पूर्णिमा रामाकृष्णन जैक केनफ़ील्ड का साक्षात्कार ले रही हैं जो ‘चिकन सूप फ़ॉर द सोल’ नामक पुस्तक-श्रृंखला के सह-रचयिता हैं। इस साक्षात्कार के दूसरे भाग में वे भय पर काबू पानेआंतरिक मार्गदर्शन का अनुसरण करने और समय के साथ अपनी सफलता की परिभाषा के विकसित होने के बारे में जानकारी दे रहे हैं। उनके ज्ञान से हमें अपनी अभिलाषा को पूरा करने और एक संतोषजनक जीवन जीने के लिए व्यावहारिक सलाह और प्रेरणा मिलती है।

 

प्र. - हमें अपने सपने साकार करने से कौन रोकता है?

आगे बढ़ने से रोकने वाली मान्यताओं के अलावा दूसरी चीज़ जो लोगों को रोकती है, वह है डर। यह कुछ खोने का डर हो सकता है - प्रतिष्ठा खोने, धन खोने, विश्वसनीयता खोने, नौकरी खोने, जीवनसाथी या मित्र के साथ अपने रिश्ते को खोने या शारीरिक तौर पर चोट पहुँचने का डर।

संभवतः आपने यह देखा हो - F-E-A-R अर्थात् F-फ़ैन्टेसाइज़्ड E-एक्सपीरिएंसेज़ A-अपीयरिंग R-रीयल यानी काल्पनिक अनुभव का वास्तविक लगना। जब महामारी आई तो बहुत सारे लोग डरे हुए थे - हम अपना रोज़गार खो देंगे या हमारे पास अब ग्राहक नहीं आएँगे या हम बाहर नहीं जा सकते या मैं स्कूल नहीं जा सकता या मैं पिछड़ रहा हूँ। यह सब कुछ उनके मन की कल्पना थी। उन्होंने आने वाले एक-दो वर्षों के बारे में सोचकर यह मान लिया था कि स्थिति और भी बुरी होने वाली है।

मैं हमेशा लोगों से इन दो में से एक चीज़ करने के लिए कहता हूँ - या तो आप वर्तमान क्षण में लौट आएँ और सोचें, “इस समय सब कुछ ठीक है।” या यदि आप भविष्य के बारे में सोच रहे हैं तो कल्पना करें कि कुछ सकारात्मक हो रहा है, जैसे “मुझे नौकरी ज़रूर मिल जाएगी”, “मेरी पुस्तक सर्वाधिक लोकप्रिय होने वाली है।”

डर के बारे में अंतिम बात जो मैं सिखाता हूँ वह यह कि डर महसूस करने पर भी वह काम ज़रूर करें। ज़्यादातर लोग यदि तैरना सीख जाते हैं तो वे डायविंग बोर्ड से कूद सकते हैं। तब आप डायविंग बोर्ड के किनारे पर खड़े होकर अपने माता या पिता या कोच की तरफ़ देखकर यह नहीं कहते, “मुझे ऊँचाई से पानी में कूदने में डर लगता है। मैं इस डर से छुटकारा पाने के लिए एक चिकित्सक से बात करूँगा। और वहाँ से जब मैं लौटकर आऊँगा तब मैं पानी में कूदूँगा।” लेकिन ऐसा कभी किसी ने नहीं किया। हमने क्या किया? हमने भले डर को महसूस किया लेकिन फिर भी पानी में कूद गए। और अधिकांशतः हमें कुछ नहीं हुआ, है न? एक बार डर को पार कर लेने पर जल्द ही हम न सिर्फ़ पानी में कूद जाते बल्कि पानी में उछल-कूद भी करने लगे और उसका मज़ा लेने लगे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमने डर को महसूस करने के बावजूद भी इसे किया।

 

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आजकल एक तकनीक जो मैं अपने विद्यार्थियों को सिखाता हूँउसे हम सूक्ष्म क्रियाएँ कहते हैं। शुरुआत करने के लिए छोटा सा कदम उठाएँ।


यदि आप स्काईडाइविंग या स्कूबा-डाइविंग करने जा रहे हैं या अपना पहला भाषण देने जा रहे हैं या अपनी किसी मित्र को डेट पर जाने के लिए पूछते हैं तो आपको शायद थोड़ा सा डर महसूस होगा। यह स्वाभाविक है। लेकिन यदि आप डर के बावजूद आगे बढ़कर अपने काम को करते हैं तो आप इस डर से बाहर निकल आते हैं। इसी से आपका आत्मविश्वास बनता है। किसी जोखिम लेने और उसे पार कर लेने का परिणाम आत्मविश्वास होता है।

इसलिए जब आप पहली बार वार्ता प्रस्तुत करते हैं तब थोड़ा सा घबराते हैं लेकिन फिर आप देखते हैं कि कुछ बुरा नहीं होता। उसके बाद अगली बार जब आप बोलते हैं तब हो सकता है कि लोग तालियाँ बजाकर आपकी सराहना करें। और फिर 20वीं बार शायद वे आपके लिए खड़े होकर तालियाँ बजाएँ और यह इसलिए क्योंकि आपने हार नहीं मानी और आप डटे रहे।

आपने बार-बार कोशिश की लेकिन हार नहीं मानी और दृढ़ता से खड़े रहे। ज़रा सोचिए कि यदि आप असफल भी हुए तो भी आप उससे उबर गए।

हर कोई जो इस लेख को पढ़ रहा है, यह जान ले कि आपने अब तक जीवन में जो कुछ भी झेला है, उसे पार करने में सफल हुए हैं वरना आप यहाँ नहीं हो सकते थे। हम स्वाभाविक रूप से जुझारू हैं। यदि हम यह याद रखें कि हम कई बार सफल हुए हैं, हमने कई बार अच्छा किया है तो हमें बस इससे प्रेरित होकर आगे बढ़ते रहना होगा।

यदि किसी काम को करने में आप डर महसूस करते हैं लेकिन फिर भी उसे करना चाहते हैं तो किसी छोटे काम से शुरू करें। दूसरे शब्दों में आप पहली बार में ही एक हज़ार लोगों के यानी बहुत बड़े समूह को संबोधित न करें। एक कमरे में 10 लोगों के सामने बात करें। या दर्पण के सामने खड़े होकर अपने भाषण का अभ्यास करें। आजकल एक तकनीक जो मैं अपने विद्यार्थियों को सिखाता हूँ, उसे हम सूक्ष्म क्रियाएँ कहते हैं। शुरुआत करने के लिए छोटा सा कदम उठाएँ।

मैं आपको एक छोटी सी कहानी बताना चाहूँगा। एक व्यक्ति हैं जिनका नाम जिम बंच है। वे अमेरिका में शिक्षक हैं और ‘द अल्टिमेट गेम ऑफ़ लाइफ़’ नामक कार्यक्रम चलाते हैं। एक बार मैं उनसे फ़ोन पर बात कर रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा, “तुम्हारा लक्ष्य क्या है, जैक?” मैंने कहा, “ओह, मैं तंदुरुस्त होना चाहता हूँ। मैं वज़न कम करना चाहता हूँ।” उन्होंने कहा, “बढ़िया, फ़ोन नीचे रखो और 10 डंड (pushups) लगाओ।”

मैंने कहा “जिम, नहीं! मैं व्यायामशाला (gym) जाने और एक प्रशिक्षक से सीखने की बात सोच रहा हूँ।” उन्होंने कहा, “जैक, फ़ोन नीचे रखो और 10 डंड लगाओ।”

मैंने कहा, “जिम, तुम मेरी बात सुन नहीं रहे हो।”

वे बोले, “जैक, तुम भी मेरी बात नहीं सुन रहे हो और हम आगे नहीं बढ़ रहे हैं। 10 डंड लगाओ।” तो मैंने फ़ोन रखा और 10 डंड किए।

उन्होंने कहा, “अब मैं तुम्हें एक महत्वपूर्ण पाठ पढ़ा रहा हूँ। जब भी आपके मन में कुछ नया करने की इच्छा होती है तुरंत छोटे काम से शुरू करो। एक फ़ोन करो; एक अपाइंटमेंट लो। इसे बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए लेकिन तुरंत शुरू करो क्योंकि हम सभी छोटा सा कुछ तो कर ही सकते हैं। आपको 20 मील की दौड़ से शुरू नहीं करना है। अपने मकान के चारों तरफ़ ही एक बार घूम लें।”

इसे समझना मेरे लिए ज़रूरी था। तो मैं भी यही कहूँगा कि आप डर महसूस करने पर भी वह काम कर सकते हैं लेकिन किसी ऐसी चीज़ से शुरुआत न करें जो इतनी ज़्यादा डरावनी हो कि आप स्तब्ध रह जाएँ।

प्र. - जैक, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मुझे जिम का आपको फ़ोन रखकर 10 डंड करने के लिए कहना बहुत पसंद आया। मेरा अगला प्रश्न यह है कि इस आध्यात्मिक मार्ग ने आपके जीवन को कैसे प्रभावित किया? मैंने देखा है कि आपकी सभी पुस्तकों में आध्यात्मिकता का पुट है। आपने कल्पनाशीलता, दृढ़ वचन और आगे बढ़ने के बारे में बहुत कुछ कहा है। आप जो बोलते हैं, जो लिखते हैं और जो सिखाते हैं, वह बहुत भावपूर्ण है। मैं सोच रही हूँ कि आपकी आंतरिक यात्रा ने आपके नेतृत्व करने और लोगों की सेवा करने के तरीके को किस तरह प्रभावित किया है।

मेरी आध्यात्मिक यात्रा लगभग 28 साल की उम्र में शुरू हुई। मैं मैसाचुसेट्स में रहता था। मेरी पूर्व पत्नी और मेरे पास एक पर्यटक गाड़ी थी। हम मेक्सिको से होते हुए ग्वाटेमाला गए और एटिट्लान झील के किनारे डेरा डाला। वहाँ पहुँचने के लिए बादलों के बीच से गुज़रना पड़ा था और वह झील एक ज्वालामुखी के पास थी। मैं परमहंस योगानंद की ‘एक योगी की आत्मकथा’ पढ़ रहा था।

वह पहली किताब थी जो मैंने पढ़ी थी।

मुझे लगा, “हे भगवान, ज़िंदगी मेरी समझ से कहीं ज़्यादा है।” मैं एक मनोवैज्ञानिक था लेकिन उस समय मैं आध्यात्मिक रूप से जागृत नहीं था। मैंने तय किया, “ठीक है मैं ध्यान करना सीखूँगा। मुझे योगासन सीखने ही होंगे।” इसलिए मैंने योग पर एक किताब खरीदी और खुद ही योगासन करने शुरू कर दिए। वह एक छोटी पुस्तिका थी। फिर मैंने कुछ ध्यान के सत्र भी किए।

मेरी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई जिनका नाम गुरु शबद सिंह था। वे ध्यान सिखाते थे और मैं अति आनंदित अवस्था में पहुँच जाता था। मुझे एहसास हुआ कि मुझे भी ध्यान सिखाना चाहिए। इस तरह मुझे मनोविज्ञान का एक रूप मिला जिसे मनोसंश्लेषण यानी साइकोसिंथेसिस कहते हैं। इसे रॉबेर्टो असाजिओली नामक एक इतालवी मनोवैज्ञानिक ने विकसित किया था। वह कार्ल युंग के समकालीन थे। उनका यह सिद्धांत था कि हम सभी में एक उच्चतर ‘स्व’ यानी हमारी आत्मा होती है। उनका एक चित्र था जो एक उल्टे कीप जैसा था। उसमें सबसे ऊपर उच्चतर स्व था और वह कीप नीचे जागरूकता के केंद्र तक पहुँचती थी जिसे आँख कहते हैं।


आप डर महसूस करने पर भी वह काम कर सकते हैं लेकिन किसी ऐसी चीज़ से शुरुआत न करें जो इतनी ज़्यादा डरावनी हो कि आप स्तब्ध रह जाएँ।


इसलिए जब मैं ध्यान करता हूँ तब मैं उस केंद्र में होता हूँ और मैं अपने उच्चतर स्व के प्रति जागरूक होने की कोशिश कर सकता हूँ। लेकिन ‘आँख’ के केंद्र के आस-पास एक विकल्प है। इसलिए मैं अपनी चेतना को अपने शरीर पर केंद्रित करने का चुनाव कर सकता हूँ, मैं इसे अपनी भावनाओं पर केंद्रित करने का चुनाव कर सकता हूँ या मैं इसे अपने मन में उठ रहे विचारों पर केंद्रित करने का चुनाव कर सकता हूँ।

ये सभी मनोवैज्ञानिक क्रियाएँ हैं लेकिन ये सब उच्चतर स्व की सेवा करती हैं। उन्होंने इसका इस तरह वर्णन किया - आपका उच्चतर स्व मानो एक ऑर्केस्ट्रा यानी वादक समूह का निर्देशक है जो आपके शरीर और आपकी भावनाओं रूपी सभी वाद्ययंत्रों को निर्देशित करता है। अब जहाँ यह ‘आँख’ यानी केंद्र है, वहाँ से अपने उच्चतर स्व के साथ जुड़ें और अपने अगले कदम के लिए निर्देश प्राप्त करें या जिस पर आपको ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है उसे जानें और फिर अपनी बुद्धि, अपने शरीर और अपनी भावनाओं का उपयोग करके दुनिया में वह कार्य करें जिसके लिए आपको यह आंतरिक मार्गदर्शन मिला है। यह हमें अहंकार से बाहर निकालता है। यह सब सकारात्मक सोच एवं कल्पनाशीलता का उपयोग करते हुए, लक्ष्य निर्धारण, दूरदृष्टि और कार्रवाई करने से संबंधित है लेकिन यह सब उच्चतर स्व का काम करने के लिए होता है और वह भी यदि आप चाहें तो।

मेरे लिए यह इसी तरह विकसित होने लगा। अब मैं वह सब कुछ सिखा सकता था जो मैंने अपने मूल गुरु, डब्ल्यू. क्लेमेंट स्टोन से सीखा था। वे नेपोलियन हिल के समकालीन और मित्र थे, जिन्होंने ‘थिंक एंड ग्रो रिच’ नामक पुस्तक लिखी थी। यह सफलता की दृष्टि से एक बढ़िया पुस्तक थी। उस आध्यात्मिकता ने मुझे बाकी सब चीज़ों के लिए संदर्भ दिया। कल्पनाशीलता का उपयोग डर पैदा करने के लिए भी किया जा सकता है और अपने लक्ष्य को पाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए भी।


मैं यहाँ क्या करने आया हूँमुझे क्या मार्गदर्शन मिल रहा हैयही सफलता का सिद्धांत ‘आंतरिक जाँच-पड़ताल’ है। सब कुछ इसी तरह मेरे सामने आया।


तो सोचिए - मेरा लक्ष्य क्या है? मुझसे क्या करने को कहा जा रहा है? उसे करने के लिए मुझे किन विचारों पर सोचना होगा? यही मेरे संकल्प हैं, मेरी आंतरिक आत्म-चर्चा। मैं अपने शरीर का उपयोग कैसे करूँ? मैं क्या कार्य करूँ? मैं प्रतिपुष्टि पर कैसे प्रतिक्रिया दूँ? क्योंकि सभी कार्य सफल नहीं होते। और यह सब ‘सक्सेस प्रिंसीपल्स’ नामक पुस्तक में लिखा गया है। सब मेरे उद्देश्य की पूर्ति के लिए होना चाहिए - मैं यहाँ क्या करने आया हूँ? मुझे क्या मार्गदर्शन मिल रहा है? यही सफलता का सिद्धांत ‘आंतरिक जाँच-पड़ताल’ है। सब कुछ इसी तरह मेरे सामने आया।

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प्र. - मेरी एक और पसंदीदा पुस्तक, ‘चिकन सूप फ़ॉर द सोल’ श्रृंखला की बात करें तो बताइए कि यह कैसे शुरू हुई?

सबसे पहली बात तो यह है कि ये कहानियाँ लोगों को अपनी कहानियाँ लगती हैं क्योंकि ये उन सामान्य विषयों के बारे में हैं जिनसे हर कोई जूझता है जैसे रिश्ते, प्रेम, मृत्यु, दुख बाधाओं को पार करना, सपनों को पूरा करने की कोशिश करना। ये सभी चीज़ें हमारे विचारों का सार बनाती हैं और उन चीज़ों पर केंद्रित हैं जिन्हें हम अपने जीवन में हासिल करना चाहते हैं। हम सभी चाहते हैं कि हमें प्यार मिले और हम प्यार करें। इन पुस्तकों में प्रेम, आत्म-सम्मान, सम्मान देने और स्वयं से प्रेम करने पर भी कुछ खंड हैं। ये उन चीज़ों से संबंधित हैं जिनसे हर कोई जुड़ पाता है। उस समय मेरी चेतना काफ़ी उन्नत थी और सारी कहानियाँ, मेरे और मेरे सह-लेखक, मार्क, द्वारा छाँटी गई थीं। मार्क भी ध्यान करते हैं और उन्होंने भारत में अध्ययन भी किया है। इसलिए हम उन्हीं कहानियों को पसंद करते हैं और उन्हें स्वीकृति देते हैं जिन्हें पढ़कर प्रेम व आनंद के विशेष स्पंदन महसूस होते हैं और जिनमें जीवन की सच्चाई निहित होती है।

मैं आपको ऐसी दो बातें बताता हूँ जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते। पहली बात, शीर्षक मेरे दिमाग में कैसे आया? हमारे पास कोई शीर्षक नहीं था। हमारे पास पुस्तक थी। हमें न्यूयॉर्क जाकर कुछ प्रकाशकों से मिलकर उन्हें किताब बेचनी थी। इसलिए मार्क और मैंने तय किया कि हम एक सप्ताह ध्यान करेंगे और शीर्षक जानने का प्रयास करेंगे। मार्क मुझसे कहीं ज़्यादा सक्रिय थे और रात को सोते समय ‘बेस्ट सेलिंग टाइटल’, ‘बेस्ट सेलिंग टाइटल’, ‘बेस्ट सेलिंग टाइटल’ सोचते हुए उस पर ध्यान करते थे। मैं थोड़ा ज़्यादा शांत स्वभाव का हूँ और हर सुबह मैं उठता और बस यही प्रार्थना करता, “हे भगवान, मुझे कोई शीर्षक दे दो” और मैं चुपचाप बैठकर प्रतीक्षा करता।

पहले दिन कुछ नहीं हुआ। दूसरे दिन भी कुछ नहीं हुआ। तीसरे दिन मैं सुबह जल्दी उठ गया। एक बड़ा हरा चॉक बोर्ड, जैसा स्कूल में होता है, दिखाई दिया। एक हाथ निकला और उसने बोर्ड पर ‘चिकन सूप’ लिख दिया। मैंने सोचा, “वाह!” क्योंकि मुझे लगा कि वह भगवान का हाथ था। फिर मैंने सोचा, “चिकन सूप का इस पुस्तक से क्या लेना-देना है?” मैं फिर से ध्यान में बैठ गया। एक आवाज़ सुनाई दी, “जब तुम बचपन में बीमार थे तब तुम्हारी दादी ने तुम्हें चिकन सूप दिया था।” मैंने कहा, “यह पुस्तक बीमार लोगों के बारे में नहीं है।” और फिर आवाज़ ने कहा, “लोगों की आत्माएँ बीमार हैं। वे हार, निराशा और डर में जी रहे हैं। और तुम्हारी ये कहानियाँ उन्हें इनसे उबरने में मदद करेंगी।” मेरे मन में ‘चिकन सूप फ़ॉर द स्पिरिट’ शीर्षक आया लेकिन वह सही नहीं लगा। फिर मैंने स्वयं से कहा, “चिकन सूप फ़ॉर द सोल कैसा रहेगा?” और मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने अपनी पत्नी को बताया। उसके भी रोंगटे खड़े हो गए। मैंने मार्क को फ़ोन करके बताया। सुनकर उसके भी रोंगटे खड़े हो गए। मैंने अपने एजेंट को बताया और उसके साथ भी वही हुआ।

फिर हम न्यूयॉर्क गए और 21 प्रकाशकों से मिले। 3 दिनों तक प्रतिदिन 7 प्रकाशकों से मिले। किसी के भी रोंगटे खड़े नहीं हुए। हमें 21 बार अस्वीकृत किया गया। किसी को शीर्षक पसंद नहीं आया। लोगों ने कहा,“बेकार शीर्षक है।” “लोग ऐसी कहानियाँ नहीं पढ़ते।” “यह कुछ ज़्यादा ही अच्छा है।” “यह कुछ ज़्यादा ही सकारात्मक है।” फिर 144 बार अस्वीकृत होने के बाद, हमारे एजेंट ने हमें पुस्तक वापस कर दी और कहा, “मैं इसे नहीं बेच सकता। मैंने कोशिश की लेकिन इसे कोई नहीं लेना चाहता।”

मैं उस समय लॉस एंजिलस में रह रहा था। किसी ने बताया कि ऑरेंज काउंटी के डिज़्नीलैंड कन्वेंशन सेंटर में प्रकाशकों का एक सम्मेलन होने वाला है। मैं और मार्क अपने बैग लेकर वहाँ गए और पुस्तक की लगभग 20 कहानियाँ लेकर हम सभी प्रकाशकों से बात करने लगे लेकिन वे कहते रहे, “नहीं!” “नहीं!” “नहीं!” “नहीं!”

आखिरकार जिस 145वें व्यक्ति से हमने बात की, उसने कहा, “मैं इसे पढ़ूँगा।” कोई और इसे पढ़ना ही नहीं चाहता था। वह उसे घर ले गया और एक हफ़्ते बाद मुझे फ़ोन पर कहने लगा, “मुझे यह बहुत पसंद आई लेकिन मैं नहीं जानता कि हम इसकी कितनी प्रतियाँ बेच पाएँगे। इसलिए मैं थोड़ा हिचकिचा रहा हूँ। यदि आप मुझे यह विश्वास दिला दें कि हम इसकी 20,000 प्रतियाँ बेच सकते हैं तो मैं इसे प्रकाशित करूँगा।” इसलिए जब भी मार्क और मैं कोई व्याख्यान देने जाते तब हमारे पास एक कागज़ होता जिस पर लिखा होता, “मैं ‘चिकन सूप फ़ॉर द सोल’ की ____ प्रतियाँ खरीदने का वादा करता हूँ।” और लोग उसमें अपने अंक भर देते थे। इस तरह हमें 20,000 प्रतियाँ खरीदने के वादे मिल गए। कुछ लोगों ने कहा कि वे इसकी पाँच या दस प्रतियाँ खरीदेंगे। एक व्यक्ति ने कहा कि वह 1000 खरीदेगा। तब हम प्रकाशक के पास गए और कहा, “लो हमारे पास 20,000 वादे हैं।” इस तरह यह शीर्षक बना। और इस तरह यह प्रकाशित हुई।

प्र. - मुझे यह कहानी सुनाने के लिए धन्यवाद। मैं आपसे आपकी पुस्तक ‘सक्सेस प्रिंसिपल्स’ के बारे में भी पूछना चाहती थी।

उस पुस्तक के बारे में अक्सर मुझसे एक प्रश्न पूछा जाता है। लोग मुझसे पूछते हैं कि सफलता के लिए सबसे ज़रूरी सिद्धांत कौन सा है और मैं उन्हें कहता हूँ कि यदि आपको अपने शरीर में सिर्फ़ एक अंग रखना हो तो आप कौन-सा अंग रखेंगे? क्योंकि हृदय के बिना या फेफड़ों के बिना, यकृत (liver) के बिना या गुर्दों के बिना कुछ भी काम नहीं करेगा। तो, यदि आप इस पुस्तक को देखें तो इसमें ज़िम्मेदारी लेने, लक्ष्य तय करने और उसे मापने योग्य बनाने, सकारात्मक कथनों का उपयोग करने, कल्पनाशीलता का उपयोग करने, कार्रवाई करने, प्रतिक्रिया लेने, डटे रहने, एक टीम बनाने, एक जवाबदेह समूह बनाने जैसी बहुत सी बातें हैं। यह वाकई सफलता की व्यवस्था है। यह सफलता प्राप्त करने की विधि की तरह है।

तो, आखिरी बात जो मैं सभी पाठकों से कहना चाहूँगा, वह यह है कि आप जो भी करना चाहते हैं उसे करने के लिए आवश्यक हर चीज़ आपके पास है। आपके भीतर कोई इच्छा तभी उत्पन्न होती है जब आपमें उसे पूरा करने की क्षमता होती है। आप कोई लक्ष्य तभी सोचते हैं जब आपके पास उसे हासिल करने की योग्यता होती है। आपको कुछ नई चीज़ें सीखनी पड़ सकती हैं या कोई ऐसा प्रमाणपत्र हासिल करना पड़ सकता है जो आपके पास नहीं है। आपको स्कूल जाना पड़ सकता है और कोई डिग्री या लाइसेंस हासिल करना पड़ सकता है। आपको दूसरे लोगों के साथ मिलकर काम करना पड़ सकता है। आपको वहाँ तक पहुँचने में भी बहुत समय लग सकता है। लेकिन आप उस सपने को साकार करने की क्षमता के बिना उसे पूरा नहीं कर पाएँगे। मैं आपको ऐसे कई लोगों की कहानियाँ सुना सकता हूँ जिन्होंने मुश्किलों का सामना किया और फिर अपने लक्ष्य को हासिल किया। आप कोई भी समस्या या चुनौती बताइए और मैं आपको किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी बता सकता हूँ जिसने उसी समस्या का सामना किया और सफलता पाई। इसका आपकी परिस्थितियों से कोई संबंध नहीं है। इसका संबंध आपके शारीरिक सामर्थ्य से है, आपके इरादे, आपके विश्वास, आपके हृदय और आपकी दृढ़ता से है।

इसलिए स्वयं पर भरोसा रखें। अपने हृदय की सुनें और जान लें कि आप में अपने सपनों को साकार करने की क्षमता है।

बहुत बहुत धन्यवाद, जैक!

 

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स्वयं पर भरोसा रखें। अपने हृदय की सुनें और जान लें कि आप में अपने सपनों को साकार करने की क्षमता है।


 


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जैक कैनफ़ील्ड

जैक कैनफ़ील्ड

जैक कैनफ़ील्ड अनेक लोकप्रिय पुस्तकों के लेखक, व्यावसायिक वक्ता,

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