इस वार्ता में संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कुणाल देसाई और होमियोपैथ डॉक्टर विजय आपस में चर्चा कर रहे हैं कि कैसे आँत का स्वास्थ्य हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमताभावनात्मक संतुलन और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। वे इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि सचेत खान-पान से लेकर ध्यान करने जैसी सरल दैनिक आदतें किस तरह से हमारे आंतरिक परितंत्र को स्वस्थ बनाए रखने में सहयोग देती हैं।

डॉ. विजय - आजकल की भागदौड़ भरी दुनिया में हम अपने भीतर स्थित सबसे बुद्धिमान तंत्रों में से एक, हमारी आँत, की अनदेखी कर देते हैं। जिसे कभी केवल एक पाचन अंग माना जाता था, आज उसे हमारे ‘दूसरे मस्तिष्क’ के रूप में सराहा जाता है। इसमें अरबों-खरबों सूक्ष्मजीव होते हैं जो हमारे रोग-प्रतिरोधक तंत्र, मनोदशा, चयापचय और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। वार्ता की शुरुआत करते हुए, क्या आप हमें बता सकते हैं कि आँत का स्वास्थ्य क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

डॉ. कुणाल - संक्रामक रोग विशेषज्ञ होने के नाते जब मैं आँत के स्वास्थ्य के बारे में सोचता हूँ तब मेरा ध्यान आँत के सूक्ष्मजीवों पर जाता है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसे हम पिछले दस से बीस सालों में बहुत बेहतर तरीके से समझ पाए हैं।

यदि मैं आपको इतिहास में पीछे ले जाऊँ तो सभी चिकित्सक हिप्पोक्रेटिक शपथ लेते हैं। पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के चिकित्सक हिप्पोक्रेटीज़ ने कहा था, “सभी बीमारियाँ आँत से शुरू होती हैं।” लंबे समय तक हम वास्तव में समझ नहीं पाए कि ऐसा क्यों है। आँत के सूक्ष्मजीवों पर हाल ही में किए गए शोधों से हमें पता चला है कि इन सूक्ष्मजीवों का सामान्य संतुलन बनाए रखना स्वास्थ्य के कई पहलुओं के लिए महत्वपूर्ण है।

इसमें जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ भी शामिल हैं जिन्हें हम आज अक्सर देखते हैं - मोटापा, मधुमेह, गुर्दे की बीमारी, उच्च रक्तचाप, असंतुलित प्रतिरक्षा प्रणाली और कैंसर। ये सभी आँत के स्वास्थ्य से जुड़ी हैं। आज हम जिन बीमारियों का सामना कर रहे हैं, उनमें से अधिकांश जीवनशैली से संबंधित हैं जिनके लिए आँत को एक ‘एपिजेनेटिक गेटवे’ माना जाता है अर्थात वंशाणुओं की अभिव्यक्ति आँत से ही शुरू होती है। हम अपने पर्यावरण, विचारों, कार्यों, भावनाओं और निश्चित रूप से आहार के माध्यम से इसे प्रभावित करते हैं।

इस व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो आँत का स्वास्थ्य समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

डॉ. विजय - यह बात, जो आपने बताई है, कि आँत का स्वास्थ्य विचारों और भावनाओं को कैसे प्रभावित करता है, बहुत दिलचस्प है। जब हम विचारों और भावनाओं के बारे में सोचते हैं तब हम आम तौर पर मस्तिष्क और हृदय के बारे में सोचते हैं। क्या आप समझा सकते हैं कि यह आँत और मस्तिष्क का संबंध कैसे काम करता है?

डॉ. कुणाल - रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम अक्सर इसे ‘गट फ़ीलिंग’ या अंतर्मन की आवाज़ कहते हैं, है न? उदाहरण के लिए, भाषण या प्रस्तुति देने से पहले जब हम घबराहट महसूस करते हैं तब अक्सर पेट या आँत में गड़बड़ी महसूस होती है। मेरा छोटा बेटा टेनिस टूर्नामेंट से पहले दो बार शौचालय जाता है। जब हम घबराहट महसूस करते हैं तब स्पष्ट रूप से आँत में कुछ बदल जाता है।

वैज्ञानिक रूप से अब हम इसे आँत-मस्तिष्क अक्ष कहते हैं। अवसाद और घबराहट जैसी कई मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का आँत के सूक्ष्मजीवों और उन सूक्ष्मजीवों के स्वास्थ्य के साथ प्रमाणित संबंध है।

यहाँ एक उपयोगी शब्द है, डिस्बायोसिस। जब आँत का संतुलन बिगड़ जाता है, यानी जब अच्छे और बुरे सूक्ष्मजीवों के बीच असंतुलन होता है तब हम उसे डिस्बायोसिस कहते हैं। यह एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। हो सकता है कि इसके स्पष्ट लक्षण न दिखें लेकिन यह पर्दे के पीछे होने वाली किसी घटना की तरह है।

डिस्बायोसिस से होने वाला असंतुलन मस्तिष्क को भी प्रभावित करता है। हमारे यहाँ एक कहावत है, विशेषकर दंपतियों के बीच, “एक आदमी की खुशी उसके पेट से जुड़ी होती है - उसे कुछ अच्छा खिलाओ तो वह खुश रहता है।” यह सुनने में सरल लगता है लेकिन वैज्ञानिक रूप से हम जानते हैं कि लगभग 80 प्रतिशत सेरोटोनिन अच्छे सूक्ष्मजीवों की मदद से आँत में ही बनता है।

यह इस बात का एक उदाहरण है कि कैसे एक स्वस्थ आँतों का सूक्ष्मजीव समुदाय (gut-microbiome) और हार्मोन का संतुलन मानसिक स्वास्थ्य, मनोदशा और भावनाओं को प्रभावित करता है जो आँत-मस्तिष्क अक्ष का सार है। इसमें स्टेरॉयड हार्मोन जैसे तनाव हार्मोन भी शामिल हैं। तनाव डिस्बायोसिस के सबसे सामान्य कारणों में से एक है। यह मानसिक स्वास्थ्य सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं का पूर्व संकेत है। इस अंतर्निहित प्रक्रिया में अक्सर आँत के सूक्ष्मजीवों का असंतुलन ही होता है।

डॉ. विजय - चूँकि आपने तनाव का विषय छेड़ा है, तो इससे पहले कि हम इसमें गहराई में जाएँ, कृपया बताएँ कि यदि कोई अस्वस्थ आँत से जूझ रहा है तो उसे किन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए?

डॉ. कुणाल - यह थोड़ा कठिन प्रश्न है क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम आँत के स्वास्थ्य को कितनी संकीर्णता से परिभाषित करते हैं। साधारण और आँत-केंद्रित दृष्टिकोण से देखें तो आपको पाचन संबंधी लक्षण दिखेंगे - जैसे मल त्याग में समस्या, बेचैनी या अनियमितता।

 

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तनाव डिस्बायोसिस के सबसे सामान्य कारणों में से एक है। यह मानसिक स्वास्थ्य सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं का पूर्व संकेत है। इस अंतर्निहित प्रक्रिया में अक्सर आँत के सूक्ष्मजीवों का असंतुलन ही होता है।


 

एक सामान्य उदाहरण ‘इरिटेबल बोवेल सिंड्रोम’ (आँत संबंधी विकार IBS) है। हम अभी भी इसे पूरी तरह से नहीं समझते हैं लेकिन हम जानते हैं कि यह आँत-मस्तिष्क अक्ष से जुड़ा है और व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित है। इरिटेबल बोवेल सिंड्रोम एक आदर्श उदाहरण है कि कैसे आँतों में सूक्ष्म असंतुलन लक्षणों के रूप में प्रकट हो सकता है।

डॉ. विजय - क्या तनाव आँत के इन नकारात्मक और सकारात्मक सूक्ष्मजीवों के बीच के संतुलन को प्रभावित करता है?

डॉ. कुणाल - हाँ, तनाव को सबसे आम कारणों में से एक माना जाता है। नकारात्मक पक्ष पर बात करने से पहले मैं बताता हूँ कि इन सूक्ष्मजीवों के लिए एक स्वस्थ आंतरिक वातावरण कैसा दिखता है।

आँत का स्वास्थ्य जन्म से ही शुरू हो जाता है। आपने पहले ठीक ही कहा था कि हममें मानव वंशाणुओं की तुलना में सूक्ष्मजीवी वंशाणु अधिक हैं। यदि किसी व्यक्ति में दस लाख मानवीय वंशाणु हैं तो शायद उसमें लगभग दस खरब सूक्ष्मजीवी वंशाणु होंगे।

इनमें से अधिकांश सूक्ष्मजीव हमारी आँत में रहते हैं। यही कारण है कि हम आँत के स्वास्थ्य पर केंद्रित रहते हैं, हालाँकि ये सूक्ष्मजीव त्वचा और श्वसन तंत्र में भी होते हैं। आँत के सूक्ष्मजीवों के मुख्‍य पहलू इस प्रकार हैं -

  • अच्छे और बुरे सूक्ष्मजीवों के बीच संतुलन और
  • उन सूक्ष्मजीवों की विविधता।

जैसे कृषि में हम जैव विविधता की बात करते हैं, वैसे ही आँत में भी ज्‍़यादा विविधता बेहतर होती है। यह विविधता जन्म के समय माँ में सूक्ष्मजीवों की विविधता से शुरू होती है। जैसे-जैसे हम बढ़े होते हैं, यह हमारे बाहरी वातावरण और आहार के अनुसार ढलती रहती है। विभिन्न सूक्ष्मजीव अलग-अलग कार्य करते हैं, इसलिए अधिक विविधता बेहतर स्वास्थ्य में सहायक होती है।

जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, बीमारियों एवं उम्र बढ़ने के प्रभाव के कारण जैव विविधता और उसके संतुलन दोनों में गिरावट आती है। यह सामान्य शरीर विज्ञान है। कोई भी चीज़ जो इसे और भी अधिक बिगाड़ देती है, वह तकलीफ़देह हो सकती है।

इस संतुलन के बिगड़ने के तीन मुख्य कारण हैं -

  • तनाव
  • सूक्ष्मजीवरोधियों (antimicrobials) का अनुचित उपयोग - यह भोजन उगाने के तरीके से ही शुरू हो जाता है। कृषि में सूक्ष्मजीवरोधियों का उपयोग मिट्टी की जैव विविधता को प्रभावित करता है जो अंततः हमें प्रभावित करता है।
  • आहार - सबसे महत्वपूर्ण कारक है।

तनाव से कोर्टिकोस्टेरॉइड्स और अन्य तनाव हार्मोन स्त्रावित होते हैं जो आँत के सूक्ष्मजीव समुदाय पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। तो हाँ, तनाव एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

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डॉ. विजय - यह दिलचस्प है। चूँकि आप इस प्रश्न के उत्तर में भोजन का विषय ले आए तो कृपया यह बताएँ कि स्वस्थ आँतों के लिए आप कौन से प्रमुख खाद्य पदार्थों को ग्रहण करने की सलाह देंगे?

डॉ. कुणाल - इसके दो पहलू हैं। पहला है - पहले से मौजूद वातावरण और आपका भोजन कहाँ से आता है, जो अक्सर आपके नियंत्रण से बाहर होता है। दूसरा है आपका आहार। एक बड़ा प्रभाव ज़्यादा रेशेदार आहार का होता है। रेशे अच्छे सूक्ष्मजीवों के लिए भोजन हैं। हम अक्सर इसे प्रीबायोटिक कहते हैं। आप प्रोबायोटिक भी ले सकते हैं — ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमें जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं। ये आमतौर पर खमीर युक्त खाद्य पदार्थ होते हैं।

दक्षिण भारत के कई व्यंजन खमीर युक्त होते हैं। दही एक खमीर युक्त खाद्य पदार्थ है। यह भी सहायक है हालाँकि इसकी अपनी सीमाएँ हैं। तो एक पहलू है, वे खाद्य पदार्थ जो जीवित सूक्ष्मजीव प्रदान करते हैं जैसे दही, खमीर युक्त व्यंजन, अमेरिका में मिलने वाला ‘केफ़िर’ इत्यादि।

दूसरा और शायद अधिक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पहले से मौजूद सूक्ष्मजीवों को स्वस्थ रखा जाए ताकि जब हम उन्हें सही भोजन जैसे सलाद, सब्ज़ियाँ और फल जैसे अधिक रेशे वाले खाद्य पदार्थ दें तो वे अपने आप बढ़ें।

मैं मरीज़ों को प्राथमिक रूप से दही या केफ़िर लेने की सलाह देता था। लेकिन जैसे-जैसे मैंने और जानकारी हासिल की तो मुझे एहसास हुआ कि अधिक रेशे वाला आहार ही सबसे अधिक लाभदायक है। यदि आप हृदय के स्वास्थ्य के लिए हृदय रोग विशेषज्ञों की सलाह को देखें तो वे भी अधिक रेशे के आहार की बात करते हैं। इसका एक कारण यह है कि रेशे आँत के सूक्ष्मजीवों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।

डॉ. विजय - जैसा कि आपने कहा, पिछले कुछ वर्षों में प्रीबायोटिक और प्रोबायोटिक जैसे शब्द प्रयोगशाला से निकलकर हमारी बातचीत का हिस्सा बन गए हैं और दही के विज्ञापनों से लेकर स्वास्थ्य संबंधी ब्लॉग में दिखाई देते हैं। इन चर्चाओं के परे, क्या आप समझा सकते हैं कि प्रीबायोटिक और प्रोबायोटिक क्या होते हैं? और वे हमारी आँतों के स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता में क्या योगदान देते हैं?

डॉ. कुणाल - प्रीबायोटिक इन सूक्ष्मजीवों का भोजन है जिसमें सामान्यतया रेशों की प्रचुरता होती है। सब्ज़ियाँ और फल इसके अच्छे उदाहरण हैं। अपने आहार में इनकी मात्रा बढ़ाने से हमें प्रीबायोटिक युक्त भोजन मिल जाता है।

खाद्य स्रोतों से प्रोबायोटिक पाने के सीमित विकल्प होते हैं - प्रोबायोटिक में दही और अन्य खमीर युक्त खाद्य पदार्थ मुख्य हैं। प्रोबायोटिक सप्लीमेंट (अतिरिक्त आहार) बाज़ार में बिना डॉक्टर की पर्ची के या फ़ार्मेसी पर आसानी से मिल जाते हैं जिनका यदि समझदारी से चुनाव किया जाए तो वे अच्छे होते हैं।

जब आप प्रोबायोटिक का चयन करें तो केवल लेबल पर लिखे सूक्ष्मजीवों की संख्या पर ध्यान न दें। जो ज़्यादा मायने रखता है, वह है सूक्ष्मजीवों की विविधता यानी उसमें अलग-अलग प्रजाति व उपप्रजाति के सूक्ष्मजीव मिले होने चाहिए। जैसा कि मैंने पहले कहा है, विविधता ही महत्वपूर्ण है, संख्या नहीं।

डॉ. विजय - यह बहुत दिलचस्प है! हाँ, विविधता ही वास्तव में महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य संबंधी नए रुझानों और सप्लीमेंट से भरी इस दुनिया में अक्सर सरल और नियमित आदतें ही सबसे अधिक लाभकारी होती हैं - विशेषकर आँत के स्वास्थ्य के लिए, जहाँ हमारे खाने के तरीके से लेकर तनाव प्रबंधन तक सब कुछ मायने रखता है। हमारी दिनचर्या परोक्ष रूप से हमारे आंतरिक पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती रहती है। एक स्वस्थ और संतुलित आँत को बनाए रखने के लिए कौन-सी सरल व व्यावहारिक दैनिक आदतें हैं जिन्हें व्यक्ति अपना सकता है?

डॉ. कुणाल - इसके मैं दो मुख्य पहलू देखता हूँ। पहला है तनाव प्रबंधन - ऐसी कोई भी चीज़ जो आपके मन की अवस्था और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। हम जानते हैं कि लंबे समय से तनाव-ग्रस्त व्यक्ति कार्बोहायड्रेट वाला अस्वास्थ्यकर भोजन अधिक खाता है। यह एक दुष्चक्र बन जाता है।

मान लीजिए कि हम किसी को हल्का व्यायाम करने के लिए कहते हैं लेकिन उसकी मानसिक स्थिति इसके अनुकूल नहीं होती तो ऐसी स्थिति में उसे व्यायाम एक बोझ जैसा लगेगा और वे इसे जारी नहीं रखेंगे। इसलिए सबसे पहले हमें अच्छे मानसिक स्वास्थ्य को विकसित करने के तरीके अपनाने की आवश्यकता है।

 

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जब आप प्रोबायोटिक का चयन करें तो केवल लेबल पर लिखे सूक्ष्मजीवों की संख्या पर ध्यान न दें। जो ज़्यादा मायने रखता हैवह है सूक्ष्मजीवों की विविधता यानी उसमें अलग-अलग प्रजाति व उपप्रजाति के सूक्ष्मजीव मिले होने चाहिए। जैसा कि मैंने पहले कहा हैविविधता ही महत्वपूर्ण हैसंख्या नहीं।


दूसरा पहलू है आहार, जिसके बारे में हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं। मेरे विचार में मन की संतुलित अवस्‍था से अपने आप ही आहार संतुलित हो जाता है। इससे एक सुचक्र बन जाता है जो अधिक स्वस्थ जीवनशैली में योगदान देता है। सब कुछ विचारों और भावनाओं से शुरू होता है जो बाद में कार्य के रूप में परिणित होता है। अगर हम अपने विचारों और भावनाओं को नियंत्रित कर लें तो सही समझ के साथ सही काम करना आसान हो जाता है।

आजकल जानकारी व्यापक रूप से और आसानी से उपलब्ध है; चुनौती उसे कार्यान्वित करने की है। सरल ध्यान अभ्यास मन को नियमित करने का पहला कदम है। एक बार जब यह स्थापित हो जाता है तब बाकी सब कुछ आसानी से व्यवस्थित हो जाता है।

डॉ. विजय - यह बहुत रोचक है कि आपने ध्यान और उसके महत्व के बारे में बात की। पिछले कुछ समय से यह माना जाने लगा है कि ध्यान जैसे अभ्यासों का संबंध केवल मानसिक स्वास्थ्य से ही नहीं है बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य से भी है, जिसमें आँत की कार्यप्रणाली भी शामिल है। लगता है मन और आँत हमेशा तालमेल में रहते हैं। आपके अनुभव में, क्या ध्यान करने से आँतों को बेहतर महसूस होता है या वे अपना कार्य सही ढंग से कर पाती हैं?

डॉ. कुणाल - निश्चित रूप से। आइए थोड़ा हट कर सोचते हैं। हम करोड़ों सूक्ष्मजीवों के साथ रहते हैं और वे हमारी भावनाओं और विचारों से प्रभावित होते हैं।

एक साधारण उदाहरण - मैं अपनी मानसिक अवस्था और आंतरिक संतुलन के आधार पर अपने बच्चों के व्यवहार को अलग तरह से देखता हूँ। हम सभी ने गौर किया है कि जब हमारी अपनी मानसिक अवस्था अच्छी होती है तब हमारे प्रियजन अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं। यह तो हमारे बाहर की बात हुई। अब कल्पना कीजिए कि जब हम शांत और संतुलित होते हैं तब हमारे भीतर की सभी कोशिकाएँ, जिनमें सूक्ष्मजीव भी शामिल हैं, उसी अवस्था के साथ सामंजस्य बिठाती हैं। मुझे यकीन है कि तब इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।


मेरे विचार में मन की संतुलित अवस्‍था से अपने आप ही आहार संतुलित हो जाता है। इससे एक सुचक्र बन जाता है जो अधिक स्वस्थ जीवनशैली में योगदान देता है। सब कुछ विचारों और भावनाओं से शुरू होता है जो बाद में कार्य के रूप में परिणित होता है। अगर हम अपने विचारों और भावनाओं को नियंत्रित कर लें तो सही समझ के साथ सही काम करना आसान हो जाता है।


कुछ अध्ययनों में शाकाहारी या वेगन आहार के साथ ध्यान के अभ्यासों का परीक्षण किया गया और आँत के सूक्ष्मजीवों पर इनके प्रभाव को मापा गया। हालाँकि ये अध्ययन कठिन हैं - क्योंकि आपको आहार और पर्यावरण जैसे कई कारकों को नियंत्रित करना पड़ता है - फिर भी हमारे पास जो सीमित अध्ययन उपलब्ध हैं, वे एक सकारात्मक प्रभाव दिखाते हैं।

कोविड के दौरान एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ और कर्मचारी स्वास्थ्य के चिकित्सा निदेशक के रूप में मेरा नज़रिया बहुत ही अलग था। महामारी के दौरान मैंने कई स्वास्थ्य कर्मियों के साथ मिलकर काम किया। मेरा एक मुख्य अवलोकन यह था कि जो व्यक्ति तनाव में थे और कोविड से ग्रसित थे, उनकी स्थिति अक्सर अधिक गंभीर रही। वे बहुत ज़्यादा बीमार पड़े। जिन लोगों ने स्थिति को स्वीकार कर लिया और शांत बने रहे, वे बेहतर स्थिति में दिखे।

मैं आश्चर्यचकित था और बाद में मुझे ऐसे शोध मिले जिनसे पता चला कि जिन लोगों में आँतों के सूक्ष्मजीवों का संतुलन बेहतर था, उन्होंने कोविड का सामना बेहतर तरीके से किया। आपको याद होगा कि उस समय ऐसी एक भी दवा नहीं थी जो भरोसेमंद तरीके से काम कर रही थी। परिणाम मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर थे कि किसी व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली ने कैसी प्रतिक्रिया दी। जिन लोगों में पहले से आँतों के सूक्ष्मजीवों का असंतुलन था और उसके कारण आँतों के सूक्ष्मजीवों के पारितंत्र में खराबी थी, उनकी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अधिक अनियमित रही। शोध के अनुसार कोविड वायरस आँतों में पाया गया था।

इसलिए यदि हम किसी बीमारी का सामना मन की संतुलित और शांत अवस्था से करते हैं तो बीमारी का स्वरूप उस स्थिति की तुलना में अलग हो सकता है जब हम चिंतित और तनावग्रस्त होते हैं। ध्यान जैसा एक सरल अभ्यास बीमारी के प्रति हमारी प्रतिक्रिया को बदल सकता है। महामारी के समय हम इसे कई लोगों में देख पाए।

इन उदाहरणों से हम देख सकते हैं कि ध्यान का अभ्यास प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करता है और इस प्रक्रिया को समझने के लिए आँत के सूक्ष्मजीव महत्वपूर्ण हैं।

डॉ. विजय - हाँ, बिलकुल ऐसा ही है। इस उत्तर के लिए आपका धन्यवाद। यह बहुत ही प्रभावशाली ढंग से याद दिलाता है कि कैसे हमारी मानसिक स्थिति सीधे हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।

आपने सही कहा कि कोविड काल में जो लोग शांत और संतुलित रहे, वे तनाव और घबराहट से घिरे लोगों की तुलना में बेहतर स्थिति में रहे। यह इस बात को स्पष्ट रूप से दिखाता है कि हमारी भावनात्मक दृढ़ता और हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली सच में आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसे बताने के लिए धन्यवाद

डॉ. कुणाल ।  इसके साथ ही मुझे लगता है कि हम चर्चा के अंत में पहुँच गए हैं। क्या आप इस विषय पर हमारे साथ कुछ अंतिम टिप्पणी साझा करना चाहेंगे कि हम भविष्य में कैसे अपने आँत के स्वास्थ्य और इसके माध्यम से अपने मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रख सकते हैं?

डॉ. कुणाल - एक अंतिम विचार - आँत मानव स्वास्थ्य के लिए वंशाणुओं की अभिव्यक्ति को प्रभावित करने वाला द्वार है। अनुवांशिकी (genetics) हमें अपने माता-पिता और अन्य कारकों से विरासत में मिलती है लेकिन वंशाणुओं की अभिव्यक्ति (epigenetics) हमारी आदतों और जीवनशैली से प्रभावित होती है।


यदि हम किसी बीमारी का सामना मन की संतुलित और शांत अवस्था से करते हैं तो बीमारी का स्वरूप उस स्थिति की तुलना में अलग हो सकता है जब हम चिंतित और तनावग्रस्त होते हैं। ध्यान जैसा एक सरल अभ्यास बीमारी के प्रति हमारी प्रतिक्रिया को बदल सकता है।


आज की दुनिया में यदि हृदय-आधारित ध्यान के सरल अभ्यास को ठीक से जीवन में अपनाया जाए तो इसके माध्यम से बहुत अद्भुत तरीके से दैनिक तनाव और भावनाओं को प्रबंधित किया जा सकता है। यह वंशाणुओं की अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकता है।

यह मुझे दाजी द्वारा बताई गई एक बात की याद दिलाता है जो हर्टफुलनेस परंपरा में बाबूजी के साथ हुई उनकी बातचीत के बारे में थी - बाबूजी का आशय था कि हार्टफुलनेस के ये अभ्यास मानव अनुवांशिकी को प्रभावित करेंगे। मैं पहले सोचा करता था कि ऐसा कैसे संभव है। लेकिन अब इसे देखते हुए समझ आता है कि जब एक सरल अभ्यास हमारी मानसिक अवस्था और अस्तित्व को बदल देता है तब वह हमारे वंशाणुओं की अभिव्यक्ति को भी प्रभावित करता है जिससे हमारा स्वास्थ्य और समग्र कल्याण भी बदल जाता है।

डॉ. विजय - यह सब बताने के लिए धन्यवाद। यह न केवल इस बात के महत्व पर ज़ोर देता है कि हम क्या खाते हैं बल्कि इस बात को भी महत्व देता है कि हम कैसा महसूस करते हैं और हर दिन कैसे जीते हैं। हम जीवन को दिन-प्रतिदिन कैसे स्वीकार करते हैं और कैसे जीते हैं, यह अपने आप में महत्वपूर्ण है। धन्यवाद, डॉ. कुणाल! आपकी स्पष्टता, गहरी समझ और व्यावहारिक ज्ञान ने वास्तव में हमें आँत के स्वास्थ्य को एक बिलकुल नए दृष्टिकोण से देखने में मदद की है - केवल एक चिकित्सा अवधारणा के रूप में ही नहीं बल्कि स्वयं के साथ एक दैनिक संबंध के रूप में। आइए, याद रखें कि हमारी आँत हमें सूक्ष्म संकेत देती है। जितना अधिक हम सचेत खान-पान, सजग आदतों और अपनी देखभाल के साथ जुड़ते हैं, उतना ही जीवंत और सुदृढ़ हमारा स्वास्थ्य बनता जाता है।

जिज्ञासु बने रहें, अपने शरीर के प्रति दयालु रहें और इन सूक्ष्मजीवों को अपना जादू दिखाने दें!


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कुणाल देसाई

कुणाल देसाई

कुणाल ओहायो के डेटन शहर में संक्रामक रोगों के क्षेत्र में चिकित्सक हैं। वे ‘कैटरिंग हेल्थ नेटवर्क’ ... और पढ़ें

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