डॉ. जोज़ेफ़ बेन्टन हॉवेल ‘इंस्टीट्यूट फ़ॉर कॉन्शियस बीइंग’ के संस्थापक हैं। पूर्णिमा रामकृष्णन के साथ इस साक्षात्कार में वे इस संस्थान की स्थापना और अपनी व्यक्तिगत यात्रा के बारे में बात कर रहे हैं। वे चेतना, बाल-आत्मा, एनिग्राम (व्यक्तित्व-परीक्षण) और आध्यात्मिक विकास पर किए अपने कार्य पर चर्चा कर रहे हैं जिसमें वे अहम् से आत्मा की ओर यात्रा के बारे में बता रहे हैं तथा प्रगति व विकास के मनोभाव की सराहना कर रहे हैं।
प्रश्न - हम चेतना के विकास के बारे में बात से इस साक्षात्कार की शुरुआत करते हैं।
जोज़ेफ़ - हमारी प्रजाति जैविक विकास का परिणाम है। हम अनुकूलन, प्रतिस्पर्धा तथा अभ्यास के माध्यम से ऐसी चीज़ें सीखना और करना जानते हैं जो हमारे वर्तमान कौशल में नहीं होती हैं। चेतना का विकास जैविक विकास की तरह ही होता है। यह भी एक प्रकार का अनुकूलन ही है जो सचेत रूप से और सोच-समझकर होता है।
जैसे-जैसे हमारी चेतना विकसित होती है, यह आध्यात्मिक ब्रह्मांड के अनुकूल होती जाती है, ठीक वैसे ही जैसे कोई प्राणी भौतिक ब्रह्मांड के अनुकूल होता जाता है। आध्यात्मिक ब्रह्मांड के अनुकूल होना बिलकुल अलग बात है। हमारा अहम् जिसे महत्वपूर्ण समझता है वह शायद आत्मा के लिए महत्वपूर्ण न हो और जिसे हमारी आत्मा महत्वपूर्ण समझती है वह शायद हमारे अहम् के अनुसार महत्वपूर्ण न हो।
प्रश्न - आपको ‘इंस्टीट्यूट फ़ॉर कॉन्शियस बीइंग’ की स्थापना करने की प्रेरणा कहाँ से मिली और आपकी यात्रा ने इसकी परिकल्पना को कैसे बढ़ाया?
जोज़ेफ़ - ‘इंस्टीट्यूट फ़ॉर कॉन्शियस बीइंग’ अस्तित्व में आया क्योंकि मेरी पत्नी लार्क और मैंने चेतना के बारे में जो कुछ सीखा था, उसे दूसरों को बताने का फ़ैसला किया। दुर्भाग्य से हमने अपने इकलौते बेटे को खो दिया जब वह केवल 26 वर्ष का था। यह हमारे लिए एक बहुत बड़ा झटका था। यह वह समय था जब उसे अपने जीवन में आगे बढ़ना था।
वह प्रतिभाशाली था और उसने विश्वविद्यालय में कई सम्मान प्राप्त किए थे। लेकिन एक बीमारी ने उसे जकड़ लिया जिससे वह कमज़ोर होता गया और धीरे-धीरे हमसे और इस दुनिया से दूर चला गया। माता-पिता के रूप में जब आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं तो आपका भविष्य उन पर निर्भर रहता है - वे क्या करते हैं, वे जीवन में क्या बनेंगे, आपके विश्वास और आपके सिखाए मूल्यों को वे कैसे आगे बढ़ाएँगे और आप उनके लिए क्या उम्मीदें और सपने रखते हैं। जब ऐसा नहीं होता है तब आप सोचने लगते हैं, “मैं किसलिए जी रहा हूँ?” इतने सालों तक उस बच्चे को गोद में खिलाना, उसे संभालना, फिर उसे खेलने के लिए ले जाना और स्कूल भेजना, उसे यथासंभव सर्वश्रेष्ठ शिक्षा दिलाना, उसे प्यार करना और प्यार पाना सिखाना और फिर यह सब छिन जाता है। इसे ही हम एनिग्राम अध्ययन में ‘आघात बिंदु’ कहते हैं और हम सभी के जीवन में ऐसे आघात बिंदु हैं।
उस समय हमारा सबसे बड़ा आघात बिंदु अपने बेटे बेन को खोना था। एनिग्राम की आध्यात्मिकता पर काम करके हम उस आघात से उबर पाए। एनिग्राम के भीतर की सच्चाइयों ने हमें अपनी अहंकारी इच्छाओं से दूर किया और हम अपने जीवन के आध्यात्मिक क्षेत्र को जान पाए। अहंकार से दूर आध्यात्मिकता की ओर जाने से ईश्वर में हमारी आस्था और गहरी हो गई। फिर भी, एनिग्राम ने विशेष रूप से हमें इस बात के प्रति सचेत होने में मदद की कि कैसे हमारे अहंकार ने हमारे दुख से उबरने को अवरुद्ध कर दिया था। इसलिए जब हमने इस शक्तिशाली सिद्धांत को जाना तब हम इसे दूसरों को बताना चाहते थे। अहंकार के आवरणों को हटाना अधिक सचेत होने के सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक है। इस तरह ‘इंस्टीट्यूट फ़ॉर कॉन्शियस बीइंग’ अस्तित्व में आया।
प्रश्न - मुझे आपके बेटे के बारे में सुनकर बहुत दुख हुआ। क्या आप विस्तार से बता सकते हैं कि आघात बिंदु हमारी आध्यात्मिक प्रगति को कैसे प्रभावित करते हैं?
जोज़ेफ़ - जैसे-जैसे हमारी चेतना में उत्तरोत्तर विकास होता है, आघात बिंदु हमारे जीवन में अलग-अलग समय पर विभिन्न मात्रा में आते हैं। वे दर्दनाक अनुभवों से लेकर किसी भी ऐसे अनुभव तक हो सकते हैं जो हमें वास्तविकता को अधिक सटीक रूप से देखने में मदद करते हैं। आघात बिंदु का अनुभव करने के बाद हम या तो अनुभव से आगे बढ़कर चेतना के उच्चतर स्तर पर पहुँच जाते हैं या इस यात्रा में हमारा पतन होने लगता है। यदि हम प्रगति नहीं करते हैं तो सामान्यतः इसका मतलब यह होता है कि हम उस स्थिति के आधार पर जीने के नए तरीके को अपना नहीं पाए हैं जिसके लिए आघात बिंदु ने हमें जागरूक किया था।
आघात बिंदु से आधारभूत प्रश्न उठ सकते हैं। ऐसा ही एक प्रश्न है “क्यों?” दूसरा है “मैं आगे कैसे बढ़ूँ?” जब हमने ईश्वर से जानना चाहा कि जो भी हो रहा है वह क्यों और कैसे हो रहा है तब आश्चर्यजनक और महत्त्वपूर्ण ज्ञान हमें स्पष्ट हुआ। उन्होंने उजागर किया कि हम आत्मा हैं, अपना अहम् नहीं। हम स्थूल शरीर में आध्यात्मिक प्राणी हैं लेकिन यह बात हमें समझ नहीं आई। जो बात समझ में आई, वह यह थी कि हमारा अहम् हमें इस दुनिया में आगे नहीं बढ़ा पा रहा है। अहम् की अभिव्यक्ति मनुष्य की मानसिक संरचना में है कि जीवन कैसे चलना चाहिए। लेकिन आध्यात्मिक मार्ग का एक और गहरा उद्देश्य होता है और वह है आत्मा की प्रगति।
अहम् की अभिव्यक्ति मनुष्य की मानसिक संरचना में है कि जीवन कैसे चलना चाहिए। लेकिन आध्यात्मिक मार्ग का एक और गहरा उद्देश्य होता है और वह है आत्मा की प्रगति।
हमें पता चलने लगा कि स्वयं से परे एक शक्ति हमें सांत्वना दे रही थी। प्रार्थना और ध्यान के माध्यम से हम उस शक्ति तक पहुँच पा रहे थे। हम केवल शारीरिक आँखों के बजाय आत्मा की आँखों से देख पा रहे थे। हमें हर जगह, यहाँ तक कि पेड़ों और सितारों में भी चमत्कार और उस शक्ति के होने के संकेत दिखाई देने लगे। जब हम केवल अहंकारी मन से काम करते हैं तो यह अहंकार असली सत्य यानी आध्यात्मिक सत्य की अद्भुत चमक को दूर कर देता है। यह ऐसा इसलिए करता है ताकि हम इसी की बताई कहानी में मग्न रहें और आत्मा की बताई राह पर न चल पड़ें। लेकिन अहंकारी मन, जो आत्मा के साथ मिल गया है, वह हमें जीने का एक स्वस्थ और आध्यात्मिक रूप से गतिशील तरीका भी देता है।
इस नए जीवन में हमें प्रदान की गई चेतना की नई अवस्था ने हमारे दुख को दूर करने में मदद की। हमें उदास रहने या मुरझाने, मायूसी, निराशा, क्रोध, आक्रोश, किसी लत या उसके निषेध में डूबने के लिए नहीं छोड़ दिया गया।
प्रश्न - अहंकार पर काबू पाने की प्रक्रिया ने जीवन और आध्यात्मिकता की आपकी समझ को कैसे नया रूप दिया?
जोज़ेफ़ - हमारे पास जीने का एक तरीका था और यह तरीका आनंदमय था। जब मैं आनंद कहता हूँ तो मेरा मतलब खुशी और दर्द की अनुपस्थिति नहीं है अथवा पार्टी करना या दिल खोलकर हँसना नहीं है। मैं कठिनतम परिस्थितियों में भी स्थायी खुशी और शांति की बात कर रहा हूँ। ऐसे में दारुण घटनाओं को निराशाजनक आपदाओं के रूप में अनुभव नहीं किया जाता। स्थायी आनंद हर चीज़ को मज़बूती प्रदान करता है। आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है संतुलन में बने रहना। यह वह शांति है जिसे मेरी परंपरा में समझ से परे की शांति कहा जाता है। हम जीने का यह नया तरीका पाकर उत्साहित थे और इसे लोगों को बताना चाहते थे। बहुत से लोग अपने दिल से नहीं, अपनी आत्मा से नहीं बल्कि अपने अहंकारी मन से जी रहे थे। वे भी बहुत दुखों का सामना कर रहे थे और वे दुखों के खतरनाक स्तर पर पहुँच चुके थे।

हमें पता चलने लगा कि स्वयं से परे एक शक्ति हमें सांत्वना दे रही थी। प्रार्थना और ध्यान के माध्यम से हम उस शक्ति तक पहुँच पा रहे थे। हम केवल शारीरिक आँखों के बजाय आत्मा की आँखों से देख पा रहे थे।
लार्क और मैं इस ज्ञान को लोगों में बाँटने के लिए विभिन्न संगठनों में जाने और वहाँ पढ़ाने लगे। ऐसा करते हुए कई सालों के बाद किसी ने हमसे कहा, “आपके पास अपने व्याख्यानों की बहुत सारी सामग्री है। कृपया उसे एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करें।” इस प्रकार, ‘बिकमिंग कॉन्शियस, द एनिग्राम्स फ़ॉरगॉटन पैसेजवे’ नामक पुस्तक लिखी गई। यह बहुत लोकप्रिय हुई। लोगों ने इसे पसंद किया और पूछा, “मैं और अधिक कैसे सीख सकता हूँ? हम यह जानना चाहते हैं कि यह सब क्या है” और इस प्रकार ‘इंस्टीट्यूट फ़ॉर कॉन्शियस बीइंग’ का गठन हुआ। अब हम दो वर्षीय सर्टिफ़िकेशन कोर्स और एक वर्षीय उच्च श्रेणी का सर्टिफ़िकेशन कोर्स कराते हैं। इसके अलावा, जो लोग ये दोनों सर्टिफ़िकेशन कोर्स कर चुके हैं, उनके लिए एक चालू कार्यक्रम भी है।
प्रश्न - हमें अपनी पुस्तक ‘बिकमिंग कॉन्शियस’ के बारे में बताइए। एनिग्राम के अध्ययन में यह किस प्रकार महत्वपूर्ण है?
जोज़ेफ़ - मेरा मानना है कि ईश्वर की कृपा से यह पुस्तक अपनेआप में बहुत प्रभावशाली है। हम आध्यात्मिक अभ्यास सिखाते हैं, ध्वनि चिकित्सा से लेकर – आपने गायन कटोरे देखे होंगे — वन स्नान, लेखन और हार्टफुलनेस ध्यान तक। यह समुदाय अपने आप में एनिग्राम के सिद्धांत लागू करने के लिए एक अद्भुत प्रयोगशाला है।
हमारे संस्थान में मुख्यतः एनिग्राम का ज्ञान सिखाया जाता है। 1980 के दशक के मध्य से लेकर अब तक एनिग्राम के बारे में मेरी समझ विकसित होती रही है। यह तब बहुत महत्वपूर्ण हो गया जब मुझे और मेरी पत्नी को गहन चेतना और आत्मा के बारे में कुछ परामर्श की आवश्यकता थी। एनिग्राम ने हमारी आस्था और हमारी ताकत को प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ाया। मुझे यह ज्ञान बहुत अच्छा लगा क्योंकि इसने मुझे व्यक्तित्व से आत्मा तक पहुँचाया है। यह आत्मा के गुणों को समझने में मदद करता है जो व्यक्तित्व की तुलना में कहीं अधिक गहन और आवश्यक हैं।
हमारे संस्थान में शिक्षण साल में तीन अलग-अलग सप्ताहांतों पर गुरुवार से शनिवार तक होता है। गहन कार्यक्रमों के बीच पठन सत्र और वीडियो शिक्षण दिए जाते हैं। यह कार्यक्रम सुनने में शायद बहुत छोटा लगे लेकिन इसके सभी सत्र जानकारी से भरपूर होते हैं। इसीलिए उन्हें इंटेंसिव यानी गहन कहा जाता है। ये गहन व्याख्यान और पारस्परिक संवाद के अभ्यास होते हैं जैसे नाटक, जिनमें व्यक्तित्व और आत्मा को समझने का प्रयास किया जाता है।
प्रत्येक गहन कार्यक्रम इनमें से किसी एक पर केंद्रित होता है - हृदय केंद्र, मनस केंद्र या शरीर केंद्र। और हमारे अभ्यास, शिक्षाएँ और सामूहिक कार्य प्रत्येक विषय से संबंधित होते हैं। हमारे यहाँ पूरे अमेरिका से लोग आते हैं। अब हमारे कार्यक्रम ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं और अंतर्राष्ट्रीय छात्र ऑनलाइन प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकते हैं। कृपया www.theicb.info देखें, जिसमें वर्तमान कार्यक्रम और सम्मेलनों के बारे में जानकारी उपलब्ध है।
एनिग्राम ने हमारी आस्था और हमारी ताकत को प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ाया। मुझे यह ज्ञान बहुत अच्छा लगा क्योंकि इसने मुझे व्यक्तित्व से आत्मा तक पहुँचाया है। यह आत्मा के गुणों को समझने में मदद करता है जो व्यक्तित्व की तुलना में कहीं अधिक गहन और आवश्यक हैं।

कभी-कभी बचपन में हमने जिस आस्था का अनुभव किया था, वह पुरानी पड़ सकती है और सामान्य बात लग सकती है। फिर भी, भाषा चाहे कितनी भी पुरानी क्यों न हो, वह फिर भी शाश्वत सत्य पर आधारित होती है। चेतना की भाषा हमें अपनी आस्था के बारे में फिर से सोचने, उसे नई दृष्टि से देखने और नए तरीकों से उसकी सच्चाई का अनुभव करने की क्षमता देती है। हम जो अद्भुत सिद्धांत सिखाते हैं, उनमें से एक यह है कि हमने एक आत्मा के रूप में जीवन शुरू किया और हम कभी एक बच्चे थे, इसलिए हम उसे अपनी बाल-आत्मा कहते हैं। वह बाल-आत्मा मासूम, कोमल और संवेदनशील होती है और केवल प्यार देना व प्राप्त करना जानती है।
वही बच्चा आप में है और मुझमें भी है लेकिन हम आमतौर पर उस तक नहीं पहुँच पाते क्योंकि हमारा अहंकार हमारे अंदर के उस कोमल, संवेदनशील छोटे से अस्तित्व को ढक लेता है। वही आंतरिक बच्चा हमारी असली पहचान है, हमारी आत्मा की पहचान है। इसमें वे सभी गुण हैं जिन्हें प्रकट करने के लिए हमारी आत्मा को स्वाभाविक रूप से यहाँ लाया गया था। हमारी बाल-आत्मा पर अहंकार का बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। उस बाल-आत्मा के पास वापस जाना एक प्रभावशाली अनुभव है क्योंकि तब हम अपनी आत्मा के सीधे संपर्क में होते हैं। हम अपनी बाल-आत्मा के पास लौटने और फिर से उसमें पुनः निवास करने के तरीके सिखाते हैं।
प्रश्न - आपने कुछ बहुत गहन अवधारणाओं का उल्लेख किया है, जैसे ‘बाल-आत्मा’ और हमारा वास्तविक सत्व। जो पहली बार इन विचारों के बारे में पढ़ रहे हैं, उन पाठकों को आप क्या कहेंगे - आत्मा के सच्चे स्वरूप से फिर से जुड़ने की दिशा में पहला कदम क्या है?
जोज़ेफ़ - हम ‘आत्म-स्मरण’ सिखाते हैं, जो आध्यात्मिक गुरु जॉर्ज गुर्जिफ़ की शिक्षा है। आत्म-स्मरण अपने मूल और सच्चे स्वरूप में वापस जाने और उस पवित्र पहचान के साथ फिर से जुड़ने की प्रक्रिया है। हम अपने सत्व का ‘स्मरण’ करते हैं और यह जानने का प्रयास करते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं। हम आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव करने और अपनी बाल-आत्मा को साकार करने के लिए बाल-आत्मा का ध्यान करते हैं। लोग कहते हैं, “मैं भूल गया था कि मैं कितना सुंदर था। मैं अपनी नन्ही बाल-आत्मा की तस्वीर की आँखों में देखता हूँ।” लोग 2, 3, या 4 साल की उम्र की अपनी एक तस्वीर लाकर उस छोटे बच्चे की आँखों में देखते हैं। वे रोते हैं क्योंकि वे अपने शुद्ध, सच्चे स्वरूप के संपर्क में आ जाते हैं।
कोई कह सकता है, “मेरा बचपन बहुत ही परेशानी भरा था। यदि मैं अपने बचपन के बारे में सोचता हूँ तो मैं अपनी मासूमियत और कोमलता को नहीं देख पाता हूँ क्योंकि बचपन में मेरे साथ अप्रिय घटनाएँ घटी थीं।”
मैं उनसे कहता हूँ, “उस छोटे बच्चे में ऐसा क्या था जो जानता था कि उसके साथ क्या हो रहा है? ऐसा क्या था जो समझता था कि यह अच्छा नहीं था, यह गलत था?”
ऐसे सवालों के जवाब हमें अपनी आत्मा के गुणों के बारे में बहुत सारी जानकारी देते हैं।
अमेरिका में एनिग्राम के महान शिक्षक - ए.एच. अल्मास, सैंड्रा मैत्री आदि - सभी ईश्वर के स्वरूप हैं, जैसे हीरे के अनेक पक्ष होते हैं। मैं रिधवान स्कूल से जुड़ा हुआ हूँ। ए.एच. अल्मास और उनके शिक्षकों के सिद्धांतों में से एक यह है कि हम दैवीय पवित्रता का ही एक पक्ष हैं और इसके नौ प्रमुख पक्ष हैं। ये नौ पक्ष तीन के नियम पर आधारित हैं। शिक्षा यह बताती है कि शैशवावस्था यानी बाल-आत्मा के वर्षों के बाद हम उस पक्ष से संपर्क खो देते हैं जिसके रूप में हमें बनाया गया था। आपने और मैंने, नौ ऊर्जावर्धकों में से एक के रूप में, दुनिया में आगे बढ़ने के लिए अपनी राह बदल ली। हम अपनी आत्मा से अहंकार की राह पर चले गए। एनिग्राम हमें आत्मा की ओर लौटने में मदद करने के लिए एक नक्शा है।
आप नौ आत्मा ऊर्जाओं में से एक के साथ पैदा हुए थे, जिसे मैं आत्मा का प्रकार कहता हूँ। मैंने अपनी नई पुस्तक, ‘नो यॉर सोल, जर्नीइंग विद द एनिग्राम’ में उन नौ आत्मा के प्रकारों पर चर्चा की है।
आत्मा का पहला प्रकार है - पवित्र धार्मिकता, जो ईश्वर के साथ तालमेल में रहती है। दूसरा है - पवित्र, दयापूर्ण उदारता। तीसरा है - पवित्र कर्म यानी कर्म जो स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि सभी की भलाई के लिए हो। चौथा है - पवित्र रचनात्मकता यानी किसी भी समस्या को रचनात्मक मन से देख पाना क्योंकि इसके माध्यम से दैवीय रचनात्मकता साफ़ दिखाई देती है। पाँचवाँ है - पवित्र ज्ञान जो दिव्य ज्ञान के प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त होता है। छठा है - पवित्र रिश्ता जिसके कारण हम समझते हैं कि जब समाज में एक जैसे हृदय के लोग हों तो हमारे अकेले रहने से बेहतर है मिलजुलकर रहना। सातवाँ है - पवित्र आनंद जो गहरा व स्थायी आनंद है जिससे हर परिस्थिति में संतुलन बना रहता है। आठवाँ है - पवित्र शक्ति, विनम्रता और सच्चाई की शक्ति। नौवाँ है - पवित्र प्रेमपूर्ण शांति जो अन्य सभी की जननी है।

पूर्णिमा - धन्यवाद! हार्टफुलनेस के साथ आपका जुड़ाव कैसा रहा है?
जोज़ेफ़ - पिछले साल मेरी पुस्तक ‘बिकमिंग कॉन्शियस’ दाजी के पास पहुँच गई थी। बाद में मैं दाजी से मिला और हमने पुस्तक पर और इस बात पर चर्चा की कि यह कैसे हार्टफुलनेस के साथ मेल खाती है। उन्हें जो बातें सबसे ज़्यादा पसंद आईं, उनमें से एक है “चेतना की श्रृंखला”, जो पुस्तक की शुरुआत में है। इसका संबंध अहंकार और पर्यावरण से है। अनियंत्रित अहंकार के कारण पर्यावरण नष्ट हो रहा है। दूसरी ओर आत्मा, हमारे सच्चे स्वरूप के रूप में हमारी पृथ्वी को संरक्षित करने के लिए प्राकृतिक नियमों के अनुसार काम करती है। मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि मैंने दाजी के साथ समय बिताया। उनके साथ रहने, उनसे सीखने और हमारी समान बातों पर चर्चा करने से मेरा जीवन ही बदल गया।
आपने और मैंने, नौ ऊर्जावर्धकों में से एक के रूप में, दुनिया में आगे बढ़ने के लिए अपनी राह बदल ली। हम अपनी आत्मा से अहंकार की राह पर चले गए। एनिग्राम हमें आत्मा की ओर लौटने में मदद करने के लिए एक नक्शा है।
हार्टफुलनेस ध्यान सीखने के बाद लार्क और मैंने इसे अपने संस्थान के पाठ्यक्रम का हिस्सा बना लिया है। हमारे संस्थान में ध्यान कराने के लिए एक प्रशिक्षक भी आते हैं। मैं हार्टफुलनेस से बहुत प्रभावित हूँ और इसे अपने लिए जीने का एक तरीका मानता हूँ। दाजी के साथ जुड़ना मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है।

जोज़ेफ़ हॉवेल
डॉ. हॉवेल एक नैदानिक मनोवैज्ञानिक और अमेरिका के अटलांटा शहर के पास ‘द इंस्टीट्यूट फ़ॉर कॉन्शियस बीइंग’ के संस्थापक हैं... और पढ़ें
