इस लेख में दाजी इस बात पर प्रकाश डाल रहे हैं कि सजगता कैसे दैनिक जीवन में सही काम करने के लिए आधार बनती है।
प्रत्येक व्यक्ति में, चाहे वह किसी भी व्यवसाय में हो – बढ़ई हो, गृहिणी हो, शिक्षक हो या किसी कंपनी का उपाध्यक्ष हो – एकाग्रता से काम करने की एक विशेष क्षमता होती है। दिलचस्प बात यह है कि इस क्षमता का काम से ज़्यादा लेना-देना नहीं है, बल्कि व्यक्ति की जागरूकता और सजगता से है।
एक बहुराष्ट्रीय निगम की वरिष्ठ उपाध्यक्ष बहुत सारे आँकड़े और अपने पदाधिकार के साथ एक मीटिंग की अध्यक्षता कर सकती है, फिर भी वह, जो उसके आसपास घटित हो रहा है, उससे अनभिज्ञ रह सकती है। वह लोगों के अप्रकट मनोभावों, मौन तनाव और उभरती हुई ज़रूरतों को समझने से चूक सकती है क्योंकि उसका मन दूसरी चिंताओं में उलझा होता है। इसके विपरीत आप एक भीड़भाड़ वाले आपातकालीन कमरे में काम करने वाली एक नर्स को देखते हैं जो परिस्थिति के प्रति गहन जागरूकता रखती है। वह पूरी तरह से उपस्थित होती है और बहुत संवेदनशील होती है। वह छोटे-छोटे बदलावों को तुरंत पकड़ लेती है - जैसे रोगी की साँसों में बदलाव, सहकर्मी की हिचकिचाहट, बोलने के अंदाज़ में बदलाव - और सहज रूप से सटीकता एवं परवाह की भावना से प्रतिक्रिया देती है। अंतर इन दोनों की बुद्धिमत्ता में नहीं, बल्कि उनकी जागरूकता में है। जागरूकता वास्तविकता को, जैसे-जैसे वह प्रकट होती है, अनुभव करने, महसूस करने और उसके प्रति प्रतिक्रिया देने की क्षमता है।
आध्यात्मिक साधकों में एक सामान्य गलतफ़हमी होती है कि एकाग्रता साधन है और ध्यान उसका लक्ष्य। कई जिज्ञासु मुझसे कहते हैं कि उन्हें ध्यान केंद्रित करने के लिए बहुत ज़ोर लगाना पड़ता है। उनका मानना है कि प्रयास से ही ध्यानमग्नता प्राप्त होगी। यह भ्रम अक्सर इन निर्देशों से और बढ़ जाता है - “अपने हृदय पर ध्यान केंद्रित करो” या “किसी बात के बारे में मत सोचो।” लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। एकाग्रता ध्यान का स्वाभाविक परिणाम है न कि उसका कारण।
सच्ची एकाग्रता तब उत्पन्न होती है जब धारणा (एकाग्रता) ध्यान में परिपक्व होती है और ध्यान समाधि या लयावस्था में। एकाग्रता को बलपूर्वक प्राप्त नहीं किया जा सकता। जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं तब यह स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है।
यही बात सजगता पर भी लागू होती है। एकाग्रता की ही तरह इसे भी इच्छाशक्ति से उत्पन्न नहीं किया जा सकता। दोनों ही तकनीक नहीं बल्कि परिणाम हैं, जो जागरूकता में बाधाओं को दूर करने पर स्वाभाविक रूप से प्राप्त होते हैं। हमें बस अपने भीतर सही हालत विकसित करने का प्रयास करना चाहिए जिससे सजगता व एकाग्रता स्वतः उत्पन्न हो जाएँगी।
सच्ची एकाग्रता तब उत्पन्न होती है जब धारणा (एकाग्रता) ध्यान में परिपक्व होती है और ध्यान समाधि या लयावस्था में। एकाग्रता को बलपूर्वक प्राप्त नहीं किया जा सकता। जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं तब यह स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है।
ध्यान देना सक्रिय है, जागरूकता निष्क्रिय है
जब आप वास्तव में किसी चीज़ में रुचि रखते हैं तब क्या उस पर ध्यान देना आसान नहीं होता? उसमें शायद ही कोई प्रयास करना पड़ता है। नींद से वंचित एक माँ तूफ़ान में भी सो सकती है लेकिन अपने बच्चे की हलकी सी रोने की आवाज़ से जाग जाती है। एक संगीतकार सूक्ष्म बेसुरेपन को भी पकड़ लेता है जिसे एक अप्रशिक्षित श्रोता नहीं जान पाता। कई बार आपको अपनी सतर्कता बढ़ी हुई प्रतीत होती है। कल्पना कीजिए कि आप रात में अकेले जंगल में चल रहे हैं। आपको ज़मीन पर पड़ी टहनी के टूटने की आवाज़ सुनाई दे जाती है, आपकी आँखें पेड़ों के बीच हो रही छोटी से छोटी हरकत को भी पकड़ लेती हैं। आत्म-सुरक्षा की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण आप इतने चौकन्ने रहते हैं कि किसी भी हरकत को पकड़ने से नहीं चूकते।
जो चीज़ें हमारे लिए सच में मायने रखती हैं, उनके बारे में हम बिना किसी प्रयास के भी जागरूक रहते हैं। इसलिए, यह सोचने के बजाय कि हम ज़्यादा सजग कैसे बनें, आपको यह प्रश्न पूछना चाहिए कि वास्तव में मेरी रुचि किस चीज़ में है?
आपकी एकाग्रता आपके ध्यान देने से पहले आ जाती है।
दूसरी ओर, जागरूकता एक ऐसी क्षमता है जो हमारे भीतर मौजूद है। यह अस्तित्व की एक निष्क्रिय व ग्रहणशील अवस्था है जो तब उत्पन्न होती है जब प्रयास, संघर्ष और हस्तक्षेप समाप्त हो जाते हैं - इसलिए नहीं कि रुचि खत्म हो जाती है बल्कि इसलिए कि रुचि अब पकड़ने या नियंत्रित करने के रूप में ज़ाहिर नहीं होती। पकड़ने की प्रवृत्ति किसी नतीजे को पाने या किसी अनुभव को सुरक्षित करने का प्रयास करती है जबकि समर्पित रुचि कुछ भी हासिल करने या माँग के बिना बस ग्रहणशील रहती है। जब मन अनुभव को नियंत्रित करने या पाने की कोशिश करना बंद कर देता है तब जागरूकता स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाती है। तब विचार, भावनाएँ और संवेदनाएँ बिना किसी प्रतिरोध के उत्पन्न होते हैं और विलीन हो जाते हैं। इस खुलेपन में अनुभव अपने आप स्पष्ट हो जाता है। यदि किसी का हृदय दिव्य सत्ता के प्रति समर्पित है तो उसकी यह आंतरिक स्पष्टता दिव्य सत्ता की उपस्थिति को भीतर अनुभव करने और उसके मार्गदर्शन को समझने की क्षमता प्रदान करती है। यह अक्सर पहले एक सूक्ष्म हरकत या स्पंदन के रूप में महसूस होती है जिसे मन बाद में समझने लगता है। धर्म के अनुसार जीने के लिए समर्पित व्यक्ति इसी स्पष्टता के साथ हर समय अपने कर्तव्य के प्रति संवेदनशील रहता है।
इसीलिए आंतरिक शुद्धि आवश्यक है। जैसे-जैसे संस्कार मिटते जाते हैं हृदय साफ़ होता जाता है और प्रतिस्पर्धा करने वाली इच्छाओं का शोर शांत हो जाता है जिससे एक स्वाभाविक और गहरी रुचि, जो पहले छिपी हुई थी, प्रकट होने लगती है। जब इच्छाओं की खींचतान कम हो जाती है तब अनुभव से एक ही तरीके से जुड़ने का हमारा हठ स्वाभाविक रूप से खत्म हो जाता है। अतः जब आंतरिक रुचि स्पष्ट होती है तब यह पहचानना आसान हो जाता है कि हमारी जागरूकता सच में किस के लिए होनी चाहिए।
सजग रहना हमारा धर्म है
एक सचेत हृदय को धर्म स्पष्ट दिखाई देता है - प्रयासपूर्ण एकाग्रता से नहीं बल्कि एक सजग, ग्रहणशील जागरूकता से। ऐसी जागरूकता पूर्वाग्रह, भावनात्मक प्रतिक्रिया, स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों और उत्साहहीनता से मुक्त होती है। यह वास्तविकता को वैसे ही देखती है जैसी वह है जो हमारी इच्छाओं, भय या अनुकूलन से प्रभावित नहीं होती। ऐसी स्पष्टता विकसित होने से सही कर्म स्वाभाविक रूप से और प्रयासरहित होता है।

एक प्रभावशाली उदाहरण मन में आ रहा है जो महाभारत से है। वनवास के दौरान पांडव जंगल में एक झील के पास पहुँचे जिसकी रखवाली एक अदृश्य यक्ष कर रहा था। उससे पांडवों का सामना हुआ। युधिष्ठिर के भाइयों ने उस अदृश्य आवाज़ को अनसुना कर दिया जिसने उन्हें पानी पीने से पहले उसके कुछ प्रश्नों के उत्तर देने के लिए कहा था। प्रश्नों के उत्तर न देने के कारण वे सब अचेत हो गए। केवल युधिष्ठिर रुके और उन्होंने सुना। उन्होंने धर्म के बारे में उस आवाज़ के प्रश्नों का उत्तर दिया लेकिन उनका अधिक महत्वपूर्ण उत्तर पहले ही उनकी जागरूकता और उपस्थिति से ज़ाहिर हो चुका था।
सच्ची सजगता ज़बरदस्ती की जाने वाली निगरानी नहीं है बल्कि आंतरिक शुद्धि से पैदा हुई सहज जागरूकता है। यह गतिशील धर्म है - स्पष्ट देखना तथा सही प्रतिक्रिया देना। यह आदर्शवाद नहीं है बल्कि एक व्यावहारिक सच्चाई है जिसे परंपरा ने लंबे समय से बनाए रखा है। और यह सच्चाई है - आंतरिक बदलाव बाहरी जीवन को आकार देता है, चेतना मूल तत्व है और सजगता धार्मिक जीवन का आधार है। जब आंतरिक रुकावटें दूर हो जाती हैं तब यह स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। दूसरे भाई अहंकार के कारण असफल नहीं हुए बल्कि इसलिए हुए क्योंकि वे सचेत नहीं थे। उन्होंने चेतावनी तो सुनी लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया।
यह प्राचीन घटना हमारी वर्तमान सच्चाई को प्रतिबिंबित करती है। कितनी बार हम उस मौन आंतरिक चेतावनी को अनसुना कर देते हैं जो समय-समय पर मिलती रहती है? कितनी बार सुख, सफलता या आराम पाने की हमारी लालसा रुकने और जागरूक होने की पुकार को दबा देती है?
सजगता ही सच्ची आध्यात्मिक शांति को आलस्य से अलग करती है। एक साधक जो शांत तो है लेकिन आलसी है, उसने बस एक कमी को दूसरी कमी से बदल लिया है। फिर भी सजगता ज़बरदस्ती थोपी नहीं जा सकती। अत्यधिक निगरानी सिर्फ़ तनाव पैदा करती है स्पष्टता नहीं। सच्ची सजगता स्वाभाविक रूप से तभी प्रकट होती है जब चेतना शांत और तनाव-रहित होती है।
सजगता की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति
सच्ची सजगता वह अवस्था है जब मन पूरी तरह से जाग्रत होता है और निरंतर भटकाव से मुक्त होता है। वह उस मन में झलकती है जो बिना किसी तनाव के वर्तमान में उपस्थित रहता है। तब बिना किसी भटकाव या प्रतिरोध के अनुभव प्रकट होता है। यह एक शांत, खुली और ग्रहणशील जागरूकता है जैसे एक साफ़ आसमान जो हर चीज़ के लिए खुला है। ऐसी जागरूकता होने पर अनुभव स्वतंत्रता से आते-जाते रहते हैं। उन्हें न तो पकड़े रखने की कोशिश की जाती है और न ही उनसे बचने की।
सजगता अपने आप में हर जगह फैले प्रकाश की तरह है। जब यह उद्देश्य के साथ जुड़ती है तब यह केंद्रित अवधान बन जाती है। इसी में यह सूक्ष्म सच्चाई छिपी है - उद्देश्य अवधान को आकार देता है और अवधान धर्म को उद्घाटित करता है।
एक सचेत हृदय को धर्म स्पष्ट दिखाई देता है - प्रयासपूर्ण एकाग्रता से नहीं बल्कि एक सजग, ग्रहणशील जागरूकता से। ऐसी जागरूकता पूर्वाग्रह, भावनात्मक प्रतिक्रिया, स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों और उत्साहहीनता से मुक्त होती है। यह वास्तविकता को वैसे ही देखती है जैसी वह है जो हमारी इच्छाओं, भय या अनुकूलन से प्रभावित नहीं होती।
लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर है - यदि सजगता धर्म का मूल है और हर व्यक्ति को अपना धर्म निभाना है तो क्या इसका यह मतलब है कि हर व्यक्ति की मनोवृत्ति एक जैसी होना चाहिए? उत्तर है ‘नहीं।’ एक छात्र की जागरूकता एक शिक्षक से अलग होती है। एक भक्त की खोज किसी दार्शनिक की जिज्ञासा से अलग होती है। एक योद्धा की उपस्थिति में एक उपचारक की उपस्थिति से अलग गुण होता है। हर व्यक्ति की भूमिका और जीवन की अवस्था के अनुरूप ही सजगता की अभिव्यक्ति होती है। यह धर्म से अलग नहीं है, बल्कि यह तो धर्म का व्यक्तिगत रूप है। परंपरा इसे ‘स्वधर्म’ कहती है यानी हर व्यक्ति का अपना अनूठा मार्ग।
सच्चे ध्यान के परिणामस्वरूप स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाली जागरूकता से जीवन स्वतः सहजता से व्यक्ति के स्वधर्म के साथ जुड़ जाता है।
उपलब्धता की कला
तत्परता से उपलब्धता उत्पन्न होती है। स्थिरता ही मूलभूत गुण है। यह एक जीवंत संतुलन है जिससे व्यक्ति शांत जीवन जीता है। इससे बिना कठोरता के स्थिरता विकसित होती है। पतंजलि का योगसूत्र ‘स्थिर सुखम् आसनम्’ केवल शारीरिक मुद्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उससे परे जीवन जीने के एक ऐसे तरीके की ओर संकेत करता है जो स्थिर है फिर भी आरामदायक है और परिवर्तन के लिए तैयार है। ऐसी अवस्था व्यक्तित्व को आकार देती है और सूक्ष्म अनुभवों को प्राप्त करने और उन्हें आत्मसात करने के लिए आवश्यक है।
स्थिरता मन और भावनाओं दोनों में काम करती है जिनमें से प्रत्येक को अपनी स्पष्टता की आवश्यकता होती है। मानसिक स्थिरता एक न डगमगाने वाली लौ की तरह विचारों की धारा को स्थिर और अविचलित रखने की क्षमता है। सच्ची मानसिक स्थिरता बलपूर्वक निर्मित नहीं की जा सकती। जब अंदर की बेचैनी दूर हो जाती है तब यह स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है।

भावनात्मक स्थिरता शारीरिक अनुभव और प्रतिक्रिया करने की गहरी आदतों से संबंधित है जो मन से परे काम करती हैं। इसे मानसिक प्रयास से विकसित नहीं किया जा सकता बल्कि हृदय की शुद्धि से किया जा सकता है - उन संस्कारों को साफ़ करके जो अत्यधिक प्रतिक्रियाओं का कारण बनते हैं जिससे धीरे-धीरे प्रतिक्रियाशीलता सचेत जवाबदेही में बदल जाती है। किसी व्यक्ति का मन अनुशासित और केंद्रित हो सकता है फिर भी वह भावनात्मक रूप से अस्थिर रह सकता है, जैसा कि बहुत से अत्यंत बुद्धिमान व्यक्तियों में देखा जा सकता है। इसके विपरीत बेचैन मन के साथ भी भावनात्मक स्थिरता मौजूद हो सकती है। सच्ची आध्यात्मिक परिपक्वता के लिए दोनों में सामंजस्य और स्थिरता की आवश्यकता होती है। यह एक ऐसा संतुलन है जिसे थोपा नहीं जा सकता बल्कि यह स्वाभाविक रूप से ही प्रकट हो सकता है।
हार्टफुलनेस ध्यान में उपलब्धता पहली आवश्यकता है। हमारा कर्तव्य किसी उपलब्धि के लिए प्रयास करना नहीं है, बल्कि यथासंभव आंतरिक स्थिरता और ग्रहणशीलता के साथ उपस्थित रहना है ताकि कृपा वह काम कर सके जो प्रयास से नहीं किया जा सकता। हम बस इस विनीत विचार के साथ बैठते हैं कि दिव्य प्रकाश हमारे हृदय में है और बिना किसी बल प्रयोग या एकाग्रता के आंतरिक रूप से खुद को संयोजित करते हुए ग्रहणशील बने रहते हैं। ग्रहणशील मनोभाव एक साधक के सबसे महत्वपूर्ण गुणों में से एक है।
सच्चे ध्यान के परिणामस्वरूप स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाली जागरूकता से जीवन स्वतः सहजता से व्यक्ति के स्वधर्म के साथ जुड़ जाता है। इससे व्यक्तियों, रिश्तों, समुदायों और अंततः सभ्यताओं का मार्ग भी प्रभावित होता है। प्रयास व्यक्तिगत है लेकिन इसका प्रभाव सार्वभौमिक है। हर कोई जो यह आंतरिक यात्रा करता है, वह न केवल अपनी स्वतंत्रता में बल्कि मानवता के सामूहिक उत्थान में भी योगदान देता है। उस वातावरण को तैयार करके और इन गुणों को विकसित करके हम खुद को कल्पनातीत ढेर सारे आध्यात्मिक उपहार प्राप्त करने के लिए तैयार करते हैं।

