हाँ, आप कर सकते हैं !

दाजी दिलों को खोलने और दूसरों के व दुनिया के साथ अपने संबंधों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का आसान तरीका सुझा रहे हैं।

प्रिय मित्रों,

आपके पास चेतना है, जागरूकता है और स्वतंत्र इच्छाशक्ति है। आप इन उपहारों को कैसे उपयोग में ला सकते हैं जिससे आप मानव से मानवीय और मानवीय से दिव्य मानव बन सकें?

जब हम पैदा होते हैं तब हमें भिन्नताओं और समानताओं का पता नहीं होता। हम बस चीज़ों को स्वीकार करते हैं। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम अपने को व दूसरों को रंग, सभ्यता, धार्मिक या आध्यात्मिक झुकाव, लिंग, व्यवसाय, समाज व संस्कृति में स्थान, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य इत्यादि के आधार पर पहचानने और वर्गीकृत करने लगते हैं। इस तरह के वर्ग और श्रेणियाँ अनेक हैं। हम उनसे बंध जाते हैं और सोचते हैं कि वही वास्तविक हैं। इसके परिणामस्वरूप हम कुछ लोगों के लिए बहुत सारी पसंद और दूसरों के लिए बहुत सारी नापसंद स्थापित कर लेते हैं जिससे हम में पूर्वाग्रह और अलगाव की भावना पैदा होती है।

मानवीय बनने के लिए हमें इस वर्गीकरण को उलटना होगा और एक सरल जागरूकता विकसित करनी होगी। चेतना के विस्तार के साथ हम मानवीय बनते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हम स्वाभाविक रूप से अधिक दयालु, अधिक समानुभूतिपूर्ण, करुणामय और स्नेहपूर्ण हो जाते हैं। हम राय बनाने से सहनशीलता की ओर तथा अलगाव से जुड़ाव की ओर बढ़ते हैं। हमारा निम्न स्व उच्चतर ‘स्व’ में लीन हो जाता है। मेरे आध्यात्मिक गुरु ने इस प्रगति का वर्णन करते हुए कहा था, “हम पशु मानव से मानव और मानव से दिव्य मानव बनने की ओर बढ़ते हैं।”

ध्यान के अभ्यास के परिणामस्वरूप हम इसे अनुभव कर पाते हैं। सारे ठप्पे, सभी भेदभाव हट जाते हैं। दूसरों में अंतर देखने के बजाय हम उस दिव्य प्रकाश को महसूस करने लगते हैं जो हममें और सभी प्राणियों में निवास करता है। हम जान लेते हैं कि हम पृथ्वी पर पर्यटक नहीं बल्कि इसका हिस्सा हैं, इस प्रकृति का हिस्सा हैं। जब हम अंतरिक्ष से पृथ्वी की तस्वीरें देखते हैं तब हमें ऐसे कोई अंतर नहीं दिखते जो हमें अलग करते हैं। हम तो इसे समग्रता में देखते हैं - एक सुंदर नीला रत्न जो अंतरिक्ष में तैर रहा है। वहाँ कोई भी अलगाव नहीं है।

ध्यान हमें मन के चेतन, अवचेतन और अतिचेतन भागों में गहराई तक ले जाता है जहाँ हम सभी प्राणियों की एकात्मकता को महसूस और अनुभव करते हैं। हार्टफुलनेस के आंतरिक अभ्यासों के साथ यहाँ दो सरल अभ्यास प्रस्तुत हैं जिनसे आपको दूसरों से जुड़ाव और एकात्मकता महसूस करने में मदद मिलेगी -

पूरा दिन जुड़ाव और एकात्मकता अनुभव करना 

संस्कृत शब्द ‘नमस्ते’ का शाब्दिक अर्थ है “मैं आपके सामने झुकता हूँ।” यह पहला अभ्यास ‘नमस्ते’ के परिचित अभिवादन का उपयोग दूसरों के साथ और अपने वातावरण के साथ आपके जुड़ाव की आंतरिक जागरूकता को लाने के लिए करता है। यह आपके दिल से प्रेम को और अधिक सचेत रूप से प्रसारित होने में मदद करता है।

आप इसका अभ्यास अकेले या दूसरों के साथ कर सकते हैं। शायद आप अपनी भाषा में इसके जैसे किसी शब्द को बोलकर या मौन रहकर इसका अभ्यास करना चाहें। यह अभ्यास किसी कार्यशाला या संगोष्ठी में बच्चों के साथ या बड़ों के साथ एक मनोरंजक और गहन सामूहिक गतिविधि के रूप में भी किया जा सकता है।

इसका उद्देश्य है दूसरों में मौजूद उच्चतर ‘स्व’ को स्वीकार करने और उसका सम्मान करने के लिए इस ‘नमस्ते’ शब्द से उनका अभिवादन करना।

कोमलता से अपने हाथों को जोड़कर प्रार्थनापूर्ण स्थिति में अपने हृदय के सामने रखें, नीचे देखें और अपने शरीर को हलका सा झुका लें। स्वयं को उच्चतर ‘स्व’ में डूब जाने दें जो आपके अंदर पवित्र सार के रूप में मौजूद है। उसके बाद उस सार को दूसरों के उच्चतर ‘स्व’ की ओर प्रसारित होने दें। वे उसका प्रत्युत्तर देंगे। अब अपनी इस अनुभूति को अपने चारों ओर विस्तारित करते हुए अपने परिवेश को उसमें शामिल करें - वायु के कण, पक्षी, वृक्ष, फूल और जो कुछ आपके आस-पास है। 


ध्यान हमें मन के चेतन, अवचेतन और अतिचेतन भागों में गहराई तक ले जाता है 
जहाँ हम सभी प्राणियों की एकात्मकता को महसूस और अनुभव करते हैं।


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इस जागरूकता को अपनी दिनभर की गतिविधियों में जारी रखें। जहाँ भी आप जाएँ और जिससे भी आप मिलें, अपने शहर में, देश में या दुनिया में, इस जुड़ाव और एकात्मकता के एहसास को बनाए रखें।

यह सहज क्रिया आपके दिल को सभी जीवों में मौजूद दिव्य सत्व के लिए खोल देगी। चाहे यह अभ्यास अपने दिल में खामोशी से किया जाए या जब आप दूसरों का अभिवादन करते हैं तब किया जाए, यह आपकी जागरूकता को मानव से मानवीय बनने और फिर दिव्य मानव बनने की ओर बढ़ाएगा।

इसका आगे विस्तार 

यदि आप इसे और आगे ले जाना चाहते हैं -

कल्पना करें कि एक व्यक्ति जिसे आप नापसंद करते हैं - कोई ऐसा जिसने आपको दुःख पहुँचाया है - आपके सामने खड़ा है। यह विचार लें, “यह व्यक्ति मेरा मित्र है और मेरा भला चाहने वाला है।” 

प्रेम और समानुभूति की भावनाओं को, जिन्हें आपने नमस्ते के अभ्यास से उत्पन्न किया है, साँस बाहर छोड़ते समय सामने खड़े उस व्यक्ति के अंदर प्रवाहित होने दें। यह विचार लें कि आपके प्रेम और स्नेह के कण उसके हृदय में प्रवेश कर रहे हैं। इस भावना को क्षमा, समानुभूति और करुणा के रूप में प्रकट होने दें।

जब आप साँस अंदर लें तब यह विचार लें कि आप उसके हृदय से नकारात्मक विचारों को, जो उसके दिल में आपके बारे में हैं, खींच रहे रहे हैं और उनको एक तरफ़ फेंक रहे हैं।

आपको आपकी आगे की यात्रा के लिए शुभकामनाएँ।

दाजी


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दाजी

दाजी हार्टफुलनेसके मार्गदर्शक

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