अंधकार लाक्षणिक रूप से और सच में यह प्रकट कर देता है कि हम कितने भटके हुए हैं। जब यह डर मन में बैठ जाता है कि शायद हम रास्ते से बहुत दूर भटक गए हैं तभी कोई प्रकट होता है। मेरे साथ ऐसा पहली बार एक पहाड़ पर हुआ।

हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी और बर्फ़ से ढकी धौलाधार पर्वतमाला के बीच त्रिउंद ट्रेक अपने लुभावने दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। यह थोड़ा कठिन है। हमारी योजना थी कि हम कुछ घंटों की चढ़ाई चढ़ने के बाद ऊपर शिखर से मनोरम दृश्य देखकर सूर्यास्त तक मैदानी क्षेत्र में लौट आएँगे।

वर्ष 2022 की गर्मियों में मैं और मेरे पति इस सुंदर ट्रेक पर निकले। चढ़ाई बहुत मनोरम थी और शिखर पर पहुँचकर बहुत ही मनमोहक दृश्य देखने को मिला। हम वहाँ कुछ अधिक देर तक रुक गए और फिर उतरना शुरू किया। पहाड़ों में समय इतनी जल्दी बीत जाता है कि उसका ध्यान ही नहीं रह पाता। ऊँची-ऊँची चोटियों की परछाइयाँ भी लंबी होती जा रही थीं और ठंडी पहाड़ी हवा हमारे फेफड़ों में भरती जा रही थी। लेकिन जैसे-जैसे सूरज पहाड़ियों के पीछे डूबता गया रास्ते की ताल परिवर्तित हो गई। जो कभी शांत लग रहा था वह अब अपरिचित सा हो गया। रास्ता अंधेरे में धुंधलाता गया और बेचैनी छाने लगी। हमें जानवरों का गुर्राना, कीड़ों की भिनभिनाहट और कभी-कभार साँप की सरसराहट सुनाई देने लगी।

तब तक पूरा अंधेरा हो चुका था। हमने अपने-अपने फ़ोन की टॉर्च जलाई तो पाया कि दोनों की बैटरी लगभग खत्म हो चुकी थी। पगडंडी ऊबड़-खाबड़ व संकरी थी और उस पर चलना मुश्किल होता जा रहा था।

मुझे लगा कि मैंने कुछ देखा - चमकता हुआ सा, मानो पेड़ों के पीछे से दो आँखें मंद-मंद चमक रही हों। मैं अंदाज़ा नहीं लगाना चाहती थी। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने पलकें झपकाईं और वह चमक गायब हो गई। मैंने सोचा शायद वह मेरी कल्पना थी।

उस क्षण में मैंने अपने भीतर कुछ महसूस किया। मन में एक मौन प्रार्थना उठी। वह पुकार सुरक्षा या मदद के लिए नहीं थी। वह शब्दों से परे थी। जब सारे विकल्प खत्म हो जाते हैं तब हम मदद नहीं माँगते क्योंकि मदद तार्किक होती है। हम तर्क से भी परे कुछ माँगते हैं। हम एक चमत्कार की गुहार लगाते हैं। हालाँकि ‘स्टार ट्रेक’ के स्पॉक कहते हैं, “चमत्कार जैसी कोई चीज़ ही नहीं होती।”

लेकिन तभी चमत्कार की ही भाँति अचानक कोई प्रकट हुआ।

तुम लोग इस समय यहाँ क्या कर रहे हो?” उसने हमारी तरफ़ बढ़ते हुए पूछा मानो वह पहले से ही वहाँ था।

मेरे पति ने कहा, “हमें समय का पता ही नहीं चला और शायद हम रास्ता भी भूल गए हैं।”

उसने बिना किसी आश्चर्य के सिर हिलाया। “मैं पहाड़ी गाइड हूँ। मेरा समूह शिखर पर डेरा डाले हुए है। मैं नीचे जा रहा हूँ। आप चाहें तो मेरे साथ आ सकते हैं।”

वह सब अवास्तविक लग रहा था। एक क्षण पहले हम असुरक्षित महसूस कर रहे थे। अगले ही पल हमारे सामने वह गाइड था। वह शांत, स्थिर और पूरी तरह से सहज था। उसकी उपस्थिति ने माहौल बदल दिया। मेरा हृदय शांत हो गया।

वह अगले कुछ घंटों तक त्रिउंड से आगे इंद्रहार दर्रे जैसे अन्य ट्रेक और रास्तों की कहानियाँ सुनाते हुए हमारे साथ चलता रहा। अंततः हम बेस कैंप तक पहुँच गए। हालाँकि रात काफ़ी हो चुकी थी लेकिन एक चाय की दुकान उस समय भी खुली हुई थी। हमने थोड़ा पानी पिया ताकि हम सहज हो सकें। उसने पूछा कि हमारी कार कहाँ है फिर थोड़ी देर बातचीत की और बस अलविदा कहकर चुपचाप गायब हो गया।

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हमने उसका नाम तक नहीं पूछा था। हमें यह भी याद नहीं था कि हमने उसे कैसे संबोधित किया था। मुझे केवल भय का वह क्षण, मौन प्रार्थना और उसके तुरंत बाद आया वह आदमी याद था।

जब मार्गदर्शन उपस्थिति बन जाता है

मैं अक्सर इस अनुभव के बारे में सोचती हूँ। लेकिन मैं इसे किसी दिलचस्प किस्से या कहानी का नाम नहीं देना चाहती। वह इतना वास्तविक था कि उसे सिर्फ़ एक अनुभव नहीं कहा जा सकता। उसमें एक सार्थकता थी जो समझ से नहीं बल्कि पहचानने से आई थी, मानो मेरे भीतर का कोई हिस्सा पहले से ही जानता था कि वह संयोग नहीं था। वह एक ऐसा क्षण था जो समय से परे था और चुपचाप मेरा हिस्सा बन गया था। वह समय, स्थान या किसी व्यक्ति से संबंधित नहीं था।

ब्रह्मांड ने मेरे द्वारा घंटों पहले भेजे गए एक संकेत का जवाब दे दिया था। लेकिन जो भाव मेरे साथ रह गया, वह यह था कि मैं हमेशा से ही दिव्य के संपर्क में थी। ब्रह्मांड को उत्तर देने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि कोई चीज़ खुद को जवाब कैसे दे सकती है? क्या आप खुद को जवाब देंगे?

हम अक्सर रूमी के उद्धरण सुनते हैं जिन्होंने कहा था, “तुम आनंदमय गति में ब्रह्मांड हो” या कबीर के उद्धरण सुनते हैं, जिसमें उन्होंने उस बूँद के बारे में लिखा जो सागर में विलीन होकर सागर बन जाती है। मैंने कभी इन्हें ऊँचे आध्यात्मिक रूपकों के तौर पर समझा था। लेकिन उस क्षण मैंने जाना कि उनके वे उद्धरण सिर्फ़ कविताएँ नहीं थीं। वे किसी वास्तविक चीज़ की ओर इशारा कर रहे थे। मैं ही ब्रह्मांड हूँ। उसे जवाब देने की ज़रूरत नहीं थी। उसने बस खुद को प्रकट कर दिया था।

 

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वह एक ऐसा क्षण था जो समय से परे था और चुपचाप मेरा हिस्सा बन गया था। वह समयस्थान या किसी व्यक्ति से संबंधित नहीं था।


मेरे आध्यात्मिक जीवन में मुझे अपने पिता, माता, पति, गुरुजनों और यहाँ तक कि अपने बेटे के माध्यम से भी मार्गदर्शन मिला है। और कभी-कभी इस पर्वतारोही गाइड जैसे अजनबियों के माध्यम से भी। लेकिन उस क्षण मुझे लगा कि वह सब एक ही व्यवस्था का हिस्सा था – एक वार्तालाप, एक संचार, मेरा अपने उच्चतर ‘स्व’ के साथ संवाद।

श्री पार्थसारथी राजगोपालाचारी जी की पुस्तक, ‘मानव विकास में सद्गुरु की भूमिका’ में एक पंक्ति है जो बहुत ही सरलता से कुछ व्यक्त करती है -
यदि सत्य से व स्वयं आध्यात्मिकता से भी अधिक महत्वपूर्ण कोई चीज़ है तो वह गुरु ही हैं जो हमें वह प्रदान करते हैं।”
- वोरॉफ़, 28 जून 1986sqaऔर यह गुरु, यह मार्गदर्शक शक्ति, स्वयं ब्रह्मांड है जो असंख्य माध्यमों से संवाद करता है। हम प्रायः आध्यात्मिक मार्गदर्शक को एक पूजनीय व्यक्ति के रूप में देखते हैं जो सिखाते हैं, साझा करते हैं और नेतृत्व करते हैं। लेकिन हार्टफुलनेस पद्धति में मार्गदर्शक केवल एक शिक्षक या सलाहकार नहीं हैं। उनकी भूमिका और भी गहरी है। यह एक आंतरिक संचार है, सूक्ष्म, मौन और अक्सर वर्णन से परे, जो भीतर किसी चीज़ को प्रकाशित करता है। मार्गदर्शक आपको कोई नक्शा नहीं देते। वे आपको अपना दिशासूचक यंत्र खोजने में मदद करते हैं।

उस रात पहाड़ पर हमारे पथप्रदर्शक ने निश्चित रूप से हमें रास्ता दिखाया। लेकिन वे हमारे साथ भी चले, पगडंडी पर चलते गए और हमें भी ऐसा करने के लिए कहा। एक सच्चा आध्यात्मिक मार्गदर्शक यही करता है। उनकी मदद दिखावटी या प्रत्यक्ष नहीं होती। कभी-कभी यह उलझन में शांति का एहसास होता है। किसी चीज़ को देखने के हमारे नज़रिए में बदलाव आ जाता है। ऐसा वक्त शांतिपूर्ण स्पष्टता से परिपूर्ण होता है। लेकिन यह उससे कहीं बढ़कर है।

इसे पाने के लिए पहला कदम हमें उठाना पड़ता है, अक्सर बिना यह जाने कि आगे क्या होगा। विश्वास की शुरुआत निश्चितता से नहीं होती। इसकी शुरुआत तब होती है जब हम इच्छुक होते हैं।

जो बात मुझे सबसे ज़्यादा याद रही, वह थी उस गाइड का जाना - बिना किसी औपचारिकता के, बिना कुछ माँगे। और यह मुझे फिर से मार्गदर्शक की भूमिका की याद दिलाता है। सच्चे गुरु लोगों को निर्भर नहीं बनाते बल्कि वे तब तक हमारे साथ चलते हैं जब तक हम खुद चलने लायक नहीं हो जाते और फिर चुपचाप यह प्रकट करते हुए पीछे हट जाते हैं कि वे हमारे ही अस्तित्व का हिस्सा हैं।

जीवन, जैसा गुरु ने चाहा था

पहाड़ी रास्तों की तरह आध्यात्मिक यात्राओं का अपना अनोखा रास्ता होता है। जिस प्रकार पहाड़ी रास्तों में लुभावने दृश्य, कठिन चढ़ाई, घाटियाँ और अनपेक्षित मोड़ होते हैं उसी प्रकार आध्यात्मिक यात्रा में भी कई तरह के उतार-चढ़ाव होते हैं। अपने साथ मार्गदर्शक होने का तात्पर्य यह नहीं है कि हम अक्षम हैं। इसका मतलब है कि हम अधिक शालीनता के साथ आगे बढ़ते हैं और कम ठोकरें खाते हैं। समय बीतने के साथ बाह्य मार्गदर्शन आंतरिक बन जाता है। पहले हमें जिस आश्वासन की खोज थी अब वह आंतरिक शक्ति बन जाता है। जब चीज़ें अनिश्चित होती हैं तब भी हमें बोध होने लगता है कि हमें किस दिशा में जाना है। सच्चा मार्गदर्शन हमारा बचाव नहीं करता बल्कि हमें रूपांतरित करता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन स्वयं में एक तरह का पाठ्यक्रम है। हर क्षण, हर मौन, हर अनिश्चितता हमें कुछ सिखाती है।

शायद यही मार्गदर्शक का असली उद्देश्य होता है कि वे हमें कठिनाइयों से बचाएँ नहीं, बल्कि कठिनाइयों के माध्यम से हमारे भीतर कुछ जागृत करें। रास्ता आँख मूँदकर चलने के लिए नहीं बनाया जाता है बल्कि इसे हमारी चलने की इच्छा के अनुसार कदम दर कदम बनाया जाता है। इस तरह जीवन शिक्षक और मार्ग दोनों ही बन जाता है। हार्टफुलनेस में मार्गदर्शक, स्पष्टता और प्रेमपूर्ण उपस्थिति हैं, जो आपके साथ चलती है, आपको प्रकाश दिखाती है जब तक कि आप यह नहीं महसूस कर लेते कि आप स्वयं ही प्रकाश हैं।


मार्गदर्शक का असली उद्देश्य होता है कि वे हमें कठिनाइयों से बचाएँ नहींबल्कि कठिनाइयों के माध्यम से हमारे भीतर कुछ जागृत करें।


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जब मैंने अपनी किशोरावस्था में पहली बार ध्यान करना शुरू किया तब मुझे कुछ खास महसूस नहीं हुआ। हार्टफुलनेस की शिक्षाएँ दिलचस्प और प्रेरणादायक भी थीं लेकिन मुझे कोई विशेष परिवर्तन नहीं महसूस हुआ। उस समय मुझे इस बात की कोई समझ नहीं थी कि मैं क्या प्राप्त कर रही थी या मैं कर क्या रही थी।

बाद में जब जीवन की परिस्थितियाँ और जटिल होती गईं तब मुझे समझ आने लगा। मैंने उस उपहार को पहचाना जो मेरे पास था। मैंने आध्यात्मिक साधना की शरण ली। हम सुगम रास्तों पर या लुभावने दृश्यों को निहारते समय पथप्रदर्शकों के महत्व को नहीं समझते। हम उन्हें तब ढूँढते हैं जब रास्ता खो जाता है और जब टॉर्च की बैटरी समाप्त हो जाती है यानी जब कठिनाइयाँ सामने आती हैं।

हार्टफुलनेस साधना और इसे प्रदान करने वाले आध्यात्मिक मार्गदर्शक, दोनों ही इतने सरल हैं कि हमें आसानी से भ्रम हो सकता है – कोई भव्य अनुष्ठान नहीं और कोई वायदा नहीं। लेकिन समय के साथ भीतर कुछ बदलने लगता है। अंततः जिस रास्ते पर हम कभी अंधेरे में चलने से डरते थे अब उसी रास्ते पर हम सहज रूप से चलने लगते हैं जो हमारे आंतरिक प्रकाश से प्रकाशित होता है। पीछे मुड़कर देखती हूँ तो मुझे लगता है कि वह पर्वतारोही पथप्रदर्शक उसी क्षण का एक हिस्सा था। जिस अंधेरे ने मुझे डरा दिया था वह उसी अंधकार से निकलकर आया था। वह तब प्रकट हुआ जब मैं उससे मिलने के लिए तैयार थी। उस रात ईश्वर की कृपा ने एक अजनबी का रूप धारण किया जिसके हाथ में टॉर्च थी।

 


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पूर्णिमा रामकृष्णन

पूर्णिमा रामकृष्णन

पूर्णिमा संयुक्त राष्ट्र पुरस्कार विजेता लेखिका और ब्लॉगर हैं। उन्होंने ‘ब्लॉग एच ई आर इंटरनेशनल एक्टिविस्ट’ अवार्डऔर पढ़ें

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