विक्टर कन्नन द्वारा लिए गए इस साक्षात्कार में सतबीर सिंह खालसा आधुनिक जीवन पद्धति में योग के उपयोग व शोध के बारे में बताते हैं। डॉ. खालसा सन् 1973 से कुंडलिनी योग के प्रशिक्षक हैं। उन्होंने सन् 2001 से कार्यस्थल तथा सार्वजनिक स्कूलों में अनिद्रा, दीर्घकालिक तनाव और चिंता संबंधी विकारों पर योग के सकारात्मक प्रभावों पर शोध किए हैं। वे हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की विशेष रिपोर्ट, ‘इंट्रोडक्शन टू योग’, के चिकित्सकीय संपादक हैं और चिकित्सा की पाठ्यपुस्तक ‘द प्रिंसिपल्स एंड प्रैक्टिस ऑफ़ योग इन हेल्थ केयर’ के मुख्य संपादक हैं।
स्कूलों में योग
प्रश्न - क्या आप हमें बता सकते हैं कि शारीरिक और मानसिक समस्याओं के निवारण में योग के कुछ अभ्यास कैसे सहायता कर सकते हैं?
मैं इस बात का प्रबल समर्थक रहा हूँ कि हमें सार्वजनिक स्कूलों में योग के अभ्यास लागू करने के बारे में और अधिक शोध करने की ज़रूरत है क्योंकि मैं मानता हूँ कि योग से ऐसे मूलभूत कौशल विकसित होते हैं जिन्हें बच्चों को सीखने की ज़रूरत है। आत्म-नियंत्रण और मनो-शारीरिक जागरूकता के कौशल सुरक्षात्मक होते हैं। वे शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक दोनों प्रकार के विकारों से बचाव करते हैं।
सभी प्रकार के विकारों में एक बहुत बड़ा खतरा दीर्घकालिक तनाव और भावनात्मक परेशानियों का होता है। आत्म-नियंत्रण से हमें भावनात्मक संतुलन प्राप्त होता है। और तनाव-नियंत्रण व भावनात्मक-नियंत्रण असामान्य व्यवहार एवं असामान्य मानसिक अवस्थाओं से बचाव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आजकल हमारे छोटे और बड़े बच्चे जिस हद तक बुरी मानसिक स्वास्थ्य दशाओं का अनुभव कर रहे हैं, वह निराशाजनक है। इसका समाधान यह है कि बच्चों को वह चीज़ सिखाई जाए जिसे ‘सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा’ कहते हैं। आत्म-नियंत्रण और जागरूक रहने की क्षमता उनके व्यवहार में बदलाव लाएगी जिससे उनकी मानसिक और भावनात्मक अवस्था बदलेगी। इससे समग्र रूप से उनकी आत्म-प्रभावकारिता में बदलाव आएगा और जीवन का सामना करने की उनकी क्षमता में सुधार होगा।
दुर्भाग्यवश हमारे स्कूलों में इस तरह के कौशल नहीं सिखाए जाते क्योंकि वे सिर्फ़ व्यावसायिक सफलता पर केंद्रित शिक्षण देते हैं न कि मन, भावनाओं और शरीर के अच्छे स्वास्थ्य पर। अपने बच्चों को शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक रूप से क्रियाशील होने के लिए प्रशिक्षित न करना हमारे समाज की एक बड़ी कमज़ोरी है। शिक्षा यह सीखने के लिए होनी चाहिए कि एक प्रभावशाली और क्रियाशील वयस्क कैसे बनें। यह सिर्फ़ एक नौकरी पाने के लिए नहीं होनी चाहिए। योग में इस तरह के कौशलों को विकसित करने का सामर्थ्य है और इसीलिए मैं यह मानता हूँ कि इसे स्कूलों में अवश्य पढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा करने के लिए हमें ऐसे शोध करने की आवश्यकता है जो यह प्रदर्शित करें कि स्कूलों में योग को लागू करने से वह सब प्राप्त होगा।
प्रश्न - आपने यह भी बताया कि नीतियाँ शोध के अनुरूप नहीं होतीं इसलिए हमें अधिक शोध की आवश्यकता है।
हमारा समाज शोध के प्रमाण के आधार पर काम करता है और निर्णय लेता है। समस्या यह है कि शोध में काफ़ी समय लगता है। उन विषयों पर, जिन्हें हम लाभप्रद मानते हैं, शोध करने के विरोध में कई ताकतें व प्रभावशाली लोग मौजूद हैं। एक उदाहरण, जो आधुनिक समाज में बहुत हावी है, वह है धूम्रपान। धूम्रपान के बारे में शोध बहुत पहले 1940 और 1950 के दशक में ही हो गया था। वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट दी थी कि धूम्रपान के बुरे प्रभाव होते हैं और उसके बाद यह भी प्रमाणित हुआ कि धूम्रपान से कैंसर होता है। जलपान गृहों और विश्वविद्यालय परिसर में धूम्रपान के निषेध के लिए नीतियाँ और नियमों को बनाने के लिए कितने दशकों तक शोध किया गया? मुझे उम्मीद है कि हमारे स्कूलों में योग और सामाजिक-भावनात्मक शिक्षण के लिए नीतियाँ बनाने में इस तरह कई दशक नहीं लगेंगे लेकिन इसकी भविष्यवाणी करना मुश्किल है।
आधुनिक समाज में एक मज़ाक चलता है कि विज्ञान वर्तमान पीढ़ी के मरने के बाद अगली पीढ़ी के स्वीकार करने से आगे बढ़ता है। वैज्ञानिक पुराने स्थापित सिद्धांतों से चिपके रहते हैं और नए प्रमाणों तथा सोचने के नए तरीकों को स्वीकार नहीं कर पाते। उनके इस दुनिया से विदा लेने के बाद उनके स्थान पर वैज्ञानिकों की जो नई पीढ़ी आती है, वह अधिक ग्रहणशील होती है और नई नीतियों को अपनाकर उन्हें लागू करती है।
हमारे पास इस बात के बहुत से उदाहरण हैं। गैलीलियो के समय और उनके इस सिद्धांत के विरोध को याद कीजिए कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। चर्च इसका विरोधी था और उसका तर्क था कि यह सिद्धांत उनके धार्मिक मत के विरुद्ध है। उसे राज़ी करने में विज्ञान को कई दशकों का समय लगा था। यह धारणा इसके समर्थकों की मृत्यु के बाद ही समाप्त हुई।
योग धर्म नहीं है
प्रश्न - मैं भी इस गलतफ़हमी पर विचार करता हूँ कि योग की क्रिया धार्मिक है।
वास्तव में दो बड़ी गलतफ़हमियाँ हैं और वे दोनों एक-दूसरे के बिलकुल विपरीत हैं। एक तो यह है कि योग एक धर्म है। इस बात के सांकेतिक प्रमाण उपलब्ध हैं कि योग सिंधु घाटी की सभ्यता का हिस्सा था। हम यह भी जानते हैं कि योग उत्तर भारत के उस हिस्से की संस्कृति में विकसित हुआ था। भारत में मुख्य रूप से हिंदू रहते हैं और बहुत से हिंदू योग का अभ्यास करते हैं। लेकिन ऐतिहासिक और दार्शनिक दोनों दृष्टिकोण से यह तर्क गलत है कि योग हिंदुत्व का एक रूप है। हालाँकि यह भारत की अन्य दार्शनिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है - जैसे सांख्य दर्शन, जिनमें सभी एक-दूसरे से संबंधित हैं - योग ‘व्यावहारिक अध्यात्म’ के रूप में अपने दम पर खड़ा है।
योग चेतना की एकात्मक अवस्था का अनुभव करने पर केंद्रित है। इसके साथ कभी भी कोई रूढ़ि नहीं जुड़ी। मेरे विचार से यही बात एक धार्मिक गतिविधि को आध्यात्मिक गतिविधि से अलग करती है। योग अध्यात्म का व्यावहारिक रूप है। यह एक ऐसा दर्शन है जो चेतना की उच्चतर अवस्था का अनुभव करने की बात करता है। यह एक अनुभव है, कोई धर्म-सिद्धांत या मान्यता नहीं है। धर्म और आध्यात्मिकता में यही अंतर है।
धर्म में आप कुछ मान्यताओं और आचरण को अपनाते हैं जो आपको उस धर्म का हिस्सा बनाता है। आप उन मान्यताओं और रूढ़ियों को मानने लगते हैं और धार्मिक आचरण के रूप में उन विधियों, अनुष्ठानों और रीति-रिवाज़ों को व्यवहार में लाने लगते हैं।
योग चेतना की एकात्मक अवस्था का अनुभव करने पर केंद्रित है। इसके साथ कभी भी कोई रूढ़ि नहीं जुड़ी।
मेरे विचार से यही बात एक धार्मिक गतिविधि को आध्यात्मिक गतिविधि से अलग करती है।

योग एक मनो-शारीरिक अभ्यास है। आप व्यायाम, रिलैक्सेशन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करते हैं। समय के साथ आप चेतना की एकात्मक अवस्था का अनुभव करने की उम्मीद करते हैं। शुरुआत में शायद यह महज़ शांति, संतोष और स्थिरता का अनुभव हो सकता है। लेकिन बहुत से लोग चेतना की गहन और एकात्मक अवस्था, समाधि की अवस्था का भी अनुभव करते हैं। अगर आप अभ्यास करेंगे तो आपको भी अनुभव होंगे, भले ही आप विश्वास करें या न करें। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ लोगों ने योग को मज़ाक मानते हुए शुरुआत की थी। फिर अभ्यास करने के बाद उनके विचारों में बदलाव हुआ क्योंकि योग वास्तविक और लाभप्रद है। यह सोच की चरम स्थिति है।
पश्चिम की मुख्यधारा संस्कृति में योग
दूसरी चरम सोच है कि बहुत से लोग यह मानते हैं कि योग का अभ्यास काफ़ी हद तक तंग कपड़े (लियोटार्ड) पहने खूबसूरत महिलाएँ करती हैं जो कलाबाज़ी वाली मुद्राएँ बनाती हैं और इसके लिए आपको लचीला होना चाहिए। मीडिया में योग को जिस तरह दर्शाया जाता है, यह उसी का प्रभाव है। इस दृष्टिकोण के अनुसार पुरुष योग का अभ्यास नहीं करते तथा बच्चे भी योग का अभ्यास नहीं करते। अगर आपको स्वास्थ्य संबंधी कोई गंभीर परेशानी या असुविधा है तो भी आप योग का अभ्यास नहीं करते क्योंकि आप स्वस्थ नहीं हैं।
यदि आप मीडिया के लिए एक लेख लिख रहे हैं या एक पत्रिका बेचना चाहते हैं तो आप चित्र में क्या दिखाएँगे? एक बूढ़ा मोटा पुरुष ध्यान में बैठा है? नहीं, आप तंग कपड़े पहने एक खूबसूरत महिला को कलाबाज़ी वाली मुद्रा में दिखाएँगे क्योंकि पाठकों को यही आकर्षित करता है। यदि आप लगातार ऐसी छवि को मीडिया में दिखाते हैं तो लोग इन दोनों का संबंध जोड़ कर देखते हैं और यह निष्कर्ष निकालते हैं, “मैं युवा और लचीली महिला नहीं हूँ इसलिए योग मेरे लिए नहीं है।”
प्रश्न - मैं सोच रहा था कि ‘प्रसन्न बुद्ध’ (Happy Buddha) इसका अच्छा जवाब था।
‘प्रसन्न बुद्ध’ के साथ समस्या यह है कि इससे ऐसा लगता है आप बौद्ध धर्म की ओर जा रहे हैं। जब आप एक ध्यानमय मुद्रा को दिखाते हैं तो यह ज़ेन और बुद्ध के दूसरे रूपों से संबंधित मानी जाती है। इस तरह तो आप इसे धर्म के रूप में योग की समझ के दूसरे चरम बिंदु पर जा रहे हैं। एक समाज के तौर पर हमें इन दोनों चरम धारणाओं के बारे में लोगों के भ्रम को दूर करना होगा क्योंकि दोनों वास्तव में गलत हैं।
प्रश्न - मैं इससे सहमत हूँ। योग को सही ढंग से बढ़ावा देना हमारी ज़िम्मेदारी है अगर हम लोगों की उचित रूप से मदद करना चाहते हैं। इसके लिए हमें बेहतर नींद, तनाव प्रबंधन और अवसाद व नशे से बचाव के दृष्टिकोण से योग के बारे में नवीनतम शोध पर ध्यान देना होगा।
हम योग पर शोध में काफ़ी प्रगति देख रहे हैं। इसमें ऐसे अध्ययन भी किए गए हैं जिनमें प्रत्येक योग अभ्यास के मनो-शारीरिक प्रभाव और पारंपरिक योग के सभी चारों पहलुओं को एकसाथ मिलाने के प्रभाव दर्शाए गए हैं।
इससे शारीरिक लचीलापन, माँसपेशीय सहनशक्ति, माँसपेशीय मज़बूती और श्वास की कार्यप्रणाली
में सुधार व वृद्धि होती है। यह स्थूल शरीर पर मनो-शारीरिक तंत्र के माध्यम से काम करता है
जिससे भावनात्मक संज्ञानात्मक कार्यप्रणाली भी प्रभावित होती है।
योग के मनो-शारीरिक क्षेत्र पर किए गए मूलभूत शोध के चार मुख्य परिणाम हैं -
1. स्थूल शरीर में बदलाव -
इससे शारीरिक लचीलापन, माँसपेशीय सहनशक्ति, माँसपेशीय मज़बूती और श्वास की कार्यप्रणाली में सुधार व वृद्धि होती है। यह स्थूल शरीर पर मनो-शारीरिक तंत्र के माध्यम से काम करता है जिससे भावनात्मक संज्ञानात्मक कार्यप्रणाली भी प्रभावित होती है।
2. आत्म-नियंत्रण -
आज इस तथ्य के ठोस प्रमाण मौजूद हैं कि योग से हम अपनी आंतरिक अवस्था को आत्म-नियंत्रित कर सकते हैं। हम आत्म-नियंत्रण के तंत्रिका-क्रिया विज्ञान (neurophysiology) को अब समझने लगे हैं। आत्म-नियंत्रण संबंधी दो सबसे महत्वपूर्ण कौशल हैं - तनाव तथा भावनाओं पर नियंत्रण। हम जानते हैं कि योग के दौरान प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (मस्तिष्क का एक महत्वपूर्ण हिस्सा) सक्रिय हो जाता है जिससे हमारा लिंबिक तंत्र, जहाँ तनाव और भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है, शांत होने लगता है। ऐसे कई प्रमाण उपलब्ध हैं जो भावनाओं और विचार की प्रक्रिया में बेहतर आत्म-नियंत्रण लाने में योग की क्षमता सिद्ध करते हैं।

3. मन-शरीर की जागरूकता और सजगता में वृद्धि -
समय के साथ ध्यान में नियमित रूप से अवधान तंत्र (attention networks) के शामिल होने से विचार प्रक्रियाओं के आत्म-नियंत्रण का कौशल प्राप्त हो जाता है। हम विचार प्रक्रियाओं का आत्म-नियंत्रण कर पाते हैं और अपनी विचार प्रक्रियाओं को समझने लगते हैं। हम यह समझ जाते हैं कि हम अपनी विचार प्रक्रिया नहीं हैं। वे हमारे अस्तित्व में सबसे महत्वपूर्ण नहीं हैं क्योंकि हम उनका आत्म-नियंत्रण कर सकते हैं और अपने विचारों को बदल सकते हैं। मनोविज्ञान में इसे अधिसंज्ञान (मेटाकॉग्नीशन) के रूप में वर्णित किया गया है। अधिसंज्ञान आज की सबसे सशक्त और विश्वव्यापी मनोचिकित्सा, ‘संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा,’ के अनुकूल है जो विचार प्रक्रियाओं के आत्म-नियंत्रण पर आधारित है। योग का यह घटक बहुत शक्तिशाली है।
4. लंबे समय तक योग का अभ्यास करने से चेतना की गहरी अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं -
योग से लोग स्थूल और सूक्ष्म दोनों स्तरों पर शांति, संतोष और स्थिरता का अनुभव करते हैं। समय के साथ यह अनुभव मज़बूत होता जाता है और एकात्मता के अनुभव में विकसित हो जाता है जिसके अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड की अवस्था एकत्व की है। यह हममें गहरी एकात्मता का भाव उत्पन्न करती है जिससे हमारे जीवन के उद्देश्य और अर्थ में बदलाव आता है।
जब हम आध्यात्मिकता शब्द का प्रयोग करते हैं तब हम वास्तव में इसी अवस्था की बात करते हैं। लोगों में बदलाव आता है। उनके व्यवहार में बदलाव आता है। उनके जीवन के लक्ष्य बदल जाते हैं - भौतिकवादी लक्ष्य बदलकर अभौतिकवादी हो जाते हैं। वे आध्यात्मिक उद्देश्यों पर अधिक तथा जीवन के भौतिकवादी पक्षों पर कम केंद्रित होते हैं।
स्वास्थ्य के बारे में यह शोध विश्वसनीय है। यह शोध दशकों पहले किया गया था। अगर हम अलग-अलग लोगों को आसनों का अभ्यास करने को कहें तो उनके शरीर अधिक लचीले हो जाएँगे। हम इस लचीलेपन को इंचों और सेंटीमीटरों तथा गति की मात्रा में माप सकते हैं। प्राणायाम का अभ्यास श्वसन प्रणाली और स्वायत्त तंत्रिका तंत्र की कार्य क्षमता में वृद्धि करता है।
मस्तिष्क की स्कैनिंग, न्यूरोइमेजिंग, आणविक जैविक तकनीकों और जैव रसायन जाँचों की सहायता से अब हम समझने लगे हैं कि आत्म-नियंत्रण और मनो-शारीरिक जागरूकता कैसे विकसित होती है, मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों का आपस में क्या संबंध है और यह मस्तिष्क में कैसे व्यक्त होता है। यह पिछले तीन से चार दशकों में हुए शोधों का सबसे शक्तिशाली परिणाम है जो हमें उपलब्ध है।

मस्तिष्क की स्कैनिंग, न्यूरोइमेजिंग, आणविक जैविक तकनीकों और जैव रसायन जाँचों की सहायता से
अब हम समझने लगे हैं कि आत्म-नियंत्रण और मनो-शारीरिक जागरूकता कैसे विकसित होती है,
मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों का आपस में क्या संबंध है और यह मस्तिष्क में कैसे व्यक्त होता है।
आध्यात्मिकता ऐसा क्षेत्र है जिसमें अभी बहुत अधिक वैज्ञानिक शोध नहीं हुए हैं। बहुत से लोग तर्क देते हैं कि योग इतना गहन विषय है कि संभवतः इसका वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया जा सकता। लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूँ। अगर आपको कोई आध्यात्मिक अनुभव हुआ है और आप उसे व्यक्त कर सकते हैं तो आप उसे माप भी सकते हैं। आज हमारे पास अनेक प्रश्नावलियाँ और जाँच के तरीके हैं जो चेतना की अवस्थाओं को माप सकते हैं। हम यह भी जानते हैं कि चेतना की ये अवस्थाएँ मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न होती हैं। हम जानते हैं कि मस्तिष्क में ऐसे तंत्र होते हैं जो योगाभ्यास से प्रभावित होते हैं जिनसे ये अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं।
इसके बारे में सबसे प्रबल प्रमाण यह तथ्य है कि ‘साइलोसायबिन’ भी व्यक्ति में चेतना के एकत्व की अवस्था उत्पन्न कर सकती है। साइलोसायबिन एक ऐसी दवा है जो मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों और तंत्रों को प्रभावित करती है। कुछ लोग जिन्होंने साइलोसायबिन लिया उन्होंने चेतना की पूर्ण एकत्व अवस्था का अनुभव किया जिसकी प्रभावशीलता और जीवन में बदलाव उसी तरह का था जैसा योग द्वारा स्वाभाविक रूप से उत्पन्न अनुभवों से होता है। हम जानते हैं कि मन की इन अवस्थाओं को उत्पन्न करने के लिए मस्तिष्क में ऐसे क्षेत्र और तंत्र हैं जिन्हें सक्रिय किया जा सकता है।
इन मनो-शारीरिक बदलावों के प्रतिरूप, जिनसे ये चार परिणाम निकले, किसी भी परिस्थिति या व्यवहार में स्वतः लागू हो सकते हैं। आप इनका उच्च रक्तचाप, मधुमेह, अवसाद या चिंता की स्थिति में प्रयोग कर सकते हैं। शोध के दो ऐसे क्षेत्र जो स्वास्थ्य नीतियों को बदलने में सबसे ज़्यादा प्रभावकारी रहे हैं, वे हैं पीठ के निचले हिस्से की दर्द में राहत के लिए योग और कैंसर के उपचार के लिए योग। अब हम दूसरे क्षेत्रों में भी बड़ी गतिविधि देखने लगे हैं, उदाहरण के लिए मधुमेह के उपचार के लिए योग। भारत ने मधुमेह के उपचार पर ज़ोर दिया है क्योंकि यह वहाँ महामारी का रूप ले चुका है।
पश्चमी देशों में हम देखते है कि योग करने से जेल के बंदियों के आपराधिक व्यवहार में सुधार की असीम संभावना बन जाती है। ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जहाँ अब मानसिक स्वास्थ्य और मनुष्य के सभी प्रकार के विकारों को दूर करने के लिए योग का बहुत असरदार तरीके से उपयोग किया जा रहा है।
अगले अंक में जारी…
कलाकृति - अनन्या पटेल

सतबीर सिंह खालसा
डॉ.खालसा, पी.एच.डी., एक विश्व विख्यात योग शोधकर्ता, सहयोगी, लेखक और वक्ता हैं। वे हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में चिकित्सा क्षेत्र में सह प्राध्यापक हैं और कुंडलिनी रिसर्च इंस्टीट्यूट के ... और पढ़ें
