आचार्य श्री वर्मा आयुर्वेदिक चिकित्सकों की उस वंशावली से ताल्लुक रखते हैं जो पिछली चार शताब्दियों से आयुर्वेदिक चिकित्सा के क्षेत्र में कार्य करती रही है। हार्टफुलनेस योग अकैडमी की मेरियन मारसो द्वारा लिए गए उनके साक्षात्कार के इस दूसरे भाग में वे मानसिक स्वास्थ्य के प्रति आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के बारे में और अधिक गहराई से बता रहे हैं।

 

प्रश्न - क्या मानसिक स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद में कुछ विशिष्ट उपचार हैं? क्या आप दवाइयों का प्रयोग करते हैं? 

हमें पहले यह समझना चाहिए कि मनस या मन एक विस्तार है न कि एक सीमित संरचना। स्थूल शरीर यानी अन्नमय कोश के लिए हमें औषधि की आवश्यकता होती है। प्राणमय कोश के लिए हमें श्वास यानी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जब इन दो परतों पर ध्यान दिया जाता है तब चिकित्सक और रोगी के लिए मन को समझना बहुत आसान हो जाता है। मन एक संयोजक है जो अन्नमय कोश को प्राणमय कोश से जोड़ता है। और साथ में ये दोनों विज्ञानमय कोश से जुड़ जाते हैं जो शरीर को आत्मा से जोड़ता है।

मन एक विस्तार है लेकिन हम मन को कैसे समझें? यह एक बिना तार वाला अप्रकट जुड़ाव है जिसे हमारी आँखें नहीं देख सकतीं। शरीर और आत्मा मन द्वारा जुड़े हुए हैं। अब सवाल यह है कि ये कैसे जुड़ते हैं? आयुर्वेद में सात प्रमुख चक्र हैं और 108 छोटे चक्र हैं जिन्हें हम मर्म कहते हैं। ये ऊर्जा केंद्र हैं। इन ऊर्जा केंद्रों के माध्यम से भावनाएँ कैसे संचालित होती हैं? यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या खाते हैं। और केवल यही नहीं बल्कि शरीर को जीवित रहने के लिए सभी पंचभूतों यानी पोषक तत्वों की भी आवश्यकता होती है। शरीर भोजन, पानी और ऑक्सीजन का उपभोग करता है जिसके बिना चयापचय (metabolism) संभव नहीं है।

तो मन का भोजन क्या है? यह बहुत सरल है। हम जो देखते, सुनते, करते और महसूस करते हैं उससे मन को पोषण मिलता है। और इनसे उभरी भावनाओं के साथ मन अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच घूमता रहता है। मन कभी भी एक स्थान विशेष पर नहीं टिकता, वह सदैव गतिशील रहता है।

ठोसता पृथ्वी की प्रकृति है, तरलता पानी की और गर्मी अग्नि की प्रकृति है। गतिशीलता या चुनौती मन की प्रकृति है। तो मन अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य की ओर बढ़ता है। वे आयुर्वेदिक चिकित्सक जो वर्म यानी मर्म के साथ काम करते हैं उन्हें ‘वर्मानीकहा जाता है। वे दिव्य उपचार की गुप्त कला का उपयोग करते हैं। वे भावनाओं के बारे में जानते हैं। 

ये मूलभूत ऊर्जाएँ क्या हैं? ये हमारे सात प्रमुख चक्रों में कैसे घूमती हैं और ये 108 मर्मों में कैसे परिवर्तन लाती हैं? वर्मन उपचार शरीर के विषाक्त पदार्थों को निकालने के लिए किया जाता है। और मन की छापों (संस्कारों) को साफ़ करने के लिए योगाभ्यास करने को कहा जाता है। इस तरह से हम भावनात्मक समस्याओं का उपचार करते हैं।

आज के माहौल में लोग अक्सर तनावग्रस्त रहते हैं और अपने काम में चुनौतियों का सामना करते हैं। हम मोबाइल फ़ोन और स्क्रीन का इस्तेमाल बंद नहीं कर सकते। यहाँ तक कि जब हम नहीं चाहते तब भी स्क्रीन के सामने रहने का हमेशा कोई न कोई कारण होता है। हमारी इंद्रियों को चुनौती मिलती रहती है और हम ऐसी चीज़ें देखते व सुनते हैं जो शायद हमें नहीं देखनी व सुननी चाहिए। स्वयं को इनसे बचाना बहुत मुश्किल है।

प्रश्न - मान लीजिए कि आपके क्लिनिक में एक मरीज़ आता है जिसे नींद न आने की समस्या है और जो थका हुआ, उदास या चिंतित है तो क्या आप सीधे पंचकर्म विषहरण से शुरुआत करेंगे? आप उसे इस स्थिति से बाहर आने में कैसे मदद करेंगे?

आयुर्वेद मनुष्य को समग्र रूप से देखता है। हम स्थूल शरीर, ऊर्जा शरीर, भावनात्मक शरीर, बौद्धिक शरीर और आध्यात्मिक शरीर का संयोजन हैं। इसलिए जब हम बीमारी का मूलभूत मूल्यांकन करते हैं तब हम यह देखते हैं कि मरीज़ को समस्याएँ कहाँ हैं और उसकी किस परत में अशुद्धियाँ हैं।

हम रोग की पहचान करते हैं और उन परेशानियों को सुनते हैं जिनका वे सामना कर रहे हैं। क्या हम सिर्फ़ इसी आधार पर उनका इलाज कर सकते हैं? नहीं! क्योंकि वे व्याकुल और मुश्किल स्थिति में हैं और वे हमें समझा नहीं रहे हैं बल्कि शिकायत कर रहे हैं। इसके बजाय हम रोग के कारकों को समझने के लिए अपने प्रशिक्षण और अनुभव का उपयोग करते हैं। उन कारकों की पुनः पुष्टि करने के लिए हम नाड़ी परीक्षा करते हैं यानी नब्ज़ पढ़ते हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनमें ऊर्जा कैसे प्रवाहित हो रही है। हम पता लगाते हैं कि अन्नमय कोश में वात, पित्त या कफ में से क्या है? कोई भी प्रशिक्षित आयुर्वेद चिकित्सक नाड़ी की जाँच करके यह पता लगा सकता है कि शरीर में क्या हो रहा है। फिर प्राणमय और मनोमय कोश के साथ हम ऊर्जा के प्रवाह को भी महसूस करते हैं।

जब हम नाड़ी को छूते हैं तब हम अपनी ऊर्जा को रोगी की ऊर्जा से जोड़ देते हैं और यह समझने का प्रयास करते हैं कि समस्या कौन सी परत में है। इलाज अन्नमय कोश से शुरू होता है। यदि प्रशामक (पीड़ा दूर करने वाले) उपचार की आवश्यकता है तो हम केवल जड़ी-बूटियाँ देते हैं। लेकिन जब विषाक्त पदार्थों की जड़ें गहरी होती हैं तब हम पंचकर्म की सलाह देते हैं जिसमें 14 से 21 दिनों का गहन विषहरण होता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संचित विषाक्त पदार्थ पूरी तरह से बाहर निकल जाएँ। उसके बाद मन के उपचार के लिए शक्तिवर्धक औषधियों और ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। आयुर्वेद सिखाता है कि हम केवल एक संरचना या पदार्थ नहीं हैं बल्कि हम पदार्थ के अंदर की ऊर्जा हैं।

सबसे पहले हम स्थूल शरीर का विषहरण करते हैं। फिर हम रोगी को बताते हैं कि ऊर्जा उनका उपचार कैसे कर सकती है।


(हम जो देखते, सुनते, करते और महसूस करते हैं उससे मन को पोषण मिलता है। और इनसे उभरी भावनाओं के साथ मन अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच घूमता रहता है।)


प्रश्न - जिस तरह आप मरीज़ को स्वयं को ठीक करने की शक्ति देते हैं, यह बहुत सुंदर बात है। यह एक तरह से व्यक्ति के भीतर उस मानसिक विकार के लिए ज़रूरी उपचार शक्ति को बहाल करना है जो शायद शरीर में असंतुलन के कारण उत्पन्न हुआ हो।

हाँ! यह नींद न आने जैसी सामान्य बात भी हो सकती है या फिर स्किज़ोफ़्रीनिया (एक मनोविकार) जैसा रोग भी हो सकता है। दोनों

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ही मामलों में हम देखते हैं कि इसका भावनात्मक स्तर पर यानी मन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। मस्तिष्क एक संरचना है, एक तरह का हार्डवेयर है लेकिन हम सॉफ़्टवेयर यानी मन के साथ काम करते हैं। और इसका असर केवल दिमाग पर ही नहीं पड़ता। इसका असर पूरे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर, मस्तिष्क से लेकर रीढ़ की हड्डी के अंतिम सिरे तक हो सकता है। तंत्रिका तंत्र सीधे हमारी अंतःस्रावी ग्रंथियों (endocrine glands) से जुड़ा होता है जो हमारे चक्रों से जुड़ती हैं। आँत में तंत्रिका कोशिकाएँ यानी न्यूरॉन होते हैं और हमारे थायरॉयड, थाइमस और सेक्स हार्मोन तंत्रिका तंत्र से परस्पर जुड़े होते हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक शोध से पता चलता है कि हमारे मस्तिष्क में न्यूरॉन, थायरॉयड में नैनो-न्यूरॉन और थाइमस में माइक्रो-नैनो-न्यूरॉन होते हैं। सदियों पहले आयुर्वेद और योग ने प्रमाणित किया था कि मन हमारे चक्रों से संचालित होता है। इसलिए जब हम विभिन्न चक्रों में विषाक्त पदार्थों को जमा कर लेते हैं तब वे विभिन्न संकेतों और लक्षणों के माध्यम से प्रकट होते हैं। आधुनिक चिकित्सा में रोग निदान विज्ञान कहता है, “ये लक्षण हैं और यह बीमारी है। हम पहले लक्षणों को नहीं देखते बल्कि हम ऊर्जा को देखते हैं। हम उस व्यक्ति का इलाज करते हैं और लक्षण ठीक हो जाते हैं।

मनुष्य के लिए स्वस्थ जीवन को बनाए रखने के लिए न सिर्फ़ भोजन महत्वपूर्ण है बल्कि यौन क्रिया और नींद भी महत्वपूर्ण हैं। जब नींद आने में समस्या होती है तो हम पूछते हैं, “इसका कारण क्या है?” लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहना एक कारण है। हम अपने मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट पर बहुत ज़्यादा समय बिताते हैं। किसी भी चीज़ की अति हमारे लिए अच्छी नहीं होती। गतिहीन जीवन, अत्यधिक भोजन, पर्याप्त व्यायाम न करना - ये सभी बीमारी में योगदान देने वाले कारक हैं। हमें संतुलन की ज़रूरत है।

जब आप किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक के पास जाते हैं तो वह यह नहीं कहेगा, “ये सब चीज़ें बंद कर दो,” बल्कि वह कहेगा, “उन्हें कम करो और अपनी बीमारी से उबरने का हर संभव प्रयास करो। और जब आप चीज़ों को भीतर से कम करना शुरू करते हैं तब आप किसी भी तरह की ऐसी रुकावट से निपट सकते हैं जो आपको आगे नहीं बढ़ने दे रही। सभी मनुष्यों की स्वस्थ और खुश रहने की मूलभूत इच्छा होती है और जितना अच्छा आपका स्वास्थ्य होगा, उतने ही ज़्यादा आप खुश रहेंगे। विज्ञान आज ऑक्सीटोसिन और सेरोटोनिन जैसे खुशी के हार्मोन के बारे में बात करता है। हमें हर उस चीज़ से दूर रहना चाहिए जो तनाव के हार्मोन और भय के हार्मोन को बढ़ाती है। जो कुछ भी आपको अंदर से खिलाता यानी उल्लासपूर्ण बनाता है हमें उसे अपने जीवन में जोड़ लेना चाहिए।


(रोग के कारकों की पुनः पुष्टि करने के लिए हम नाड़ी परीक्षा करते हैं यानी नब्ज़ पढ़ते हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनमें ऊर्जा कैसे प्रवाहित हो रही है।)


प्रश्न - यह एक बहुत अच्छा सिद्धांत है - इस अराजक दुनिया में अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए जो आपको खुश करता है उसे जोड़ें और जो आपको तनावग्रस्त करता है उसे हटा दें।

जब मरीज़ बहुत अधिक व्यथित होते हैं, तो क्या कुछ ऐसी मुख्य बातें हैं जिनका पालन करके वे खुश रह सकते हैं या संतुलित रह सकते हैं?

आयुर्वेद रोग के रोकथाम, इलाज और पुनर्वास के बारे में बात करता है। हमारी स्पष्ट समझ है कि केवल 10% लोगों को ही ऐसी शारीरिक समस्या होती है जिसके उपचार की आवश्यकता होती है। बाकी 90% स्वस्थ होते हैं। लेकिन इन 90% लोगों में भावनात्मक समस्याएँ होती हैं इसलिए उनके किसी बीमारी से संक्रमित होने की संभावना बनी रहती है। यदि इन भावनात्मक समस्याओं का ठीक से समाधान नहीं किया जाता तो वे रोग का कारण बन सकती हैं। जब बीमारी ठीक नहीं होती तो वह पुरानी होती जाती है और आप सोचते हैं कि यह लाइलाज है।


(जो कुछ भी आपको अंदर से खिलाता यानी उल्लासपूर्ण बनाता है हमें उसे अपने जीवन में जोड़ लेना चाहिए।)


स्वस्थ जीवन के लिए योग सीखने और आयुर्वेद को समझने का प्रयास करें। यह महत्वपूर्ण है कि आप किस समय जागते हैं और आप अपना दिन कैसे शुरू करते हैं। यह एक मैराथन दौड़ की तैयारी की तरह है। आप जो पहला कदम उठाते हैं वह इस बात के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है कि आप हर दिन के लिए अपने आप को कैसे तैयार करते हैं। यदि आपके जीवन में एक उच्चतम लक्ष्य है तो यह आपको मज़बूत बनाता है। दिन की शुरुआत ध्यान से करें। कुछ शारीरिक गतिविधि करें - यह योगासन, साइकिल चलाना, दौड़ना, चलना या तैराकी कुछ भी हो सकता है। जो भी हो आपके स्थूल शरीर को सप्ताह में कम से कम छह दिन, दिन में एक घंटा व्यायाम की आवश्यकता होती है। उसके बाद अपने काम पर ध्यान केंद्रित करें। आप 100% परिणाम देंगे। दिन के अंत में शांति से बैठें और दिनभर की गतिविधियों के बारे में सोचें - आपने अपनी भावनाओं में कौन सी अवाँछित चीज़ें जमा कर ली हैं? सफ़ाई का अभ्यास करें। जब आप सोने जाएँ तब प्रार्थनापूर्ण भाव में रहें। ये तीन चीज़ें अनिवार्य हैं। यही सार है।


(यह महत्वपूर्ण है कि आप किस समय जागते हैं और आप अपना दिन कैसे शुरू करते हैं। यह एक मैराथन दौड़ की तैयारी की तरह है। आप जो पहला कदम उठाते हैं वह इस बात के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है कि आप हर दिन के लिए अपने आप को कैसे तैयार करते हैं।)


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आप हार्टफुलनेस से जुड़े प्रशिक्षित योग शिक्षकों और आयुर्वेद चिकित्सकों से सफ़ाई का अभ्यास सीख सकते हैं। वे जानते हैं कि इन सभी अभ्यासों में आपका मार्गदर्शन कैसे करना है। प्रार्थनापूर्ण भाव में सोने से आप स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं। यदि आपके सामने चुनौतियाँ हैं तो हम तक पहुँचने में संकोच न करें। हम आपको स्वस्थ और सुखी जीवन जीने में मदद करने के लिए हमेशा मौजूद हैं। धन्यवाद मेरियन।

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

 

कलाकृति - जास्मी मुद्गल


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श्री वर्मा

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आचार्य श्रीवर्मा, जिन्हें

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