रहालय आयोजकों ने देखा कि मैं कार्यक्रम के इतने सारे पहलुओं को कैसे संभाल रही थी। उन्होंने मुझे अपने ट्रस्ट में शामिल किया जो मेरे लिए बहुत सम्मानजनक बात है। मुझे सच में वह काम करना भी बहुत अच्छा लगता है।
यह एक और भूमिका है जो मैं निभा रही हूँ और इससे मेरा काम थोड़ा और बढ़ गया है। इसी तरह मुझे कुछ अन्य उपक्रमों में भी शामिल होने के लिए कहा गया है, लेकिन मुझे लगता है कि मैं अभी जितना कर रही हूँ, बस उतना ही कर सकती हूँ। अपनी ओर से मैं जितना हो सकता है कर रही हूँ। उत्सव इस जनवरी में आने वाला है, इसलिए मैं अभी बहुत व्यस्त हूँ।
वनेसा पटेल - क्या आप इस वर्ष महोत्सव के लिए कोई कला बना रही हैं?
बृंदा मिलर – नहीं, मेरे पास उसके लिए कभी समय नहीं होता। इस बार समिति के लोग चाहते थे कि मैं विज्ञापन आदि के लिए रचनात्मक सामग्री तैयार करूँ। लेकिन हमारे पास इसके लिए एक टीम है और हर साल सभी लोग एक निर्धारित प्रारूप का पालन करते हैं जिससे यह आसान हो जाता है। इस साल का विषय है ‘अहेड ऑफ़ द कर्व’ यानी समय से आगे होना। हम पहले ही पच्चीस साल का महत्वपूर्ण पड़ाव पार कर चुके हैं और यह छब्बीसवाँ साल है जब हम यह महोत्सव आयोजित करने जा रहे हैं। इसलिए अब हम यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि हमने इस महत्वपूर्ण पड़ाव से भी आगे कदम बढ़ा लिए हैं।
वनेसा पटेल - इस उपलब्धि के लिए आपको बधाई! हम आपकी निरंतर सफलता और रचनात्मक आनंद की कामना करते हैं। हमें समय देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद, बृंदा।


बृंदा मिलर
बृंदा मिलर मुंबई स्थित एक मिश्रित माध्यम कलाकार हैं जिन्होंने ‘सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट’ से स्वर्ण ... और पढ़ें
