इस लेख में मीनू तिवारी और हेस्टर ओ’कॉनर तीसरे अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं कल्याण सम्मेलन और उसके इस आह्वान के बारे में बात कर रही हैं जिसमें स्वास्थ्य और उपचार के लिए एकीकृतहृदय-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की बात कही गई है। 1

तीसरा अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं कल्याण सम्मेलन 10-12 अक्टूबर, 2025 को हैदराबाद, भारत के कान्हा शांतिवनम् में आयोजित किया गया था। इसमें 800 से अधिक स्वास्थ्य सेवा विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, छात्रों और आम जनता ने भाग लिया था। इस सम्मेलन का उद्देश्य आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा और पारंपरिक उपचार पद्धतियों के बीच सच्चे संवाद को प्रोत्साहित करने के एक साहसिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना था।

इस सम्मेलन में हृदय के स्वास्थ्य, जीवन-शैली और मानसिक स्वास्थ्य के लिए मनोशारीरिक चिकित्सा पर ध्यान केंद्रित किया गया था जिसमें शरीर विज्ञान और जैव-चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण को अध्यात्म, आयुर्वेद और योग के दृष्टिकोण के साथ जोड़ा गया। यह सम्मेलन हार्टफुलनेस इंस्टीट्यूट, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), आयुष मंत्रालय, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, जामनगर (ITRA) द्वारा संयुक्त रूप से प्रायोजित किया गया था जिसमें विभिन्न दृष्टिकोणों के सहयोग के ज़रिए एकीकृत भावना को व्यक्त किया गया था।

इस सम्मेलन की विशेषता थी कि इसमें खुलेपन और वास्तविक जिज्ञासा का माहौल था। जैव-चिकित्सा विशेषज्ञ और पारंपरिक चिकित्सक एक-दूसरे के दृष्टिकोण को प्रतिद्वंद्वियों की तरह नहीं बल्कि सहयोगियों की तरह समझ रहे थे। वे समझने का प्रयास कर रहे थे कि विभिन्न पद्धतियाँ किस प्रकार से एक ही तरह की हृदय रोग संबंधी चुनौतियों का वर्णन, अनुसंधान एवं उपचार करती हैं। सभी प्रतिभागियों ने अपनी-अपनी पद्धतियों की सीमाओं का समर्थन करने के बजाय हृदय संबंधी रोगों को कम करने, ठीक करने और उनकी रोकथाम करने के अपने लक्ष्य में समानता खोजने की कोशिश की।

इस सहयोगपूर्ण वातावरण ने गहन जाँच के लिए एक ऐसा दुर्लभ माहौल बनाया जहाँ विविध परंपराओं के प्रमाणों को साथ-साथ जाँचा जा सकता था। विभिन्न पद्धतियों पर प्रामाणिक चर्चा के द्वारा सम्मेलन ने दीर्घकालिक सहयोग तथा सही मायने में एकीकृत, नैतिक, प्रमाणित और रोगी-केंद्रित सच्ची देखभाल की जन नीति विकसित करने का मंच तैयार किया।

एक ऐसे युग में जब स्वास्थ्य सेवाओं का पृथक होना दीर्घकालिक रोगों के उपचार को खतरे में डालता हो तब इस समागम ने एक आशावादी और नवीन राह दिखाई - प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का साथ मिलकर काम करना।

इस सम्मेलन से कई महत्वपूर्ण विषय उभरकर सामने आए जो हृदय के स्वास्थ्य और आंतरिक व बाहरी मानव कल्याण को एक पूर्णतः नए दृष्टिकोण से समझने का संकेत देते हैं।

सम्मेलन के मुख्य विषय - हृदय, मन और उपचार

हृदय - एक सेतु

एक प्रमुख विचार यह था कि हृदय को केवल रक्त का संचार करने वाला एक यांत्रिक अंग ही नहीं मानना चाहिए बल्कि उससे परे देखना चाहिए। वक्ताओं ने बार-बार हृदय को एक सेतु के रूप में वर्णित किया जो मन, शरीर, भावनाओं, चेतना और समग्र कल्याण को जोड़ता है। इस विस्तारित दृष्टिकोण से हृदय दृश्य और अदृश्य को जोड़ता है, जैसे जीवविज्ञान और जागरूकता, शरीर विज्ञान और प्रयोजन। जब हृदय, मन और शरीर सामंजस्य में कार्य करते हैं तब स्वास्थ्य कोई ऐसी चीज़ नहीं रह जाती जिसके लिए काम करना पड़े। यह संतुलन, तालमेल और आंतरिक शांति की अवस्था हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो हृदय एक साथ एक शारीरिक अंग है, स्नायु तंत्र का केंद्र है, भावनात्मक नियमन व चेतना का केंद्र है तथा हमारी गहनतम मानवता का स्थान भी है। सम्मेलन में चर्चा हुई कि वास्तव में हृदय के स्वास्थ्य में इन सभी पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए।

वैयक्तिकरण, विशिष्टता और नए प्रमाण

इस सम्मेलन का दूसरा प्रमुख विषय था - बीमारियों की रोकथाम और उपचारात्मक तरीकों में अधिक विशिष्टता और वैयक्तिकरण की आवश्यकता। इसे भी सभी पद्धतियों से समर्थन मिला। दाजी ने इस बात को संक्षेप में व्यक्त किया जब उन्होंने कहा, “क्रोध के कारण हृदयाघात हो सकता है जबकि करुणा हृदय की रक्षा कर सकती है।” उन्होंने बताया कि भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ व्यक्तियों को अलग-अलग तरह से प्रभावित करती हैं क्योंकि वृत्तियाँ – चेतना के सूक्ष्म उतार-चढ़ाव – प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्तियों और शारीरिक प्रतिक्रियाओं को अलग-अलग तरह से निर्धारित करती हैं। उन्होंने शोध की एक नई दिशा प्रस्तावित की, मूल भावनाओं को विशेष ईसीजी पैटर्न से जोड़ना और फिर उन्हें यौगिक चक्रों के साथ मिलाकर देखना जिससे भावनात्मक असंतुलन के लिए सटीक, ध्यान-आधारित उपचार की संभावना बन सकती है।

एक प्रख्यात तंत्रिका वैज्ञानिक ने मस्तिष्क की इमेजिंग के प्रमाण के आधार पर इस दृष्टिकोण को सुदृढ़ किया। उन्होंने दिखाया कि हृदय और मस्तिष्क तालमेल में काम करते हैं। भावनात्मक स्थिरता इस दो-तरफ़ा पारस्परिक क्रिया से उत्पन्न होती है। हृदय की लय मस्तिष्क की गतिविधि को निर्धारित करती है, जबकि चिंता जैसी मानसिक स्थितियाँ हृदय की लय को बिगाड़ सकती हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि श्वसन क्रिया इन दोनों के बीच एक सुगम सेतु की तरह कार्य करती है। उनके शोध ने प्रदर्शित किया कि व्यक्तिगत श्वसन अभ्यासों (प्राणायाम) ने कुछ ही हफ़्तों में चिंता और तेज़ी से उठते विचारों को काफ़ी हद तक कम किया, साथ ही हृदय–मस्तिष्क–फेफड़ों के तालमेल को मज़बूत किया।

 

bringing-medicine-divide-2.webp

 

एक अन्य जैव-चिकित्सा के प्रस्तुतकर्ता ने इन जानकारियों को पूरे जीवनकाल की रूपरेखा में प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रमुखता से बताया कि किस प्रकार से पारंपरिक मनोशारीरिक चिकित्सा उभरते हुए वैज्ञानिक प्रमाणों से मेल खाती है। उन्होंने इनके संबंधों को तंत्रिका हार्मोन के अक्ष, आँत-मस्तिष्क अक्ष, एपीजेनेटिक्स और हृदय के स्वास्थ्य में तनाव, नींद व संक्रमण की तिकड़ी की भूमिका के माध्यम से उजागर किया। ये निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करते हैं कि रोकथाम की शुरुआत जल्दी होनी चाहिए और इसमें आंतरिक स्थिति एवं बाहरी प्रभावों, दोनों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।


जब हृदयमन और शरीर सामंजस्य में कार्य करते हैं तब स्वास्थ्य कोई ऐसी चीज़ नहीं रह जाती जिसके लिए काम करना पड़े। यह संतुलनतालमेल और आंतरिक शांति की अवस्था हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है।


आयुर्वेद - शरीर और मन का संतुलन बहाल करना

आयुर्वेद ने एक पूरक दृष्टिकोण प्रदान किया जिसके अंतर्गत स्वास्थ्य को शरीर, मन, इंद्रियों और चेतना के मध्य एक गतिशील संतुलन के रूप में परिभाषित किया गया। आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य का अर्थ केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं है बल्कि यह विचारों की स्पष्टता, ताज़गी प्रदान करने वाली नींद, प्रभावी पाचन और जीवन के प्रति उत्साह से व्यक्त होता है। सम्मेलन की चर्चाओं में प्रमुखता से यह उभरकर आया कि किस तरह से ये प्राचीन सिद्धांत सूजन, चयापचय और दीर्घकालिक रोगों के विषय में आधुनिक समझ से मेल रखते हैं। आहार नियमन, शुद्धिकरण और जड़ी-बूटी चिकित्सा जैसी पद्धतियों को शरीर की स्वाभाविक रूप से ठीक होने की क्षमता में सहयोग देने के तरीके के रूप में प्रस्तुत किया गया। महत्वपूर्ण बात यह है कि मन को शारीरिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को जोड़ने वाली जीवंत कड़ी माना गया जिसने इस विचार को बल दिया कि हृदय की देखभाल को लेकर किसी भी विधि में भावनात्मक और मानसिक कल्याण पर ध्यान देना आवश्यक है।

 

bringing-medicine-divide-3.webp

 

निस्संदेह, पंचकर्म द्वारा विषमुक्ति के लाभों को आधुनिक शोध भी मान्यता देने लगा है। उदाहरण के लिए, प्रशिक्षित वैद्य के मार्गदर्शन में ‘अभ्यंग’ (औषधीय तेल मालिश जो कि पंचकर्म की पूर्व तैयारी है) करने से चिंता और कोर्टीसोल स्तर (तनाव हार्मोन जो तनाव की प्रतिक्रिया में बढ़ जाता है) कम हो जाता है। इसी प्रकार, ‘वमन’ चिकित्सा लिपिड पेरोक्सीकरण (एक प्रक्रिया जिसमें मुक्त कण कोशिका की झिल्लियों में वसा को हानि पहुँचाते हैं जिसे ऑक्सीडेटिव तनाव का एक सूचक माना जाता है) को काफ़ी कम कर देती है और साथ ही कैटालेज़ एंज़ाइम (एक एंटीऑक्सीडेंट एंजाइम जो हाइड्रोजन पॅराक्साइड को तोड़कर कोशिकाओं की रक्षा करता है) की सक्रियता को बढ़ाती है। इसके अलावा, ‘विरेचनचिकित्सा अत्यधिक यकृत ग्लूकोज़ उत्सर्जन (यकृत द्वारा रक्त प्रवाह में ग्लूकोज़ का उत्सर्जन) को कम करके चयापचय मानकों में सुधार कर सकती है जिससे रक्त शर्करा स्तर को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने में मदद मिलती है। ‘बस्ति’ चिकित्सा को आयुर्वेद में इसके व्यापक प्रणालीगत प्रभाव के कारण ‘सभी उपचारों का आधा हिस्सा’ माना जाता है। इसने भी प्रतिरक्षा-संशोधक प्रभाव को दर्शाया है जैसे टी-हेल्पर प्रतिरक्षा कोशिकाओं (कोशिकाएँ जो प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने में सहायक हैं) को नियंत्रित करना और सूजन बढ़ाने वाले साइटोकाइन स्तरों (साइटोकाइन एक संकेतन प्रोटीन हैं जो सूजन को बढ़ाता है) को कम करना। अभी काफ़ी काम किया जाना बाकी है। उदाहरण के लिए, व्यवस्थित निरीक्षण से ज्ञात हुआ है कि हृदय रोग संबंधी हज़ारों आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों में से केवल एक जड़ी-बूटी ‘अर्जुन’ के चिकित्सकीय प्रयोग के पर्याप्त आँकड़े उपलब्ध हैं जिस पर मेटा-विश्लेषण किया जा सका और हृदय स्वास्थ्य पर इसके सकारात्मक प्रभाव को सिद्ध किया जा सका। यह आयुर्वेदिक उपचारों पर अधिक सुव्यवस्थित, बहु-केंद्रित चिकित्सीय परीक्षणों की तत्काल आवश्यकता को उजागर करता है ताकि यह साबित हो सके कि वे वास्तव में लाभकारी और सुरक्षित हैं और उन्हें आधुनिक हृदय रोग पद्धति में एकीकृत किया जा सके।


स्वास्थ्य का अर्थ केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं है बल्कि यह विचारों की स्पष्टताताज़गी प्रदान करने वाली नींदप्रभावी पाचन और जीवन के प्रति उत्साह से व्यक्त होता है।


एकीकरण की अनिवार्यता

इस सम्मेलन ने इस बात का समर्थन किया कि केवल बीमारी होने पर इलाज करने के बजाय एकीकृत, निवारक देखभाल की जानी चाहिए। इसमें शाकाहारी पोषण, शारीरिक गतिविधि और तनाव कम करने पर ज़ोर दिया गया ताकि हृदय की रक्त वाहिकाओं में बनी रुकावटों को हटाया जा सके।

 

bringing-medicine-divide-4.webp

 

प्रमाणों से पता चला कि योग, ध्यान और विशेष रूप से हार्टफुलनेस ध्यान हृदय संबंधी तनाव को कम करते हैं, तंत्रिका तंत्र का नियमन करते हैं तथा भावनात्मक संतुलन एवं स्थिरता को बढ़ाते हैं। विशेष रूप से, ये अभ्यास प्रतिरक्षा तंत्र को मज़बूत करते हुए सूजन और थकान को कम करते हैं। इसके अतिरिक्त, जीवनशैली और खान-पान की आदतों को सरल बनाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। उदाहरण के लिए, पाचन क्रिया को आराम देने के लिए भोजन की आवृत्ति कम करने से वज़न नियंत्रण और रक्त शर्करा नियंत्रण में सुधार देखा गया है जिससे पारंपरिक पद्धतियाँ वर्तमान चयापचय विज्ञान के अनुरूप हो जाती हैं।

चुनौतियाँ और निवारक देखभाल

विभिन्न प्रस्तुतियों में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि एकीकृत, निवारक पद्धतियाँ - जिनमें सटीक दवा, शाकाहारी पोषण, शारीरिक गतिविधि, तनाव प्रबंधन और अच्छी नींद लेने की आदतें शामिल हैं - हृदय रोग को रोक या ठीक कर सकती हैं। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि हृदय गति की परिवर्तनशीलता भावनात्मक और तंत्रिका तंत्र के नियमन को प्रदर्शित करती है।

वैश्विक स्वास्थ्य संकट का सामना करना

सम्मेलन के समापन दिवस पर वक्ताओं ने असंक्रामक और हृदय रोग के बढ़ते वैश्विक संकट पर चर्चा की जिसमें भारत जैसे देशों में समय से पहले होने वाले हृदय रोग मामलों की चिंताजनक दर पर विशेष ध्यान दिया गया। वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस समस्या से निपटने के लिए केवल बेहतर दवाएँ या निदान तकनीकें पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए एक समग्र, नैतिक और जन-केंद्रित स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की आवश्यकता है जो सामाजिक निर्धारकों, पर्यावरणीय प्रभावों और जीवनशैली से जुड़े रोगों के मूल कारणों का समाधान करें।

इस एकीकृत दृष्टिकोण को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करते हुए वक्ताओं ने पारंपरिक भारतीय पद्धतियों की वैज्ञानिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला, जिसमें पंचकर्म चिकित्सा पर उभरते प्रमाण और आयुर्वेदिक हृदय-रक्षक औषधियों के ठोस नैदानिक सत्यापन की तात्कालिक आवश्यकता शामिल थी। सम्मेलन में आधुनिक एकीकृत नवाचारों - जटिल मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के लिए नॉन-इनवेसिव (शरीर को नुकसान पहुँचाए बिना बाहर से ही किया गया इलाज) तंत्रिका तंत्र को संशोधित करने की तकनीकों से लेकर आयुर्वेद के सफल एकीकरण तक, जो सटीक पोषण के साथ मिलकर चयापचय संबंधी विकारों का समाधान करता है - को भी प्रदर्शित किया गया।


विभिन्न प्रस्तुतियों में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि एकीकृतनिवारक पद्धतियाँ - जिनमें सटीक दवाशाकाहारी पोषणशारीरिक गतिविधितनाव प्रबंधन और अच्छी नींद लेने की आदतें शामिल हैं - हृदय रोग को रोक या ठीक कर सकती हैं। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि हृदय गति की परिवर्तनशीलता भावनात्मक और तंत्रिका तंत्र के नियमन को प्रदर्शित करती है।


bringing-medicine-divide-5.webp

 

व्यवहारिक और आंतरिक स्वास्थ्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के रूप में सामने आए। वक्ताओं ने बताया कि शोध से पता चला है कि प्राणायाम और शरीर से जुड़ी मनोविज्ञान की विधियाँ शरीर के तंत्रों को संतुलित और नियंत्रित करती हैं। एक वक्ता ने साँस लेने के तरीकों (Breath prints) के माध्यम से उपचार की बात की। वक्ताओं ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए लंबे समय तक चलने वाले और व्यवस्थित तरीके से बनाए गए कार्यस्थल स्वास्थ्य कार्यक्रमों को प्राथमिकता के रूप में माना। चर्चाओं के दौरान प्रतिभागियों ने सहमति व्यक्त की कि वास्तविक प्रगति के लिए नए सहयोगात्मक दृष्टिकोणों की आवश्यकता होगी। उन्होंने तर्क दिया कि सफलता के लिए मन में गहराई से जमे हुए उन तीन विखंडनों पर विजय पाना आवश्यक है जिन्हें एक प्रस्तुतकर्ता ने नाम दिया - ज्ञानमीमांसीय (पश्चिमी विज्ञान को सत्य का एकमात्र निर्णायक मानना), संस्थागत (खंडित शासन व्यवस्था) और साक्ष्य-आधारित (सामुदायिक स्तर पर अमल करने योग्य अनुसंधान का अभाव)। विभिन्न चिकित्सा ज्ञान पद्धतियों को सचमुच एकसाथ मिलकर कार्य करने में सक्षम बनाकर ही एकीकृत और प्रभावी स्वास्थ्य देखभाल नीति उभर सकती है।


सम्मेलन ने उस भावना को मूर्त रूप दियाजिसे एक प्रतिभागी ने “चिकित्सा पद्धति और आध्यात्मिकता दोनों पर जीवन-परिवर्तनकारी प्रभाव” बताया। यह याद दिलाता है कि उपचारअपने सच्चे अर्थों मेंहृदय से शुरू होता है।


संपूर्णता की परिकल्पना

एक संदेश जो पूरे समय गूँजता रहा, वह यह था कि स्वास्थ्य सेवा का भविष्य एकीकरण में निहित है - पूरब बनाम पश्चिम नहीं बल्कि विखंडन के स्थान पर समग्रता। आधुनिक विज्ञान की सटीकता को प्राचीन ज्ञान की गहराई के साथ मिलाकर चिकित्सा रोग के उपचार से आगे बढ़कर संपूर्ण कल्याण को पोषित कर सकती है। यानी यह मनुष्य के संपूर्ण विकास और खुशहाली के प्रति साझा प्रतिबद्धता के साथ शरीर, मन और चेतना के सामंजस्य को बढ़ावा दे सकती है।

एक प्रतिभागी ने कहा, “दाजी के संदेश के साथ समाप्त हुई पहली रात की बातचीत ने एलोपैथिक, आयुर्वेदिक और उच्च चेतना के लिए ध्यान के एकीकरण की शुरुआत के लिए मंच तैयार किया, जिससे उपचार के ऐसे नए तरीके सामने आएँगे जो तीनों व्यक्तिगत रूप से हासिल नहीं कर सकते।”

 

bringing-medicine-divide-6.webp

 

यह दूरदर्शिता हार्टफुलनेस के संस्थापक दाजी के एकता के आह्वान से मेल खाती है। सम्मेलन ने उस भावना को मूर्त रूप दिया, जिसे एक प्रतिभागी ने “चिकित्सा पद्धति और आध्यात्मिकता दोनों पर जीवन-परिवर्तनकारी प्रभाव” बताया। यह याद दिलाता है कि उपचार, अपने सच्चे अर्थों में, हृदय से शुरू होता है।

1 यह लेख ईशाप्रसाद भागवत, मार्गरेट शेन्कमैन, कृष्णमूर्ति जयन्ना, जसविथा बालाजी और रघुवीर एस.एन के बहुमूल्य योगदान से लिखा गया है। हम उनके सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हैं।


Comments

मीनू तिवारी

मीनू तिवारी

डॉ. मीनू तिवारी चैपल हिल में यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉर्थ कैरोलिना में आर्थिक विकास और राजनीतिक अर्थशास्त्... और पढ़ें

डॉ. हेस्टर ओ'कॉनर

डॉ. हेस्टर ओ'कॉनर

डॉ. हेस्टर ओ'कॉनर एक नैदानिक मनोवैज्ञानिक हैं। वे कान्हा शांतिवनम्... और पढ़ें

उत्तर छोड़ दें