अनन्या पटेल ने वस्त्र कलाकार दर्शिनी पटेल के बारे में परिच्छेदिका (profile) तैयार की है, जिसमें वे उनकी ध्यानात्मक बुनाई के तरीके और उनके द्वारा बनाए गए प्रकृति से प्रेरित कपड़ों का विवरण देती हैं।
एक वस्त्रशिल्पी के रूप में दर्शिनी पटेल अपनी पूरी प्रक्रिया, विशेषकर करघे पर काम करने को, एक प्रकार की ध्यान-प्रक्रिया बताती हैं।
दर्शिनी कहती हैं, “यह धीरे-धीरे, चरणबद्ध तरीके से किया जाता है और मेरे लिए यह प्रक्रिया ध्यानमयी है।”
वे अत्यंत सटीकता के साथ अपनी सामग्री को विशिष्ट आकृतियों में ढालती हैं, जिन्हें वे बड़े करघे पर जूट, ऊन और अन्य जैविक रेशों के साथ बुनती हैं। फिर वे इन बुने हुए कपड़ों को जैविक रचनाओं में ढालती हैं जो प्राकृतिक रूपों और अनूठी बनावटों की याद दिलाती हैं। उनके शब्दों में - “मेरी अवधारणा है कि प्रकृति कैसे विकसित होती है, उसका रिकॉर्ड होना चाहिए। यह अवलोकन करने वाली प्रक्रिया है जिसमें यह देखा जाता है कि कैसे धीरे-धीरे प्रकृति में गहरे परिवर्तन होते रहते हैं और मैं इन्हें अपने काम में शामिल करने की कोशिश करती हूँ। यही मेरी प्रेरणा है।”

उनकी रचनात्मक प्रक्रिया दो आयामों से शुरू होती है। वे अपने काम के बारे में समझाती हैं, “मैं अपनी अवधारणा को साकार करने की शुरुआत कागज़ और स्याही के साथ करती हूँ। अपने शोध के आधार पर मैं पेंसिल से अपनी रचना को जो रूप देना चाहती हूँ उसका रेखाचित्र बनाती हूँ। फिर आहिस्ता-आहिस्ता, मैं इस बात पर विचार करती हूँ कि उस कार्य विशेष के लिए कौन सी तकनीक सर्वाधिक उपयुक्त होगी और उसके लिए किस सामग्री का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अगर मुझे संरचना में अकड़न चाहिए होती है तो मैं ताने-बाने के लिए जूट या ऊन चुनती हूँ। इस तरह, मुझे मनचाही आकृति मिल जाती है।”


इसके बाद दर्शिनी करघे की तरफ़ अपना रुख करती हैं, जिसे उन्होंने समय के साथ अपने कार्य और ज़रूरत के हिसाब से ढाला है। वे बताती हैं, “मैं एक बड़ा करघा चाहती थी, इसलिए यह बड़ा वाला करघा सात फ़ुट चौड़ा है, लेकिन इसकी कार्य-प्रणाली वही है। मैं इसे ज़्यादा मज़बूत बनाना चाहती थी, इसलिए मैंने चीड़ या आम की लकड़ी के बजाय सागौन की लकड़ी (teak wood) का इस्तेमाल किया। मैंने सीट को थोड़ा चौड़ा बनाया है क्योंकि मैं करघे पर एक बार में दो-तीन घंटे काम करती हूँ। बड़े करघे में चार शाफ़्ट होते हैं और छोटे करघे में बारह शाफ़्ट होते हैं जिससे मुझे प्रयोग करने और अलग-अलग परिणामों को समझने में मदद मिलती है।”
करघे पर धीमी और पुनरावर्ती गतिविधियों से दर्शिनी को वस्त्र विज्ञान में अपने काम को बेहतर करने में मदद मिली है। वस्त्र उद्योग, खासकर हथकरघे, में उनकी विशेषज्ञता ने पिछले दस वर्षों में उन्हें विभिन्न आकारों, आकृतियों और सामग्रियों के साथ नवाचार करने का अवसर दिया है। दर्शिनी बताती हैं, “पहले मेरे पास एक छोटा करघा था और धीरे-धीरे मैं बड़े करघे पर काम करने लगी। यह गणित की तरह है, काफ़ी तकनीकी है और मैंने इसे धागे से कपड़े तैयार करने तक, बिलकुल शुरुआत से सीखा है।”

दर्शिनी कहती हैं, “ “यह धीरे-धीरे, चरणबद्ध तरीके से किया जाता है और मेरे लिए यह प्रक्रिया ध्यानमयी है।”
दर्शिनी की हाल ही की श्रृंखला में समय के साथ प्रवाल संरचनाओं (coral formations) और प्रवाल भित्तियों के व्यापक विरंजन (bleaching) के बारे में बताया गया है। इस विषय पर उन्होंने अभी कुछ समय पहले के अपने रेज़ीडेंसी कार्यक्रम (किसी स्थान पर रहकर शोध करना) के दौरान गहराई से जाँच की। उन्होंने बताया, “मैंने एक लिली के तालाब के बारे में अपने अवलोकन रोज़ाना दर्ज किए - पहले दिन यह पौधों से भरा था और अगले दिन माली द्वारा साफ़ कर दिए जाने के कारण यह दृश्य बदल गया। इसलिए, एक श्रृंखला में मैंने कपड़े के माध्यम और करघे का उपयोग करके इस विकसित होती प्रकृति को दर्शाया है। मेरा कार्य बहुत अधिक अवलोकन पर आधारित है।”

दर्शिनी अपनी रचनाओं में फ़ैक्ट्रियों के बचे हुए और बेकार कपड़ों, विशेष रूप से स्थानीय कारखानों से प्राप्त दबा कर बनाए गए नमदे (compressed felt) और नरम नमदे (soft felt) का उपयोग करना पसंद करती हैं। उनका कहना है, “यह कपड़ा बहुत अच्छा है क्योंकि यह किनारों पर उधड़ता नहीं है, रेशे बाहर नहीं निकलते हैं और मैं कपड़े को अलग-अलग आकार में काट पाती हूँ।”
दर्शिनी बचे-खुचे कपड़ों के और अधिक स्रोतों की तलाश में हैं और कपास व लिनन जैसे जैविक रेशों को काम में शामिल करना चाहती हैं। उनका मानना है, “जब आप बचे-खुचे कपड़ों के साथ काम करते हैं तब कुछ सीमाएँ होती हैं। आपको विशिष्ट रंग नहीं मिलते। आपको जो मिलता है, उसी के साथ काम करना पड़ता है। पर्याप्त शोध कर लेने के बाद ही मैं अंततः रंगों का इस्तेमाल करती हूँ लेकिन मैं कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल नहीं करती। मैं केवल प्राकृतिक रंगों या इको प्रिंट यानी प्राकृतिक छपाई का ही इस्तेमाल करती हूँ। लेकिन फिर, मेरी पूरी अवधारणा प्राकृतिक विकास पर आधारित है। इसलिए मैं फूल और पत्तों को तोड़ती नहीं हूँ। जो भी ज़मीन पर गिरा होता है, मैं उसे ही इकट्ठा करके इस्तेमाल करती हूँ। और फिर प्याज़ के छिलके, सब्ज़ियों का कचरा और चुकंदर भी होते हैं जिनका मैं इस्तेमाल करती हूँ।”
अपने काम के अनुरूप, दर्शिनी का अभ्यास भी अत्यधिक जैविक है और सृजन की प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्ध है। किसी भी समय, उनके लगभग दो या तीन काम प्रगति पर होते हैं। वे बताती हैं, “इनमें से कुछ प्रक्रियाएँ बार-बार दोहराई जाती हैं जिससे आकार वगैरह सब एक जैसा रहता है। लेकिन मुझे पूरी प्रक्रिया को करना पसंद है। यह बहुत ही ध्यानमयी है। 10’ x 6’ के आकार का कोई भी कपड़ा पूरा करने में मुझे चार-पाँच महीने लग जाते हैं। करघे से उतारने के बाद उसके किनारों को पूरा करने में भी समय लगता है। फिर मैं उसे मोड़ना, आकार देना शुरू करती हूँ ताकि मुझे अपनी अवधारणा के अनुसार मनचाहा परिणाम मिल सके।”

“मेरा कार्य बहुत अधिक अवलोकन पर आधारित है।”
दर्शिनी अपनी नई कलाकृतियों में रंग, गति और पैमाने के समावेश पर शोध करके अपने काम का विस्तार करने की कोशिश कर रही हैं। वे अपने काम को प्रदर्शनी में प्रदर्शित करने के साथ-साथ कला प्रेमियों के लिए आयोग भी बनाती हैं और अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों के साथ मिलकर साज-सज्जा और व्यावसायिक उपयोग के लिए वस्त्र निर्मित करती हैं।

आप दर्शिनी और उनके काम के बारे में यहाँ अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
https://www.instagram.com/darshinidalwadi.studio/


दर्शिनी पटेल
दर्शिनी दलवाड़ी पटेल एक वस्त्र डिज़ाइनर हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थानऔर पढ़ें
