एक कला चिकित्सक की दृष्टि से
वनेसा पटेल कला चिकित्सक, संगीता प्रसाद, से इस विषय में बात करती हैं कि कैसे रचनात्मक अभिव्यक्ति उन बातों को व्यक्त करने का माध्यम बन जाती है जिन्हें अन्यथा कह पाना मुश्किल होता है - चाहे वह सदमे से जूझते बच्चों की बात हो या दर्द, बदलाव और मानसिक स्वास्थ्य की जटिलताओं से जूझते वयस्कों की। वे इस बारे में भी चर्चा करती हैं कि क्यों कलाकृति बनाना मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है।
प्र. - आपको कला चिकित्सा की ओर किस बात ने आकर्षित किया?
मैं भारत के चेन्नई शहर में पली-बढ़ी जहाँ मेरी माँ एक शानदार बालवाड़ी (kindergarten) स्कूल चलाती थीं। उनके स्कूल में कला को बहुत प्रोत्साहन दिया जाता था जिससे मैं सदा कला, शिक्षा और बच्चों के बीच रही। कॉलेज शिक्षण के दौरान मैंने अपनी ललित कला की डिग्री के साथ-साथ एक वर्ष ‘दृश्य संवाद’ का शिक्षण भी प्राप्त किया। तब मुझे लगा कि मुझे और भी कुछ करना चाहिए - कुछ ऐसा जिसमें लोगों और कला की सहभागिता हो।
चेन्नई की उमस भरी गर्मी से बचने के लिए मैं अक्सर वहाँ की खूबसूरत, वातानुकूलित अमेरिकन लायब्रेरी में चली जाती थी। उसे अब अमेरिकन सेंटर कहा जाता है। वहाँ मुझे एडिथ क्रेमर की एक पुस्तक पढ़ने को मिली। एडिथ ‘कला चिकित्सा’ के क्षेत्र में अग्रणी थीं जो विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के साथ काम करती थीं। मैं वह पुस्तक पढ़ने लगी और मुझे यह एहसास हुआ कि यही वह चीज़ है जिसके बारे में मैं और अधिक जानना चाहती थी।
मैंने ललित कला का अध्ययन करने और फिर कला चिकित्सा की पढ़ाई करने के लिए वर्ष 1985 में अमेरिका के जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। मेरा इरादा भारत लौटकर विशेष आवश्यकताओं वाले लोगों के लिए स्कूल की स्थापना करने का था क्योंकि उस समय तक भारत में ऐसा कोई भी स्कूल नहीं था। इसकी शुरुआत मैंने अपनी माँ के स्कूल ‘बैंबिनो’ में एक विशेष संसाधन कक्ष खोलकर की जहाँ हमने ऑटिज़्म, प्रलंबित विकास, अतिसक्रियता और ध्यान अभाव अतिसक्रियता विकार (ADHD) से पीड़ित बच्चों के साथ काम किया। उस समय इन विकारों को लोग ठीक से समझते नहीं थे।
प्र. - आधुनिक निदान उपकरणों के बिना आप ऐसे बच्चों को कैसे पहचानती थीं?
अधिकतर यह उन बच्चों के व्यवहार को देखकर समझ में आता था – जैसे जब बच्चे स्कूल नहीं आना चाहते थे या बहुत बेचैन रहते थे। मेरी माँ जानती थीं कि उन्हें कैसे संभालना होता है। मैंने कला चिकित्सा की वे तकनीकें लागू कीं जो मैंने उस समय ‘भावनात्मक रूप से परेशान बच्चों’ के साथ काम करते हुए सीखी थीं - ऐसे बच्चे जो भावनात्मक समस्याओं से, किसी तरह के सदमे (ट्रॉमा) से ग्रस्त थे और कुछ बच्चे जो ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम से पीड़ित थे। असामान्य मनोविज्ञान (abnormal psychology) की जानकारी होने से मुझे यह समझने में मदद मिली कि उनके साथ कैसे बेहतर ढंग से काम किया जाए।
हमने उन बच्चों के साथ काम करने के लिए एक ऐसे शिक्षक को नियुक्त किया जो सामान्य कक्षाओं में उपयोग की जाने वाली विधियों से अलग प्रकार की विधियों का उपयोग करते थे और उन्हें सामान्य कक्षाओं में शामिल भी करते थे। मैं कला चिकित्सा करती थी और परिवारों के साथ भी काम करती थी।
विवाह के बाद, मैं अमेरिका में स्थायी रूप से रहने लगी। बैंबिनो में जिन शिक्षक ने मेरे साथ काम करना शुरू किया था, उन्होंने आगे चलकर चेन्नई में विशेष बच्चों के लिए एक स्कूल की स्थापना की और अब भी विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के साथ काम कर रहे हैं।
प्र. - एक सामान्य कला की कक्षा और एक चिकित्सकीय कला के सत्र में क्या अंतर है?
यह बहुत अच्छा प्रश्न है। एक कला कक्षा में आप बहुत कौशल और कलाकृति उन्मुख होते हैं। आपको रंगों को मिलाना, परिप्रेक्ष्य चित्रण सीखना होता है और आपका इरादा वास्तव में कलाकृति बनाने का होता है। कला चिकित्सा में प्रक्रिया ही उद्देश्य होती है। बच्चा जैसे चाहे कागज़ पर लिख सकता है। वास्तव में हम इसे प्रोत्साहित करते हैं ताकि उसकी रचनात्मक सोच विकसित हो सके।
कला का कई अलग-अलग तरीकों से उपयोग किया जा सकता है- जैसे एक निदान के साधन के रूप में, जो व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर निर्भर करता है या यह सूक्ष्म और सकल गतिक कौशल (motor skills) को निखारने के लिए किया जा सकता है। हमारा प्रशिक्षण हमें भावनात्मक अभिव्यक्तियों को समझने में मदद करता है। दृश्य कला के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए हममें से हरेक व्यक्ति अलग रंगों और अलग तरीके का चुनाव करता है।
प्र. - तो यह वास्तव में व्यक्ति के बिना बोले उसे समझना है?
यह दोनों का मिलाजुला रूप है। कभी-कभी यह सिर्फ़ चित्रकला हो सकती है - कोई व्यक्ति अंदर आता है और कुछ उठाकर बिना कोई शब्द कहे कृति बनाकर खुद को व्यक्त करता है। और कभी इसमें कला और शब्द दोनों हो सकते हैं।
प्र. - यदि किसी व्यक्ति ने मानसिक सदमा झेला हो तो कला चिकित्सा के माध्यम से उससे जुड़ने में कितना समय लगता है?
यह व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। मेरे पास ऐसे भी क्लाइंट हैं जो पाँच साल से आ रहे हैं। अस्पतालों में हमारे पास अल्पकालिक और दीर्घकालिक क्लाइंट होते हैं। स्कूलों में अलग होता है और यह वास्तव में परिस्थिति पर निर्भर करता है। हम केंसर चिकित्सा विभागों में भी काम करते हैं जहाँ हम दर्द प्रबंधन के लिए कला का उपयोग करते हैं।
हाल ही में मेरा एक सत्र ऐसी क्लाइंट (मरीज़) के साथ था जो अत्यधिक दर्द, बेचैनी और गंभीर अवसाद से पीड़ित थी। जब मैंने उससे कहा कि वह अपने दर्द की कल्पना करे कि वह कैसा था और उसका चित्र बनाकर दिखाए तो उसने एक मछली का चित्र बनाया जो बुरी तरह घायल थी और खून से लथपथ थी। उसने कहा, “मेरा दर्द ऐसा है। मुझे मछली अच्छी लगती है। वे बहुत सुंदर होती हैं लेकिन मेरी मछली अब नहीं रही वह जा चुकी है।” इस तरह वह अपने दर्द को अभिव्यक्त कर पाई।
जब उसने मछली का चित्र बनाया और हमने उसे देखा तब हमने रूपकात्मक ढंग से बात की कि उस मछली को कैसे राहत दी जा सकती है। उसकी मदद करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं? इससे उसे अपनी समस्या को अपने आपसे अलग करके देखने में मदद मिली। हमने चर्चा की कि मछली के घावों का कारण क्या हो सकता था और क्या कुछ ऐसा है जो वह मछली को पुन: स्वस्थ बनाने के लिए कर सकती थी।
कला चिकित्सा में प्रक्रिया ही उद्देश्य है।
प्र. - यह वास्तव में बहुत सुंदर बात है। आप उन्हें एक ऐसा सुरक्षित वातावरण प्रदान कर रही हैं जिसमें विश्वास है। शायद यह एक कारण है कि लोग बार-बार आपके पास आते हैं। यह ऐसी जगह है जहाँ वे वास्तव में जैसे हैं वैसे बने रह सकते हैं या उसे खोज पाते हैं जो वे वास्तव में हैं।
बिलकुल सही है। कभी-कभी वे बेहतर महसूस करने लगते हैं तो आना बंद कर देते हैं लेकिन कुछ समय बाद यदि उन्हें सहारे की फिर से आवश्यकता पड़ती है तो वे वापस आ जाते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि सभी को सहारे की आवश्यकता होती है। वे जानते हैं कि उन्हें किस चीज़ से मदद मिलेगी। इन सब के बारे में बात करने के लिए यह उनको सुरक्षित जगह लगती है।

प्र. - आप किन तकनीकों का उपयोग करती हैं?
यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है जो हमारे पास आता है। जिस क्लाइंट के बारे में मैंने अभी बात की थी उसके दर्द को समझने के लिए मैंने कल्पना चित्रण का उपयोग किया था। एक अन्य क्लाइंट है जो वयस्क है लेकिन उसका व्यवहार एक आठ साल के बच्चे जैसा है। उसके लिए मैं उसके सूक्ष्म गतिक कौशलों और सकल गतिक कौशलों के विकास पर ध्यान केंद्रित करती हूँ। हमने बाएँ हाथ और दाएँ हाथ के बीच बेहतर तालमेल बनाने के लिए एक बुनाई परियोजना शुरू की है। कभी-कभी मैं एक कला गतिविधि करवाती हूँ जिसमें उसे किसी ऐसी घटना के बारे में अपनी भावनाओं को चित्रित करना होता है जो गत सप्ताह के दौरान हुई। यह गतिविधि मैं इसलिए करवाती हूँ क्योंकि वह बहुत आवेगी है और बदलावों का सामना करना नहीं जानती।
क्लाइंट की विशिष्ट आवश्यकता के अनुसार हम अलग-अलग तकनीकों का उपयोग करते हैं। कला बहुत विविधतापूर्ण है। कलाकृति बनाने के लिए हम विभिन्न प्रकार की सामग्रियाँ प्रदान करते हैं, जैसे पेन्सिल, रंग, मिट्टी, मिली-जुली वस्तुएँ और प्राकृतिक तत्व। मैं कला कक्ष में कई ऐसी सामग्रियों का उपयोग करती हूँ जिन्हें हम प्रकृति से इकट्ठा करते हैं। हम पुनर्चक्रित वस्तुओं को भी इकट्ठा करते रहते हैं जिन्हें लोग कचरा समझते हैं।
प्र. - यह तो अद्भुत रचनात्मकता है। क्या आप अपनी पुस्तकों के बारे में बताएँगी?
मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। एक है, ‘क्रिएटिव एक्सप्रेशन- से इट विथ आर्ट’, जो वर्ष 2008 में विशेष तौर पर भारत के अध्यापकों के लिए लिखी गई थी। मैंने इसे अब पीडीएफ़ रूप में अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है और यह अध्यापकों को आसानी से उपलब्ध है। दूसरी पुस्तक है, ‘यूज़िंग आर्ट थेरेपी विद डायवर्स पॉपुलेशन’, जिसमें प्रत्येक अध्याय लोगों के अलग समूह के साथ काम करने पर केंद्रित है, जैसे शरणार्थी, कैदी और विभिन्न आयु वर्ग के लोग। इस पुस्तक में लगभग सत्ताईस लेखकों ने अपना योगदान दिया है।
हमारे चिकित्सक अलग-अलग तरह की परिस्थितियों में काम कर सकते हैं जैसे सामुदायिक केंद्र, अस्पताल और स्कूल। वे सभी उम्र के लोगों के साथ काम करते हैं और उनके लिए उपयुक्त तकनीकों का उपयोग करते हैं। इसीलिए प्रशिक्षण आवश्यक होता है। मैं प्रशिक्षण पर इसलिए ज़ोर देती हूँ क्योंकि बहुत लोग सोचते हैं कि चूँकि वे स्वयं कलाकार हैं, वे कला चिकित्सा कर सकते हैं। लेकिन कला चिकित्सा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कार्य है। इसके लिए स्नातकोत्तर स्तर के शिक्षण की आवश्यकता होती है - दो से तीन वर्ष का गहन प्रशिक्षण और व्यावहारिक अनुभव लेना होता है। इस संदर्भ में पी.एच डी. स्तर के प्रोग्राम भी हैं जिनमें इस विषय पर शोध किया जा रहा है कि किस प्रकार कला का उपयोग स्थानीय लोगों में किया गया है। प्रागैतिहासिक (prehistoric) काल से ही कला को अभिव्यक्ति के एक माध्यम के रूप में गुफाओं की दीवारों पर चित्रित किया गया है। मानव जीवन में कला ने सदैव महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
प्र. - इसका मतलब है कि प्रशिक्षण में मुख्यत: कला, शिक्षा, और मनोविज्ञान का समावेश है?
हाँ, ये तीनों ही शामिल हैं। मनोवैज्ञानिक एवं परामर्श तकनीकों का काफ़ी उपयोग किया जाता है। अमेरिका में सामान्यतया इसमें दो से तीन वर्ष लगते हैं जो पाठ्यक्रम पर निर्भर करता है। और हम आमतौर पर सलाह देते हैं कि विद्यार्थी अनुभवी सलाहकार की देखरेख में कम से कम दो तरह के लोकवर्गों के साथ काम करें।
वर्तमान में, मैं भारत में पुणे के ‘महाराष्ट्र इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी’ में पढ़ा रही हूँ। यहाँ मैंने एक मिश्रित प्रोग्राम (हाइब्रिड प्रोग्राम जिसमें कुछ क्लासें ऑनलाइन होती हैं और कुछ आमने-सामने) को शुरू करने और तैयार करने में मदद की है। मैं अब भी वहाँ निरीक्षण करती हूँ। हमारे विद्यार्थी विभिन्न व्यवस्थाओं में कार्य करते हैं और हम उन्हें उन चुनौतियों पर चर्चा करने के अवसर प्रदान करते हैं जिनका वे सामना करते हैं।
उसने कहा, “मेरा दर्द ऐसा है। मुझे मछली अच्छी लगती है। वे बहुत सुंदर होती हैं लेकिन मेरी मछली अब नहीं रही वह जा चुकी है।” इस तरह वह अपने दर्द को अभिव्यक्त कर पाई।
प्र. - मानसिक स्वास्थ्य के प्रति आपका दृष्टिकोण बहुत समग्र (holistic) प्रतीत होता है। क्या आप कहेंगी कि यह दृष्टिकोण आज के समय में पहले से कहीं अधिक आवश्यक होता जा रहा है?
मुझे तो ऐसा ही लगता है। औषधि-प्रयोग ही एकमात्र समाधान नहीं है। हमें एक बहुपक्षीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है। जब कोई व्यक्ति किसी समस्या से ग्रस्त होता है - जैसे सदमे से पीड़ित, विकास में विलंब, जीवन में बदलाव, तलाक - तब आपको उस व्यक्ति के लिए अलग साधनों की आवश्यकता होती है। कला चिकित्सा के साथ-साथ मैं माइंडफुल ध्यान का भी बहुत उपयोग करती हूँ। मैं माइंडफुल ध्यान सिखाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक हूँ और मेरा अपना व्यवसाय है। मुझे माइंडफुलनेस और कला का संयोजन बहुत अच्छा लगता है।
तंत्रिका विज्ञान में भी मेरी बहुत रुचि है। यदि हम शरीर और मस्तिष्क को और उनके बीच के संबंधों को समझ लें तो यह वास्तव में हमें इस बात को समझने में मदद कर सकता है कि हमारा क्लाइंट किस मानसिक स्थिति से गुज़र रहा है और उसी अनुसार हम उन्हें अलग-अलग साधन प्रदान कर सकते हैं।
मैं कला कक्ष में कई ऐसी सामग्रियों का उपयोग करती हूँ जिन्हें हम प्रकृति से इकट्ठा करते हैं। हम पुनर्चक्रित वस्तुओं को भी इकट्ठा करते रहते हैं जिन्हें लोग कचरा समझते हैं।

प्र. - आपके कार्य के आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य के बारे में पढ़कर मुझे अच्छा लगा। मैं भी हार्टफुलनेस ध्यान की प्रशिक्षिका हूँ। कभी-कभी ध्यान सत्र के बाद लोग बैठकर बात करना चाहते हैं और उसमें मेरी भूमिका सिर्फ़ सुनने की होती है। लेकिन आप अपनी कला चिकित्सा प्रशिक्षण के साथ इसे दूसरे स्तर पर ले जाती हैं।
यह सच में अद्भुत है क्योंकि जिन स्कूलों से मैं जुड़ी हूँ उनमें यह स्पष्ट रूप से सामने आया है कि बच्चों को वास्तव में अभिव्यक्ति के लिए किसी अन्य साधन की भी आवश्यकता होती है। और कला चिकित्सा ऐसा ही एक साधन प्रदान करती है।
प्र. - आपने इस साधन का उपयोग जेलों में भी किया है। यह कैदियों के पुनर्वास में किस तरह से मदद करता है?
डेव गुस्साक नाम के एक अद्भुत कला चिकित्सक हैं। उन्होंने इस विषय पर बहुत काम और शोध किया है कि उन परिस्थितियों में जहाँ बहुत आक्रामकता हो सकती है, जहाँ लोग आहत होकर आते हैं और जहाँ क्रोधपूर्ण संवाद होते हैं वहाँ कला चिकित्सा का उपयोग किस तरह से किया जा सकता है। जेल में बहुत लोग मानसिक आघात से पीड़ित होते हैं और फिर जेल के भीतर कैदियों को पुनः मानसिक आघात होते हैं।
कला चिकित्सा का उपयोग उन्हें शांत करने और उनमें परस्पर संवाद को बेहतर करने के लिए किया जा सकता है जिससे वे एक-दूसरे को बेहतर समझने लगते हैं। कई लोग मानसिक समस्याओं के कारण जेल में होते हैं। कला चिकित्सा के माध्यम से उनके पुनर्वास में मदद मिल सकती है। इसके लिए विशेष प्रशिक्षण और अनुभव की आवश्यकता होती है क्योंकि यह अलग तरह का कार्यस्थल है। यहाँ आप कई कला सामग्रियों का उपयोग नहीं कर सकते। कैंची, गोंद जैसी वस्तुओं का उपयोग नहीं किया जा सकता। आपको बहुत सावधान रहना पड़ता है।
इन प्रतिबंधों के बावजूद लोगों ने कला बनाना जारी रखा है। डेव ने अपनी पुस्तक में एक कलाकृति साझा की थी जो एक कैदी द्वारा बनाई गई थी। उसने ‘एम एंड एम्स’ (M&M) केंडी इकट्ठा करके उनके साथ पानी का उपयोग करके अद्भुत चित्र बनाया था।

डेव ने अपनी पुस्तक में एक कलाकृति साझा की थी जो एक कैदी द्वारा बनाई गई थी। उसने ‘एम एंड एम्स’ (M&M) केंडी इकट्ठा करके उनके साथ पानी का उपयोग करके अद्भुत चित्र बनाया था।


प्र. - तो उन्होंने ‘एम एंड एम्स’ का उपयोग रंग की तरह किया। यह कितना शानदार है!
हाँ इससे उस व्यक्ति की रचनात्मकता के बारे में बहुत कुछ पता चलता है जो जेल में है और जिसके पास सीमित संसाधन हैं। कला आत्म-अभिव्यक्ति को बढ़ावा देती है क्योंकि दृश्य रूप से संवाद करने की आवश्यकता हमारे अंदर गहराई से समाई हुई है।
प्र. - जैसे कि हममें बाहरी संसार से जुड़ने और अपनी असलियत को अभिव्यक्त करने की मूलभूत आवश्यकता होती है।
सही कहा। संवाद आंतरिक संसार से भी जोड़ता है। जैसे ध्यान में आंतरिक और बाह्य जुड़ाव होता है।
प्र. - इस वार्ता को विराम देने के लिए यह बड़ी सुंदर और आशाजनक टिप्पणी है। अपना समय देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
मुझे अवसर देने के लिए धन्यवाद।

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