जर्ना खिमानी इच्छास्थिरता और परमात्मा पर किए शांतिमय ध्यान के दौरान कुछ पाने से होने की ओर हुए बदलाव के बारे में बताती हैं।

 

क साल की उम्र में मेरे लिए बस यही मायने रखता था कि मैं अपनी माँ की बाहों में लिपट जाऊँ और सुरक्षा व प्यार के उस गहरे एहसास को महसूस करूँ। ग्यारह साल की उम्र में मेरे लिए अपने कपड़ों पर अपने दोस्तों की स्वीकृति पाना सबसे ज़रूरी था। इक्कीस साल की उम्र में कॉलेज में अच्छे नंबर लाना ही मेरा एकमात्र लक्ष्य था। इकतीस साल की उम्र में मेरे लिए मेरा शौक और काम सबसे ज़रूरी थे।

अब, मैं यहाँ एक छोटे, अनूठे कैफ़े में बैठी हूँ और अपने जीवन के हर चरण पर विचार कर रही हूँ। मैं इस बात पर चिंतन कर रही हूँ कि उस समय मैं कितनी उलझी हुई थी और आज भी कितनी उलझी हुई हूँ क्योंकि अब जीवन के कई अन्य पहलू मेरे मन को व्यस्त रखते हैं। क्या मैं जीवन में हमेशा कुछ अधिक और कुछ नया पाने की इच्छा करती रहूँगी?

मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे दादाजी चाहते थे कि हमारा पूरा परिवार एक ऐसे घर में चला जाए जिसे हम अपना कह सकें। उन्होंने बहुत अच्छा जीवन जिया। फिर भी उनके अंतिम क्षणों में उन्हें यह बात बहुत कचोटती थी कि वे नया घर नहीं खरीद पाए। जब मैं उन नाज़ुक पलों के बारे में सोचती हूँ, मुझे यकीन हो जाता है कि मेरी इच्छाएँ भी इसी तरह विकसित और उन्नत होती रहेंगी और मेरे जीवन के हर मोड़ पर हमेशा कुछ न कुछ ऐसा रहेगा जो मुझे सबसे ज़रूरी लगेगा - चाहे वह मेरे अपने लिए हो या दूसरों के लिए।

निश्चित रूप से इस बात से कोई बच नहीं सकता कि हमारी इच्छाएँ, रिश्ते, आकांक्षाएँ और सपने हमें किसी दिशा की ओर खींचते हैं या किसी से दूर करते हैं। लेकिन किसी न किसी स्तर पर मैं हमेशा दुनिया से जुड़ी रहूँगी। मैं खुद से पूछती हूँ, “क्या इसीलिए हम सब यहाँ हैं और यह जीवन जी रहे हैं?”

नहीं!” मेरा दिल तुरंत जवाब देता है, मानो उसे पहले से ही पता हो - इस सब में और भी बहुत कुछ है; मुझे दी गई हर साँस में कोई गहनता है। मन जो इस संसार में अत्यधिक उलझा हुआ है, उसे पार करने के अनगिनत अवसर मौजूद हैं।

मांडूक्य उपनिषद् का एक सुंदर उद्धरण है जो अभी-अभी मेरे मन में उभरा है -

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥

दो पक्षी, अविभाज्य साथी, एक ही पेड़ पर बैठे हैं। एक फल खाता है, दूसरा देखता है। पहला पक्षी हमारा व्यक्तिगत स्व है, जो इस संसार के सुख-दुःखों का भोग करता है। दूसरा सार्वभौमिक स्व है, जो मौन रहकर सब कुछ देखता है।

परमात्मा सब कुछ देखता है। लेकिन अपनी जीवन यात्रा में हमें उस परमात्मा को देखने और उससे जुड़ने का अवसर भी मिलता है। जितना अधिक हम उससे जुड़ते हैं उतना अधिक हम शांत होते जाते हैं और उतना अधिक हम सर्वव्यापी ऊर्जा को आत्मसात करने तथा ईश्वर के प्रवाह में बने रहने के लिए ग्रहणशील होते जाते हैं।

हाल ही में मैंने एक अँधेरे कमरे में दीया जलाया। मेरी आँखें नाचती हुई दमकती लौ पर टिकी रहीं जो मेरा ध्यान भीतर और बाहर के प्रकाश की ओर आकर्षित कर रही थी। कुछ ही मिनटों में नाचती हुई लौ शांत हो गई और मेरा घूमता हुआ मन भी शांत हो गया। फिर वहाँ केवल रिक्तता थी जहाँ कभी लौ जल रही थी, वह लौ जो अब हवा में विलीन हो चुकी थी और मेरे चाँदी के दीए पर रुई जैसी काली राख छोड़ गई थी।

मैं वहीं रुकी रही, उस खाली जगह में बिलकुल स्थिर - मानो मेरे आसपास सब कुछ ठहर गया था , ठीक वैसे ही जैसे अर्जुन के लिए सब कुछ ठहर गया होगा जब श्री कृष्ण ने उसे गीता का ज्ञान दिया था। उस क्षण, मैंने एक आवाज़ सुनी – “इस ज्योति की तरह मैं क्षण भर के लिए साकार रूप में विद्यमान हूँ और पलक झपकते ही मैं चली जाऊँगी।” जब तक मैं अपने भीतर के ईश्वर से, निराकार परमात्मा से जुड़ नहीं जाती तब तक जीवन निरर्थक ही है।

मैं स्थिर रही, मेरा मन खाली और हृदय प्रेम से भरा था। यह उन शुभ दिनों में से एक था जब मैं किसी भी बाहरी शोर से अविचलित रही। शायद यह ब्रह्मांड का कहने का तरीका था, “मेरी बेटी, अब तुम्हारा समय है, अपने भीतर के ईश्वर के साथ एकाकार होने का।”

उन क्षणों में,
मैं बस अस्तित्व में थी।
जैसे सूर्य बस विद्यमान है।
जैसे चंद्रमा बस विद्यमान है।
जैसे तारे बस टिमटिमाते हैं।
मैं बस वहाँ थी।
और सूर्य व चंद्रमा की तरह,
मुझे नहीं पता था
मुझे कैसे पुकारा जाता है।
कोई नाम नहीं,
कोई रूप नहीं,
कोई लिंग नहीं,
सिर्फ़ एकात्मकता।
सिर्फ़ अस्तित्व।

मुझे लगता है कि यह मेरी आध्यात्मिक यात्रा में किसी नई और शक्तिशाली अवस्था का आरंभ है। यह इस बात का एक गहरा एहसास है कि जीवन में इच्छाओं से परे भी गहराई है - यदि हम स्थिर रहने और एक अंश के रूप में नहीं बल्कि पूर्ण का प्रतीक बनकर जीने को तैयार हों।

 

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यह इस बात का एक गहरा एहसास है कि जीवन में इच्छाओं से परे भी गहराई है - यदि हम स्थिर रहने और एक अंश के रूप में नहीं बल्कि पूर्ण का प्रतीक बनकर जीने को तैयार हों।


 


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जर्ना खिमानी

जर्ना खिमानी

जर्ना खिमानी कैपजेमिनी में आईटी मैनेजर हैं। उन्हें शब्दों और पौराणिक कथाओं से गहरा प्रेम है। अपने ल... और पढ़ें

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