सरला उपाध्या किसी दायरे में सीमित हो जाने के अनुभवों पर चिंतन कर रही हैं - अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष यान में फँसे अंतरिक्ष यात्रियों की बेचैनी से लेकर स्वतंत्रता के लिए हमारी लालसा तक - और पाती हैं कि प्राचीन ज्ञान और आधुनिक आध्यात्मिकता मिलकर कैसे एक ऐसा नया संसार सृजित करने के लिए हमारा मार्गदर्शन करते हैं जो परस्पर जुड़ावकरुणा और सार्वभौमिक संबद्धता पर आधारित है।

ब अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर को कई महीनों तक एक अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष यान में ही रहना पड़ा तब वे एक सीमित जगह में रहे। उनकी गतिशीलता एवं गतिविधियाँ, जिन्हें हम पृथ्वी पर सामान्य मानते हैं, बहुत सीमित थीं। ऐसे में न जाने कितनी बार उन्होंने धरती पर लौटने की इच्छा की होगी - उस स्वतंत्र संसार में जो प्रेम और अपनेपन से भरा है।

हमारी स्थिति - धरती पर रहते हुए अपने वास्तविक घर, अपने परम आध्यात्मिक स्रोत की ओर लौटने की तड़प रखना - वैसी ही हो सकती है जैसी अंतरिक्ष यात्रियों ने अपने अंतरिक्ष अभियानों के दौरान अनुभव की होगी। मैं अक्सर स्वतंत्रता के असली अर्थ पर मनन करती हूँ। क्या यह शारीरिक रूप से घूमने-फिरने की स्वतंत्रता है अथवा मानसिक स्तर पर प्रकाश की गति से भी तेज़ यात्रा करने की क्षमता है? कभी मैं सोचने लगती हूँ कि क्या स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ़ अपने भावनात्मक बोझ से मुक्त होना है। क्या स्वतंत्रता वास्तव में हार्टफुलनेस अभ्यास की सफ़ाई प्रक्रिया द्वारा संचित भावनात्मक अवशेषों को हटाने भर से मिलती है, भले वे भावनात्मक अवशेष हमें याद हों या भुला दिए गए हों? क्या स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि हमारी कोई ऐसी इच्छा न रहे जो हमें अपने परम आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर बढ़ने से रोकती है? क्या ऐसी कोई और दुनिया है जहाँ हम उस स्वतंत्रता का आनंद ले सकते हैं?

हम अपने संसार के अनेक भागों में अकल्पनीय स्थितियों का सामना कर रहे हैं। क्या हम कभी दुख, क्रोध, नफ़रत, लालच, हिंसा, कामना और घृणा की बेड़ियों को, जो हमें घेरे हुए हैं, तोड़कर मुक्त हो पाएँगे? क्या शांति, प्रेम, विश्वास और अन्य सकारात्मक भावनाएँ इस संसार में हमारी पहुँच से बाहर हो गई हैं?

एक खोए हुए बच्चे की तरह जब मैं अपने इस तरह के विचारों और कल्पनाओं के अंधकार में भटक रही थी तब बाबूजी की दस नियमों की व्याख्या के छठे नियम की टिप्पणी में बाबूजी का यह संदेश एक मार्गदर्शक प्रकाश के रूप में मेरे सामने आ गया।

यह संसार वास्तव में परलोक का प्रतिबिंब है। जब इस संसार को अच्छी तरह ढाल लिया जाता है तब इसका प्रभाव परलोक पर भी पड़ता है जिसका यह प्रतिबिंब है और वह भी शुद्ध होने लगता है। इससे हमारा कार्य सरल हो जाएगा और हमें अपना आदर्श पाने में मदद मिलेगी। इस लोक में हमारी सफलता उस लोक में भी हमारी सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगी।”
 बाबूजी

इससे जो सीख मिलती है वह अत्यंत सरल है। स्वतंत्रता पाने के लिए हमें किसी अन्य दुनिया में जाने की ज़रूरत नहीं है। बाबूजी जिस दूसरी दुनिया का वर्णन करते हैं वह हमारे भीतर मौजूद सूक्ष्म आंतरिक क्षेत्र की ओर संकेत करता है। यहाँ भौतिक संसार में अपने आपको शुद्ध करके हम साथ ही अपने भीतर के उच्चतर आयामों को भी शुद्ध करते जाते हैं और उन तक अपनी पहुँच बना लेते हैं। मुक्ति जिसकी हमें आकांक्षा है, वह दूर नहीं है, वह यहीं है। जिस अलगाव की धारणा की मैंने कभी कल्पना की थी, वह एक भ्रम मात्र है। यह संसार और वे सभी आंतरिक संसार शुरू से ही परस्पर जुड़े हुए हैं। श्रद्धा और प्रेम के द्वारा हम इस संसार में स्वयं को शुद्ध करते हैं। जैसे-जैसे हम शुद्ध होते जाते हैं दूरियाँ मिटती जाती हैं और हम यहीं इसी संसार में रहते हुए अपने मूल घर में पहुँच पाते हैं। एक बार जब हम यह मान लेते हैं कि मुक्ति के लिए हमें कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है तब हम अपने भीतर के नए संसार की रचना कर पाते हैं और उसमें जी पाते हैं।

परस्पर संबद्धता का जाल

करुणा, प्रेम और स्वीकृति सहित कई अन्य मानवीय गुणों से युक्त एक नए संसार के निर्माण में परस्पर संबद्धता एक प्रमुख सिद्धांत है। यह संसार में सभी धर्मों और आध्यात्मिक परंपराओं का मूल तत्व है।

उपनिषद्, जो भारतीय दर्शन के मूल ग्रंथ हैं, सृष्टिकर्ता और सृष्टि में विद्यमान सभी वस्तुओं के बीच पारस्परिक संबद्धता के बारे में बताते हैं। छान्दोग्य उपनिषद् (3.14.1) में लिखा गया है ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्मजिसका अर्थ है कि इस ब्रह्मांड में विद्यमान सभी कुछ - जड़, चेतन और वह सब जिसके होने की कल्पना की जा सकती है - ब्रह्म यानी परम सत्य की ही अभिव्यक्ति है।

अन्य उपनिषदों में भी ऐसे कई कथन मिलते हैं जो पारस्परिक संबद्धता के गहन आध्यात्मिक सत्य को दर्शाते हैं। यह पारस्परिक संबद्धता ‘एकत्व’ पर ध्यान के द्वारा अनुभव, पोषित और सुदृढ़ की जाती है। इस विचार की सुंदरता सृष्टि और व्यक्ति के संबंध से भी आगे तक फैली हुई है। यह हमारे आसपास के सभी लोगों तक फैलती, विस्तृत होती और उन्हें प्रभावित करती है। महाउपनिषद् सार्वभौमिक परिवार के सिद्धांत को स्थापित करते हुए इसे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (6.71-73), कहकर व्यक्त करता है।

भगवद्गीता में भी इस पारस्परिक संबद्धता का अद्भुत वर्णन किया गया है -

सर्व भूतस्थम् आत्मानम् सर्वभूतानि च आत्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:।। 6.25।।

जिस योगी की दृष्टि सम हो गई है वह सभी जीवों में परमात्मा को देखता है और परमात्मा में सभी जीवों को देखता है।

अत: सभी को जोड़ने वाले जटिल संबंधों के जाल की सही समझ और सराहना के लिए एक ‘सम दृष्टि’ यानी संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। हमारे विचारों, कर्मों और भावनाओं का दूसरों पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। इसी आधार पर एक ऐसे संसार की रचना की जा सकती है जिसमें सभी प्राणियों के प्रति प्रेम, करुणा और स्वीकार्यता का भाव हो।

प्राचीन चीन का ज्ञान

चीनी दर्शन के एक महान विचारक, लाओज़ी जिन्हें लाओज़ू के नाम से भी जाना जाता है, के विचारों को कोई भौगोलिक या सांस्कृतिक सीमा सीमित नहीं कर सकती। उन्होंने अपनी गहन अंतर्दृष्टि को अपने ग्रंथ ‘ताओ ते चिंग’ में दर्ज किया है जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द बुक ऑफ़ द वे एंड वर्च्यु’ है। उनका दर्शन ताओवाद कहा जाता है और यह अपने प्रज्ञान के लिए विख्यात है। इसमें सादगी व विनम्रता पर ज़ोर दिया गया है। लाओज़ी सिखाते हैं कि मानवीय कर्म प्रकृति के साथ तालमेल में किए जाने चाहिए और उन्हें ब्रह्मांड के प्राकृतिक क्रम का अनुपालन करना चाहिए। कर्म सहजता से होने चाहिए और परिवेश की सभी वस्तुओं के साथ संतुलन में किए जाने चाहिए जिनमें जड़-चेतन दोनों शामिल हैं।

 

creating-newworld2.webp

 

एकात्मकता पर पश्चिमी विचार

हेनरी डेविड थोरो ने अपनी पुस्तक, ‘वालडेन’, में अपने अनुभवों पर आधारित एक गहन वक्तव्य दिया है, “जिनसे भी मैं मिला हूँ, मैं उन सभी का एक हिस्सा हूँ।” इस कथन से मनुष्य और उसके वातावरण के गहन संबंध के बारे में थोरो के दृढ़ विश्वास का प्रमाण मिलता है। उन्होंने सहज जीवन जीने की अनुशंसा की और अपने आसपास की प्राकृतिक लय का अवलोकन करने पर बल दिया। अस्तित्व के इस विशाल जाल में अपने स्थान की उचित समझ से उसके प्रति आदर व सम्मान विकसित होता है। यदि हम अपने कार्यों को पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को पोषित करने के लिए करें तो हम एक स्थायी और बेहतर विश्व बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाएँगे।

नॉर्वे के दार्शनिक आर्ने नेस ने ‘आत्मा’ और पर्यावरण के बीच के संबंधों पर कार्य किया है। उन्होंने ‘पारिस्थितिक आत्मा’ के बारे में बात की जिसकी पहचान अहम् आधारित सोच छोड़ने से होती है। यह पारिस्थितिक आत्मा प्राकृतिक संसार के साथ सामंजस्य में काम करती है और स्वयं को उसका अभिन्न अंग मानती है। नेस के विचार आत्मा व परमात्मा की अवधारणा से बहुत मेल खाते हैं। यह सामंजस्य स्वाभाविक रूप से अपनेपन के भाव को विकसित करता है - हम एक सार्वभौमिक परिवार का हिस्सा हैं जिसमें हमारे चारों ओर स्थित प्रत्येक वस्तु समाहित है।


यह संसार वास्तव में परलोक का प्रतिबिंब है। जब इस संसार को अच्छी तरह ढाल लिया जाता है तब इसका प्रभाव परलोक पर भी पड़ता है जिसका यह प्रतिबिंब है और वह भी शुद्ध होने लगता है। इससे हमारा कार्य सरल हो जाएगा और हमें अपना आदर्श पाने में मदद मिलेगी। इस लोक में हमारी सफलता उस लोक में भी हमारी सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगी।”
– बाबूजी


अपने भीतर एक नए संसार का सृजन

उपरोक्त सभी कथनों और अनेक साधकों व विचारकों के निष्कर्षों को पढ़ने के बाद क्या आप यह समझ पाए कि अपने लिए नए संसार का सृजन करने से हमारी प्रगति कितनी तेज़ हो सकती है? यह एक ऐसी यात्रा है जो अपनाने योग्य है। सबसे पहले तो हम अपने अस्तित्व की वर्तमान स्थिति में फँसे होने के कारण आई रुकावट को और बदलाव लाने की ज़रूरत को स्वीकार करते हैं। स्वतंत्रता के लिए यह आंतरिक पुकार हमें उस बंधन से मुक्त कर देती है जिसके कारण हम वही काम दोहराते हैं। इसके बाद प्राचीन और समकालिक ज्ञान का अध्ययन करके हम यह समझने लगते हैं कि वह नया संसार कहाँ हो सकता है - एक ऐसा संसार जो हमें वह स्वतंत्रता प्रदान करे जिसकी हमें तलाश है।

पूज्य बाबूजी की शिक्षाओं पर पुनः विचार करने पर हम यह समझ पाते हैं कि हमारे अंदर उस सुंदर संसार को साकार करने की क्षमता है जिसकी हमें आकांक्षा है। इस नए संसार में आदर्श दशा कोई कल्पना न होकर प्राप्य अवस्था है जिसे जीवन के प्राकृतिक सिद्धांतों का पालन करते हुए प्राप्त किया जा सकता है। बाबूजी द्वारा बताई गई आदर्श दशा को समझने और जीवन में उतारने पर निरंतर केंद्रित रहना आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है। इस प्रतिबद्धता के लिए ध्यान, आत्मचिंतन और आवश्यकतानुसार आत्मसुधार की आवश्यकता होती है।


आंतरिक शुद्धि में करुणाप्रेम और सामंजस्यपूर्ण जीवन के सार्वभौमिक सिद्धांतों के अनुरूप अपने दृष्टिकोणोंविचारों और कर्मों को ढालना शामिल है।


दाजी द्वारा प्रतिपादित हार्टफुलनेस पद्धति आध्यात्मिकता को एकीकृत करके दैनिक जीवन में परस्पर संबद्धता को बढ़ावा देने के व्यावहारिक तरीके प्रदान करती है। यह ढाँचा व्यक्तियों को स्वयं के साथ, अन्य लोगों के साथ और आसपास की दुनिया के साथ जुड़ाव की गहरी भावना विकसित करने के लिए प्रेरित करता है। आंतरिक शुद्धि में करुणा, प्रेम और सामंजस्यपूर्ण जीवन के सार्वभौमिक सिद्धांतों के अनुरूप अपने दृष्टिकोणों, विचारों और कर्मों को ढालना शामिल है। भौतिक जगत में हमारे कर्मों और दृष्टिकोणों का प्रभाव आध्यात्मिक आयाम पर भी पड़ता है और हमें आदर्श अवस्था की ओर ले जाता है। सार्वभौमिक भाईचारे की भावना को बढ़ाने के लिए व्यक्तिवाद और अलगाव की भावनाओं की बाधाओं को तोड़ना आवश्यक है। इन विधियों को अपने दैनिक जीवन में शामिल करके हम अपनी आध्यात्मिक साधना को गहन कर सकते हैं और एक अधिक सुसंगत, सामंजस्यपूर्ण जीवन की रचना कर सकते हैं।

हार्टफुलनेस ध्यान के अभ्यास ने इस यात्रा में मेरा मार्गदर्शन किया है। अब मैं समझ पा रही हूँ कि जिसे कभी मैं केवल अपना मानती थी, वह सबका है। हर दिन इस विवेक के साथ जीने से एक नया संसार अस्तित्व में आने लगता है।

 

creating-newworld3.webp

 


Comments

सरला उपाध्याय

सरला उपाध्याय

सरला पहले बैंगलोर विश्वविद्यालय में एक व्यावसायिक इंजीनियरिंग कॉलेज में काम करती थीं, और पढ़ें

उत्तर छोड़ दें