क्लार्क ए. पॉवेल बता रहे हैं कि उन्होंने अपने आप को बारह वर्ष के लिए समाज से अलग कर लिया था और कैसे स्वप्न में हुए एक दिव्य दर्शन ने उसे खत्म कर दिया और स्वप्न में ही उनका उस आनंद से साक्षात्कार हुआ जिसकी उन्हें जीवन भर तलाश थी।

 

मुझे 22 दिसंबर 2025 को एक फ़ोन आया। हार्टफुलनेस पत्रिका के फ़रवरी अंक के लिए मुझे तीन दिनों के अंदर कुछ लिखकर देना था। उस बातचीत के दौरान संपादक ने मेरी कही गई बातों में से ‘अकेलेपन और एकांत’ के अनुभव से जुड़ी बात को पकड़ लिया और ऊपर दिया गया शीर्षक सुझाया।

मेरे लिए यह जीवन की एक लंबी यात्रा रही है जिसमें बारह वर्षों का अंतिम दौर बहुत कठिन रहा जो मुझे अकेलेपन से एकांत की ओर ले गया। लेकिन आइए, हम अकेलेपन और एकांत को समझने की शुरुआत एक दार्शनिक दृष्टिकोण से करते हैं - पहले हम इन शब्दों को परिभाषित करते हैं। बाद में ज़रूरत पड़ने पर हम उनके अर्थ को बदल भी सकते हैं।

एकांत और अकेलापन एक समान नहीं हैं। असल में वे एक-दूसरे के विपरीत हैं या कम से कम वे एक वर्णक्रम के दो विपरीत छोर कहे जा सकते हैं।

अकेलापन सीमित है। एकांत विशाल है।

अकेलापन संकुचित है। एकांत विस्तृत है।

अकेलापन बंधा हुआ है। एकांत मुक्त है।

अकेलापन सब छोड़ देता है। एकांत शामिल करता है।

अकेलापन मानवीय दशा है। एकांत दिव्यता का स्वरूप है।

अकेलापन अलगाव है। एकांत सर्वसमावेशी है।

अकेलापन दुख है। एकांत आनंद है।

एकांत संपूर्णता या एकत्व की वह अवस्था है जो हमारे अंदर बनी रहती है चाहे हम अकेले हों या भीड़ में हों।

मैंने अपने जीवन के बारह वर्ष पूरी तरह नितांत अकेलेपन में बर्बाद कर दिए। उस दौरान मैं कभी अपने घर से बाहर नहीं गया; मैं तो अपने कमरे से भी बाहर नहीं निकला। बारह वर्षों तक मैं किसी अन्य इंसान से नहीं मिला, सिवाय उन डॉक्टरों के जिन्होंने मुझे देखे बिना मेरा इलाज करने से इंकार कर दिया था। इन बारह वर्षों में मैंने परिवार के एक ही सदस्य से फ़ोन पर बात की जो मेरी खैरियत पूछने के लिए फ़ोन करती थी ताकि यह पता कर सके कि मैं न्यू ऑरलिन्स में ज़िंदा हूँ।

मेरी इस दशा से एक स्वाभाविक सवाल पैदा होता है कि मैंने ऐसा क्यों किया? मैं, जो वर्ष 1992 से मिशन का प्रशिक्षक हूँ, आखिर इस स्थिति में कैसे पहुँच गया? सहज मार्ग की एक बहन ने मेरे परिवार के इस सदस्य को फ़ोन करके पूछा था कि मैं कैसा हूँ।

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मेरी उस परिजन ने उन्हें बताया कि ऐसा लगता है कि मैं इस दुनिया को छोड़ने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। वास्तव में, मैं यही कर रहा था चूँकि अपनी जान लेना पलायन का ऐसा मार्ग है जिसके लिए मुझे लगा कि मुझे इजाज़त नहीं है। बारह वर्षों तक मैंने सोफ़े पर पड़े रहकर टीवी देखते हुए दुनिया को छोड़ने की प्रतीक्षा की। सच मानिए, मैंने सारा जीवन अवसाद या उसी तरह की समस्या से संघर्ष किया है। कई बार मैं स्थिति से अचानक अलग हो जाता था और फिर बहुत समय तक किसी से मिलता नहीं था। मेरा बचपन का एक परम मित्र मेरे इस तरह गायब हो जाने की घटनाओं को ‘पॉवेल आउटेज’ (पॉवेल का गुल हो जाना) कहता था।

जिन मनोचिकित्सकों के पास मुझे भेजा गया था, उन्होंने मेरी दशा को अलग-अलग नाम दिए। मैं DSM2 (मानसिक विकारों की नैदानिक एवं सांख्यिकीय मैनुअल) के समय से लेकर वर्तमान DSM5 के समय तक के कई डॉक्टरों को मिला। उन सब ने मेरी सहायता करने की कोशिश की लेकिन हर नए दौर के डॉक्टरों का तर्क होता था कि पहले किया गया निदान गलत था और मुझे हर बार नई और आधुनिक दवाओं के साथ वापस भेज दिया जाता था।

लेकिन हर निदान में आवश्यक रूप से दोषी किसी तरह का अवसाद ही पाया गया। मैं आपको बता नहीं सकता कि मुझे ‘सामान्य’ बनाने का वादा करते हुए कितनी सारी गोलियाँ लेने के लिए कहा गया। लेकिन मुझ पर उनके केवल अजीब तरह के अवांछित दुष्प्रभाव ही हुए, जिनके लिए वे शक्तिशाली मानसिक उपचार की दवाएँ जानी जाती हैं।

एक-एक करके जो भी मनोचिकित्सक आए, उन्होंने मेरे अवसाद को लाइलाज घोषित कर दिया। यहाँ तक कि उपचार की इस श्रृंखला का अंतिम विकल्प ‘बिजली के झटके’ भी काम न कर पाए। ऐसा इसलिए था क्योंकि मेरी दशा मेरे मनस, मेरी आत्मा या उस उच्चतर ‘स्व’ से संबंधित थी जो हम सभी में विद्यमान है। वह कोई मानसिक बीमारी नहीं थी।

अंतत: मैं मदद के लिए ईश्वर की ओर मुड़ा। लेकिन आप ईश्वर की ओर कैसे मुड़ सकते हैं? किशोरावस्था के दौरान, मैंने अपने परिवार का धर्म अपनाया था जो नियमवादी (Methodist) ईसाई धर्म था। लेकिन नियमवादी धर्म के द्वारा मैं उस ईश्वर के आसपास तक भी नहीं पहुँच पाया जिसकी मुझे तलाश थी। उस धर्म में कुछ गलत नहीं था लेकिन वह रास्ता मेरे लिए नहीं था।

अंतत: मेरे भीतर कुछ बदलाव आया। वर्ष 1969 के ग्रीष्मकाल में मुझे नौकरी मिली जिसमें मुझे एक पुराने विक्ट्री जहाज़ पर नाविक के रूप में काम करना था। वह जहाज़ प्रशांत महासागर के पार विएतनाम तक बम और बारूद ले जाता था। उस समुद्रयात्रा के बाद मैं अमेरिका के मोबिल शहर लौट आया ताकि अपने हाई स्कूल के अंतिम वर्ष की पढ़ाई को पूरा कर सकूँ। लेकिन अब मैं वह व्यक्ति नहीं था जो उस यात्रा पर गया था। विएतनाम जाने और लौटकर आने की यात्रा ने मुझे पूरी तरह से बदल दिया था।

जब मैं जहाज़ से उतरा तब मैंने अपनी माँ से कहा कि मैं अब एक नास्तिक हूँ। रविवार की धार्मिक सभा में हमें जिस ईश्वर पर विश्वास करना सिखाया गया था, उसे अब मैं स्वीकार नहीं कर पा रहा था। माँ ने मुझे हमारे बुद्धिमान और धैर्यवान धार्मिक गुरु डॉ. जोएल मॅक्डेविड के पास भेजा। उनके कार्यालय में हर शुक्रवार हम ईश्वर के बारे में चर्चा करते थे। मैंने उन्हें अपनी तरह नास्तिक बनाने की कोई कोशिश नहीं की लेकिन उनके साथ इन साप्ताहिक चर्चाओं ने ईसा मसीह के प्रति मेरे हृदय को काफ़ी हद तक मृदु कर दिया।

मई 1970 में बड़ा परिवर्तन आया जब मैं हाईस्कूल से स्नातक होने वाला था और अगले पतझड़ के समय आगे पढ़ने के लिए पूर्ण छात्रवृत्ति पर वंडरबिल्ट जाने वाला था। मेरे साथ सर्फ़िंग (जलक्रीड़ा) करने वाले एक मित्र ने मुझे बताया कि कैलिफ़ोर्निया से हिप्पियों का एक समूह हमारे छोटे से खाड़ी तट के शहर मोबिल, अलाबामा, में आया हुआ था और वे सिर्फ़ यीशु के बारे में बात कर रहे थे।

तो, मैं उन लंबे बालों वालों को सुनने के लिए वहाँ गया। मुझे भरोसा था कि मैं उनकी बचकानी आस्था को अपने मेकोंग नदी के किनारे जन्मे अनीश्वरवाद के तर्कों से पराजित कर दूँगा। लेकिन मैं उन्हें हरा नहीं सका। बल्कि मैं ‘आल्टर कॉल’ (प्रार्थना सभा में आगे बुलाए जाने की धार्मिक परंपरा) के प्रत्युत्तर में बेव्यू हाइट्स बैप्टिस्ट चर्च के सामने रोते हुए ‘यीशु को अपना हृदय देने,’ (जैसा कि इसे कहते हैं) की क्रिया कर रहा था।

जल्द ही परमात्मा (Holy Spirit) के नाम पर मुझे दीक्षित (baptized) किया गया और मैं भी ‘मनुष्यों और फ़रिश्तों’ की भाषा बोलने लगा जैसा बेव्यू में दक्षिणी बैप्टिस्ट चर्च के लोग करते थे। मुझे लगा कि मुझे अंतरात्मा पुकार रही थी और अगस्त तक मैं इतना आश्वस्त हो गया कि मैंने माँ से कह दिया कि मैं छात्रवृत्ति के लिए वंडरबिल्ट नहीं जा रहा हूँ क्योंकि मुझे ऐसा महसूस हुआ कि ईश्वर मुझे लिबर्टी बाइबिल कॉलेज, पेंसाकोला की ओर निर्देशित कर रहा था जहाँ मैं पूर्णकालिक धर्मोपदेशक बनने वाला था।

बेचारी मेरी माँ मेरी इस अति से उतना ही डर गईं जितना वे तब डरी थीं जब मैंने अपने नास्तिक होने की घोषणा की थी। लेकिन इस बार उन्होंने मुझे हमारे ऊँचे दर्जे के नियमवादी पादरी के पास नहीं भेजा। उन्होंने मदद के लिए उस एकमात्र व्यक्ति की ओर रुख किया जिसकी मैं सुनता था, ब्रदर चार्ल्स सिंपसन जो बेव्यू के प्रभावशाली नेता थे।

वे रविवार की प्रार्थना सभा में ईश्वर के नाम पर भविष्यवाणी किया करते थे और कभी-कभी वे सीधे उपदेश मंच से ही लोगों से दुष्ट आत्माओं को निकालने का कार्य करते थे, जिसके कारण कुछ लोग बेहोश हो जाते थे।

लेकिन मेरी माँ के लिए राहत यह थी कि ब्रदर चार्ल्स ने कहा, “क्लार्क, लिबर्टी बाइबिल कॉलेज मत जाओ। छात्रवृत्ति स्वीकार करके वंडरबिल्ट चले जाओ।”

मैंने ऐसा ही किया। मुझे ऐसा लगा मानो मैं डेनियल (एक यहूदी भविष्यवक्ता और विद्वान) था जो नेब्यूकद्नेज़र के महल में जा रहा था। वंडरबिल्ट मेरी नवीन आस्था के लिए अनुकूल जगह नहीं थी।

यह वह समय था जब हिप्पी जिन्हें ‘जीसस फ़्रीक्स’ यानी ‘यीशु के लिए सनकी’ कहा जाता था, हर जगह उभर रहे थे और अमेरिका के शिक्षा परिसरों का पुन: प्रवर्तन हो रहा था। जब मैं नैशविल में था, हमने संगीत के लिए प्रसिद्ध गली 16 एवेन्यु साउथ में ‘हाउस मिनिस्ट्री’ (घरों में होने वाला ईसाई धर्माचार) प्रारंभ की।

हम कल्पना करते थे कि हम यीशु के स्वर्ग जाने के बाद प्रथम शताब्दी के ईसाइयों की तरह ही थे जो एकसाथ रहते थे, हर चीज़ साझा करते थे तथा किसी चीज़ पर अपना अधिकार नहीं रखते थे। हम लोग निरंतर ईसाई धर्म (गॉस्पेल) का प्रचार कर रहे थे। जब मैं अठारह वर्ष का था तब मेरे छोटे से समूह के लोग मुझे ‘ब्रदर क्लार्क’ (धार्मिक संबोधन) कहने लगे थे और वे मुझे ‘एल्डर’ यानी धार्मिक नेता मानते थे। यह सब हास्यास्पद होता लेकिन हम लोग पूरी तरह आश्वस्त थे कि ईश्वर हमारे हृदय में स्थित होकर हमसे बात करता था। शायद वह करता भी था।

अगली गर्मियों तक सब कुछ बदल गया। मुझे उत्तरी कैरोलीना में ग्रीष्मकालीन नौकरी के रूप में घर-घर जाकर पारीवारिक बाइबिल बेचने का काम मिला। वहाँ एक तो दुनिया के बारे में अपने नज़रिये पर कायम रहने का दिमागी तनाव था और उसके साथ-साथ ग्रीष्म ऋतु की तेज़ गर्मी में बारह-बारह घंटे घर-घर जाकर पारिवारिक बाइबिल बेचने के लिए याद की हुई बातें बोलनी पड़ती थीं। इन सब ने मुझे पूरी तरह थका दिया। मैं लोगों के घर के द्वार पर दस्तक देता और अपने मनाने के प्रयासों और तर्कों से उन्हें डरा देता।

मेरे माता-पिता मुझे मोबिल, हमारे घर, वापस ले आए और मनोचिकित्सक के पास ले गए। वह मेरा पहला और बहुत बुरा मनोचिकित्सक था जो हमारे साप्ताहिक आधे घंटे के सत्र में पंद्रह मिनट तक मुझे घूरता रहता था और फिर सपाट आवाज़ में कहता, “आप..कैसे..हो?” उसने मुझे चार मनोविकार रोधी औषधियों - अरटेन, नेवेन, थोराजिन और प्रोलीक्सिन - की भारी मात्राओं से एक चलता-फिरता आज्ञाकारी प्रेत बना दिया।

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मेरी कथा का यह भाग जितना मैंने सोचा था उससे अधिक लंबा हो गया है इसलिए मैं बीमारियों हेतु अस्पताल में भर्ती होने के बारे में, अपने सैन फ्रांसिस्को के पेज स्ट्रीट में ज़ेन (Zen) बौद्ध केंद्र के और वर्ष 1981-82 की सर्दियों में मरीन कंट्री के खाड़ी क्षेत्र के आसपास ग्रीन गल्च फ़ार्म के अनुभव नहीं बताऊँगा।

चलिए, मैं पार्थसारथी राजगोपालाचारी जी, जिन्हें प्यार से चारीजी भी कहते हैं, से अपनी प्रथम मुलाकात के बारे में बताता हूँ जो वर्ष 1992 में अटलांटा के मोलेना आश्रम में हुई थी। उन्हें चारों ओर से लोग घेरे हुए थे और उनका कद इतना लंबा था कि मैं उनके सफ़ेद बालों की झलक पा सका।

मैंने तब तीन सिटिंग ली ही थीं और सहज मार्ग नाम की नई ध्यान पद्धति से ध्यान शुरू किया था। जब मैंने चारीजी को देखा, जो सहज मार्ग के आध्यात्मिक गुरु या ‘मास्टर’ थे, तब मुझमें उम्मीद जागी कि यही वे व्यक्ति हो सकते हैं जिनकी मैं सारी ज़िंदगी तलाश करता रहा हूँ। मैंने आशा की कि हो सकता है यही व्यक्ति मेरा प्रारब्ध हों। जब ध्यान हेतु बनाए गए विशाल पंडाल में वे अभ्यासियों को सिटिंग दे रहे थे तब मैंने प्राणाहुति, जिसके बारे में मुझे बताया गया था, का प्रवाह महसूस किया जिससे ऐसा लगा मानो मेरे हृदय का भ्रम पिघलता जा रहा था।

मैं सिर्फ़ दो महीने पुराना अभ्यासी था लेकिन अलाबामा में, जहाँ मैं रहता था, कोई प्रशिक्षक नहीं था। इसलिए चारीजी ने मुझे विशेष सिटिंग दी और मुझे ही प्रशिक्षक बना दिया। मास्टर की उस सिटिंग के समाप्त होने पर मैं रो रहा था।

मैं सदा से पूर्ण समर्पण से काम करने वाला व्यक्ति रहा हूँ। इस प्रवृत्ति के लाभ भी हैं और हानियाँ भी। मैंने चारीजी के साथ भारत आने के लिए अपनी सारी जमा-पूँजी खर्च करने में ज़रा भी संकोच नहीं किया। मैं वर्ष 1993 से वर्ष 2011 के बीच नौ बार भारत आया और हर बार औसतन चार महीने के लिए यहाँ रहा।

पहली बार से ही मास्टर मुझे अपने निकट रखने लगे क्योंकि उन्हें मेरे प्रश्न अच्छे लगते थे। वे सारे प्रश्न किसी नौसिखिए के होते थे जिसे इसके बारे में कुछ भी मालूम नहीं था और जिसके लिए नियमों, औपचारिक व्यवहार आदि के कोई बंधन नहीं थे। मैं इस बात की पुष्टि के लिए उनसे हाथ भी मिलाया करता था कि हम हमेशा एक-दूसरे के प्रति पूरी तरह ईमानदार रहेंगे। वे मेरा हाथ अपने हाथ में लेते और कहते “सौदा पक्का है।”

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वर्ष 1997 में मास्टर की पत्नी सुलोचना मामी कोइंबटूर में आर. के. नेचर क्योर होम में भर्ती थीं और गुरुदेव उनके साथ वहाँ दो सप्ताह तक रहे। वह समय मेरे इस गुरुकुल की, उनसे निकट संपर्क की, पराकाष्ठा था। मैं उन 20 भाग्यशाली अभ्यासियों में से था जिन्हें वहाँ जाने की अनुमति थी। वास्तव में, वहीं पर हमारे लंबे वार्तालापों की शुरुआत हुई। मास्टर कहा करते थे, “वह अलाबामा वाला लड़का कहाँ है? उसे यहाँ लेकर आओ। वह मिशन के उन दो लोगों में से एक है जो मुझे बोलने के लिए विवश करते हैं (दूसरे व्यक्ति थे फ़र्डिनैंड वूलीमियर)।”

मेरे लिए दूसरा गुरुकुल अनुभव वर्ष 2004 में हुआ। मैं सात लंबे वर्षों तक मास्टर, मिशन और मेथड से दूर रहा क्योंकि मेरी चारीजी के साथ लालाजी के गुरु के विषय पर और उस समय नए-नए आए इंटरनेट पर मैंने किस तरह से धन कमाया था, उसके बारे में बहस हो गई थी। (उस समय तो मुझे लगता था कि मैंने इन्हीं कारणों से मिशन को छोड़ा था लेकिन अब मैं इसका असली कारण जानता हूँ।)

एक शिष्य गुरु को छोड़ सकता है। लेकिन जैसा कि चारीजी ने कहा था, गुरु को शिष्य का परित्याग करने की अनुमति नहीं है।

ईश्वर का शुक्र है! मेरे ज़िद्दी और मूर्खतापूर्ण सात वर्षों के विराम की अवधि में भी मुझे पत्र और निमंत्रण मिलते रहे जो सुंदर, अलंकृत कागज़ पर छपे एवं ‘पार्थसारथी’ के हस्ताक्षर से सजे होते थे। वे पत्र मुझे भारत लौटने को कहते थे।

एक दिन मुझे एक पत्र प्राप्त हुआ जिसमें मुझे एक नए आश्रम को देखने के लिए बुलाया गया था। यह आश्रम महान हिमालय पर्वतमाला के पास बनाया गया था जहाँ से त्रिशूल और नंदा देवी शृंखलाएँ दिखाई पड़ती थीं।

उन्होंने लिखा था कि उस नए आश्रम का नाम सतखोल रखा गया था। अंत में परिशिष्ट में उन्होंने लिखा - “यदि इससे कोई फ़र्क पड़ता है तो मैं अपने अनुरोध को आदेश कहूँगा।”

मैं इंकार कैसे कर सकता था?

रास्ते में मैं चलचित्र बनाने के उपकरण खरीदने के लिए न्यू यॉर्क शहर में रुका। मैंने सोचा था कि इस बार भी जो भी मास्टर कहेंगे या करेंगे उसे रिकॉर्ड करूँगा लेकिन इस बार अपनी डायरी में नहीं, बल्कि फ़िल्म के रूप में रिकॉर्ड करूँगा। इससे हर कोई देख और सुन सकेगा कि गुरु से वार्तालाप करना कैसा होता है। बाद में मुझे महसूस हुआ कि मास्टर मुझ जैसे बेवकूफ़ व्यक्ति पर ध्यान इसलिए देते थे क्योंकि उन्होंने देखा कि मेरे हृदय में उनके द्वारा मुझे प्रचुरता में दी गई शिक्षाओं और उनके कार्यों को हर उस व्यक्ति तक पहुँचाने की गहरी इच्छा थी, जो उन्हें ग्रहण करने के लिए तैयार था।

जब हम सतखोल के छोटे से आश्रम में पहुँचे, गाड़ी में सामने की सीट पर बैठे मास्टर ने मुड़कर मेरे चल रहे कैमरे में देखते हुए कहा, “तुम मेरे साथ मेरी कॉटेज में रहोगे।” बिना इस आमंत्रण का महत्व समझे मैंने सरलता कहा, “ठीक है सर।” बाद में मुझे बताया गया कि मैं पहला पश्चिमवासी व्यक्ति था जिसे मास्टर की कॉटेज में रहने का अवसर मिला था।

दो सप्ताह तक मैं परम आनंद में रहा। मैं मास्टर के परिवार के किसी सदस्य की तरह उनके घर में रहा, ठीक वैसे ही जैसे बाबूजी ने कहा था कि किसी सच्चे अभ्यासी को करना चाहिए।

वहाँ मैंने सब कुछ रिकॉर्ड किया - हर भोजन के पलों को, हर वार्तालाप को। उसमें वह बातचीत भी शामिल थी जो तब हुई थी जब चारीजी अपनी छोटी खिड़की वाली सीट पर बैठे थे। उनके सामने यानी मेरे पीछे बहुत से अभ्यासी उपस्थित थे और मेरा कैमरा इतना जटिल था कि उसे संभालना मुझ जैसे नौसिखिए के लिए मुश्किल था। उस समय मास्टर ने सहज मार्ग की गुरु परंपरा के बारे में चर्चा की जो भगवान् कृष्ण तक जाती थी। सतखोल में रहने का अनुभव मेरी संपूर्ण विश्व की यात्राओं में सर्वश्रेष्ठ था (मुझे शर्म आती है कि वहाँ बनाई गई चालीस घंटे की फिल्म का संपादन करके उसको वृत्तचित्र का रूप मैं अब तक नहीं बना पाया हूँ हालाँकि वह अब भी मेरे पास सुरक्षित है।)

धीरे-धीरे मास्टर के आसपास की हर चीज़ बदलती गई जैसा कि हमेशा होता है। बाद की मेरी यात्राओं में उनके निकट होने और मनोहर चर्चाओं के सत्र जाते रहे और मेरी उपस्थिति के लिए उनकी सौम्य स्वीकृति भी नहीं रही। अब मैं समझता हूँ कि उस समय उन्होंने मुझ में क्या देखा - एक ऐसा व्यक्ति जो अतीत में अटका हुआ था, जब वह सोचता था कि वह गुरु का चहेता था। मुझ में अहंकार आ गया था क्योंकि मैं अपने आप को बड़ा आदमी समझने लगा था।

बेशक चारीजी देख सकते थे कि आध्यात्मिक साधक के लिए सबसे पेचीदा शत्रु वह सूक्ष्म ‘आध्यात्मिक अहंकार’ है जो साधक में तब प्रकट होता है जब वह आध्यात्मिकता की अदृश्य मीनार की घुमावदार सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उस स्थान तक पहुँच जाता है जहाँ दिव्यता केंद्रित होती है। ‘आध्यात्मिक अहंकार’ एक अनवरत, कठिन और लगातार रूप बदलने वाला शत्रु है। इसे प्रेम ही पराजित कर सकता है।

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मैं पहले ही देख चुका था कि चारीजी वह सब जानते थे जिसे उन्हें जानने की ज़रूरत थी – कभी-कभी वे शर्मनाक बातें भी जो मैं सबसे छुपाना चाहता था। उन्होंने एक ही झलक में सब कुछ देख लिया था। दाजी ने मुझसे एक बार कहा था कि वास्तव में शिष्यों का कोई ऐसा समूह नहीं होता जो गुरु के ज़्यादा करीब होता है, बल्कि एक उच्च कोटि के गुरु के आसपास सदैव कुछ कार्यकर्ता होते हैं जो उनकी अपने गुरु के कार्य में सहायता करते हैं।


आध्यात्मिक अहंकार’ एक अनवरतकठिन और लगातार रूप बदलने वाला शत्रु है। इसे प्रेम ही पराजित कर सकता है।


मैं मास्टर के मानवीय अस्तित्व पर जो बोझ डाल रहा था, उस पर मेरी नज़र ही नहीं पड़ी। और चारीजी के चारों ओर बदलती परिस्थितियों के केंद्र से जो दाजी, कमलेश भाई साहब देख पाते थे, वह मैं कभी नहीं देख पाया। यह मेरे दिमाग में कभी नहीं आया कि मेरे उनके निकट बने रहने के संघर्ष के कारण उनके दयामय विशाल हृदय को कष्ट पहुँचता था। मैं कभी इतना समझदार नहीं बन पाया कि मास्टर को अपनी उपस्थिति के दबाव से मुक्त कर पाऊँ।

अधिकतर अभ्यासी शायद यह जानते हैं कि तीव्र आध्यात्मिक प्रगति के लिए शारीरिक रूप से एक समर्थ गुरु के निकट रहना आवश्यक नहीं है। मास्टर एक ही नज़र में किसी के जीवन को रूपांतरित कर सकते थे और ऐसा उन्होंने कई बार किया भी था। यदि आप तैयार हैं और उनकी पूर्ण प्राणाहुति को ग्रहण करने के योग्य हैं तो वे आपको सीधे ईश्वर तक ले जा सकते हैं।

इस तरह भारत की पिछली तीन यात्राओं के दौरान मेरा ज़्यादातर समय चेन्नई के मणपक्कम आश्रम में उनकी कॉटेज के दरवाज़े के आसपास मंडराते हुए या हर जगह उनके साथ जाने में बीता। मैं उनके निकट रहने के लिए दीवाना था लेकिन उन्हें दूर से देखकर भी प्रसन्न रहता था।

लेकिन बहुत समय तक मैं समझ नहीं पाया कि वे मुझे अपनी अनुपस्थिति से कितना सिखा रहे थे जैसे पहले उन्होंने अपनी उपस्थिति से सिखाया था। अनुपस्थिति द्वारा सिखाए गए सबक कठोर तो थे लेकिन वे आवश्यक थे क्योंकि जैसा बाबूजी ने कहा है कि अंदर मौजूद ‘बरज़ख’ यानी बाधाएँ किसी की आध्यात्मिक यात्रा का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं।

अंततः वर्ष 2012 में मेरा लिवर ट्रांसप्लांट हुआ और पैसों की कमी के कारण मैं मास्टर से दूर न्यू ऑर्लिन्स में ही रहा, हालाँकि जितना संभव था, उतना दैनिक ईमेल के माध्यम से उनसे जुड़ा रहा। अवसाद, जो मेरा पुराना मित्र था, एक धीमे-धीमे बढ़ते खामोश साए की तरह मेरे भीतर लौट आया और इस बार उसका स्वरूप बर्फ़ की तरह अधिक गहन और कठोर था।

मैं फिर से तनहाई और अकेलेपन में कैद हो गया जो मेरे जीवन का सबसे लंबा ‘पॉवेल आउटेज’ रहा। इस आउटेज यानी अकेलेपन की अवधि बारह वर्ष थी - फ़रवरी 2013 से 10 अप्रैल 2025 तक। तभी मैं जब अपने ढीले पुराने सोफ़े पर नींद से जागा, मैंने पाया कि मेरे शरीर में एक सिहरन सी उठी। यह सिहरन दाजी और चारीजी के साथ स्वप्न में हुई एक अप्रत्याशित भेंट के कारण थी।

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इस स्वप्न से मेरा बारह वर्ष का अकेलापन खत्म हो गया और मैं फिर से उस काम पर लौट आया जिसके लिए मैंने जन्म लिया था। इसने सचमुच मेरी प्राणरक्षा की क्योंकि एक सप्ताह बाद ‘मौंडी गुरुवार’ (यीशु का अपने शिष्यों के साथ अंतिम भोज का दिन) को मैं फिर से एंबुलेंस में अस्पताल जा रहा था क्योंकि गंभीर थायरॉइड स्थिति ने मुझे मिक्सीडेमा कोमा के करीब पहुँचा दिया था। मुझे बताया गया था कि यह ऐसा कोमा है जिससे व्यक्ति बाहर नहीं आ पाता।

10 अप्रैल को जब यह स्वप्न आया तब मैं संसार छोड़ने के बारे सोच रहा था। ऐसा पहली बार वर्ष 1982 में भी हुआ था जब मैं सिटका, अलास्का में था। मैं इसे विस्तार से नहीं बताऊँगा, बस इतना कहूँगा कि वह एक पीड़ा भरी रात थी। और सुबह जब मैंने बाहर पर्वतों को देखने के लिए परदे हटाए, ठीक उसी समय पर्वतों के पीछे से सूर्य उदित होता नज़र आया। वर्षों बाद जब मैं यह बात चारीजी को उनके कार्यालय में बैठकर बता रहा था तभी मैंने उनके सिर के ऊपर देखा जहाँ बाबूजी द्वारा बनाया गया श्री रामचंद्र मिशन का प्रतीक चिह्न लटका था। उसमें पहाड़ियों के पीछे से सूर्योदय को दिखाया गया है। उसे देखकर मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। चारीजी मुस्कुराए और धीमी आवाज़ में दो ही शब्द बोले, “सहज मार्ग।”

लेकिन अप्रैल 2025 में, मुझे एक बार फिर अपना जीवन निरुद्देश्य लग रहा था। मेरे मन में अब भी सिटका से जुड़ा काव्यात्मक विचार था कि मैं गूटे (Goethe) के ‘यंग वर्थर’ की तरह किसी तरह आधी रात को बिना किसी पीड़ा के समाप्त हो जाऊँ।

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तभी 10 अप्रैल वाला सपना आया और उसके एक सप्ताह बाद करीब-करीब जानलेवा थाइरॉइड की स्थिति बनी। क्या आप मान सकते हैं कि मास्टर मेरी देखभाल कर रहे थे? वे शायद यह कह रहे थे, “वह लड़का अब बूढ़ा हो चुका है। वह अपने शरीर की उपेक्षा कर रहा है और शायद अब मरने वाला है। उसने अभी भी वह काम नहीं किया है जो हम उससे लेना चाहते थे। चलें, उसके स्वप्न में जाकर उसे जगा दें।”

क्योंकि मुझे लगता है कि मेरे साथ वास्तव में यही हुआ था। एक बार चारीजी ने कहा था कि जब कोई दिव्य शख्सियत आपके सपने में आती है तो वह सिर्फ़ स्वप्न नहीं होता। यह एक दर्शन होता है और हर दर्शन का कोई उद्देश्य होता है।

दाजी ने कहा था कि वृद्ध लोगों के लिए विशेष प्रकार की प्राणाहुति उपलब्ध होती है क्योंकि उनके पास अधिक समय नहीं होता है। मुझे लगता है कि यह सच है क्योंकि इससे पहले मैंने कभी इस तरह की प्राणाहुति अनुभव नहीं की थी। मैं अब हर जगह, हर समय रेडियो या टीवी के स्पंदनों की तरह प्राणाहुति का प्रवाह अनुभव कर सकता हूँ।

जिस तरह स्रोत से आने वाली उच्च वोल्टेज की बिजली को खंभों पर लगे ट्रांसफ़ॉर्मर कम क्षमता की बनाकर घरों तक सुरक्षित और उपयोगी वोल्टेज में पहुँचाते हैं उसी तरह प्रशिक्षक भी उच्च क्षमता की प्राणाहुति की तीव्रता को अभ्यासी की ज़रूरत के अनुसार बदलकर उन्हें प्रदान करते हैं।

हमारे पास कितना समय बाकी है? युवा हों या वृद्ध, हममें से कोई भी कल ही मर सकता है। यद्यपि चारीजी ने मुझे एक बार वह उम्र बताई थी जब तक मैं जीवित रहूँगा लेकिन मैंने इस पर पहले कभी विश्वास नहीं किया था, लेकिन अब मुझे लगता है कि मेरा बहुत सा उपेक्षित काम अभी बाकी है। खैर,आगे देखते हैं।

मैं जानता हूँ कि मेरा अकेलापन अब समाप्ति पर है। वास्तव में मैंने जो मूर्खता की वह यह कि अपने बारह वर्ष शर्म और अपराधबोध में और अहंकार की छाया में बर्बाद कर दिए। मैंने हमारे खूबसूरत आधारभूत अभ्यासों की अवहेलना की। उनके बारे में मैंने वर्ष 1996 में एक पुस्तक लिखी थी और अगले कुछ वर्षों में खुद ही उन्हें पूरी तरह भूल गया।

मुझे केवल हर दिन बताए गए हार्टफुलनेस के तीन सरल अभ्यास करने थे।

1. सुबह के समय ध्यान

2. शाम के समय सफ़ाई

3. सोते समय की प्रार्थना और दसवें नियम का अनुपालन

 

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प्रार्थना का महत्व अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। हम दिन के अंत में पुनरावलोकन, पश्चाताप, पुनरारंभ और नवीनीकरण करने के लिए प्रार्थना करते हैं। मुझे अपनी ही पैदा की हुई परेशानियों, गुरु के सामने अपने गलत व्यवहार के अपराधबोध और अपनी अनेक असफलताओं की शर्मिंदगी को छोड़कर बस फिर से शुरुआत करने और आगे बढ़ने की ज़रूरत थी। यह सारा खेल उस शातिर और फिसलन भरे आध्यात्मिक अहंकार का था जो व्यक्ति को अपराधबोध और शर्म के जाल में फँसाता है।


मैं मानता हूँ कि अकेलेपन से एकांत तक की लंबी यात्रा वास्तव में पल भर में हो सकती है जैसे कि बच्चे का जन्म होता है। जन्म लेने के लिए लंबा गर्भ-काल आवश्यक होता हैलेकिन जन्म उसी क्षण हो जाता है जब शिशु अंधेरेजल से भरे गर्भाशयउस एकमात्र संसार सेजिसे उसका शरीर जानता हैसे बाहर निकलता है।


मैं मानता हूँ कि अकेलेपन से एकांत तक की लंबी यात्रा वास्तव में पल भर में हो सकती है जैसे कि बच्चे का जन्म होता है। जन्म लेने के लिए लंबा गर्भ-काल आवश्यक होता है, लेकिन जन्म उसी क्षण हो जाता है जब शिशु अंधेरे, जल से भरे गर्भाशय, उस एकमात्र संसार से, जिसे उसका शरीर जानता है, से बाहर निकलता है।

अब इतने समय बाद, मैं हर दिन परमानंद की अवस्था, एक आनंदपूर्ण कृतज्ञता की अवस्था में जागृत रहता हूँ। यह वही अवस्था है जिसके बारे में मैंने पवित्र धार्मिक ग्रंथों में पढ़ा था और चारीजी के चरणों में बैठकर अनेक बार सुना था। मैं नहीं जानता था कि यह सत्य है भी कि नहीं क्योंकि मेरे लिए यह सिर्फ़ सुनी सुनाई बात थी। और स्वामी विवेकानंद के अनुसार, आध्यात्मिक यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण है स्वयं का प्रत्यक्ष अनुभव।

अपने गुरु की असीम धैर्यशीलता के कारण - जिन्हें हम चार महान मार्गदर्शकों के सांसारिक रूपों में स्मरण करते हैं - मैंने अपने अनुभव से जान लिया है कि जो कुछ उन्होंने कहा है, वह सत्य है। जो पहले मैंने पढ़ा और सुना था, वह सब अब मेरे अपने हृदय का अनुभव है।

मैं जान गया हूँ कि एकांत में जो आनंद है, वह मेरे लिए आज वास्तविकता है।

 

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परिवर्तन का रहस्य यह है कि अपनी सारी ऊर्जा पुरानी बातों पर लड़ने में नहीं, बल्कि नया बनाने में लगाओ।”

सुकरात


 


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क्लार्क पॉवेल

क्लार्क पॉवेल

क्लार्क पॉवेल सबसे पहले एक कवि हैं। वे एक पुरस्कार विजेता स्तंभ लेखक हैं, और पढ़ें

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