इस लेख में विक्टर कन्नन यह समझाते हैं कि आध्यात्मिक साधक क्यों ज़्यादा तनावग्रस्त महसूस करते हैं और वही अशांति कैसे आंतरिक रूपांतरण और शांति का ज़रिया बन जाती है।

र इंसान शांति और सुख पाना चाहता है। उसकी यह खोज बहुपक्षीय प्रेरणा है जिसकी गहरी जड़ें प्राचीन ज्ञान और आधुनिक समझ दोनों में निहित हैं। सभी परंपराओं के धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह खोज ईश्वर से जुड़ने और धर्म के अनुसार जीने का मार्ग है। उनके अनुसार असली शांति का मतलब संघर्ष का अभाव नहीं है बल्कि ज़िंदगी और उसके उद्देश्य की गहरी समझ से प्राप्त आंतरिक अवस्था है। यह शांति आस्था, क्षमा, दूसरों की सेवा करने और एक नैतिक उद्देश्य के पालन से मिलती है।

यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण वैज्ञानिक निष्कर्षों से बहुत मेल खाता है। वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि संतोष और खुशी की भावनाओं के साथ कुछ विशिष्ट प्रक्रियाएँ और डोपामिन व सेराटोनिन जैसे न्यूरोट्रांसमिटर्स जुड़े हुए हैं। मनोविज्ञान भी शास्त्रों में समुदाय और जीवन की सार्थकता पर दिए गए बल का समर्थन करता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मज़बूत सामाजिक संबंध, उद्देश्य की भावना और कृतज्ञता व सजगता (माइंडफुलनेस) का अभ्यास दीर्घकालीन स्वस्थ जीवन और भावनात्मक दृढ़ता के सटीक सूचक हैं।

चाहे हम आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें या फिर विकासवादी मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से, मानव समृद्धि तभी संभव है जब मानव आत्म-हित से ऊपर उठे, मज़बूत संबंध बनाए और अपने भीतर एक ऐसी मानसिकता विकसित करे जो क्षणिक व बाहरी खुशी की तुलना में आंतरिक शांति और उद्देश्य को ज़्यादा महत्व देती है। मानवता के अधिक शांतिपूर्ण और संतोषजनक जीवन प्राप्त करने के सतत प्रयास को इसी संयुक्त समझ से एक व्यापक आधार मिलता है।

शांति वास्तव में आत्मा की विशेषता है और आत्मा सदैव आराम और शांति पाने की आकांक्षा करती है। परंतु आत्मा हमारे मन, बुद्धि और अहंकार के अधीन है। और इनकी अभिव्यक्ति हमारे शरीर और इंद्रियों के माध्यम से होती है। इस तरह जीवन के तीनों पहलू - शरीर, मन और आत्मा - बहुत ही खूबसूरत और बेहतरीन तरीके से मिलजुल कर काम करते हैं।

आध्यात्मिक साधक अपने निरंतर सुधार के लिए अनुशासित व सचेत जीवन जीते हैं। साथ ही अनुभव यह कहता है कि वे अत्यधिक तनाव से गुज़रते प्रतीत होते हैं। ऐसा क्यों?

पहला कारण है, जो मन शांति पाना चाहता है वह जीवन की छोटी-छोटी बातों से भी परेशान हो जाता है जिससे तनाव का कोई भी अनुभव बड़ा लगने लगता है। ऐसा आध्यात्मिक साधना के शुरुआती दिनों में आम होता है। एक आध्यात्मिक साधक को अनुभूत तनाव पैमाने (PSS-10 - (Perceived Stress Scale) पर 6 अंक वाला तनाव भी आसानी से 8 या 9 अंक जैसा महसूस हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये लोग शांति चाहते हैं और अपने आसपास शांति की अपेक्षा रखते हैं। जब भी वे तनावग्रस्त होते हैं, वे उसके प्रभाव को ज़्यादा महसूस करते हैं। जैसे एक शांत कमरे में सुई के गिरने की आवाज़ भी स्पष्ट सुनाई देती है जबकि भीड़भाड़ वाले न्यूयॉर्क सबवे स्टेशन जैसे शोरगुल वाली जगह में एक घंटे की आवाज़ भी खो जाती है।

इसका एक और पहलू भी है। जब हम आत्म-सुधार के पथ पर चल पड़ते हैं जैसे विपासना, माइंडफुलनेस, हार्टफुलनेस आदि, तब हमारी जागरूकता बढ़ जाती है, हमारी संवेदनशीलता परिष्कृत हो जाती है और हमारे अहंकार को चुनौती मिलती है। ये तीनों परिवर्तन एक आध्यात्मिक त्रय बनाते हैं। मेरी समझ में इसी तरह से प्रकृति हमारी आध्यात्मिक प्रगति में तेज़ी लाती है। हम अपने अहंकार के परिष्करण द्वारा ही तेज़ी से प्रगति करते हैं। अहंकार का परिष्करण हमारे सचेत अभ्यास और इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने सामने आने वाली मुश्किलों का सामना किस खूबसूरती से करते हैं।

हार्टफुलनेस के हमारे पूर्व गुरु, बाबूजी और चारीजी, अक्सर हमें याद दिलाते थे, “प्रकृति हमेशा सहयोग करती है।” 40 साल पहले जब मैंने अपनी साधना शुरू की थी तब यह पंक्ति मैंने कई बार सुनी थी लेकिन मैं इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था। इसके बजाय मेरा मन अन्य कहावतों की तरफ़ मुड़ जाता था, जैसे एक तमिल मुहावरा है, “जिस अंगूठे को एक बार चोट लगती है, वह बार-बार घायल होता रहता है” या फिर एक जापानी मुहावरा, “जो कील बाहर निकलती है, उसे हथौड़े से ठोका जाता है।” हालाँकि यह अक्षरशः सच नहीं है, लेकिन हम लोगों को यह कहते सुनते हैं, “दुख हमेशा तीन की गिनती में आते हैं।” यदि ऐसा होता तो मैं कहूँगा कि यह प्रकृति की हम पर कृपा है कि जब हमारा अहंकार कमज़ोर होता है तब बड़ी जल्दी और प्रभावी ढंग से काम हो जाता है। जब हम दुख झेलते हैं और यह पूछते हैं, “मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है,” तब ऐसा लगता है मानो हम पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। लेकिन जब हम अपने दुखों को स्वीकार करना सीख लेते हैं और अपने अंदर कृतज्ञता, प्रेम व करुणा जैसे गुणों को विकसित कर लेते हैं तब हमारा अहंकार विनम्रता में रूपांतरित हो जाता है जो पूर्ण आध्यात्मिक मोक्ष प्राप्त करने का अंतिम द्वार है। तो देखा आपने, दुखों में तीव्र प्रगति की संभावना है और हमारा रूपांतरण निश्चित है, बशर्ते कि हमारा मनोभाव सही है।

हमारा असली रूपांतरण तब शुरू होता है जब हमारी चेतना का क्रमिक-विकास होता है। यह विकास हमारे जीने का ऐसा गहन तरीका है जो हमारे अस्तित्व के हर हिस्से को स्पर्श करता है। हमारी चेतना जैसे-जैसे विस्तृत होती जाती है वैसे-वैसे मन की जगह हृदय प्रधानता लेने लगता है। हमारे विचारों में भावनाओं की कोमलता और समानुभूति शामिल होने लगती हैं। हम इन भावनाओं का अनुभव पूरी संवेदनशीलता और सजगता के साथ करने लगते हैं। तब हमारे स्पंदन अलग ही तरह के होते हैं जिससे हम अपने आसपास के लोगों को शांति प्रदान करने लगते हैं।

इस अवस्था में हम भौतिक और भावनात्मक उथल-पुथल से दूर होने लगते हैं। फिर कामयाबी-नाकामयाबी, प्रशंसा-दोषारोपण, सुख-दुख हमें प्रभावित नहीं कर पाते हैं। हमारी शांत समझ और विवेक से मार्गदर्शन पाकर हमारी बुद्धि स्पष्ट होने लगती है। भावनात्मक प्रतिक्रिया और इच्छाओं के खिंचाव से प्रभावित न होकर हम जीवन को वैसा ही देख पाते हैं जैसा वह वास्तव में है।


हमारी चेतना जैसे-जैसे विस्तृत होती जाती है वैसे-वैसे मन की जगह हृदय प्रधानता लेने लगता है। हमारे विचारों में भावनाओं की कोमलता और समानुभूति शामिल होने लगती हैं। हम इन भावनाओं का अनुभव पूरी संवेदनशीलता और सजगता के साथ करने लगते हैं। तब हमारे स्पंदन अलग ही तरह के होते हैं जिससे हम अपने आसपास के लोगों को शांति प्रदान करने लगते हैं।


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अहंकार भी, जिसे अक्सर आध्यात्मिक उन्नति का दुश्मन माना जाता है, रूपांतरित होने लगता है। अब हमारा अहंकार हमें मान्यता और नियंत्रण की तरफ़ जाने के लिए प्रेरित नहीं करता। इसके विपरित वह परिपक्व होकर साहस, आश्चर्य और विनम्रता में बदल जाता है - सच्चाई का सामना करने का साहस, निरंतर सीखते रहने का आश्चर्य और यह समझने की विनम्रता कि हम किसी वृहत्तर का छोटा सा अंश हैं।

इस आंतरिक बदलाव के कारण ही कभी-कभी लगता है जैसे आध्यात्मिक साधकों को ज़्यादा संघर्ष करना पड़ता है। वे एक बहुत ही गहरे पुनर्निर्माण से गुज़र रहे होते हैं। मन और अहंकार की पुरानी संरचनाएँ खत्म हो जाती
हैं और कुछ नए के लिए जगह बनती है जो अधिक व्यापक, अधिक प्रकाशमय और अधिक शांतिपूर्ण है। जिस तरह कोई तितली अपने कोष से बाहर निकलने के लिए ज़ोर लगाती है, यह प्रक्रिया भी कुछ ऐसी ही है - स्थिर लगने वाले एक लंबे समय के बाद एक तीव्र प्रयास होता है और फिर जीवन का एक नया रूप उभरता है।

यदि आपने कोई आध्यात्मिक पथ अपना लिया है तो फिर ज़िंदगी के दिए हुए उपहारों का विरोध क्यों करें, भले ही वे दुख, तकलीफ़ या नुकसान के रूप में क्यों न हों। जैसे-जैसे आपकी जागरूकता बढ़ती जाएगी, आपके भीतर मौजूद प्रतिरोध की परतें हटनी शुरू हो जाएँगी। वक्त के साथ जो कभी अशांत लगता था, वह भी शांत लगने लगता है। संघर्ष खत्म होने लगता है और उसकी जगह ईश्वर से सतत जुड़ाव हो जाता है जिससे स्थायी शांति मिलती है। उस शांति में हमारी आत्मा आनंदित होती है और चेतना का क्रमिक-विकास तीव्रता से होता है।


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विक्टर कन्नन

विक्टर कन्नन

विक्टर हार्टफुलनेस ध्यान के एक उत्साही अभ्यासी और प्रशिक्षक हैं। व्यावसायिक क्षेत्र के मुख्य वित्तीय अधिकारी के रूप में वे दैनिक कार्यों एवं उत्तरदायित्वों में ध्यान के लाभों को भी ... और पढ़ें

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