सम्माननीय सूफ़ी विद्वान पीर ज़िया इनायत खान 2024 में कान्हा शांतिवनम् में आयोजित वैश्विक आध्यात्मिक महोत्सव में एक प्रमुख वक्ता थे। वे हमारे जीवन में ‘अदृश्य बगीचों’ के सूफ़ी दर्शन के बारे में बता रहे हैं।

 

मैं वैश्विक आध्यात्मिक महोत्सव को आयोजित करने के लिए कान्हा शांतिवनम् से अधिक उत्तम स्थान की कल्पना भी नहीं कर सकता। सोचिए कि सिर्फ़ आठ वर्ष पहले यह ज़मीन केवल धूल और मिट्टी से भरी हुई थी। और अब हम श्रद्धेय दाजी तथा हार्टफुलनेस समुदाय के द्वारा इस ज़मीन की देखभाल करने का नतीजा देख रहे हैं। यह एक चमत्कार के समान है।

इसमें कोई शक नहीं है कि ध्यान कक्ष बहुत आकर्षक है। लेकिन मेरे लिए यहाँ के बगीचे सबसे ज़्यादा आकर्षक हैं – जो पेड़ यहाँ लगाए गए हैं, जिन लुप्त हो रही प्रजातियों के पेड़ों को यहाँ इकट्ठा किया गया है और जो खेती यहाँ हो रही है ताकि यह वनम् वास्तव में एक जीवंत बगीचा बन सके। दाजी पेड़ों की लुप्तप्राय प्रजातियों को यहाँ लाए हैं। जब भी कहीं किसी जगह पर पेड़ काटे जाने वाले होते हैं वे उन्हें वहाँ से खोदकर निकलवा लेते हैं और यहाँ लाकर लगवा लेते हैं ताकि वे जीवित रह सकें। यह कार्य सारे देश और समस्त विश्व के लिए एक मिसाल हो सकता है।

हम इन दृश्यमान बगीचों की तो तारीफ़ कर रहे हैं जिन्हें हम अपनी आँखों से देख सकते हैं, लेकिन साथ ही हम यहाँ पर कुछ अदृश्य बगीचों को भी पाते हैं। सूफ़ी संत चार आध्यात्मिक बगीचों की बात करते हैं।

कर्मों का बगीचा

इनमें से पहला बगीचा कर्मों का बगीचा कहलाता है और यह वह जगह है जहाँ पर हम उसको पुन: खोज लेते हैं जो कुछ भी इस संसार में हमने किया है। संसार एक गुंबद की तरह है - जो कुछ भी हम कहते हैं, वह प्रतिध्वनित होता है और अंततः हमारे पास ही लौटकर आता है। यदि हम उदारता पाना चाहते हैं तो हमें उदार बनना चाहिए। यदि हम दयालुता पाना चाहते हैं तो दयालु बनना चाहिए। जो कुछ भी हम इस संसार को देते हैं, आज नहीं तो कल वह घूम-फिरकर हमारे पास ही लौट आता है। जब हम अपना ‘कर्मों का बगीचा’ तैयार करें तो हमें सावधान रहना चाहिए कि हम अपने कर्मों पर घमंड न करें। यह इस तरह होना चाहिए कि बाएँ हाथ को भी पता न चले कि दाएँ हाथ ने क्या दिया है।

महान हज़रत राबिया बसरी अपने एक हाथ में पानी से भरी बाल्टी और दूसरे हाथ में एक मशाल लेकर घूमा करती थीं और लोग उनसे पूछते थे, “आप ये चीज़ें लेकर क्यों घूमती हैं?”

वे जवाब देतीं, “मैं स्वर्ग का बगीचा जला देना चाहती हूँ और नर्क की आग बुझा देना चाहती हूँ ताकि जो लोग तुम्हें पूजते हैं वे सिर्फ़ तुम्हारे लिए तुम्हारी पूजा करें, किसी इनाम के लिए नहीं।”


संसार एक गुंबद की तरह है - जो कुछ भी हम कहते हैंवह प्रतिध्वनित होता है और अंततः हमारे पास ही लौटकर आता है। यदि हम उदारता पाना चाहते हैं तो हमें उदार बनना चाहिए। यदि हम दयालुता पाना चाहते हैं तो दयालु बनना चाहिए। जो कुछ भी हम इस संसार को देते हैंआज नहीं तो कल वह घूम-फिरकर हमारे पास ही लौट आता है।


मित्रों का बगीचा

इस प्रकार हम कर्मों के बगीचे को पार करके ईश्वर के मित्रों के बगीचे में आते हैं। यह पवित्र पैगंबर और उन संतों की विरासत का बगीचा है जिन्होंने इस दुनिया को ज्ञान दिया। इस बगीचे में हम उनके पदचिन्हों पर चलते हैं और यह समझते हैं कि हालाँकि ये महान संत अलग-अलग परंपराओं से आते हैं लेकिन अंततः वे सभी एक ही संदेश देते हैं - दिव्य चेतना का संदेश। यह दिव्य चेतना हमारे जीवन और इस दुनिया में संपूर्णता चाहती है। हम पैगंबरों के करीब तभी आते हैं जब हम सेवा के प्रति समर्पित जीवन जीते हैं।

नामों का बगीचा

इससे आगे चलने पर नामों का बगीचा आता है यानी ईश्वर के नामों का बगीचा। हमारी दुनिया में, दिव्य अस्तित्व को कई नामों से जाना जाता है। हम चाहे जो भी नाम चुनें, यदि हम अपना पूरा दिल उसको दे देते हैं तो इसके द्वारा ही हमारी उन्नति हो जाएगी। कहा जाता है कि इस अदृश्य संसार में, इस नामों के बगीचे में जब भी इंसान ईश्वर के नाम को जपते हैं तो फ़रिश्ते पेड़ लगाते हैं। एक दिन किसी ने देखा कि एक फ़रिश्ता उनके पेड़ को पानी नहीं दे रहा था और उसकी देखभाल नहीं कर रहा था तो उसने पूछा कि उस पेड़ की देखभाल क्यों नहीं की जा रही है। फ़रिश्ते ने जवाब दिया कि धरती पर इंसानों ने नाम जपना छोड़ दिया है। वे नाम की महिमा नहीं गा रहे हैं। और जब तक वे यह नहीं करते इस बगीचे का पालन-पोषण करना संभव नहीं है।

यही वह संभावना है जो हम सबके लिए मौजूद है – ताकि हम यह सुनिश्चित कर सकें कि अदृश्य दुनिया के इस बगीचे के ये पेड़ बढ़ते रहें और पनपते रहें। यह केवल तभी हो सकता है जब हम प्रेम से भरे दिल के साथ स्वयं को उस ईश्वर की स्तुति में समर्पित कर दें जिससे हमारा अस्तित्व है।

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एक’ (ईश्वर) का बगीचा

अंत में, वहाँ एक चौथा बगीचा है, ‘एक’ (ईश्वर) का बगीचा।

एक साधक उसके दरवाज़े पर गया और अंदर से एक आवाज़ आई, “कौन है?” साधक ने जवाब दिया, “प्रियवर, मैं हूँ।” आवाज़ ने जवाब दिया, “तो फिर चले जाओ।” साधक चला गया और कई वर्षों तक वह ध्यान करता रहा तथा उसकी खोज जारी रही। अंततः वह वापस आया और फिर से वही आवाज़ थी और उसने वही सवाल पूछा। इस बार साधक ने जवाब दिया, “आप हैं।”

तब साधक अंदर गया और वहाँ न कोई साधक था और न ही कोई साध्य था, वहाँ कोई प्रेमी या प्रियतम नहीं था, वहाँ पर सिर्फ़ ‘एक’ ही था हमेशा-हमेशा के लिए।

मेरी दुआ है कि कान्हा शांतिवनम् दाजी के कृपालु मार्गदर्शन में लगातार उन्नति करता रहे। हमारे अपने जीवन के बगीचे – कर्मों का बगीचा, ईश्वर के मित्रों का बगीचा, दिव्य नामों का बगीचा और ‘एक’ का बगीचा – इस पूरी दुनिया में फैल जाएँ ताकि हम सब एक स्वर्ग जैसी दुनिया में जी सकें। आमीन!


हमारे अपने जीवन के बगीचे – कर्मों का बगीचाईश्वर के मित्रों का बगीचादिव्य नामों का बगीचा और ‘एक’ का बगीचा – इस पूरी दुनिया में फैल जाएँ ताकि हम सब एक स्वर्ग जैसी दुनिया में जी सकें।


 


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पीर ज़िया इनायत खान

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