अवस्था और दशा : आध्यात्मिक विकास के दो अक्ष
दाजी आध्यात्मिक अवस्था और आध्यात्मिक दशा के बीच के अंतर को समझाते हुए बताते हैं कि किस तरह ये दोनों साधक के आंतरिक विकास को आकार देती हैं।
आध्यात्मिक विकास दो परस्पर जुड़े अक्षों (axes) पर आगे बढ़ता है - पहला है साधक की आध्यात्मिक अवस्था का गहन होना और दूसरा है उसकी आध्यात्मिक दशा का उन्नत होना। हालाँकि सामान्य बातचीत में अक्सर इन दोनों शब्दों का प्रयोग एक-दूसरे के स्थान पर किया जाता है लेकिन ये आत्मा की मूल रूप से दो भिन्न गतियों का वर्णन करते हैं। एक का संबंध अनुभव की गहराई से है तो दूसरे का संबंध अस्तित्व के परिष्कार से है। एकसाथ मिलकर ये स्रोत की ओर बढ़ते हुए एक साधक की आंतरिक जीवनयात्रा का चित्रण करते हैं।
इस अंतर को समझना ही सहज मार्ग यानी हार्टफुलनेस पद्धति में बताई गई रूपांतरण की प्रक्रिया को समझना है।
1. आध्यात्मिक अवस्था - आंतरिक उन्नति
हार्टफुलनेस पद्धति में ‘यात्रा’ (आध्यात्मिक यात्रा) में हमारी अवस्था उस उच्चतम चक्र या सूक्ष्म बिंदु के अनुरूप होती है जिसे जागृत कर दिया (या खोल दिया) गया है और पार कर लिया गया है। जब ध्यान और प्राणाहुति के माध्यम से कोई चक्र जागृत होता है तब साधक के लिए नई संभावनाएँ यानी नई अनुभूतियाँ, संवेदनशीलता और समझने के नए तरीके उपलब्ध हो जाते हैं।
अवस्था में परिवर्तन अचानक हो सकता है, जैसे किसी द्वार का खुलना, जो भीतर की स्थिति में बदलाव को दर्शाता है। लेकिन ज़रूरी नहीं कि यह आंतरिक परिष्कार को भी दर्शाए। इसकी पूर्ण संभावना है कि साधक -
- दूसरे चक्र पर हो - फिर भी ऐसी सुंदरता, विनम्रता और संवेदनशीलता का अनुभव करे जो संरचनात्मक दृष्टि से उच्चतर चक्रों के गुण हैं या
- सातवें चक्र पर हो, जो दूसरे चक्र से बहुत आगे है, फिर भी उसका मन अत्यधिक भारीपन, स्वार्थ या अपरिपक्वता से भरा हो।
यह विसंगति इसलिए होती है क्योंकि ‘अवस्था’ आध्यात्मिक ऊँचाई का स्तर दर्शाती है, जबकि ‘दशा’ उस स्तर पर मौजू़द वातावरण को दर्शाती है।
विचार कीजिए - एक विमान जो 30,000 फुट की ऊँचाई पर पहुँच गया है वह खतरनाक वायु-विक्षोभ (turbulence) से जूझ रहा है, जबकि दूसरा विमान जो अभी 20,000 फुट पर ही है लेकिन वह शांत और स्थिर आकाश में आसानी से उड़ रहा है। कम ऊँचाई पर उड़ने वाला विमान बेहतर उड़ान की स्थितियों का आनंद लेता है, भले ही वह अपनी यात्रा में कम आगे बढ़ा हो। आप किस विमान में होना पसंद करेंगे?
प्राणाहुति किसी आंतरिक द्वार को तत्काल खोल सकती है लेकिन व्यक्ति की दशा के रूपांतरण के लिए आपको उस नए आंतरिक स्थान से गुज़ारना, उसमें स्थिर होना और उसी आधार पर जीवन जीना होता है। इन दोनों के बीच का भेद यह दर्शाता है कि क्यों दो साधक समान चक्रों को पार करने के बावजूद अपनी आंतरिक दशा की गुणवत्ता में एक-दूसरे से बहुत भिन्न हो सकते हैं।
2. आध्यात्मिक दशा - आंतरिक वातावरण की गुणवत्ता
जहाँ ‘अवस्था’ यात्रा में हमारी स्थिति या उन्नत स्तर को दर्शाती है वहीं ‘दशा’ उस अवस्था में व्यक्ति के आंतरिक अस्तित्व की गुणवत्ता, बनावट और सूक्ष्मता को दर्शाती है। यह इस बारे में नहीं है कि व्यक्ति कहाँ तक पहुँचा है बल्कि इस बारे में है कि वह कैसा है।
दशा चेतना के वातावरण को दर्शाती है जैसे -
- पवित्रता का स्तर
- परिष्कार की मात्रा
- आंतरिक ऊर्जा के प्रवाह की सहजता
- स्मरण की प्रबलता
- हृदय की कोमलता या कठोरता
- विचारों, भावनाओं और इच्छाशक्ति के बीच सामंजस्य
विमान के उदाहरण की सादृश्यता में देखें तो यदि अवस्था पहाड़ी पट्टी की ऊँचाई है तो दशा वहाँ से दिखने वाले दृश्यों की दृश्यता, हवा की ताज़गी और क्षितिज के विस्तार का दर्शन है।
पर्वत पर अलग-अलग ऊँचाइयों पर मौजूद दो समतल स्थान पूरी तरह से अलग अनुभव दे सकते हैं। 5000 फुट की ऊँचाई वाला स्थान घने कोहरे से ढका या जमा हुआ हो सकता है। वहाँ व्यक्ति ऊँचाई पर तो खड़ा है लेकिन बहुत कम देख पाता है। वहीं 4000 फुट वाला स्थान एक लुभावना और अबाधित दृश्य प्रस्तुत कर सकता है - नक्शे पर नीचा दिखने वाला लेकिन जीवंत अनुभव में श्रेष्ठ।
इसलिए दशा ऊँचाई से सुनिश्चित नहीं होती। इसे पैदा करना, शुद्ध करना, निखारना और अर्जित करना पड़ता है।
3. दोनों में अंतर
- व्यक्ति की अवस्था मुख्यतः ध्यान और प्राणाहुति के माध्यम से आगे बढ़ती है। ये दोनों विशिष्ट आध्यात्मिक बिंदुओं को खोलते जाते हैं और साधक को अपनी यात्रा में भीतर की ओर ले जाते हैं। साधक जितना ऊँचा आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करता है उतना ही वह भीतर गहराई में जाता है।
- व्यक्ति की दशा सफ़ाई, सतत् स्मरण, मनोभाव के परिष्कार और यम-नियम, जो पतंजलि के योगसूत्रों में वर्णित हृदय के करने और न करने योग्य आचरण हैं, का पालन करके पोषित और विकसित की जाती है।
अवस्था प्रकट होती है जबकि दशा विकसित होती है। जहाँ अवस्था सहज रूप से मिल जाती है वहीं दशा स्वयं के प्रयास द्वारा विकसित करनी होती है।
प्राणाहुति किसी आंतरिक द्वार को तत्काल खोल सकती है लेकिन व्यक्ति की दशा के रूपांतरण के लिए आपको उस नए आंतरिक स्थान से गुज़ारना, उसमें स्थिर होना और उसी आधार पर जीवन जीना होता है। इन दोनों के बीच का भेद यह दर्शाता है कि क्यों दो साधक समान चक्रों को पार करने के बावजूद अपनी आंतरिक दशा की गुणवत्ता में एक-दूसरे से बहुत भिन्न हो सकते हैं।
अवस्था प्रकट होती है जबकि दशा विकसित होती है। जहाँ अवस्था सहज रूप से मिल जाती है वहीं दशा स्वयं के प्रयास द्वारा विकसित करनी होती है।
4. यह अंतर समझना क्यों महत्वपूर्ण है?
- यह साधक में आध्यात्मिक अहंकार को बढ़ने नहीं देता – ऊँचे बिंदु पर होने का अर्थ ‘उन्नत व्यक्ति’ होना नहीं है। उन्नत अवस्था, समान रूप से परिष्कृत दशा के बिना एक संकीर्ण कगार पर खड़े होने की तरह है - जहाँ ऊँचाई केवल आपकी असुरक्षा को बढ़ाती है।
- यह उन्नत साधक में विनम्रता बनाए रखता है और निरंतर विकास के लिए प्रेरित करता है – साधक को यह भान रहता है, “मैं संरचनात्मक रूप से भले ही उन्नत हो गया हूँ लेकिन नैतिक और भावनात्मक रूप से अभी भी प्रारंभिक स्तर पर ही हूँ।”
- यह आध्यात्मिक जीवन जीने पर ज़ोर देता है – यह दशा प्रदर्शित करती है कि हमारा व्यवहार कैसा है, हम कैसे प्रेम करते हैं, कैसे प्रत्युत्तर देते हैं और कैसे अपने हृदय में गुरु को धारण करते हैं।
- यह आध्यात्मिक इतिहास में विरोधाभासों को स्पष्ट करता है –आध्यात्मिक रूप से उन्नत लोग भी अपने अनसुलझे भावनात्मक या कार्मिक अपशिष्ट के कारण कष्ट भोगते हैं। इसके विपरीत, सरल हृदय वाले साधक, जिनकी आध्यात्मिक अवस्था साधारण होती है, असाधारण प्रकाश से युक्त हो सकते हैं।

5. आध्यात्मिक अवस्था कैसे गहन होती है?
आध्यात्मिक अवस्था में गहनता तब आती है या साधक यात्रा में तब आगे बढ़ता है जब -
- ध्यान आंतरिक तल्लीनता के माध्यम से कोई बिंदु (चक्र) जागृत करता है।
- प्राणाहुति साधक के स्पंदनिक विस्तार को बदल देती है और उसकी सुप्त क्षमताओं को जागृत करती है।
- समर्पण आध्यात्मिक कार्य को बिना किसी प्रतिरोध के जारी रखता है।
- आंतरिक तालमेल एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक एक सहज प्रवाह बनाता है।
- गुरु की कृपा साधक को उन सीमाओं के पार ले जाती है जिन्हें केवल व्यक्तिगत प्रयास से पार करना संभव नहीं होता।
साधक की अवस्था का गहन होना एक आरंभिक प्रक्रिया है, चेतना की संरचना में एक बदलाव है जो हमारी यात्रा में हुई प्रगति को दर्शाता है।
6. दशा उन्नत कैसे होती है?
एक आध्यात्मिक दशा निम्नलिखित माध्यमों से उन्नत होती है -
- सफ़ाई जो जटिलताओं को दूर करती है और हल्कापन बहाल करती है।
- दुखों को स्वीकार करना जो हृदय को उज्ज्वल बनाता है।
- सरल जीवनशैली जो आंतरिक उलझनों को दूर करती है।
- सतत स्मरण जो आंतरिक प्रकाश को बनाए रखता है।
- बेहतर इरादा जो नियति का निर्माण करता है।
- भावुकता रहित भक्ति जो व्यक्ति को गुरु की उपस्थिति से जोड़े रखती है।
- सूक्ष्म नैतिकता का अभ्यास जो हृदय में दैवीय स्पंदनों के ठहरने के लिए वातावरण बनाता है।
दशा धीरे-धीरे और स्वाभाविक रूप से विकसित होती है, जैसे पेड़ पर फल पकना या आकाश का साफ़ होना या आत्मा का क्रमश: परिपक्व होना।

7. अवस्था और दशा के बीच परस्पर क्रिया
यद्यपि दोनों ही भिन्न हैं फिर भी वे एक-दूसरे को मज़बूत करती हैं। एक परिष्कृत दशा साधक को बिना किसी विकृति के गहनतर या उच्चतर अवस्थाओं में प्रवेश करने में मदद करती है। और उच्चतर अवस्थाएँ वह सूक्ष्म सामग्री प्रदान करती हैं जिससे दशा को आकार देने में मदद मिलती है।
लेकिन ये दोनों हमेशा एक ही गति से नहीं बढ़तीं।
अक्सर गुरु साधक की अवस्था को दशा की शुद्धता के स्तर से भी ऊपर उठा देते हैं। यह उनका करुणामय कार्य है जिससे नई अवस्था पुरानी दशा को भी ऊपर खींच लेती है यानी उसे भी उन्नत बना देती है। ऐसी उन्नति साधक में आंतरिक घर्षण पैदा कर सकती है यानी साधक को अपनी स्थायी पहचान से परे खिंचे जाने का एहसास हो सकता है। लेकिन यह खिंचाव ही रूपांतरण की कसौटी है।
सच्ची आध्यात्मिक प्रगति अवस्था और दशा का सामंजस्य है। दशा के बिना अवस्था ऐसी है जैसे बिना अनुकूलन के ऊँचाई पर होना - व्यक्ति ऊँचाइयों पर तो पहुँच जाता है लेकिन खुलकर साँस नहीं ले पाता। अवस्था के बिना दशा ऐसी है जैसे आधार रहित परिष्कार - सतह पर तो चमक होती है लेकिन आध्यात्मिक गहराई नहीं होती।
8. विकास पर हार्टफुलनेस दृष्टिकोण
सच्ची आध्यात्मिक प्रगति अवस्था और दशा का सामंजस्य है। दशा के बिना अवस्था ऐसी है जैसे बिना अनुकूलन के ऊँचाई पर होना - व्यक्ति ऊँचाइयों पर तो पहुँच जाता है लेकिन खुलकर साँस नहीं ले पाता। अवस्था के बिना दशा ऐसी है जैसे आधार रहित परिष्कार - सतह पर तो चमक होती है लेकिन आध्यात्मिक गहराई नहीं होती।
आध्यात्मिक मार्ग का लक्ष्य इन दोनों को एकीकृत करना है ताकि -
- उच्चता का शुद्धता से मेल हो सके।
- गहनता का स्पष्टता से मेल हो सके।
- आध्यात्मिक अनुभव का आचरण से मेल हो सके।
एक पूर्णतः विकसित साधक वह है जिसकी अवस्था उत्कृष्ट होती है तथा जिसकी दशा पारदर्शी होती है जैसे कोई ऊँची पर्वत चोटी साफ़ आकाश से आच्छादित हो।
9. लंबी यात्रा - दशा से नियति का निर्माण
हार्टफुलनेस की गहन अंतर्ध्वनियों में व्यक्ति को निम्नलिखित शिक्षाएँ मिलती है -
- अवस्था आपको अगले कदम के लिए तैयार करती है।
- दशा आपको अगले जीवन के लिए तैयार करती है।
- अवस्था आपके आध्यात्मिक अनुभव को बदलती है।
- दशा जो आप हैं (अस्तित्व), उसे बदलती है।
गुरु आपकी अवस्था को एक क्षण में ऊपर उठा सकते हैं लेकिन आपकी दशा वह मिट्टी है जिसमें शाश्वत विकास का वृक्ष पनपता है।
अतः आध्यात्मिक प्रगति का असली पैमाना यह नहीं है, “मैंने कौन-सा बिंदु पार कर लिया है?” बल्कि यह है, “मेरा हृदय कितना शुद्ध है? इसकी स्थिति कितनी संवेदनशील है? और इसका प्रेम कितना व्यापक है?”
10. एकीकरण
हार्टफुलनेस मार्ग में हमारी यात्रा केवल आंतरिक अवस्थाओं के बदलने से नहीं बल्कि आंतरिक दशा के परिष्कार के माध्यम से आगे बढ़ती है जिससे वे अवस्थाएँ पूर्णत: अभिव्यक्त हो पाती हैं। अवस्था पहुँच प्रदान करती है तथा दशा उस पहुँच की अभिव्यक्ति को संभव बनाती है। अवस्था द्वार खोलती है तो दशा प्रकाश को बिना किसी विकृति के गुज़रने देती है।
जब ये दोनों सामंजस्य में होते हैं तब साधक दिव्यता का पारदर्शी साधन बन जाता है और फिर यह मार्ग किसी उपलब्धि की यात्रा नहीं रह जाता बल्कि आत्मा के मूल स्वभाव का सहज प्रकटीकरण बन जाता है।

