सरला उपाध्यायएक कॉलेज प्रोफ़ेसर के रूप मेंअपना अनुभव बताते हुए झुंझलाहट को उपयोगी और दयालु तरीके से प्रबंधित करने के लिए एक कारगर मॉडल सुझा रही हैं। अब उन्होंने अपनी ‘झुंझलाहट’ को कम कर लिया है जिससे उनका और उनके आस-पास के लोगों का जीवन अधिक शांतमय हो गया है।

 

ल्पना करें कि आप सुबह हल्की बारिश के बाद की धूप का आनंद लेते हुए सड़क पर प्रसन्नचित्त होकर चल रहे हैं। लेकिन तभी आपका पैर पटरी पर कीचड़ में पड़ जाता है और आप पूरा दिन हर चीज़ से चिढ़े रहते हैं। या आप ठीक समय पर कीचड़ को देख लेते हैं और उससे बचकर आगे चलते रहते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि चिढ़ जाना या शांत रहना अपनी इच्छा पर निर्भर करता है।

आइए बिलकुल शुरुआत से शुरू करें,” यह एक घिसी-पिटी बात है जो आपको खिझा सकती है। इसी तरह “अंतिम लेकिन कम महत्वपूर्ण नहीं ..…” कहने के बाद एक लंबा भाषण भी खिझाऊ हो सकता है। कई बार मामूली या बेतुकी बातें भी हमें झुंझला देती हैं, जैसे दीवार पर कीलों से खरोंचने की आवाज़, धातु के चम्मच से प्लेट को खुरचने की आवाज़। यदि इंटरनेट धीमा हो या व्यस्त समय में ट्रैफ़िक अधिक होने के कारण हमें रुकना पड़े, तब भी हमें झुंझलाहट हो सकती है। इनके अतिरिक्त, हमारी झुंझलाहट के और भी कई कारण हो सकते हैं - सार्वजनिक स्थानों पर लोगों का मोबाइल फ़ोन पर ऊँची आवाज़ में बात करना, अव्यवस्थित घर या कार्यस्थल - यह सूची बहुत लंबी है।

मेरे एक दोस्त को किताब के पन्नों के कोनों को मोड़कर पाठक की जगह चिह्नित करना पसंद नहीं है। इस्तेमाल किए गए चम्मच और कप को रसोई के सिंक में रखने के बजाय रसोई के काउंटर पर छोड़ने से मेरी बहन खीज जाती है। यदि कोई मेहमान अपने बाहर के जूते पहनकर मेरे भाई के कमरे में आ जाते हैं तो वह अपनी नाराज़गी छुपाने के लिए दूसरी तरफ़ देखने लगता है। इस बात पर ध्यान देना दिलचस्प है कि ये छोटी-छोटी बातें, जिन पर लोग सामान्यतः नाराज़ हो जाते हैं, बर्दाश्त की जा सकती हैं, लेकिन वे सब एकत्रित होकर ऐसा बोझ बन जाती हैं जो अक्सर मन की शांति में बाधा डालती हैं।


आप झुंझलाहट का कारण समझने के लिए कुछ पल लेकर थोड़ी दयालुता और सोच-विचार के साथ स्थिति का मूल्यांकन भी कर सकते हैं।


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कभी-कभी परिस्थितियाँ अंदर के कोई नाज़ुक से तार छेड़ देती हैं जिससे मन में अत्यधिक झुंझलाहट पैदा हो जाती है, जैसे कि पास वाले घर में हो रही पार्टी के दौरान ऊँचा संगीत बजना या सड़क पर किसी का लगातार हॉर्न बजाते रहना। स्थिति तब और गंभीर हो सकती है जब झुंझलाहट चिड़चिड़ाहट या गुस्सा बन जाए। गुस्सा घर पर परिवार के सदस्यों के बीच या दफ़्तर में सहकर्मियों के बीच सामंजस्य बिगाड़ देता है।

कई वर्ष पहले, एक शिक्षक के रूप में काम करते हुए मैंने पाया कि मेरा अपना ‘झुंझलाहट घटक’ बहुत अधिक था यानी मैं बहुत आसानी से खीज जाती थी। एक अव्यवस्थित कक्षा - साफ़ न किया गया ब्लैकबोर्ड, फ़र्नीचर पर धूल - मेरी झुंझलाहट को शुरू करने के लिए पर्याप्त कारक थे। मैंने इस बात पर भी गौर किया कि इसका मेरे छात्रों पर भी प्रभाव पड़ता था। इस प्रत्यक्ष अस्त-व्यस्तता को ठीक करने में 10 से 15 मिनट लगते थे, जिसमें हमारी बहुमूल्य ऊर्जा और कार्य-क्षमता चली जाती थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे काम शुरू होने से पहले ही कुछ हद तक हमारा जुड़ाव, शांति और एकाग्रता चली जाती थी।

जब आप झुंझलाहट की कगार पर होते हैं, जो आपकी शांति को भंग कर सकती है, तब आप क्या करते हैं? एक आसान तरीका यह है कि आप परिस्थिति से हार मानकर आवेगपूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया दें। या आप उसे अनदेखा करके उससे अलग हटने की कोशिश कर सकते हैं। आप झुंझलाहट का कारण समझने के लिए कुछ पल लेकर थोड़ी दयालुता और सोच-विचार के साथ स्थिति का मूल्यांकन भी कर सकते हैं।


हार्टफुलनेस के पूर्ण अभ्यास ने मुझे यह समझने में मदद की कि मेरे लिए क्या उपयोगी था और मुझे सामान्यतः किस तरह की बातों पर झुंझलाहटें होती थीं जिन्हें प्रयास से छोड़ा जा सकता था।


यह मुझे बुद्ध और कुख्यात डाकू अंगुलिमाल की कहानी याद दिलाता है। अंगुलिमाल उस समय के सबसे खूंखार लुटेरों में से एक था। वह यात्रियों को लूटता था और फिर उनके अंगूठे काटकर उन्हें पुरस्कार के रूप में अपने हार में पहन लेता था जिसमें उसे बड़ा मज़ा आता था। उसने बुद्ध के बारे में सुना था और वह उन दयालु पुरुष से मिलने का इंतज़ार कर रहा था ताकि उन्हें चुनौती देकर परास्त कर सके।

जब बुद्ध जंगल से गुज़र रहे थे तब अंगुलिमाल ने मुस्कराते हुए अपने कठोर शब्दों से उन पर हमला किया, उनका मज़ाक उड़ाया और हर कदम पर उन्हें धमकाया। बुद्ध ने उसे अनदेखा किया और बुरा नहीं माना। उन्होंने अपमान पर ध्यान नहीं दिया। अंततः उनके आत्मसंयमी और दयालु स्वभाव ने डाकू के कठोर दिल को पिघला दिया। कृपालु बुद्ध के प्रेमपूर्ण व्यवहार से अंगुलिमाल के जीवन में एक बड़ा बदलाव आ गया। बुद्ध ने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार किया और उसका नाम बदलकर आनंद रखा। यह नाम एक आनंदमय स्थिति का प्रतीक है।

बुद्ध और आनंद की कहानी हमें एक सकारात्मक दिशा देती है कि हम खिझाऊ स्थितियों में कैसे सबसे अच्छा काम कर सकते हैं -

  • सबसे पहले, झुंझलाहट का कारण पता करें। हमारे सांसारिक जीवन में यह एक अनुभव या उसका प्रभाव हो सकता है जो पहले से ही मन में बैठा हुआ है। झुंझलाहट के कारण को पूरी तरह से जानने के लिए प्रतिक्रिया करने से पहले एक कदम पीछे हटें या थोड़ा रुकें।
  • कारण पर ध्यान देकर इसकी उत्पत्ति को स्वीकार करना दूसरा कदम है। झुंझलाहट भीतर से भी उत्पन्न हो सकती है या किसी बाहरी कारण से भी हो सकती है।
  • तीसरा कदम कारण को स्वीकार करना है। स्वीकार करने से व्यक्ति एक प्रकार से परिस्थिति की ज़िम्मेदारी लेने लगता है और उसमें उस परिस्थिति को संभालने की तत्परता आ जाती है, क्योंकि लंबे समय तक परेशान रहना सुखद नहीं होता।
  • इसके बाद झुंझलाहट को कम करने के लिए उपयुक्त कार्रवाई करने के अंतिम चरण का पालन करना आसान हो जाता है।

अपनी कक्षा की कहानी पर वापस जाते हुए, मैंने इन चरणों का पालन कई बार किया - अपनी झुंझलाहट के कारणों का पता लगाना और नाराज़ होने के परिणामों को मान लेना व स्वीकार करना। पहले तो मैं एक तरह से आत्मरक्षा करती थी जो स्थिति की ज़िम्मेदारी लेने और परिवर्तनों को स्वीकार करने के विरुद्ध था। मैंने उस समय हार्टफुलनेस अभ्यास शुरू ही किया था। मैं खुद को समझने के लिए थोड़ा रुककर कई बार गहरी साँस लेती थी। हार्टफुलनेस के पूर्ण अभ्यास ने मुझे यह समझने में मदद की कि मेरे लिए क्या उपयोगी था और मुझे सामान्यतः किस तरह की बातों पर झुंझलाहटें होती थीं जिन्हें प्रयास से छोड़ा जा सकता था। मैंने उन पहलुओं को, जो मुझ पर दबाव डाल रहे थे, परमात्मा को समर्पित करना सीखा।

इसलिए मेरी झुंझलाहट का घटक एक साध्य स्तर पर तो आ ही गया है। मैं अब यह भी समझती हूँ कि इस दुनिया में प्रगति करने के लिए कुछ हद तक झुंझलाहट की आवश्यकता होती है। लेकिन यह तभी बेहतर काम करती है अगर हम दया और करुणा के साथ काम करें ताकि इस प्रयास में सभी को एक साथ लिया जाए।


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सरला उपाध्याय

सरला उपाध्याय

सरला पहले बैंगलोर विश्वविद्यालय में एक व्यावसायिक इंजीनियरिंग कॉलेज में काम करती थीं, और पढ़ें

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